उपन्यास >> शोध शोधतसलीमा नसरीन
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तसलीमा नसरीन का एक और पठनीय उपन्यास
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सुबह हारुन नाश्ता किए बिना ही दफ्तर चला गया। उसने टिफ़िन भी नहीं लिया। चाँदी का डिब्बा, बावर्चीखाने में ही पड़ा रहा।
'दफ्तर में खाओगे क्या?' मैंने पूछा।
उसकी जुबान से कोई आवाज़ नहीं फूटी।
हारुन के जाने के बाद, मैंने घरवालों के लिए नाश्ता तैयार किया। सबको नाश्ता कराने और खुद ख़ाने के बाद, कमरे में आकर मैंने हारुन के कपड़े, रसूनी को धोने के लिए थमा दिए, कमरे के असबाब-पत्तर की झाड़-पोंछ करके, मैं खिड़की के सामने आ खड़ी हुई और आसमान देखती रही! इस घर में फुर्सत के पल मैं इसी तरह गुजारती थी। ब्याह के बाद से मुझे फुर्सत-ही-फुर्सत थी! वैसे यहाँ खाना-वाना बनाने, कपड़े धोने, घर की व्यवस्था वगैरह की देखरेख वही करती है, कुछेक काम तो उसे ख़ुद भी करना पड़ता है, फिर भी, ये सारे काम, कभी मुझे काम ही नहीं लगते। इन सब कामों के लिए रसूनी जो है! उसकी मदद के लिए मेरी सास मौजूद हैं! मैं इन सब कामों में न भी लगें, तो भी गृहस्थी ठीकठाक चलती रहेगी, जैसे पहले चल रही थी। जो-जो काम मैं खुद अपने हाथों से करूँ, तो घरवाले खुश होते थे। वे सारे काम पूरे करने के बावजूद, मेरे हाथों में ढेर सारा वक़्त बचा रहता है। अब मैं इस खाली समय को लेकर क्या करूँ, मुझे क्या करना चाहिए, मुझे सचमुच समझ में नहीं आता। यह खाली वक़्त मुझे ज़हरीले चींटियों की तरह काटती-नोंचती रहती हैं। घर में हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने वाली लड़की मैं कभी नहीं थी। बचपन से ही मैं हर वक़्त उछलती-कदती-दौडती फिरती थी। नपर काफ़ी चप्पी लडकी थी। वह जहाँ बैठती थी, बस, बैठी रहती थी। मुझमें इतना सब्र कभी नहीं रहा। जब मैं छोटी थी, मेरी माँ हम दोनों बहनों को नई फ्रॉक पहनाकर, एक पीर साहब के पास ले गई थीं। नूपुर माँ के साथ बैठी-बैठी, कई घंटों तक उनका प्रवचन सुनती रही ओर मैं वहाँ, आम के बाग में जा पहुँची और आम की सबसे ऊँची डाल से आम तोड़-तोड़कर अपनी फ्रॉक की घेरे में भर लाई। इस हरकत के बाद भी मैं थमी नहीं, मुहल्ले-भर के हमजोली लड़के-लड़कियों के साथ तिकड़ी खेलते हुए, कँटीले
पौधों में उलझकर, अपने कपड़े फाड़कर, कीचड़-कादे में रपटते हुए, मैंने अपनी नई फ्रॉक चौपट कर डाली।
बचपन में ही क्यों, बड़े होने पर भी मेरा खुराफ़ाती और ऊधमी स्वभाव, मेरा साथ छोड़कर कहीं नहीं गया। पेड़ देखते ही पेड़ पर चढ़ने की मेरी सनक, किसी दिन भी नहीं मरी। पोखर-तालाब देखते ही, तैरने की याद भी कभी बेज़ान नहीं हुई!
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