गीता प्रेस, गोरखपुर >> आध्यात्मिक प्रवचन आध्यात्मिक प्रवचनजयदयाल गोयन्दका
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इस पुस्तिका में संग्रहीत स्वामीजी महाराज के प्रवचन आध्यात्म,भक्ति एवं सेवा-मार्ग के लिए दशा-निर्देशन और पाथेय का काम करेंगे।
सबके लिये निकाली हुई चीजको तुम अकेले सारी-की-सारी कैसे ले सकते हो। बड़े
चन्देमें, उस प्रभुके खजानेमें अपनी पूँजीको जमा रहा है। उसमेंसे सबको मिल ही
सकता है। उस स्थानपर परमात्मा उसको ही गुमास्ता बनाकर अपना काम करवा सकते
हैं। याज्ञवल्क्यने जनकको गुमास्ता बनाकर राज्य सौंप दिया, इसी प्रकार
नि:स्वार्थ भावसे, निरभिमान भावसे, भगवत् प्रेरणानुसार कार्य किया जाय। अपना
अभिमान गया भगवान्का सेवक बनकर रहे। भगवान्की चीज दे। अपनी शक्ति वहाँ जमा दे
दी, अब बड़ी शक्ति लेकर सबके उद्धारके लिये कार्य कर रहा है। अपना सर्वस्व
दिया और मेम्बर बना। परमात्माके सर्वस्व अर्पण करके उनकी शक्ति से वितरण करे।
सबके कल्याणके लिये जो अपना सर्वस्व त्याग देता है, उस त्यागसे भी जो फल होता
है, उसका भी सबके कल्याणके लिये त्याग करे, फिर उसका जो फल मिले वह भी सबके
लिये, इस प्रकार खूब अपने मनमें सबके कल्याणका भाव रखे। दीर्घतपा ब्राह्मणने
गायत्रीका जपरूपी तप किया। राजा इक्ष्वाकु उनके पास आये और कुछ सेवा करनी
चाही और कहा कि आपको जो इच्छा हो ले लें। दीर्घतपाने कहा कि तुमको जो इच्छा
हो मौग सकते हो। राजाने कहा—आपने जो तपस्या की है वह मुझे दे दीजिये।
दीर्घतपाने कहा ले लो। राजाको चेत हुआ बोले मैं क्षत्रिय हूँ, आप ब्राह्मण
हैं, मेरा धर्म तो देना ही है। दीर्घतपाने कहा-सोचकर क्यों नहीं माँगा, अब तो
लेना होगा। वहाँ काल, मृत्यु एवं यमराज थे। उनसे न्याय कराया गया, उन्होंने
कहा कि राजाको सोचकर कहना चाहिये था, अब तो लेना ही पड़ेगा। राजाने कहा अच्छी
बात है। उसके बाद धर्मराजने दीर्घतपा ऋषिसे कहा मृत्युका समय आ गया चलिये।
ऋषिने कहा अभी मुझे
घोर तपस्या करनी है। धर्मराज चुप रहे। राजाने पूछा इनके पास अब कौन-सा पुण्य
बचा है। सब तो मुझे दे चुके। कौन-सी चीज इनके पास है जिससे आप इन्हें नहीं
मार सकते। धर्मराज बोले सारे तपका दान आपको दे दिया। इस त्यागका भी तो फल
होना चाहिये, वह इतना महान् है।
दानके फलके विषयमें यह कथा कही गयी। सब भगवान्के भत बन जायें, यह भाव खूब
बढ़ाये। लाला बलदेवसहायजी देहरादूनवालोंका उत्तम भाव था, यही भाव था कि सब
भगवान्के भक्त बन जायें। वे बड़े अच्छे पुरुष थे। उनका यह भाव स्वाभाविक था।
जिस कामसे भगवान् प्रसन्न हों वही करे।
जिस बातको हम हृदयसे अच्छी समझते हैं उसके अनुसार अगर हमलोग साधनमें तत्पर हो
जायें तो बहुत जल्दी कल्याण हो सकता है। एकान्तमें बैठकर शुद्ध हृदयसे
परमात्मापर भरोसा करके भगवान्की प्रेरणा हो वही सिद्धान्त हम बना लें। प्राण
दे दें पर उस सिद्धान्तसे न डिगें। निश्चय कर लिया कि ब्रह्मचर्यका पालन
करेंगे और फिर परस्त्रीकी तरफ हमारा मन जाता है तो हम अपनी आत्माका पतन करते
हैं। जो बात हम सबसे बढ़कर समझते हैं उसको सिद्धान्त बनाकर तत्परताके साथ
उसके पालनमें लग जायें, इससे बहुत जल्दी हमारा कल्याण हो सकता है।
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- सत्संग की अमूल्य बातें