नीली आँधी - सुचित्रा भट्टाचार्य Neelee Aandhi - Hindi book by - Suchitra Bhattacharya
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नीली आँधी

सुचित्रा भट्टाचार्य

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :273
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 6037
आईएसबीएन :78-81-8143-653-

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प्रस्तुत है पुस्तक नीली आँधी .......

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

झकझक स्मार्ट सौमिक बसुराय के साथ दयिता का विवाह तय हो गया। लेकिन दयिता किसी अजीब इंसान के मोहपाश में बँधी हुई, जिसे वह प्यार समझ बैठती है, वह शख्स है, उसका प्रोफेसर, विश्वविख्यात वैज्ञानिक-बोधिसत्व मजूमदार ! दयिता का प्यार मानो कोई दुर्धर्ष आँधी-तूफान है, जो उम्र की कोई बाधा-निषेध नहीं मानता; नाते रिश्तेदारों की परवाह नहीं करता; समाज-संसार के नीति-नियमों को वह तिनके की तरह, वक्त की धार में बहा देती है। महाविश्व की सृष्टि-रहस्य जानने के रिसर्च में विभोर, अधेड़ बोधिसत्व मजूमदार भी दयिता के अमोघ आकर्षण की आखिर उपेक्षा नहीं कर पाए। पत्नी-पुत्र त्यागकर, वे दयिता के साथ अपनी नई दुनिया बसा लेते हैं।

दयिता और बोधिसत्व की समवेत जिन्दगी क्या खुशहाल हो पाई ? दयिता द्वारा ठुकराया हुआ सौमिक क्या उसे भूल पाया ? पति-परित्यक्ता राखी के मन में हो बोधिसत्व के लिए, अन्त में कितनी-सी श्रद्धा और प्यार बचा था ?
‘नीली-आँधी’ जटिल प्यार का बयान है। लेकिन यह उपन्यास सिर्फ प्यार के त्रिकोण का उपाख्यान ही नहीं है, औरत-मर्द के रिश्तों की रस्साकशी के माध्यम से, लेखिका को यह भी तलाश है कि अनन्य प्रतिभा सम्पन्न इंसानों के जीवन में औरत की जगह कहाँ है ! कुल मिलाकर सुचित्रा भट्टाचार्य की सशक्त कलम ने वर्तमान युग की जीवन-यन्त्रणा को उजागर किया है।
‘नीली-आँधी’ इसी वक्त का तूफानी-भँवर है, जो समकालीन होते हुए भी, चिरकालीन है। आँधी नीली हो या पीली हर इंसान की जिन्दगी में दाखिल जरूर होती है। जो कमजोर होते हैं, आँधी उन्हें उड़ा ले जाती है और सख्त सजा देती है, उनका सब कुछ छील लेती है। जो वह आँधी बहादुरी से झेल जाते हैं, जिन्दगी सुख बनकर, उनका अधूरापन मिटा देती है। विराट व्यक्तित्व दुनिया की नजरों में भले असाधारण हो, मगर जब उसका पदस्खलन होता है, तो वे निहायत कमजोर और मामूली इंसान साबित होते हैं, जबकि मामूली इंसान, इंसानियत का परिचय देकर, असाधारण साबित होते हैं-इन तमाम अहसासों ने मुझे अमीर बना दिया है !

 

सुशील गुप्ता

 

नीली आँधी

 

आँधी-तूफान की रफ्तार से दयिता डिनर निपटा रहती। इसे खाना नहीं कहते, जैसे-तैसे गोग्रास में, गले से नीचे उतारना कहते हैं। रोटी तोड़-तोड़कर मुँह में ठूँसकर, ऊपर से ढक्-ढक् पानी ढकोलती हुई ! अचानक उसे हिचकी आने लगी। अपने को संयत करते हुए, उसकी छाती दुबारा धक्क् से रह गई। बोधिसत्व कहीं आज जल्दी तो नहीं चले जाएँगे ?

डाइनिंग हाल में खचाखच भीड़। इस हॉस्टल में छात्राओं की संख्या लगभग दो सौ। इंजीनियरिंग, रिसर्च स्कॉलर, प्योर साइंस-सब मिला-जुलाकर छात्राओं की बेतहाशा भीड़ ! उनमें से कम से कम सत्तर छात्राएँ, इस वक्त हॉल में मौजूद थीं। डिनर का यह चरम समय था। पीक आवर ! लड़कियाँ दर्जन भर मेज के सामने बँटी-बिखरी बैठी हुईं। छोटे-छोटे झुण्डों में साल-मुताबिक, विषय मुताबिक छात्राएँ या महज यारी-दोस्ती मुताबिक जमघट !

दयिता की बायीं तरफ सुपर्णा और दाहिनी तरफ मैत्रेयी ! सबकी सब क्लासमेट ! एम.एस.सी., सेकंड ईयर, फिजिक्स ! उल्टी तरफ रीता, एक साल जूनियर !
सुपर्णा ने कैंटीन-डिश में खोप् से एक अंडा उठा लिया।
उसने अंडे को उछालते हुए सवाल किया, ‘‘बात तो, यह किसका अंडा है ?’’
‘‘ऑफकोर्स, कबूतर का ! हमारी मुँडेर पर दिन-रात गुटुर-गूँ करते रहते हैं-’’ मैत्रेयी ठठाकर हँस पड़ी।
रीता ने विज्ञ मुद्रा में कहा, ‘‘वैसे कबूतर के अंडे काफी स्वादिष्ट होते हैं-’’ ‘‘तूने चखा है ?’’
‘‘मैं क्यों चखने लगी ? मैंने तो देखा है, बिल्लियाँ काफी स्वाद ले-लेकर खाती हैं।’’
‘‘कहीं जहरीला तो नहीं होता ?’’ सुपर्णा की आँखों में बनावटी खौफ उतर आया, ‘‘इन अंडों से कहीं पेट तो नहीं चल जाएगा ?’’

‘‘कम ऑन सुपू, नथिंग विल हैपेन ! कुछ नहीं होता। बिल्लियाँ तो आराम से हजम कर लेती हैं।’’
‘‘बिल्ली और इन्सान का मेटाबॉलिक सिस्टम क्या एक जैसा होता है ?’’
बगल की मेज के सामने बैठी, दिल्ली की लड़की, अनुशा ने कुर्सी खिसकाकर, उनकी तरफ देखते हुए कहा, ‘‘यह अंडा कब्बू का हरगिज नहीं है। मस्ट बी ऑफ छिपकली, मैं शर्त लगा सकती हूँ।’’
बस, अजीबोगरीब बहस छिड़ गई। आज रात का मेनू अतिशय थर्ड क्लास है। वही नन्ही-नन्ही गोलियों की साइज की अंडा-करी, जिसके मसाले एक तरफ और तरी की नदी एक तरफ बहती-उतरती हुई ! साथ में भुर्ते जैसी कोई और सब्जी ! उसमें शायद फूलगोभी और आलू भी था। इसके अलावा, किसी अज्ञात चीज की चटनी। मुमकिन है वह तेतुल की चटनी हो या फिर अमावट की। सारे के सारे आइटम निरे बकवास ! बेस्वाद ! इस कैम्पस टाउनशिप का हर रसोइया, बेस्वाद-बकवास खाना पकाने में डॉक्टरेट डिग्रीधारी था।

 लेकिन हॉस्टल की लड़कियों को ऐसे खाने की कमोबेश आदत पड़ चुकी थी। हँसी-मजाक करते-करते, वे लड़कियाँ इस तरह के स्वाद की अभ्यस्त हो चुकी थीं। अब वे सब कुछ खा जाती थीं, उन्हें होश भी नहीं रहता था। अंडों पर यह विचार विमर्श भी, उसी बेख्याली का हिस्सा था।
समूचे हाल में जोर-शोर से हो-हल्ला जारी था। किसी मेज पर अंडा-मेटाबॉलिज्म-रिलेटिविटी पर बहस, किसी मेज पर ऐश्वर्या राय, क्लण्टन, मोनिका लेवेंस्की ! कहीं सचिन, अजहर, सौरभ ! कहीं सलमान, आमिर, शाहरूख ! इस मेज पर झरने की कलकल ! उम मेज़ पर टूटे रिकॉर्ड की झंकार। शब्द-शब्द बजते हुए; बजते ही रहे।
दयिता के कानों तक यह सब कुछ भी नहीं पहुँच रहा था। इस वक्त वह लगभग बहरी हो आई थी, जिसकी आँखें समूचे हॉल का चक्कर लगा रही थीं, मगर देख कुछ भी नहीं रही थीं। इस वक्त उसके दिल में लगातार घंटों के शोर ! हे भगवान, हे प्रभु, उनसे भेंट हो जाए ! वे दिख जाएँ !

किसी तरह गले में खाना ठूँसकर, दयिता कुर्सी छोड़कर उठ खड़ी हुई !
टेबल-मैनर के तकाजे पर वह अपने साथियों से मुखाबिक हुई, ‘‘एक्सक्यूज़ मी ! बाइ !’’
सुपर्णा की निगाहें तिरछी हो आईं, ‘‘हाय-माँ, तू भी मौजूद थी यहाँ ?’’
मैत्रेयी के चेहरे पर बेहया हँसी झलक उठी।
उसने मासूम-सी आवाज़ बनाकर पूछा, ‘‘तेरा वक्त हो गया है, है न ?’’
दयिता ने उसकी बात को तूल नहीं दिया। बस, उसके जबड़े ज़रा शिथिल हो आए। हाथ में अपनी प्लेट थामे, वह सिंक की तरह बढ़ गई। यहाँ यही नियम था ! अपनी प्लेट खुद साफ करना पड़ती थी।
डाइनिंग हाल में दयिता का कमरा ख़ासा दूर था। हॉस्टल की बिल्कुल दूसरी छोर पर, दो मंज़िला मकान में। दो बेड का कमरा। परिमित असबाब-पत्तर ! हर छात्रा के लिए लोहे का एक अदद बेड, मेज-कुर्सी ! इससे ज्यादा किसी समान की जरूरत पड़ी तो छात्राएँ खुद ही इंतजाम कर लेती थीं। दयिता के पास, एक अदद छोटे-नाटे आकार का वार्डरोब ! उसकी रूममेट, चिरश्री, इस मामले में भी खाली बिन्दास थी। उसने दीवार पर ही चंद अस्थायी हुक जड़ लिए थे। अपने कपड़े-लत्ते वह उन पर ही झुलाए रखती थी। कमरे में दोनों के लिए, अपने कपड़े-लत्ते वह उन पर ही झुलाए रखती थी। कमरे में दोनों के लिए, अपने-अपने आइने भी मौजूद थे। लड़कियाँ दूसरे के आइनों में अपना चेहरा देखना पसंद नहीं करती  थीं।

इस वक्त भी चिरश्री अपने बेड पर पेट के बल लेटी हुई, कोई थ्रिलर निगल रही थी। यह लड़की बाक़ायदा किताबी-कीड़ा थी। हर वक्त उसके हाथ में शिफ़-किटेल-फेइनमैन या लुडलाम-जॉन लेकर-फ्रेडरिक-फरसाइथ। डाइनिंग हॉल, कॉमनरूप, कैंटीन, कहीं भी, किसी ने उसे कभी भी किताब के बिना नहीं देखा था। दयिता की क्लास में भी वही फर्स्ट गर्ल थी।
अपने कमरे में कदम रखते ही, वह सीधे आईने के सामने जा खड़ी हुई। कंधे छूते हुए अपने स्टेप-कट बालों में उसने जल्दी-जल्दी कंघी चलाई, चेहरे पर क्रीम थोपकर, उसकी बेचैन उँगलियाँ नाच-नाचकर बराबर करती रहीं-वक्त नहीं है ! अब बिल्कुल वक्त नहीं है।
उसने आईने में ही चिरश्री की तरफ मुखातिब होकर पूछा, ‘‘खाना खाने नहीं गई तू ?’’
चिरश्री ने किताब से चेहरा नहीं उठाया।
उसने किताब में चेहरा गड़ाए-गड़ाए ही संक्षिप्त-सा जवाब दिया, ‘‘हूँ ? हूँ !’’
‘‘अरे, जा, जा फटाफट जा ! इसके बाद और कुछ नहीं जुटेगा।’’
‘‘हूँऽऽ....’’

‘‘अच्छा, सुन, मैं ज़रा जा रही हूँ। तू कमरे में ही है न ?’’
चिरश्री ने खट् से गर्दन
घुमाई।
उसकी भौंहे सिकुड़ आईं, ‘‘आज भी चल दी ?’’
दयिता फिक् से हँस पड़ी, ‘‘आज देर बिल्कुल नहीं करूँगा, देखना।’’
गोल-गोल चश्मा पहने, चिरश्री के चेहरे हर वक्त दीदी-दीदी जैसा भाव ! किताब उल्टी करके, चिरश्री ने दयिता की तरफ देखा। उसके मनोभाव उसके चेहरे पर साफ झलक उठे।
किसी गिरजे के पादरी के अंदाज में उसने कहा, ‘‘यू आर गोइंग टु फार, दयि !’’
‘‘अभी दूर ही कितना गई हूँ ?’’ दयिता ने झट से अपने होठों पर नेचुरल शाइन लिपिस्टिक फेरते हुए कहा, ‘‘सिर्फ लाइब्रेरी से मेन गेट तक ! हद से हद गेट से घर तक !’’
‘‘वहाँ तक भी जाने की क्या जरूरत है ?’’
‘‘अच्छा लगता है, इसलिए ! दिल करता है, इसलिए !’’
‘‘दिल को मना कर ! रेजिस्ट कर !’’

‘‘रेजिस्ट नहीं कर पाती, रे !’’
‘‘हुँह : फिजूल के नाटकीय डायलॉग !’’ चिरश्री एकदम तनकर बैठ गई, ‘‘तुझे खबर है, लोग तुझ पर इस कदर हँसते हैं ?’’
‘‘आइ केयर ए फिग ! मैं क्या बी एम से इश्क फरमा रही हूँ ? बस, आइ डू एडमायर हिम ! उनकी मुरीद हूँ ? उनसे बातें करना मुझे अच्छा लगता है।’’ दयिता ने झटपट अपना वार्डरोब खोला, अगले ही पल बंद कर दिया। अपने कंधे पर दूधिया-सफेद ओढनी बिछाए।
उसने धीमे लहजे में कहा, ‘‘इसके अलावा, और किसी के मन में चाव जागे, तो वह भी उनसे मिलने जा सकती है, मुझे मालूम है, बहुत-सी लड़कियाँ बी एम पर फिदा हैं। मेरी ही क्लास की कई लड़कियाँ उन पर मरती हैं। अगर तू कहे, तो लाइन से उनके नाम भी गिना दूँ।’’
‘‘हो सकता है, लड़कियाँ उन पर जान छिड़कती हों, लेकिन तेरी तरह बचकानी हरक़त कोई नहीं करती।’’ चिरश्री अभिभावक की तरह गंभीर नजर आई, ‘‘देख, दयि, देखते ही देखते अब काफी उम्र हुई। इस उम्र में किसी भी लड़की को हीरो-वर्शिप शोभा नहीं देती। यह सब ‘टीन-एज’ के लक्षण हैं। किशोर उम्र के लक्षण !’’
दयिता अब किसी बहस में नहीं पड़ी। उसने सधे हुए हाथों से झटपट अपनी कत्थई कमीज झाड़ी, मेज पर पड़ी एक किताब फट् से उठाई और गर्दन मोड़कर एक बार फिर अपने धान-पान-से चेहरे पर नज़र डाली ! बस, लमहे भर के लिए ! बिजली की कौंध की तरह !

उसने खट् से दरवाजा खोला और बाहर निकलते-निकलते एक जुमला उछाल दिया, ‘‘सुन मैं कमरे की चाबी लेकर नहीं जा रही हूँ-’’
दयिता हिरण-चाल में आगे बढ़ चली। वह उनमुक्त रफ्तार में आगे बढ़ गई। वहाँ थर्ड ईयर केमिकल की तीन छात्राएँ आपस में बहस-मुबाहसे में थीं। कॉरीडोर में सुतनुका और रागिनी मौज से सिगरेट के सुट्टे लगा रहीं थीं। जोर-जोर से साँस खींचकर वे दोनों जलती तंबाकू की पुरुष-गंध अपने सीने में भर रही थीं। कॉमनरूप से तैरकर आती हुई मधुमक्खी के टूटे छत्ते की गुन-गुन आवाजें धीरे-
धीरे क्षीण होती गईं। दयिता अब खुले आसमान तले आ पहुँची।
गेट के सामने कोलतार की चौड़ी सड़क ! आइन्स्टाइन सरणी ! बेहद खूबसूरत सड़क ! दोनों ओर से पेड़ की कतारें, चँदोवे की तरह पूरी सड़क को ढँके हुए ! उनकी दरारों से आकाश शायद ही नज़र आता था। यह सड़क, यूर्निवर्सिटी की मुख्य द्वार से शुरू होती थी। इसी सड़क पर छात्र-छात्राओं के कतार-दर-कतार हॉस्टल ! सबसे पहले गर्ल्स हॉस्टल ! मेन गेट से हद से हद तीन सौ गज फासले पर ! अभी तो नवंबर महीने की शुरूआत भर थी ! अभी से हवा में खुनक ठंडक ! पल भर के लिए दयिता को ख़्याल आया कि आते हुए अगर वह एक शॉल भी ले लेती, तो बेहतर होता। पूरी सड़क निर्जन नजर आ रही थी। शायद ठंडक की वजह से। लड़के इधर-उधर जा आ रहे थे। सड़क पर काफी दूर-दूर पर लैंपपोस्ट अभी तक जलते हुए ! निओन के प्रकाश में धूप-छाँह की तरह। धीरे-धीरे कुहासा उतर रहा था।

मेन गेट तक आकर, दयिता पल भर को ठिठक गई। यहाँ तक आकर, वह रोज ही ठिठक जाती थी। वह जुबान से चाहे जो कहे, हर दिन ठीक उसी वक्त जाने कहाँ से, एक किस्म की दुविधा उसे पोर-पोर जकड़ लेती है। उसके पाव वजनी हो आते हैं। उसे यूँ कंगले की तरह दौड़कर आते देखकर, बोधिसत्व को कहीं कुछ बुरा तो नहीं लगता ? धत् ! लाइब्रेरी तक तो वह किसी भी वक्त जा सकती है। बोधिसत्व तो उसके प्रोफेसर ठहरे। उनके साथ बातें करते हुए वह लौट ही सकती है। इसमें इतना किंतु-परंतु की क्या बात है ? और बोधिसत्व मजूमदार जैसे विश्वप्रसिद्ध प्रोफेसर, उसके बारे में कुछ सोचे उनकी बला ! महावृक्ष कभी भी लता-पत्तों में अपना सिर नहीं खपाते। उन जैसों को तो दयिता जैसी अकिंचन का, अपने इर्द-गिर्द होने का अहसास तक नहीं होता।


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