दहन - सुचित्रा भट्टाचार्य Dahan - Hindi book by - Suchitra Bhattacharya
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दहन

सुचित्रा भट्टाचार्य

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2000
पृष्ठ :167
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2847
आईएसबीएन :81-7119-590-3

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इसमें औरत को अपने जुल्म और अत्याचार का शिकार बनाने वाले मर्दों के खिलाफ सामाजिक इंसाफ की वकालत का वर्णन है...

Dahan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

पुरूष शासित सामाज में मर्द को क्या कभी अहसास होगा कि औरत युग युगान्तरों से अपने अन्तस में कितना अभिमान, अपमान, पीड़ा और ग्लानि छिपाये, उसे प्यार करती है ? हजार असहमति आपत्ति बिक्षोभ और असहनीय विसंगतियों के बावजूद उसके साथ हम कदम हो कर सफर जारी रखती है ? महानगर में हुई एक परिचित-सी घटना के सहारे लेखिका सुचित्रा भट्टाचार्य ने इस उपन्यास में वर्तमान समय और समाज की अँधेरी सच्चाईयों और मर्द की तानाशाहियों को कमलबंद किया है। ‘दहन’ महानगर के टाली गंज के इलाके के चार समाज दुश्मन नौजवानों की अश्लीस से किसी गृहवधु को बचाने के लिए अपूर्व साहस से कूद पड़ने वाली एक औरत के तुजर्बे की हकीकत है उसने पुरूषत्व रके अहंकार में औरत को अपने जुल्म और अत्याचार का शिकार बनाने वाले मर्दों के खिलाख सामाजिक इन्साफ की वकालत ती उन्हें उचित सजा दिलाने के लिए थाना-पुलिस, कोर्ट कचहरी तक भी दौड़ लगाने मे हिचक भी नहीं की। अपनी साहसिकता के क्षणिक अभिन्नदन के बाद उनके भयंकार अचरच के साथ अविष्कार किया कि इन्साफियों के खिलाख आवाज उठाने वाली और उनसे जूझने से तैयार औरत पर कितने कितने माध्यमों से, कितनी-कितनी तरह के दबाव उसे निष्क्रिय और तुच्छ बना देते हैं। उसका प्रतिवाद, हाँ तक की उस पर लगाये गये अनगिनत सांघन भी उसे बर्बर में पिसकर रह जाते हैं। ‘दहन’ उपन्यास, वर्तमान नारी-स्वातंत्र्य का असली चेहरा दिखाता है और पुरूष शक्ति के नपुंसक और खोखले मूल्यों की हकीकत बयान करता है, और वर्तमान समाज और पुरूषों द्वारा औरत की हिम्मत और मुकाबले की ताकत को तोड़ने की साजिश का पर्दाफाश करता है।

तू क्यों नहीं समझती कि मर्द जितनी जमीन छोड़ेगा, बस उतनी-सी ही जमीन तुम लोगों के हिस्से में आएगी। इससे ज्यादा एक इंच भी नहीं। सच तो यह है कि घर-गृहस्थी में डूबी सिमटी-सहमी, बौड़म औरत आजकल के मर्दों को बिल्कुल पसंद नहीं आती। इसीलिए तुम लोगों को पढ़ने-लिखने की आजादी दान कर दी है। ये मर्द अकेले-अकेले गृहस्थी नहीं चला पा रहे थे या यूँ कहें कि गृहस्थी के तकाजे पर ही तुम औरतें खुद नौकरी करने निकल पड़ीं। ज्यादा दूर नहीं जाना पड़ेगा, तू अपनी माँ-मौसी को ही देख ले। उनके ऊपर, अपनी दादी-नानी को देख, तू समझ जाएगी कि कैसे तुम लोगों को धीरे-धीरे, जरा-सी छूट दी गयी। अब ये मर्द तुम लोगों को जरा और खुली-खुली... थोड़ी–सी और आजाद देखना चाहते हैं। इसलिए आजकल टी.वी, फिल्मों और विज्ञापनों में तुम लोगों का उन्मुक्त दिखना, नाचते फिरना...ज्यादा जरूरी हो आया है। क्यों ? महज मर्दों को खुश रखने के लिए ! इसी सबको तुम लोग आजादी समझ बैठी हो और भेड़-बकरियों-सी उछल-कूद मचा रही हो। सच तो यह है कि, बिट्टी, कि यह आजादी नहीं है, आजादी की मरीचिका है। स्वाधीनता तो मन की अनुभूति होती है। तुम लोगों की वही मानसिक स्वाधीनता ये मर्द बिरादरी कभी कबूल नहीं करेगी।

1


दो तन-बदन ! उत्ताल सागर की तरह हहराती-उमड़ती लहरें टूट-टूटकर बिखरती रहीं। परत-दर-परत ज्वार उमड़ता हुआ ! लहर-लहर टकराता, पछाड़ें खाता हुआ ! छाती पर ! पीठ पर ! अविराम लहरों की घात-प्रतिघात से आदिम दुश्मन मानो छलक-छलक कर, उठ-उठ कर उमड़ता-घुड़ता हुआ ! वह जवान, सुदर्शन मर्द गाने के बोल और सुर-ताल के छंद पर उस रूपसी औरत की पीठ, छाती, पेट, कमर, अंग-अंग से छेड़छाड़ करता हुआ ! उस औरत का तीन-चौथाई अंग-प्रत्यंग निरावृत ! उन्मुक्त ! चोली और घाघरे के बीच अटलांटिक महासागर का फासला ! मोम की तरह चिकनी-रेशमी त्वचा। उद्धत तरुणाई और अलौकिक सुषमा माथे से लेकर तन के अंग-प्रत्यंग की परत-परत से उत्तेजित कामना विकीर्ण करती हुई ! झीगुर ने मुंह फेर लिया। आजकल जिसके यहाँ भी जाओ, जिस वक्त भी जाओ, टी.,वी., टी.वी, सिर्फ टी.वी.,। फर्स्ट चैनल, सेकेंड चैनल, केबल, स्टार, एम, जी चैनलों का अंबार। हर चैनल पर किंचित हेर-फेर के साथ लगभग एक जैसा ही दृश्य। पाँच-सात साल पहले तक भी कमरे में बैठकर इस किस्म के दृश्य देखते हुए अक्सर निषिद्ध रोमांच जाग उठता था। अब तो खैर सारा कुछ दाल-भात बन चुका है। इन दिनों वक्त उजाले की रफ्तार से होड़ लगाकर दौड़ पड़ा है। आजकल सारा कुछ बहुत ज्यादा उन्मुक्त हो चुका है। उन्मुक्त दुनिया ! उन्मुक्त राजनीति ! उन्मुक्त आमोद-प्रमोद। रंग-बिरंगे विज्ञापनों में जिंदगी कुछ ज्यादा ही मोहमय हो उठी है। खुली-खुली ! उन्मुक्त !

विशाखा के बाबुम ने अचानक कमरे में आकर टी.वी. बंद कर दिया, ‘‘यह सब क्या है ? तुम लोग दिन –रात...नाच-गाना देखते रहते हो ? जवान खून हो ! सामने खाना पड़ा है। खाओ, पियो, गप्पें मारो। अड्डा जमाओ। ऐश करो। यह सब करने के बजाए, सबके सब गर्दन उचकाये...’’
‘‘ठीक है ! ठीक है ! तुम जाओ तो यहाँ से।’’ विशाखा की माँ खीज उठीं, ‘‘यह प्रोग्राम सभी को बेहद पसंद है। तुम जैसे रसहीन जीव को छोड़कर ! यह प्रोग्राम खत्म होते ही हम उठ जाएँगे।’’
‘‘नहीं, नहीं, कोई जरूरत नहीं अंत तक रुकने की। ऐसा बकवास...उबाऊ प्रोग्राम न देखा तो जिंदगी अकारथ नहीं हो जाएगी। चलो, मेरा खाना लगा दो पहले।’’
विशाखा की बहन ने हाल में ही हायर सेकेंडरी की परीक्षा दी थी। फुफेरा भाई कक्षा पाँच में। यूँ टी.वी ऑफ करके, नाच-गाने का प्रोग्राम बंद करके कोई उनके मौज-मजे में खलल डाले तो उनका दिमाग एकदम से गर्म हो उठता है। चूँकि कमरे में दीदी की सहेलियाँ मौजूद थीं, इसलिए अपनी भड़ास दबा लेने को लाचार दोनों भाई-बहन मार्च करते हुए कमरे से बाहर निकल गये।

वैसे टी.वी., ऑफ किये जाने पर झीनुक मन-ही-मन खिल आयी। वह ‘इडियट-बॉक्स’ उसे कभी भी आकर्षित न करता हो, ऐसी भी कोई बात नहीं थी। लेकिन सिर्फ अपने ही घर में। उस वक्त दृश्य भी काफी अलग किस्म के होते थे। उन दिनों टी.वी., देखते-देखते, कभी-कभी एक किस्म की अलीक माया भी जाग उठती। मानो सुबह-सुबह का स्कूल सच न हो; प्रायः सारी दोपहर सोते-सोते थक जाना भी सच न हो; शाम को उन्हीं-उन्हीं रास्तों पर चलते-चलते एक जैसे बेचेहरा लोगों को देखते रहना भी सच न हो; सच सिर्फ वही नहीं, जो उस बक्से में नजर आता हो।

चंडीतला में झीनुक-परिवार का साढ़े सात सौ स्क्वायर फीट का फ्लैट; दक्षिण की तरफ छः बाई-तीन की बाल्कनी; गमलों में सजाये हुए सदाबहार पत्ते-पत्तियों वाले पौधे-सारा कुछ उस वक्त निश्चिह्न हो जाता। उसकी जगह विराट, रंगारंग ऐश्वर्यमय प्रासाद खड़ा हो जाता। खून की बूँद-बूँद में अमोघ वासना की तरह वह मैज़िक-बॉक्स ही आ समाता। उस बक्से के ज़रिये, घने गहरे अरण्ड की कँकरीली-सँकरी पगडंडियों पर वह तूणीर के साथ घूम रही होती...। कभी बर्फ पर दौड़ रही होती...। कौए की नन्हीं आँख जैसे झरने में दोनों बेलौस नहा रहे होते। फिलहाल तूणीर उसके करीब नहीं है। वह अक्सर ही उसके करीब नहीं होता, झीनुक यह हकीकत मानो बिल्कुल ही भूल जाती। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यह अजीबोगरीब, बेसिर-पैर के नाच-गाने...!छिः !
विशाखा की मम्मी-बाबुम के कमरे से बाहर जाते ही सुलग्ना ने विशाखा से फुसफुसाकर कहा,  ‘‘एइ, आवाज ऑफ करके जरा चला दे न। आज ‘खलनायक’ का गाना दे सकते हैं-’’

मैनाक ने कहा, ‘‘न्ना ! आज नहीं देंगे। टी.वी. पर संजय का मुखड़ा आजकल ‘बैन’ कर दिया गया है। वह हीरो पहले टाडा से तो रिहाई पा ले...’’
सुलग्ना रुआँसी हो आयी। चींटी से ऐरावत हाथी तक वह किसी की, कोई तकलीफ सहन नहीं कर पाती। सखी-सहेलियाँ उसे ‘नाजुक दिल’ कह कर बुलाती थीं। उसने कहा, ‘‘यह सरासर नाइंसाफी है। एक नासमझ बच्चा अनजाने में कोई गलती कर बैठा, इस कसूर पर सब लोग मिल कर इस किस्म का...कितने निर्दय होते हैं लोग-बाग !’’
‘‘अहा-रे, दूध पीता बच्चा था न ! युद्ध-युद्ध खेलने के लिए विदेशी आर्म्स रखता था अपने पास। है न। ?’’
‘‘हाँ-हाँ, जैसे सारा कसूर संजय का हो, है न ? और बाकी लोग ? वे क्या हैं ? तेरे वो राजनीतिक नेतागण जैसे स्वर्ग से उतरे देवता हैं। देख लेना, तेरे रशीद के केस में सबके-सब किस बुरी तरह फँसने वाले हैं !’’
‘‘तुम लोग चुप करोगी ? हर वक्त वही बोर-बोर बातें !’’ सरे-बाजार छिड़ी बातचीत पर शुभाशीष ने एकदम से रोक लगा दी, ‘‘चल आ, विशाखा को नौकरी मिलने की खुशी हम लोग मुर्गी की टाँग नचाकर सेलिब्रेट करें।’’
सबके-सब पूरे उत्साह से प्लेट में पड़ी मुर्गी पर टूट पड़े। झीनुक भी यंत्रचालित-सी चिकेन उड़ाने में जुट गयी, लेकिन वह तूणीर अभी तक आया क्यों नहीं है ?

झीनुक का अनमना चेहरा ! उसका मुड़-मु़डकर बार-बार दरवाजे की तरफ देखना मैनाक की नजरों से छिपा नहीं रहा।
‘‘क्या रे, तेरा तूणीर क्या आजकल दफ्तर में ताला मारने का काम भी करने लगा है ?’’
झीनुक काफी देर से बबलगम चबा रही थी। किसी भी उत्तेजना या तनाव के पलों में वह कचर-कचर बबलगम चबाती रहती है। यह उसकी बचपन की आदत है। लाख कोशिशों के बावजूद सुजाता अपनी बेटी की यह बुरी लत छुड़ा नहीं पायीं।
मुँह चलाते हुए उसने गंभीर-सा जवाब दिया, ‘हाँ, लगता तो यही है-’’
इन दिनों तूणीर का दफ्तर-रोग काफी बढ़ गया है। झीनुक से पाँच मिनट की भी बातचीत के दौरान तीन बार कुरुविला, दो बार रजत राय, छः बार फिनांस डायरेक्टर का नाम घूम –फिरकर जरूर लेता है। वैसे भी, ज्यादातर सात-साढ़े सात बजे से पहले वह दफ्तर से नहीं निकलता। छुट्टी के दिन भी किसी-न-किसी बहाने दफ्तर दौड़ना उसके लिए जरूरी होता है।

नौकरी मिलने से पहले वह बिल्कुल और ही इन्सान था। उन दिनों उसके लिए सोते-जागते, नींद में, सपने में सिर्फ झीनुक, ! झीनुक ! झीनुक !
‘‘तू तीन दिनों के लिए मुर्शिदाबाद घूमने जाएगी। देख, मैं बेमौत मर जाऊँगा। परसों शाम तुझे ब्याह में जाना है ? मैं परली तरफ, लैंपपोस्ट के नीचे खड़ा रहूँगा। काका के श्राद्ध में मैं नवद्वीप हो आऊँ ? नो चांस ! अच्छा अगर मैं चला जाऊँ तो शाम तक लौट आऊँगा  ?’’
उस वक्त अपना श्राद्ध कौन कराता ? झीनुक से हर रोज भेंट होती, लेकिन उसके बावजूद सैंतालीस पन्नों का प्रेम-पत्र ! सत्तावन पन्नों का प्रेम-भरा  खत ! तिहत्तर पन्नों का मुहब्बतनामा !

असल में तूणीर बस ऐसा ही है। हर काम में अतिवादी ! हर बात में अतिशयता ! हर राग-रंग हद से बाहर ! वैसे यह अतिशयता भी जाने कैसी अजीबोगरीब ! कभी-कभी तो झीनुक को भी उसका कूल-किनारा नहीं मिलता। हद से कितना बाहर जाना है, इस बारे में भी कोई मुश्किल-सा हिसाब-किताब उनके दिमाग में लगातार चलता रहता है। चार्टर की इंटर परीक्षा से तीन महीने पहले उसने तय किया कि वह पूरे सात सौ पैंसठ घंटे पढ़ेगा। चूँकि अपने हिसाब से वह कुल इकतीस घंटे कम पढ़ सका, इसलिए पहली बार उसने इम्तहान ही नहीं दिया। इसी तरह एक बार उसने तय किया कि वह उस महीने के एक सौ पैंतीस घंटे झीनुक के साथ गुजारेगा, अपना हिसाब पूरा करने के लिए जिद में हालत यहाँ तक पहुँच गयी कि महीने के आखिरी कुछेक दिन, जब भी वह उसके घर आया तो ऐसा जमकर बैठा कि बस बैठा ही रहा। रात के नौ बज गये, उस पर कोई असर नहीं; दस बज गये, फिर भी उसने हिलने का नाम नहीं लिया। तीन दिन तो रात के साढ़े दस बज गये। उसके बाद झीनुक ने ही उसे धकियाते हुए घर से विदा किया। आखिरी दिन तो हद ही हो गयी। पूरे बीस मिनट उसने झीनुक को दरवाजे पर अटकाए रखा। इधर घरवालों को सफाई देते-देते झीनुक की जान कोयला हो गयी। माँ तो खैर...यूँ भी उसके कौतूहल का कहीं कई अंत नहीं। बच रहे पापा...! जैसा उनका स्वभाव था, कमरे के पर्दे बदल दिये जाने के बावजूद कम-से-कम तीन महीनों तक उस ओर ध्यान ही नहीं जाता था। तूणीर के इस राग-रंग पर पापा तक की त्योरियाँ चढ़ गयीं।

अपने ऑफिस के बारे में भी क्या उसने ऐसी ही कोई योजना बनायी है ? उसने एकदम से शायद यह तय कर डाला हो कि साल के ढाई यी तीन हजार घंटे वह दफ्तर में ही गुजारेगा। इधर उसके सिर पर स्टेट्स जाने की भी धुन सवार है।
झीनुक उठकर खिड़की तक पहुँची और मुँह का बबलगम बाहर थूक आयी। दिन का प्रखर ताप कम हो जाने के बावजूद बाहर की हवा आभी भी खासी गर्म थी। पंखे के नीचे से जरा हटते ही, चेहरे-मोहरे पर पसीना आने लगता। आज तो उमस भी कुछ ज्यादा ही है। विशाखा लोगों का मकान जदू बाबू बाजार से बिल्कुल सटा हुआ है, क्या, इसीलिए यहाँ उमस इतनी ज्यादा है ?
झीनुक ने प्लेट हाथ में उठा ली। ‘‘और दूँ ? ले ले न ! तूणीर के आने का कोई ठीक-ठिकाना नहीं। इधर आनंदिता और उसके दूल्हे ने भी लटका दिया-’’

 अचानक नीलांजना ने सवाल उछाला, ‘‘क्यों रे, खबर गर्म है कि आनंदिता माँ बननेवाली है ?’’
शुभाशीष उस वक्त अपने पराँठे की कौर बनाने में जुटा था।
उसने तिरछी निगाहों से विशाखा की तरफ देखा, ‘‘इसका मतलब यह हुआ कि एक और पार्टी मिलनेवाली है।’’
नीलांजना ने उसकी तरफ आँखें तरेरकर देखा, ‘‘शर्म कर ! शर्म कर ! अपनी नौकरी मिलने की पार्टी तो गोल कर गया, यहाँ बैठा-बैठा विशाखा के पकवान उड़ा रहा है। अब एक और पार्टी वसूलने का धंधा ?’’
‘‘अरे तो तू क्यों खफा हो रही है ? खिलाएगा तो आनंदिता का दूल्हा-’’
‘‘जा-जा, मुँह धो रख। तुझे वह नहीं खिलानेवाला ! पैसा इतना सस्ता नहीं है, जनाब !’’
‘‘तुम भी न...अच्छा मजाक कर लेती हो, बॉस ! आनंदिता के दूल्हे को भला पैसों की क्या कमी ? हाथ में छुरी-कैंची पकड़ी नहीं...कि पैसे झमाझम ! मसलन...एइ...श्रवणा, बोल न...मसलन ?’’
‘‘मसलन पॉकेटमार ! ब्लेड पकड़ते ही पैसा-ही-पैसा !’’
झीनुक के होंठों पर मंद-मंद हँसी खिल आयी ।
‘‘मसलन, ट्रैफिक पुलिस ! लॉरी पकड़ते ही...दे पैसा !’’

सुलेखा भी खिलखिलाकर हँस पडी, ‘‘तुम लोग न...महापाजी हो ! अनु का दूल्हा चश्मखोर डॉक्टर हरगिज नहीं है। मुहल्ले का पुत्तर..क्लीनिक में भी बैठता है, पता है ? जाने कितने ही गरीबों का बिल्कुल कम पैसों में ऑपरेशन भी करता है।’’
झीनुक ने बुरा-सा मुँह बनाया, ‘‘यह अनु कमबख्त खुद नहीं आयी, लेकिन मुझे फँसा गयी। उसकी दो किताबे थीं, मेरे पास पड़ी हैं। अब यह पहाड़ जैसा बोझ लादे-लादे वापस ले जाना होगा। कोई मतलब हुआ, एइ मैनाक, तू तो उसकी ससुराल के करीब ही रहता है, किताबें जरा पहुँचा देना ?’’
मैनाक ने विशाखा की तरफ एक उ़ड़ती-सी नजर डाली। विशाखा से उसका गहरा प्रेम-संबंध ! कॉलेज में पढ़ाई के दौरान आनंदिता की मैनाक के प्रति थोड़ी-बहुत दुर्बलता रही थी। विशाखा यह बात जानती है। इसलिए विशाखा के सामने आनंदिता का जिक्र आते ही मैनाक जरा सिमट आता है।
उसने उदासीन भाव से जवाब दिया, ‘‘मेरी मान, वो किताबें हजम कर जा। चुप मारकर घर बैठ। देखना, वह खुद तेरे पास दौड़ी-दौडी आएगी। वह न पहुँची, तो उसका दूल्हा पहुँच जाएगा। आएगा जरूर !’’
‘‘क्यों ?’’

‘‘ अरे, अपने होने वाले बच्चे के लिए उसे तमाम स्कूलों में लाइन नहीं लगानी होगी ? अगर तेरी बैकिंग रही तो तेरे स्कूल में बिल्कुल आखिरी पलों में दाखिला हो सकता है।’’
झीनुक हँस पड़ी, ‘‘मेरा भई कोई हाथ-वाथ नहीं है। हमारे यहाँ टीचरों के नाम कोई कोटा नहीं होता।’’
अचानक नीलांजना टपक पड़ी, ‘‘तेरा कोटा न सही, तेरी हेडमिस्ट्रेस का तो होगा। उसी कोटे के दम पर खुद तो आराम से नौकरी हथिया ली !’’
स्कूल की नौकरी पाने के बाद इस किस्म की टीका-टिप्पणी झीनुक को अक्सर सुननी पड़ी है। उसी स्कूल के प्राइमरी विभाग की इंचार्ज गीताली बसु से खबर पाकर उसने सीधे स्कूल हेडमिस्ट्रेस को पकड़ा था। एम.ए. की परीक्षा देने के बाद उन दिनों झीनुक बिल्कुल बेकार बैठी थी।
सुनीता सेनगुप्ता ने सवाल किया, ‘‘तू क्या सच्ची पढ़ाएगी ? सीरियस है ? या महज शौकिया ?’’
‘‘नौकरी भी कभी शौकिया करते हैं, आंटी ?’’
‘‘नौकरी छोड़कर खट् से भागेगी तो नहीं ?’’
‘‘बेहतर मौका न मिलने तक सवाल ही नहीं उठता।’’
‘तो फिर ऐसा कर, एक लीव-वेकेंसी है, तू वहीं लग जा। सपना मेटरनिटी छुट्टी पर जा रही है। उसकी  जगह तू नर्सरी का एक सेक्शन चला-’’
‘‘और जब वह लौट आएगी ?’’

‘‘तब का तब देखा जाएगा। हर साल ढेर-ढेर छात्र बढ़ते जा रहे हैं। इस बार माध्यमिक में दो बच्चों ने स्टैंड भी किया। चौदह को स्टार मिला है-’’ यह कहते हुए हेडमिस्ट्रेस की आँखे चमक उठीं, ‘‘लगता है, इस बार नर्सरी में एकाध सेक्शन बढ़ेगा। मिस्टर सेनगुप्ता भी यही चाहते हैं कि इस स्कूल की पूर्व-छात्राएँ ही यहाँ टीचर बनकर आएँ।’’
नियल सेनगुप्ता, सुनीता के भाई ! छोटे-मोटे उद्योगपति ! स्कूल के मालिक भी ! बेभाव व्यस्त शख्स ! स्कूल के बारे में सोचने की उन्हें कतई फुर्सत नहीं। इसके बावजूद सुनीता अपने स्कूल के  बारे में लिये गये फैसलों में सेनगुप्ता साहब का नाम जरूर जोड़े रखती है। माँग में हल्के-से सिंदूर की तरह ! झीनुक ने लंबी-सी उसाँस भरकर कहा, ‘‘तुम सबने बस यही देखा कि मुझे नौकरी मिल गयी, कितनी मेहनत करती हूँ, यह नहीं देखा !’’

‘‘हुँह ! नर्सरी में तो पढ़ाती है, इसमें भला मेहनत क्या है री ? सिर्फ आम और एपल ही तो सिखाना होता है। साथ में ए बी सी डी और वन टू ! हद से हद हिलते-डुलते, जोर-जोर से गा-गाकर सिखाना होता है-हम्पटी-डम्पटी सैट ऑन ए वाल...’’
नीलांजना का क्षोभ कहाँ है, झीनुक जानती है । उसके साथ पढ़कर फर्स्ट क्लास हासिल करने के बादजूद अभी तक वह कुछ कर नहीं पायी। श्याम बाजार के करीब किसी कॉलेज में पार्ट–टाइम पढ़ाती है। हफ्ते में कुल छः क्लासें ! दक्षिणा के तौर पर महीने में कुल एक सौ पच्चीस रूपये। दरवाजे-दरवाजे अगर फेरी भी लगाओ, तो इससे ज्यादा कमाई हो जाती है। उधर किस्मत से हाथ आयी नौकरी में झीनुक को हर महीने पूरे बारह सौ रुपये। वैसे इन बारह सौ रुपल्ली के बदले स्कूल उससे कम मेहनत कराता है ? पूरे साढ़े तीन घंटे तक चालीस-चालीस बच्चों की खिदमत ! सम्मानजनक बेबी-सिटिंग !
-आंटी, सुसु आयी !
-आंटी, पॉटी हो गयी।

एकाध बच्चे तो भयंकर बिच्छू। कालीघाट में गाड़ दो तो कोडाइकनाल में कँटीला पेड़ बनकर प्रकट हों। जितनी जुबान चलती है, उससे ज्यादा हाथ-पाँव। क्लास में दाखिल होते ही कंधे का बस्ता मानो ढाल, और रुलर मानो तलवार बन जाती है। उस वक्त सारे के सारे बच्चे टेलीविजन के टीपूसुल्तान बन जाते हैं। हे ऽ...हो..ह-म-ला ! साथ में नोच-घसोट तो चलती ही रहती है। उस पर इन दिनों बच्चों का नया बैच आया है। तीनशाला शिशुओं का झुंड ! उनके बदन से अभी दूध की गंध भी नहीं गयी। लगातार पी-पी-पी शहनाई बजाते रहते हैं, बजाते ही चले जाते हैं। आज भी एक लड़की लगातार तीन घंटों तक महीन आवाज में राग ललित सुनाती  रही-माँऽ के पाछ जाना है। माँ के पाछ...! धत्त धत्त ! इस नौकरी से आखिर फायदा क्या हुआ ? साल भर गुजर गया, अभी तक वही नर्सरी में घिसटे जा रही है। सुनीता आंटी अभी तक उसे ऊँचे सेक्शन में ले जाने का नाम तक नहीं ले रही है। इसी लालच में पड़े-पड़े आलस की दुम बनी वह इस बार भी बी, एड. का फॉर्म लाने से चूक गयी। डब्लू. बी. सी. में बैठी, गणित के पेपर में लड्डू ! एक सवाल हल करने में ही पूरे डेढ़ घंटे पानी में चले गये। न्ना ! अब दोपहर को सोना बंद ! बीजगणित की प्रैक्टिस करनी होगी।

झीनुक दीवान पर अधलेटी हो आयी। दुःख-दर्द की बातें नीलांजना को सुनाने से कोई फायदा नहीं। यह उन सबके लिए अपनी-अपनी जिंदगी शुरू करने का वक्त है। नौकरी-चाकरी, भूत-भविष्य-निर्माण का वक्त ! इस दौर में कॉलेज-यूनिवर्सिटी की परीक्षाओं में कम नंबर लेना दोस्त सहेलिय़ों से पिछड़ जाना, क्या भला लगता है ?
बहरहाल, प्रसंग बदलकर उसने नीलांजना की दबी-छिपी ईर्ष्या पर खुशी का प्रलेप लगाने की कोशिश की ‘‘हाँ रे नील तेरे ब्याह की फिर कहीं बात चल रही थी न ? मामला कितना आगे बढ़ा ?’’
ब्याह का जिक्र छिड़ते ही नीलांजना का चेहरा एकदम चमक उठता है। वह हँसते-हँसते बताने लगी, ‘‘लड़का बॉस्टन से आ रहा है। पिछले इतवार को लड़के की माँ और बहन आये थे। साथ में उनका कोई मौसेरा या फुफेरा भाई था।’’
‘‘इंटरव्यू लिया ? पहले लड़केवालों की तरह हाथ की रेखाएँ देखना चाहा होगा ?’’

‘‘ऊँहुँ, लड़के ने तस्वीर देखकर कमोबेश पसंद कर लिया था। बस चंद छुटपुट सवाल करता रहा। मैं रिसर्च करना चाहती हूँ या नहीं ? कौन-कौन-सा खाना पका सकती हूँ ? ड्राइविंग आती है या नहीं ? घर-द्वार सजाने-सँवारने के बारे में कैसी सूझबूझ है ? उस मुल्क में कामकाजी लोगों को बेहिसाब समस्याएँ हैं। सो, इस बार इंडिया आकर पाँच-सात लड़कियाँ देखकर, चुन-बीनकर एकदम से ब्याह करके ही वापस लौटेगा !’’
झीनुक की आँखें गोलमोल हो आयीं, ‘‘देख इस बार तू मौका हाथ से जाने मत देना। बॉस्टन के बारे में कसकर इंटव्यू लेना। सीधे-सीधे सवाल करना, घर-द्वार की झाड़ू-बुहारू कर सकता  है या नहीं, चावल का माँड़ सुखाना आता है या नहीं, बच्चे की नैपी कैसे बदलते हैं....’’
शुभाशीष खिड़की के किनारे जाकर गिलास के पानी से हाथ धो रहा था। उसने वहीं से चिल्लाकर कहा, ‘‘हाँ, हाँ, पहले से खबर देना, प्रश्नावली मैं तैयार कर दूँगा।’’

सुलग्ना हँसते-हँसते लोटपोट हो गयी ‘‘जरा सोच वह नजारा। बॉस्टन लड़कियों की तरह घुटने मोड़कर सिर नीचा किए बैठा है और नीलू काल्पनिक मूँछ पर ताव देते हुए धुआँधार सवाल पर सवाल उछालती हुई-हाँ, तो बताओ। तुम्हारे बदन का रंग क्या सच ही लाल है ? या अमेरिकी क्रीम लगाई है ? रुई और स्परिट से घिसकर देखूँ जरा ?’’
कमरे में नये सिरे से हँसी-ठहाका का माहौल ! लेकिन झीनुक को बिल्कुल हँसी नहीं आयी। लड़कियाँ भी अगर इस भंगिमा में बैठी हों तो हँसी नहीं आती, तो लड़कों को तो उस मुद्रा में देखकर उसे भला कैसे हँसी आती ? मैनाक ने कहा, ‘‘अब तुम लोग चाहे जो कहो, बाजार एनआरआई लोगों का है। क्यों रे, बॉस्टन को ग्रीन-कार्ड मिल चुका है ?’’
गर्वित मुर्गे की तरह नीलांजना ने सिर झटकाया, ‘‘बेशक ! जब इतने दिनों से वहाँ रह रहा है तो ग्रीन-कार्ड तो खैर मिल ही चुका है। उसकी माँ तो रुआँसी होकर बता रही थी कि अब उसका बेटा शायद कभी वापस न लौटे-’’
‘‘खैर, अक्लमंद है तो उसे यही करना चाहिए। बुद्धिमान, प्रतिभावान लड़के आखिर किस भरोसे यहाँ पडे रहें ? एइ श्रवणा, तेरे भाई का क्या प्लान है ? इंजीनियरिंग के बाद जीआरआई तो देगा न ?’’

‘‘पता नहीं !’’ झीनुक ने मुँह बिचकाया, ‘‘अभी तो थर्ड ईयर में ही गया है, अभी से भला क्या कहा जा सकता है ?’’
‘‘अरे नहीं-नहीं, जिंदगी की प्लानिंग बहुत पहले  से ही कर रखना चाहिए।’’ शुभाशीष बेहद गंभीर दिखा, ‘‘तेरे भाई को देखा है मैंने ! ब्रिलियंट लड़का है। ऐसे ब्रिलिएंट लड़के की अगर अभी से कोई साफ-साफ महत्त्वाकाँक्षा न हो तो...’’  


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