लेख-निबंध >> औरत का कोई देश नहीं औरत का कोई देश नहींतसलीमा नसरीन
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औरत का कोई देश नहीं होता। देश का अर्थ अगर सुरक्षा है, देश का अर्थ अगर आज़ादी है तो निश्चित रूप से औरत का कोई देश नहीं होता।...
बहुत ज़्यादा पुरुषों को न सही, मैंने काफ़ी पुरुष देखे हैं। क्या एक ही पुरुष काफ़ी नहीं था? चूँकि एक पुरुष काफ़ी नहीं था; इसलिए शौकिया दूसरा पुरुष भी देख लिया। मैंने देखा सभी एक जैसे होते हैं। उँगली पर गिने जाने लायक बस, कुछेक दिन प्रेम। दोनों सिर्फ एक-दूसरे के लिए। तुम्हारे बिना मैं जी नहीं सकता। तुम नहीं मिलीं! तो मैं आत्महत्या कर लूँगा। वगैरह! वगैरह! बाद में फिर वही का वही। मुखौटा चीर कर बाप-दादे प्रकट हो जाते हैं; असली रूप दिखाते हैं। साथ रहना शुरू करने से पहले पुरुष, नारी-पुरुष के समान अधिकार में दो हजार प्रतिशत विश्वास जाहिर करते हैं। औरत की आज़ादी के वे लोग दुनिया में अव्वल नम्बर के पक्षधर होते हैं। लेकिन जैसे ही एक साथ रहना शुरू होता है, वैसे ही पुरुष जनाब बैठे-लेटे आराम फरमाने लगते हैं, हुक्म झाड़ने लगते हैं-बाघ का दूध चाहिए, जिराफ का सिर चाहिए। ये सारी फरमाइशें बजा लानी होंगी, सारी चीजें जुटानी होंगी, क्योंकि वे पुरुष हैं। उनकी दोनों जाँघों के बीच तीन या चार इंच की एक खास चीज़ है उनके पास। उनकी तरफ़ से अपने लिए ढेर-ढेर माँगें होती हैं, उससे भी ज़्यादा मेरे अपने लिए उनकी 'न माँगने की' अपेक्षाएँ! वे साहब नहीं चाहते कि उनके अलावा, किसी अन्य पुरुष के साथ, मैं बँधे हुए वक्त से ज़्यादा बातचीत करूँ। उनकी अनुमति बिना मैं कहीं भी जाऊँ, कुछ भी करूँ, वे जनाब, चाहे जैसे भी हो, मुझे अपनी मुट्ठी में दबोच कर एक आरामदेह, चैन भरा जीवन गुज़ारना चाहते हैं। उनकी चिपचिपी मुट्ठी में मेरा दम घुट रहा है, मुझे साँस लेने में तकलीफ़ हो रही है, यह उनकी अक्ल में नहीं आता! उनकी अक्ल में कुछ नहीं आता, क्योंकि उनके पास तीन-चार इंच की वह खास चीज़ जो है। वह क्षुद्र चीज, इन्सान की बुद्धि को खोखला कर देने के लिए काफ़ी होती है।
बहरहाल, जब तक दिमाग़ काम करेगा, उतने दिनों तक मैं अकेली रहूँगी। वज्र पागल न हो तो भला कोई औरत, किसी पुरुष के साथ रहती है भला? किसी-किसी औरत में जानबूझ कर, पुरुष के हाथ की गुड़िया सजने का चाव जगता है। उन सब औरतों को जन्म से ही उस तरह रचा-गढ़ा जाता है। लेकिन, एक वक़्त मैं पलट कर खड़ी हो गयी। नहीं, मैं गुड़िया नहीं बनूँगी, 'माल' नहीं बनूँगी। तब मैं बनूँगी क्या? इन्सान बनूँगी। मैं 'मैं' बनूँगी। मेरा यह संकल्प सर्वत्र था! सर्वांग था। पुरुष को मैं अपने घर में जगह नहीं देती. लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं था कि मैं पुरुषों से प्रेम नहीं करना चाहती। प्रेम बिना तो मैं एक पल भी नहीं रह सकती थी। चूँकि मैं असमकामी हूँ, इसलिए सुदर्शन पुरुषों के प्रति मैं तीखा खिंचाव महसूस करने से अपने को रोक नहीं पाती। वह सुदर्शन शख्स अगर कहीं विद्या-बुद्धि में, दिल प्रतिभा में, हँसी-मज़ाक, कौतूहल में असाधारण हुआ तब तो उसके प्यार में पड़े बिना मैं रह नहीं पाती। मेरा प्यार, दिन-रात का प्यार होता है। यहाँ के पुरुष जैसे प्रेम को कुल एक-दो घटे का प्रेम-प्यार समझते हैं। सुयोग-सुविधा देख कर, बीवी से छिप-छिपा कर, घर से बाहर किसी लड़की का होठ काट कर, छाती नोच कर औरत के ऊपर अपने को फेंक देने को ही प्यार समझते हैं, मैं ऐसा नहीं समझती। मैं तो प्यार का मतलब 'ज़बरदस्त पैशन' समझती हूँ। मैं चाहती हूँ ऐसा प्रेमी, जो मेरा सबसे बड़ा दोस्त हो, जिससे मैं ज़िन्दगी के सारे सुख-दुख, दिन हो या रात, कह-सुन सकूँ। जो झूठा न हो, ठग न हो, धोखेबाज़ न हो, छिछोरा न हो, जिसके लिए कभी प्यास नहीं मिटती; जिसे पा कर मैं दुनिया-जहान भूल जाऊँ और जिसके साथ मुझे समूचा संसार मिल जाये। जो मेरे साथ हो; मेरे पास हो; जिसके साथ मैं हर पल सातवें आसमान पर शीर्ष-सुख में उड़ान भरूँ।
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- इतनी-सी बात मेरी !
- पुरुष के लिए जो ‘अधिकार’ नारी के लिए ‘दायित्व’
- बंगाली पुरुष
- नारी शरीर
- सुन्दरी
- मैं कान लगाये रहती हूँ
- मेरा गर्व, मैं स्वेच्छाचारी
- बंगाली नारी : कल और आज
- मेरे प्रेमी
- अब दबे-ढँके कुछ भी नहीं...
- असभ्यता
- मंगल कामना
- लम्बे अरसे बाद अच्छा क़ानून
- महाश्वेता, मेधा, ममता : महाजगत की महामानवी
- असम्भव तेज और दृढ़ता
- औरत ग़ुस्सा हों, नाराज़ हों
- एक पुरुष से और एक पुरुष, नारी समस्या का यही है समाधान
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- औरत को नोच-खसोट कर मर्द जताते हैं ‘प्यार’
- सोनार बांग्ला की सेना औरतों के दुर्दिन
- लड़कियाँ लड़का बन जायें... कहीं कोई लड़की न रहे...
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- औरत अपने अत्याचारी-व्याभिचारी पति को तलाक क्यों नहीं दे देती?
- औरत और कब तक पुरुष जात को गोद-काँख में ले कर अमानुष बनायेगी?
- पुरुष क्या ज़रा भी औरत के प्यार लायक़ है?
- समकामी लोगों की आड़ में छिपा कर प्रगतिशील होना असम्भव
- मेरी माँ-बहनों की पीड़ा में रँगी इक्कीस फ़रवरी
- सनेरा जैसी औरत चाहिए, है कहीं?
- ३६५ दिन में ३६४ दिन पुरुष-दिवस और एक दिन नारी-दिवस
- रोज़मर्रा की छुट-पुट बातें
- औरत = शरीर
- भारतवर्ष में बच रहेंगे सिर्फ़ पुरुष
- कट्टरपन्थियों का कोई क़सूर नहीं
- जनता की सुरक्षा का इन्तज़ाम हो, तभी नारी सुरक्षित रहेगी...
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- औरत क़ब बनेगी ख़ुद अपना परिचय?
- दोषी कौन? पुरुष या पुरुष-तन्त्र?
- वधू-निर्यातन क़ानून के प्रयोग में औरत क्यों है दुविधाग्रस्त?
- काश, इसके पीछे राजनीति न होती
- आत्मघाती नारी
- पुरुष की पत्नी या प्रेमिका होने के अलावा औरत की कोई भूमिका नहीं है
- इन्सान अब इन्सान नहीं रहा...
- नाम में बहुत कुछ आता-जाता है
- लिंग-निरपेक्ष बांग्ला भाषा की ज़रूरत
- शांखा-सिन्दूर कथा
- धार्मिक कट्टरवाद रहे और नारी अधिकार भी रहे—यह सम्भव नहीं