आचार्य श्रीराम शर्मा >> आत्मिक प्रगति के लिए अवलम्बन की आवश्यकता आत्मिक प्रगति के लिए अवलम्बन की आवश्यकताश्रीराम शर्मा आचार्य
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आत्मिक प्रगति के लिए अवलम्बन की आवश्यकता
दो जून १९९० को परम्पूज्य गुरुदेव का महाप्रयाण हुआ। अपने अन्तिम सन्देश
में उन्होंने कहा था कि जो कार्य वे स्थूल शरीर से नहीं कर सके अब कारण
शरीर से सम्पन्न करेंगे। विश्व कुण्डलिनी जागृत करेंगे, जिससे स्वाति
नक्षत्र के चमकने पर मोती, वंशलोचन, मणिमुक्ता बनने का सौभाग्य उन सभी
आत्माओं को मिलेगा जो उनकी कारण सत्ता से जुड़ेंगे। यह क्रम इस शताब्दी के
अंत तक निरन्तर चलता रहेगा।
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- आत्मिक प्रगति के लिए अवलम्बन की आवश्यकता
- श्रद्धा का आरोपण - गुरू तत्त्व का वरण
- समर्थ बनना हो, तो समर्थों का आश्रय लें
- इष्टदेव का निर्धारण
- दीक्षा की प्रक्रिया और व्यवस्था
- देने की क्षमता और लेने की पात्रता
- तथ्य समझने के उपरान्त ही गुरुदीक्षा की बात सोचें
- गायत्री उपासना का संक्षिप्त विधान
अनुक्रम
विनामूल्य पूर्वावलोकन
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