लोगों की राय

इतिहास और राजनीति >> भारत की एकता का निर्माण

भारत की एकता का निर्माण

सरदार पटेल

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :350
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 62
आईएसबीएन :

Like this Hindi book 0

स्वतंत्रता के ठीक बाद भारत की एकता के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा देश की जनता को एकता के पक्ष में दिये गये भाषण


(२)

लखनऊ
१८ जनवरी, १९४८

बहनो और भाइयो!
मेहरबानी करके अब कोई आवाज़ न करें, सब भाई-बहन शान्त हो जाएँ। बहुत दिनों के बाद आप लोगों से मिलने का मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ, इससे मुझे बहुत खुशी हुई है। आप लोगों से मिलने की ख्वाहिश तो बहुत दिनों से थी, लेकिन हम लोग ऐसी मुसीबतों में फंसे रहे कि किसी जगह पर आ-जा नहीं सकते थे। लेकिन इस बार चन्द दिनों के लिए मुझे आसाम और कलकत्ता जाना था, हमारे प्रधान मन्त्री पन्त जी का एक सन्देश मेरे पास आया कि कम-से-कम एक रोज के लिए सब से मिलने के लिए मैं लखनऊ रुकूं। मैंने कबूल कर लिया कि एक रोज के लिए आऊँगा। लेकिन मेरा जी आज भी दिल्ली में पड़ा है, क्योंकि आजकल वहां इतना काम रहता है कि हम वहां से हट नहीं सकते। तो भी मैं आया हूँ और आप लोग मेरी कुछ बात भी सुनना चाहते हैं, तो ठीक है कि मैं कुछ बातें आप से कहूँ।

आप का यह लखनऊ शहर हमारे मुल्क का एक बहुत पुराना शहर है, और यह हिन्दू और मुसलमान दोनों की मिश्रित कल्चर (संस्कृति) का एक केन्द्र स्थान है। इस शहर की पुरानी बातें हम सदा सुनते रहते हैं। लखनऊ की पुरानी निशानियों को देख कर हम मगरूर भी होते है। पिछली आजादी की लड़ाई में इस शहर का जो हिस्सा है, जो इतिहास है, वह देख कर भी हम मगरूर होते हैं। साथ ही आज तक हम इस बात को याद करते हैं कि इसी शहर में से यह बात निकली थी कि हम हिन्दू और मुसलमान एक कौम नहीं हैं, एक नेशन (राष्ट्र) नहीं हैं एक प्रजा नहीं है-हमें अलग-अलग हिस्सा करना चाहिए। यहीं कहा गया था कि हमारी जबान अलग है, हमारी संस्कृति अलग है हमारा सब प्रकार का काम अलग-अलग है, इसलिए हमें अलग होना चाहिए। हिन्दोस्तान के सारे मुसलमानों के ऊपर ज्यादातर लखनऊ के मुसलमानों का ही असर पड़ा और पड़ता रहा। दूसरी ओर हमारे जो नेशनलिस्ट (राष्ट्रीय) मुसलमान थे, वे भी इसी प्रान्त के थे। उन लोगों ने काफी विरोध किया और काफी मुसीबतें उठाई। हिन्दुओं और नेशनलिस्ट मुसलमानों में बहुत मुहब्बत थी और आज भी है। वे चन्द लोग हैं और परेशान हैं। उनकी तकलीफ और उनकी परेशानी हम उनके चेहरों पर देखते हैं और तब हमको दर्द होता है।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

    अनुक्रम

  1. वक्तव्य
  2. कलकत्ता - 3 जनवरी 1948
  3. लखनऊ - 18 जनवरी 1948
  4. बम्बई, चौपाटी - 17 जनवरी 1948
  5. बम्बई, शिवाजी पार्क - 18 जनवरी 1948
  6. दिल्ली (गाँधी जी की हत्या के एकदम बाद) - 30 जनवरी 1948
  7. दिल्ली (गाँधी जी की शोक-सभा में) - 2 फरवरी 1948
  8. दिल्ली - 18 फरवरी 1948
  9. पटियाला - 15 जुलाई 1948
  10. नई दिल्ली, इम्पीरियल होटल - 3 अक्तूबर 1948
  11. गुजरात - 12 अक्तूबर 1948
  12. बम्बई, चौपाटी - 30 अक्तूबर 1948
  13. नागपुर - 3 नवम्बर 1948
  14. नागपुर - 4 नवम्बर 1948
  15. दिल्ली - 20 जनवरी 1949
  16. इलाहाबाद - 25 नवम्बर 1948
  17. जयपुर - 17 दिसम्बर 1948
  18. हैदराबाद - 20 फरवरी 1949
  19. हैदराबाद (उस्मानिया युनिवर्सिटी) - 21 फरवरी 1949
  20. मैसूर - 25 फरवरी 1949
  21. अम्बाला - 5 मार्च 1949
  22. जयपुर - 30 मार्च 1949
  23. इन्दौर - 7 मई 1949
  24. दिल्ली - 31 अक्तूबर 1949
  25. बम्बई, चौपाटी - 4 जनवरी 1950
  26. कलकत्ता - 27 जनवरी 1950
  27. दिल्ली - 29 जनवरी 1950
  28. हैदराबाद - 7 अक्तूबर 1950

विनामूल्य पूर्वावलोकन

Prev
Next
Prev
Next

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book