चंचरीक - गुरुदत्त Chanchreek - Hindi book by - Gurudutt
लोगों की राय

सामाजिक >> चंचरीक

चंचरीक

गुरुदत्त

प्रकाशक : हिन्दी साहित्य सदन प्रकाशित वर्ष : 1992
पृष्ठ :128
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5362
आईएसबीएन :0000

Like this Hindi book 8 पाठकों को प्रिय

147 पाठक हैं

एक श्रेष्ठ उपन्यास...

Chanchreek

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रथम परिच्छेद

कमला निर्धन माता-पिता की लड़की थी। उसके पिता एक धनी सेठ के घरेलू नौकर थे, इस कारण ये भी धनियों के एक मुहल्ले में रहते थे। साधु के मालिक लाला हरसुखराय ने अपने घर की सबसे नीचे की मंजिल पर एक कमरा कमला के पिता साधु को परिवार सहित रहने के लिए दे रखा था जिसमें साधु, उसकी लड़की कमला और पत्नी सुलक्षणा रहते थे।
सुलक्षणा, जो मुहल्ले वालों में सुलक्खी के नाम से पुकारी जाती थी, तीन-चार घरों में चौका-वासन करती थी। इस प्रकार अपने घरवाले की आय में वह थोड़ी वृद्धि कर देती थी। साधु हरसुखराय के घर की चौकीदारी और बाजार से सौदा लाने का काम करता था। कमला साधु की एकमात्र सन्तान थी।

सब लड़कियों की भाँति कमला भी लड़कियों के विवाह देखने में बहुत रुचि रखती थी। मुहल्ले में किसी का विवाह होता तो वह वहाँ जाकर देखने लगती। विशेष रूप से लड़की के विदा किए जाने को देखना तो वह टाल ही नहीं सकती थी। कई बार तो विदाई रात के बारह एक बजे होती और वह तब तक जागती रहती। कदाचित् दुलहिन के वस्त्राभूषण उसके लिए आकर्षण का विषय होते थे। धनियों की बेटियाँ धनी श्वसुरालों में जाती थीं और विदाई के समय श्वसुराल के भूषण-वस्त्र पहने हुए लड़की को देखने में किसी भी लड़की के लिए रुचि का विषय होना स्वाभाविक था।

यह तब की बात है जब कमला चार-पाँच वर्ष की आयु की थी। उस समय उसे यह ज्ञान नहीं था कि चौकीदार की लड़की को तो उस सबका पासंग-भर भी नहीं मिल सकता और वह अपने बाल-मन में यह विचार करती प्रतीत होती थी कि एक समय आएगा, जब वह भी उसी भाँति वस्त्रा-भूषणों से सजाई जाएगी। स्त्री वर्ग की सज-धजकर रहने की स्वाभाविक इच्छा कमला के मन में भी थी और वह यही समझती थी कि विदा होने वाली लड़की अपने जीवन में सबसे अधिक सजाई जाती है।
वस्त्राभूषणों का यह आकर्षण सात-आठ वर्ष की अवस्था तक बना रहा। आकर्षण तो इसके पश्चात भी था, परन्तु अब उसको इस व्यर्थता का भास भी होने लगा था। वह समझने लगी थी कि चौकीदार पिता और चौका-वासन करने वाली माता की लड़की को वह सब कदापि नहीं मिल सकेगा, जो उस मुहल्ले की हवेलियों में रहने वाली लड़कियों को प्राप्त होता है। जैसे-जैसे उसको इस बात का ज्ञान होता जाता था कि ऐसा कुछ भी उसके लिए उपलब्ध होने वाला नहीं है तो उसकी रुचि वस्त्राभूषण देखने में कम हो जाती थी। फिर भी वह लड़कियों के विवाह के समय विदाई देखने जाती थी। विदाई के समय लड़की के माता-पिता और सम्बन्धियों को रोते देखना और उनके रोने में सम्मिलित होना भी रसमय कार्य था।
जब वह दस-ग्यारह वर्ष की हुई तो उसको अपने रोने पर विस्मय होने लगा। वह विचार करती थी कि लड़कियाँ तो पत्नी बनने के पश्चात् बहुत प्रसन्न और सुखी हो जाती हैं, तो फिर उनके माता-पिता के घर से विदा होने के समय रोना तो अर्थहीन है। उसके ज्ञान में लड़कियाँ पत्नी बनने पर सुखी अधिक होती थीं। कोई बिरली ही दुखी प्रतीत होती थी। इस बात का ज्ञान होने पर उसको अपने और विदा होने वाली लड़कियों के सम्बन्धियों के रोने पर विस्मय होने लगा था। फिर भी समय आने पर वह जाती थी और रोती भी थी।

जब वह चौदह वर्ष की आयु की हुई तब भी ऐसे अवसरों पर लड़की के वस्त्राभूषणों को देखने की लालसा तथा दुलहिन की शोभा देखने की उत्कण्ठा तो बनी ही थी। विदाई के समय का स्वाभाविक रोना भी होता था, परन्तु अब तो ऐसे अवसरों पर इन सबसे अधिक आकर्षण का विषय वर की सज-धज और रूप-राशि बनने लगा था। वह अब मन में दुलहिन से अधिक वर को देखने की लालसा अनुभव करने लगी थी।
दूसरे के वर को देख उसके मन में अपने अज्ञात वर का विचार उठने लगता। अपने इस विचार पर वह मन-ही-मन लज्जा भी अनुभव करती थी। मुहल्ले की लड़कियाँ भी वर के विषय में परस्पर चर्चा करती थीं। यद्यपि वे उसको तो कभी बताती नहीं थीं, तो भी वह प्रायः उसकी परस्पर की बातों को सुनती और अपने मन में स्वयं ही स्वप्न देखने लगती थी।
कमला की माँ सुलक्खी को अपनी लड़की के मनोभावों का ज्ञान होने लगा तो उसको उसके विवाह की चिन्ता होने लगी। एक रात कमला मुहल्ले की एक लखपति की लड़की की विदाई कर ग्यारह बजे घर लौटी और प्रातः तीन बजे तक खाट पर करवटें लेती रही। सुलक्खी ने यह देखा तो अगले दिन अपने पति से बोली, ‘‘अब तो कमला के लिए घर-वर ढूँढ़ना चाहिए।’’

‘‘देख रहा हूँ सुलक्खी ! परन्तु कुछ सूझ नहीं रहा। एक भूल करता रहा हूँ। गाँव से आए सोलह वर्ष हो गए और तब से मैं एक बार भी वहाँ नहीं गया। अब तो वहाँ कोई परिचित भी नहीं रहा होगा। फिर भी विचार कर रहा हूँ कि एक दिन जाऊँ और किसी से बात करके देखूँ।’’
‘‘हाँ, लालाजी से एक सप्ताह की छुट्टी ले लो और कुछ निश्चय करके ही आना। अब देरी करना उचित नहीं। लड़की को रजस्वला होते दो वर्ष से ऊपर हो गए हैं। अब तो विचारों में भी यौवन प्रस्फुटित होने लगा है। मैं समझती हूँ कि अब लड़की के हाथ रँगने का समय आ गया है।’’
साधु उसी दिन लाला हरसुखराय की दुकान पर जा पहुँचा। लालाजी एक बहुत बड़े तकिये का सहारा लिए एक पत्र पढ़ रहे थे। साधु हाथ जोड़ सामने जा खड़ा हुआ। लालाजी पत्र पढ़ने में लीन होने के कारण उसे देख नहीं रहे थे।
लालाजी का लड़का रामसहाय कहीं बाहर से आया और साधु को हाथ जोड़े खड़ा देख विस्मय से विचार करने लगा। उसके पिताजी अपने ही ध्यान में लीन थे। अतः उसने उनका ध्यान आकर्षित करने के लिए कहा, ‘‘लालाजी !’’

हरसुखराय का ध्यान भंग हुआ। उसने लड़के की ओर देखा तो रामसहाय ने साधु की ओर संकेत कर दिया और स्वयं जूता उतारकर पिताजी के समीप बैठ गया। वह विस्मय कर रहा था कि आज साधु किस काम के लिए आया है। साधु दुकान पर बहुत कम आता था और इस प्रकार इस मुद्रा में खड़ा तो पहली बार देखा गया था।
लाला हरसुखराय साधु को यों खड़ा देखकर पूछने लगे, ‘‘क्या बात है साधु ?’’
‘‘लालाजी ! मैं छः-सात दिन की छुट्टी चाहता हूँ।’’
‘‘क्यों, क्या बात है ?’’ अपनी नौकरी के काल में साधु के छुट्टी माँगने का यह पहला ही अवसर था।
‘‘कोई विशेष बात नहीं। लड़की सज्ञान हो रही है। उसके विवाह का प्रबन्ध करने गाँव जाना चाहता हूँ।’’
‘‘कहाँ है गाँव तुम्हारा ?’’ लालाजी तो भूल ही गए थे कि साधु कभी किसी गाँव से आया था। पिछले सोलह वर्ष में एक बार भी तो वह गाँव नहीं गया था।
‘‘बहुत दूर तो नहीं है। बागपत के समीप ही है।’’

‘‘तो किसी लड़के का पता चला है वहाँ ?’’
‘‘अभी तो पता नहीं मिला। हाँ, वहाँ कदाचित् कोई परिचित मिल गया तो कोई न-कोई प्रबन्ध हो ही जाएगा।’’
हरसुखराय हँस पड़ा। हँसकर कहने लगा, ‘‘तो गाँव के तालाब में मछली पकड़ने जा रहे हो ? परन्तु साधु ! बंसी के काँटे से क्या लगाकर चले हो ?’’
‘‘साधु इस व्यंग्य का अर्थ नहीं समझा। लालाजी ने उसको टुकुर-टुकुर देखते पा अपने प्रश्न का आशय समझाने के लिए कहा, ‘‘लड़की को देने के लिए कितना कुछ जमा कर रखा है ?’’
‘‘लालाजी ! आपकी कृपा से कुछ तो जमा किया ही है।’’
‘‘तो यहाँ सागर में ही बंसी क्यों नहीं लगा लेते ?’’

‘‘साधु फिर समझने का प्रयत्न करता हुआ चुप रहा। लालाजी ने मन में समझा कि यह तो निरा बुद्धू ही है। रामसहाय साधु के बात न समझने पर मुस्करा रहा था। हरसुखराय ने उसको कहा, ‘‘जरा इसको समझाना।’’
रामसहाय ने साधु को बैठने को कहा। जब साधु बैठ गया तो उसने कहा, ‘‘साधु काका ! लालाजी के कहने का मतलब यह है कि गाँव तो एक तलैया की भाँति बहुत छोटा स्थान है। इस नगररूपी सागर को छोड़कर उस छोटी तलैया में मछली पकड़ने जाने की आवश्यकता नहीं। यहीं ढूँढ़ोगे तो कोई-न-कोई मिल जाएगा। जब तुम्हारे पास दहेज में देने को कुछ है, तो गाँव में जाने की आवश्यकता नहीं है।’’
‘‘पर भैया ! यहाँ के मगरमच्छ इस चौकीदार की चून-भून की ओर देखेंगे भी नहीं।’’
अब फिर लालाजी ने पूछ लिया, ‘‘कितना कुछ इकट्ठा कर रखा है ?’’
‘‘ठीक-ठीक तो नहीं बता सकता। सुलक्खी के पास ही सब-कुछ रखा है। फिर भी मैं समझता हूँ कि डेढ़ हजार के लगभग होगा।’’

‘‘सत्य ?’’ लालाजी तो इतने कुछ की आशा नहीं करते थे। परन्तु वे यह भूल रहे थे कि पिछले सोलह वर्ष में उनके पास बीस, तीस लाख जमा हुआ था।
‘‘हाँ लालाजी ! होगा तो इससे कुछ अधिक ही, परन्तु कुछ कमला की माँ अपने पास रखने की इच्छा करेगी।’’
‘‘तो ऐसा करो, घर लौट जाओ। मालकिन से पूछकर साग-भाजी ले जाओ। आज सायंकाल तुम्हारी जात-बिरादरी की एक मछली तुम्हारी बंसी में फँसा दूँगा।’’
अब तो मछली तथा बंसी की बात साधु समझ गया था। उसने खड़े हो, हाथ जोड़ कह दिया, ‘‘लालाजी ! तनिक कमला की माँ को भी लड़का दिखाना होगा।’’

‘‘हाँ-हाँ। तुम दोनों को दिखा देंगे। कहो तो कमला को भी दिखाया जा सकता है ?’’
इससे तो साधु के गालों पर लाली दौड़ गई। वह यह तो जानता था कि धनी-मानी लोगों में न केवल वर को ही वधू दिखाते हैं, प्रत्युत वर को भी वधू द्वारा पसन्द कराने में आपत्ति नहीं करते। लालाजी की अपनी ही लड़की के संयोग की बात उसको याद थी। सगाई से भी पहले लड़का घर पर आया था और लड़की के साथ बैठकर चाय पी गया था। लड़के के पिता ने तो दहेज में मिलने वाली धनराशि को स्वीकार किया था और लड़के ने लड़की के रूप-लावण्य और बातचीत के ढंग को पसन्द किया था। परन्तु साधु को अपने जैसे निर्धन के लिए यह सब-कुछ उपयुक्त प्रतीत नहीं हो रहा था। उसको इस सुझाव पर ही लज्जा आई थी। फिर मुस्कराते हुए कहने लगा, ‘‘वह बेचारी क्या देखेगी ! आप जो कहेंगे वह उसको ब्रह्म वाक्य मानकर स्वीकार करेगी।’’

:2:


उसी सायंकाल लालाजी एक अपरिचित युवक को साथ लेकर आए और नीचे की मंजिल पर बैठक खोल उसको बैठाकर साधु को बुलाने लगे। लालाजी ने साधु को समीप बैठाकर कहा, ‘‘यह हमारी दुकान पर सुन्दर पल्लेदार का लड़का मोहनलाल है। पिछले वर्ष दसवीं श्रेणी की परीक्षा पास की है और अब बड़े लाट के दफ्तर में काम करता है। पचपन रुपया महीना वेतन पाता है। यह जाति का कहार है और पेशे से बाबू है। बताओ, करूँ बात पक्की ?’’
‘‘लालाजी ! सुलक्खी को बुला लूँ ?’’
‘‘हाँ बुला लो।’’
साधु गया और पत्नी को आवाज देकर बोला, ‘‘सुलक्खी ! तनिक बाहर आना।’’
सुलक्खी ने समझा तो कमला को रोटी देखने के लिए लिए कह उठी और साफ धुली धोती पहन, बालों को ठीक कर पति के साथ लालाजी की बैठक में चली गई।

कमला को अपने माता-पिता का व्यवहार आज प्रातःकाल से ही विलक्षण प्रतीत हो रहा था। प्रातः वह खाट पर ही लेटी थी कि माँ को पिता के कान में फुसफुसाते देखा था। जब वह मध्याह्न का भोजन तैयार कर रही थी तो पिता मालकिन के साथ साग-भाजी लेकर लौटा। नित्य से वह बहुत देर करके आया था और आते ही उसकी माँ को दूर ले जा कुछ बातें करता रहा था। वह सुन नहीं सकी थी कि उनमें क्या बातें हुई हैं, परन्तु इतना तो वह जान गई थी कि बात उससे कुछ चोरी है। इस वार्तालाप के पश्चात् माँ के मुख पर संतोष और प्रसन्नता दिखाई दी थी। उसने माँ से पूछा, ‘‘माँ ! क्या बात थी ?’’
‘‘तुम्हारे मतलब की नहीं है।’’ माँ ने मुस्कराते हुए कहा था।

अपनी चौदह वर्ष की आयु में पहली बार उसने माँ को कोई ऐसी बात करते देखा था, जो उसके मतलब की नहीं समझी जा सकती थी। अब भी पहले लालाजी ने उसके पिता को बैठक में बुलाया था। तत्पश्चात् पिता उसकी माँ को ले गया। यह सब-कुछ उसकी समझ में नहीं आ रहा था। उसने रोटी तवे से उतारी, घी से चुपड़ी और दूसरी रोटियों के साथ अँगोछे में लपेट दी। तत्पश्चात् चटनी को पथरोटी में डाल, सब-कुछ लटकन पर रख, हाथ धोने के लिए बाहर निकल आई। इसी समय घर के उस कक्ष में से, जिधर बैठक थी, लालाजी, उसके माता-पिता तथा एक लड़का बाहर निकला। लालाजी ने कमला को गुसलखाने की ओर जाते हुए देखा तो पूछ लिया, ‘‘कमला बेटी ! भोजन कर लिया है ?’’

‘‘लालाजी ! अभी नहीं।’’ वह इस अप्रत्याशित प्रश्न का कारण जानने के लिए लालाजी के मुख पर देखने लगी तो उनको ऐसा प्रतीत हुआ कि उनके समीप खड़ा लड़का घूर-घूरकर उसकी ओर देख रहा है। उसने भी लड़के को देखा और जब दोनों की आँखें मिलीं तो कमला, अपने मन के संशय का उत्तर पाए बिना, गुसलखाने की ओर हाथ धोने चली गई।
ये सब लोग घर के बाहर चल गए थे। जब कमला हाथ धोकर लौटी तो उसके माता-पिता अपने कमरे के बाहर खड़े बातचीत कर रहे थे। माँ के मुख से निकला वाक्य कमला ने भी सुना। माँ कह रही थी, ‘‘लड़का अच्छा प्रतीत होता है।’’
‘‘हाँ।’’ पिता का उत्तर था, ‘‘केवल कुछ अभिमानी लगा है।’’

‘‘यह स्वाभाविक है। पढ़-लिख गया है। नौकरी भी करता है।’’
कमला के मन में प्रकाश हो गया। वह समझ गई कि उसके विवाह का प्रबन्ध हो रहा है। उस रात वह खाट पर लेटी तो विचार करने लगी, कदाचित् वही लड़का था जो उसकी ओर घूरकर देख रहा था। वह काले रंग का था। मोटी और चपटी नाक थी और छोटी-छोटी परन्तु तीव्र आँखें थीं। फिर भी उसका मस्तक विशाल और गालें भरी हुई थीं। कद मध्यम और चाल भी ठीक थी। कोई अंग-भंग प्रतीत नहीं होता था।
वह पायजामा, बन्द गले का कोट और पाँव में जूता पहने हुए था। वैसे अस्वीकार करने योग्य तो नहीं था, परन्तु धनी-मानी लड़कों को देखकर वर की जो कल्पना वह बना चुकी थी, उसकी तुलना में तो वह रुपये में एक आना भी नहीं था।

सबसे बड़ी बात, उसके पिता का कहना था कि कुछ अभिमानी प्रतीत होता है। माँ का कहना था कि पढ़-लिख गया है। उसके सम्मुख वह अवगुण कुछ भी गणना नहीं रखता था।
इन्हीं विचारों में वह सो नहीं सकी और रात-भर छत की कड़ियाँ गिनती रही। माँ आज भी उसको जागते देख रही थी। पिछले दिन से अन्तर यह था कि आज वह बेचैन नहीं थी। वह शान्त भाव से लेटी हुई थी।
अगले दिन बात स्पष्ट हो गई। उसकी श्वसुराल की स्त्रियाँ उसे देखने आईं और उसका माथा सूँघ उसको प्यार दे गईं। दो दिन पश्चात् उसका पिता मिठाई का थाल और इक्कीस रुपये लेकर लालाजी के साथ गया तो वह समझ गई कि उसकी भी विदाई उस घर से होनेवाली है। इस विचार के मन में आते ही उसकी आँखें तरल हो गईं। माँ ने देखा तो पूछ लिया, ‘‘क्यों कमला ! आँखें भर क्यों आई हैं ?’’

‘‘कुछ नहीं माँ !’’ वह भूमि की ओर देखती हुई आँसू बहाने लगी।
माँ ने पीठ पर प्यार देते हुए कहा, ‘‘कमला बेटी ! सब लड़कियों के साथ ऐसा ही होता है। उनको माता-पिता को छोड़ अपनी श्वसुराल जाना ही होता है। देखो, घरवाले की मन लगाकर सेवा करोगी तो परम सुख पाओगी। इस लोक में और परलोक में भी सुखी रहोगी।’’
‘‘माँ !’’ उसने साहस पकड़ कह दिया, ‘‘कुछ काले रंग का है।’’
‘‘हाँ, भगवान् भी तो श्यामवर्ण हैं। देखा नहीं उनकी मूर्ति को ? राधा गोरी है और भगवान् श्याम हैं।’’
कमला भी गौरवर्णीय थी। इससे वह चुप रही। वह मन में विचार कर रही थी कि रंग तो भगवान् का-सा ठीक, परन्तु रूप वह नहीं। फिर भी लज्जावश वह कुछ और कह नहीं सकी।

एक मास के भीतर कमला का विवाह हो गया। उसकी डोली भी गई। उसकी विदाई देखने भी मुहल्ले की स्त्रियाँ और लड़कियाँ आईं। कोई रोती नहीं थीं। सब हँसी-मजाक उड़ा रही थीं। उसको मिलने वाला दहेज दिखाया नहीं गया। वह दिखाने योग्य था भी नहीं। उसके श्वसुराल वाले भूषण और वस्त्र लाए थे, जो उसको पहनाए गए थे। वे न तो उसके अपने मन को भाए थे, न ही मुहल्ले की धनवानों की स्त्रियों तथा लड़कियों को। उसका पति भी किसी को भाया अथवा नहीं, वह नहीं जानती थी।
केवल लाला हरसुखराय की पत्नी ने पीठ पर हाथ फेरते हुए कमला के कान में कहा था, ‘‘बेटी ! घरवाले को भगवान् समझ पूजा करना। ईश्वर तुम्हारा कल्याण करेगा।’’
जब से कमला को पता लगा था कि उसका विवाह होनेवाला है, वह अनेकानेक स्वप्न ले रही थी। धीरे-धीरे समय व्यतीत होता गया और स्वप्न, जिनका आधार उस मुहल्ले की लड़कियों के विवाह पर बाजे-गाजे और शान-शौकत थी, विलीन होते गए। इस सब पर तब पटाक्षेप हुआ, जब नाई द्वारा बजाए जाते छैनों के साथ उसकी डोली गली से निकली। वह रो रही थी।



अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book