आचार्य श्रीराम शर्मा >> अध्यात्मवादी भौतिकता अपनाई जाए अध्यात्मवादी भौतिकता अपनाई जाएश्रीराम शर्मा आचार्य
|
10 पाठकों को प्रिय 18 पाठक हैं |
अध्यात्मवाद पर आधारित पुस्तक
अध्यात्म वस्तुतः एक महान् विज्ञान है। इसे जीवन विद्या या संजीवनी विद्या कह सकते हैं। जीवन जैसे महान् कार्य का सही उपयोग करना इसी ज्ञान के आधार पर संभव होता है। किसी बड़ी जागीर, मिल, फैक्टरी, फार्म संस्था, उद्योग या विशालकाय मशीन को चलाने, सुधारने और लाभदायक स्थिति में रखने के लिए प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। यदि अनाड़ी हाथों में ऐसे बड़े काम सौंप दिये जाएँ तो अनर्थ की ही संभावना रहेगी। मानव जीवन ऐसी ही एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। चौरासी लाख योनियों के बाद प्राप्त हुआ, सृष्टि का सर्वोपरि उपहार, यह सुर-दुर्लभ मनुष्य शरीर है। इसको ठीक प्रकार से जीने की जो एक सर्वागपूर्ण विद्या है, उसे ही अध्यात्म कहते हैं, जिसने अध्यात्म का शुद्ध स्वरूप जान लिया और उसे अपना लिया उसके लिए यह मानव शरीर ऋद्धि-सिद्धियों का भंडार है। सुख-शांति का रत्न कोष है। आनंद और उल्लास का खजाना है। ऐश्वर्य और वैभव का कल्पवृक्ष है। अध्यात्मयुक्त जीवन ही वह जीवन है जिसे प्राप्त कर मनुष्य अपने आप को देवता की स्थिति में पहुँचा हुआ अनुभव करता है।
लौकिक जीवन में जितने भी सुख-साधन एवं प्रसन्नतादायक अवसर हैं, उनका मूल अध्यात्म ही है; यदि इस विचारधारा का प्रभाव मन पर न हो तो पुण्य कर्म किस प्रकार बन पड़ेंगे? और उनके बिना सुख-साधनों से परिपूर्ण प्रारब्ध कैसे बनेगा? स्त्री-पुत्रों का, स्वजनों-परिजनों का, सज्जन और सद्भाव संपन्न होना एक बहुत बड़ा सुख है। पर यह सुख उसे ही मिलता है, जिसने अपने स्वभाव और चरित्र को आदर्श बनाकर अपने निकटवर्ती लोगों को प्रभावित कर लिया है। दूसरों को सज्जन बनाने के लिए अपना सज्जन होना आवश्यक है।
क्रोधी बाप के बेटे अवज्ञाकारी हो सकते हैं। बालक के स्वभाव का बहुत कुछ निर्माण उसके जन्म से पूर्व हो जाता है। माता-पिता के रज वीर्य से बच्चे का शरीर बनता है और उनके स्वभाव एवं चरित्र से उसका मन विनिर्मित होता है। अच्छी संतान पैदा करने के इच्छुक माता-पिता को इसके लिए वर्षों पूर्व आत्म निर्माण की साधना करनी पड़ती है। अपना चेहरा कुरूप हो तो फोटो भी कुरूप ही खिंचेगा। माता-पिता का स्वभाव अव्यवस्थित हो तो उनके बालक कैसे सज्जन और सद्भावी होंगे? बच्चों को पौष्टिक भोजन कराकर, उन्हें स्वस्थ और कपड़े, जेवर आदि से सजाकर सुंदर बनाया जा सकता है, पर उनके स्वभाव में श्रेष्ठता तो तभी आयेगी जब माता-पिता अपनी श्रेष्ठता का प्रभाव प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से उन पर डालें।
|
- भौतिकता की बाढ़ मारकर छोड़ेगी
- क्या यही हमारी राय है?
- भौतिकवादी दृष्टिकोण हमारे लिए नरक सृजन करेगा
- भौतिक ही नहीं, आध्यात्मिक प्रगति भी आवश्यक
- अध्यात्म की उपेक्षा नहीं की जा सकती
- अध्यात्म की अनंत शक्ति-सामर्थ्य
- अध्यात्म-समस्त समस्याओं का एकमात्र हल
- आध्यात्मिक लाभ ही सर्वोपरि लाभ है
- अध्यात्म मानवीय प्रगति का आधार
- अध्यात्म से मानव-जीवन का चरमोत्कर्ष
- हमारा दृष्टिकोण अध्यात्मवादी बने
- आर्ष अध्यात्म का उज्ज्वल स्वरूप
- लौकिक सुखों का एकमात्र आधार
- अध्यात्म ही है सब कुछ
- आध्यात्मिक जीवन इस तरह जियें
- लोक का ही नहीं, परलोक का भी ध्यान रहे
- अध्यात्म और उसकी महान् उपलब्धि
- आध्यात्मिक लक्ष्य और उसकी प्राप्ति
- आत्म-शोधन अध्यात्म का श्रीगणेश
- आत्मोत्कर्ष अध्यात्म की मूल प्रेरणा
- आध्यात्मिक आदर्श के मूर्तिमान देवता भगवान् शिव
- आद्यशक्ति की उपासना से जीवन को सुखी बनाइए !
- अध्यात्मवादी भौतिकता अपनाई जाए
- आध्यात्मिक साधना का चरम लक्ष्य
- अपने अतीत को भूलिए नहीं
- महान् अतीत को वापस लाने का पुण्य प्रयत्न