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अंधकार

गुरुदत्त

प्रकाशक : हिन्दी साहित्य सदन प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :192
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 16148
आईएसबीएन :000000000

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गुरुदत्त का सामाजिक उपन्यास

कौड़ियामल्ल हंस पड़ा। हंसकर बोला, "संतजी। इसे जाने दीजिये। मैं गुरुजी की स्मृति में इसकी सेवा कर सुख लाभ करूंगा। कृष्णदास मन से तो यही चाहता था। केवल ऊपर से दिखाने के लिए ही कह रहा था। अत: वह मान गया और सेठजी सूरदास को एक खिलौना समझ साथ ले आये।

सूरदास पन्द्रह वर्ष की आयु में बदायूँ आया और कौड़ियामल्ल की हवेली की भूमि वाले कमरों में एक बड़े से कमरे मैं रहने लगा। कमरे के साथ ही 'स्नानघर' था। इस कारण यह स्थान सूरदास के लिए सुविधा-जनक था।

एक कहार सुन्दर को सूरदास के साथ रहने के लिए नियुक्त कर दिया गया। सुन्दरदास को मकान तो हवेली के बाहर मिला हुआ था। वहां उसकी पत्नी और दो बच्चे रहते थे। परन्तु सूरदास की सहायता के लिए अब उसै एक छोटा-सा कमरा बगल में दे दिया गया, जहां वह दिन भर और कभी-कभी रात के समय भी रहता था।

सूरदास को शास्त्र की शिक्षा पैने के लिये एक आचार्य सोमदेवजी नियुक्त कर दिये गये। एक संगीतज्ञ उसे सुर-ताल-लय का ज्ञान कराने लगे।

अब सन् 1956 था। सूरदार बाईस वर्ष की आयु का युवक हो गया था। वह हवेली के पिछवाड़े में नित्य सायंकाल कथा किया करता था। कथा पहले तो हवेली के भीतर कमरे में ही आरम्भ हुई थी। घर की स्त्रिया और नौकरानियां ही मुनने आती थीं, परन्तु धीरे-धीरे पुरुष वर्ग भी सुनने के लिए आने लगे। जब हवेली के बाहर से लोग आने लगे तो हवेली के पिछवाड़े में कथा करने का प्रबन्ध कर दिया गया। वहां सायंकाल दरी, जाजम बिछा दी जाती थी। एक तख्तपोश पर सूरदास के बैठने का प्रबन्ध हो जाता था। एक हारमोनियम और तबले वाला बुला लिया जाता था। अत: भजन, कीर्तन और कथा दो घण्टा भरसायंकाल हो जाया करती। चार-पांच सौ लोग नित्य एकत्रित हो जाया करते थे।

यों तो जब भी सेठजी बदायूं में होते, कथा सुनने आते थे और प्रकाशचन्द्र भी पिता को प्रसन्न करने आ जाया करता था। परंतु वह घर में और सूरदास की पीठ पीछे उसकी हंसी उड़ाया करता था।

प्रकाशचन्द्र सूरदास से पांच वर्ष बड़ा था और सेठजी के कारोबार में कई वर्ष से भाग लेने के कारण व्यापार में सूझ-बूझ रखता था। ज्यों-ज्यों प्रकाश की अवस्था बड़ी होती जाती थी, सेठजी उस पर अधिक और अधिक निर्भर करते जाते थे। अब प्राय: वह ही बाहर की शाखारों को देखने जाया करता था।

प्रकाशचन्द्र का विवाह कासगंज के एक व्यापारी की लड़की श्रीमती से हुआ था। पत्न्तु उसका गुहस्थ जीवन सुरवी नहीं था। उसके घर कोई सन्तान नहीं हुई थी। सन्तान होने की आशा भी नहीं थी। उसकी पत्नी रुग्ण समझी जाती थी।

एक व्यापारी की बुद्धि रखने से प्रकाशचन्द्र विचार किया करता था कि सूरदास एक निधि है। नित्य सायकाल दो घण्टे पांच-छै: सौ से ऊपर लोग मन्त्र मुग्ध हो उसके प्रवचन सुनने आया करते हैं और लोग इस प्रज्ञा चक्षु की प्रतिभा को मानते हैं। अब तो स्त्रियां अपने शिशुओं को उसके पास लाकर उसका आशीर्वाद लेने लगी हैं। सूरदास का इतना प्रभाव देख प्रकाशचन्द्र विचार किया करता था कि इस प्राणी पर दो सौ रुपया व्यय किया जा रहा है। इससे कुछ काम लेना चाहिए। परन्तु उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या काम इससे लिया जा सकता है।

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    अनुक्रम

  1. प्रथम परिच्छेद
  2. : 2 :
  3. : 3 :
  4. : 4 :
  5. : 5 :
  6. : 6 :
  7. : 7 :
  8. : 8 :
  9. : 9 :
  10. : 10 :
  11. : 11 :
  12. द्वितीय परिच्छेद
  13. : 2 :
  14. : 3 :
  15. : 4 :
  16. : 5 :
  17. : 6 :
  18. : 7 :
  19. : 8 :
  20. : 9 :
  21. : 10 :
  22. तृतीय परिच्छेद
  23. : 2 :
  24. : 3 :
  25. : 4 :
  26. : 5 :
  27. : 6 :
  28. : 7 :
  29. : 8 :
  30. : 9 :
  31. : 10 :
  32. चतुर्थ परिच्छेद
  33. : 2 :
  34. : 3 :
  35. : 4 :
  36. : 5 :
  37. : 6 :
  38. : 7 :
  39. : 8 :
  40. : 9 :
  41. : 10 :

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