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गीता प्रेस, गोरखपुर >> आध्यात्मिक प्रवचन

आध्यात्मिक प्रवचन

जयदयाल गोयन्दका

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :156
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1007
आईएसबीएन :81-293-0838-x

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इस पुस्तिका में संग्रहीत स्वामीजी महाराज के प्रवचन आध्यात्म,भक्ति एवं सेवा-मार्ग के लिए दशा-निर्देशन और पाथेय का काम करेंगे।


पेंशन पानेवालेके चार भेद हैं-
(१) पेंशनका अधिकार होनेपर भी पेंशन नहीं लेता, सरकारका काम करता है।
(२) पेंशन लेता है काम करता है।

(३) पेंशन नहीं लेता काम भी नहीं करता।
(४) पेंशन लेता है काम नहीं करता।
इन चारोंमें श्रेष्ठ १ नम्बर है और वही भगवान्का सबसे ऊँचे दर्जेका भक्त है। यहाँ पेंशन मुक्ति है। सरकारका काम लोकोपकार है। मुक्तिका एकदम तिरस्कार करनेवाले केवल निष्कामी एक नम्बर हैं। मुक्ति चाहें तो उनका दर्जा घट जाय। उनके तो चाहनेसे ही लाखोंकी मुक्ति हो जाय। सदावर्त करनेवाला लेने लग जाय तो निन्दाकी बात है। हाथ फैलाना तो छोटापन है। मुक्ति तो उसकी दासी है, उसका अभाव थोड़े ही है। वह तो बेचारा मुक्तिसे डरता है, कहता है कि सब भूखे बैठे हैं फिर मैं कैसे भोजन करूं। दयालु है, सबका उद्धार चाहता है। मुक्ति भी वहाँ तो स्वार्थ है। दयावान् आदमी कैसे उसे स्वीकार करे। वह जीवन्मुक्त नहीं, जीवन्मुक्तिको देनेवाला है, जीवन्मुक्त करनेवाला है। उसकी भूख तो भाग जाती है। बस बाँटनेमें ही प्रसन्नता है। वह तो भगवान्के साथ भोजनकी बात करता है। यदि पहले भोजन करनेकी बात उससे करते हैं तो वह कहता है कि प्रभो! मेरा आपमें प्रेम कहाँ है, इसलिये आप बिना आपके भोजन करनेकी बात करते हैं। जल्दी है तो काम खतम कर डालिये। सबको मुक्त कर दीजिये।

एक विद्वान् और एक वेश्या काशीमें रहते थे, वेश्या कपड़ा फटकार रही थी। विद्वान् महात्माने कहा अलग हटो। वेश्या बोली-यह काशी है, यहाँ सबकी एक गति है, जहाँ तुम जाओगे वहीं मैं जाऊँगी। पंडितजी दु:खी होकर जाने लगे, कहा जिस काशीमें ऐसा अन्धेर है एक विद्वान् और वेश्याकी एक ही गति है उसमें मैं नहीं रहूँगा। काशीकी अधिष्ठात्री देवी प्रकट हुई और सब बातें समझा दीं। पापीकौ अधिक-से-अधिक ८८००० वर्षतक भैरवी यातना भोगनी
पड़ती है, ज्ञानी तुरन्त मुक्त हो जाता है। आप इतनी पवित्र भूमि छोड़कर कहाँ जा रहे हैं, पंडितजी समझ गये। केदारखण्डमें भैरव यातना भी नहीं भोगनी पड़ती। शिवजी भोलेनाथ हैं, भक्त केदारजीकी वरदान दे दिया था। अब पूर्व प्रसङ्गपर आ जाता हूँ। सबकी मुक्ति आजतक नहीं हुई, परन्तु हो तो सकती ही है। अपने तो यही चेष्टा करनी चाहिये। निष्काम प्रेम-भाव अपने कल्याणकी, उद्धारकी, परमात्माकी प्रासिकी बात ही नहीं तन, मन, धन, जीवन अर्पण कर देना चाहिये कि सबका कल्याण हो जाय। भगवान्की दयासे कोई भी काम असंभव नहीं है। ऐसा दृढ़ विश्वास रखना चाहिये कि सबका कल्याण हो सकता है। यह आग्रह पहुँचे हुए पुरुषोंसे भी ऊँचे दर्जेकी बात है। बड़ी भारी दयाकी बात है। ऐसे भतको ईश्वरसे भी बढ़कर बताया जाय तो कोई बड़ी बात नहीं है। यह उद्देश्य बहुत सराहनीय है, इससे बढ़कर और उद्देश्य हो ही नहीं सकता कि सबका कल्याण हो। जो मुक्तितकके स्वार्थका त्याग कर सकता है वही ऐसा उद्देश्य बना सकता है। स्वार्थका त्याग करना यह कहना तो बड़ा सहज है, परन्तु होना बड़ा कठिन है। एक महत्त्वकी बातजो कुछ है भगवान्के अर्पण है यह अच्छी बात है, पर इसमें भी यह स्वार्थ है कि कहीं मेरी मूर्खतासे खर्च न हो जाय, इसीलिये भगवान्के यहाँ जमा कर दिया। यह स्वार्थकी ही बात है। इससे ऊँची बात यह है कि हे प्रभु! वास्तव में तो मुझसे कुछ नहीं बनता। जो कुछ बनता है वह आपकी कृपासे ही बनता है। आप ही निमित्त बनाकर करा लेते हैं, अगर निमित्त बननेमात्रके बदलेमें कुछ मिलता हो तो उससे सबका कल्याण हो जाय, सबके काममें आ जाय। युधिष्ठिरने कुत्तेके लिये स्वर्गको लात मार दी। उनसे कहा गया कि कुत्तेको पालनेवाला नरकमें जाता है। उन्होंने कहा कि कुत्ता मेरे साथ
रहा है इसलिये मैं स्वर्गमें कुत्तेको छोड़कर नहीं जाना चाहता, बस कुत्तेमें ही धर्मराज प्रकट हो गये। यह स्वार्थत्यागका दृष्टान्त है। प्रशंसा करनेलायक तो वही पुरुष है जिसमें अधिक-से-अधिक स्वार्थका त्याग है। भाव यही रखना चाहिये कि सबका कल्याण हो, सबका उद्धार हो। साधारण लोग मोटे स्वार्थसे काम करते हैं। मुक्तिकी इच्छावाले मुक्तिके स्वार्थको रखकर काम करते हैं। अपने यह लक्ष्य रखना चाहिये कि सबका कल्याण जिस किसी प्रकार हो, जल्दी हो जाय। वह प्रभु बड़े दयालु हैं। उनकी कृपासे ही हो सकता है। क्यों नहीं करते हैं क्या कारण है पता नहीं। वह दयालु हैं, सर्वसामथ्र्यवान् हैं। कोई महापुरुष भगवान्का दर्शन करा सकते हैं, किन्तु नहीं कराते, मुक्ति दे सकते हैं, किन्तु नहीं देते। क्यों नहीं करते इसमें भी उनकी दया ही है। सामथ्र्यकी कमी नहीं है। परमात्माकी इच्छा यह बात अपनी बुद्धिके बाहरकी है। हम नहीं समझ सकते। पर हमें यही उद्देश्य रखना चाहिये कि प्रभु सबका कल्याण हो जाय, सब आपके भक्त बन जायें। अपनी सामथ्र्य कहाँ है, प्रभुकी दयासे हो सकता है। अपना वोट तो हर समय यही देता रहे कि सबका उद्धार हो जाय। प्रसन्नता तो उसीमें हो जो सबकी इच्छासे हो, सभापतिकी आज्ञासे हो, परन्तु अपना वोट, अपनी राय तो यही रहे कि बस सबका कल्याण हो, दर्ज तो होगा कि ऐसा भी वोट आया है। एक आदमी आकर माँगता है कि तुमने ५० हजार रुपये निकाले हैं मुझे दे दो। वह कह सकता है कि भाई तुम्हारे अकेलेके लिये थोड़े ही है, सबके लिये है। अपने हिस्सेके अनुसार ले लो। अगर ऐसी बात कहनेमें संकोच हो, अभिमानकी बात कहनी पड़े और यह कह दिया जाय कि नहीं दे सकता, इसके बदलेमें अगर उसे खोटी-खरी सुननी पड़े तो उसका क्या हर्ज है।

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    अनुक्रम

  1. सत्संग की अमूल्य बातें

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