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गीता प्रेस, गोरखपुर >> आध्यात्मिक प्रवचन

आध्यात्मिक प्रवचन

जयदयाल गोयन्दका

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :156
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1007
आईएसबीएन :81-293-0838-x

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इस पुस्तिका में संग्रहीत स्वामीजी महाराज के प्रवचन आध्यात्म,भक्ति एवं सेवा-मार्ग के लिए दशा-निर्देशन और पाथेय का काम करेंगे।


धर्म और नीति

श्रीज्वालाप्रसादजी डिप्टी कलेक्टरने क्रोधकी अपनी बीती हुई घटना सुनायी। घरमें नौकरको क्रोधसे धमकाया गया। काम तो बन गया पर स्थिति बिगड़ गयी। इस विषयमें उनके प्रश्नका उत्तर-

नौकरके हितके लिये क्रोध तो लाना चाहिये, पर बनावटी, असली नहीं। असली क्रोध आयेगा तो हमपर सवार होकर हमारी दुर्दशा कर देगा। यदि बनावटी क्रोध न ला सके तो काम भले ही देरसे हो या बिगड़ जाय पर क्रोध नहीं करना चाहिये, क्योंकि अगर हम क्रोध करेंगे और यदि क्रोधके वश में हो गये तो हमारा आध्यात्मिक पतन हो जायगा। क्रोध न करना इसके लिये ही उपदेश दिया जाता है। क्रोध करो इसके लिये उपदेशकी आवश्यकता ही नहीं है; क्योंकि प्राय: जीवोंकी आदत बिगड़ी हुई है। एक भाई कहता है कि नकली क्रोध करनेसे असली आ जाता है, हम उसके वशीभूत हो जाते हैं तो ऐसी स्थितिमें उसे क्रोध नहीं करना चाहिये। मनके प्रतिकूल जितनी क्रिया हो रही है वह अनिच्छा या परेच्छासे हो रही है। मालिककी राजीमें हम राजी रहें। प्रभु हमारी परीक्षा ले रहे हैं। मालिक जो भी मनके विरुद्ध करें उसमें क्रोध न हो, शान्ति बनी रहे। वही मालिकका भक्त है, अन्यथा कथनमात्रकी भक्ति है। मनुष्यका स्वभाव अलग-अलग है। मेरे काममें चार नीति हैं-साम, दाम, दण्ड, भेद। मैं पहले साम, दामको काममें लेता हूँ। इनसे काम न चले तो दण्डको काममें लेता हूँ भेदका काम बहुत ही कम सालमें एकदो बार पड़ता है। साम-समझाकर प्रेमसे, दाम-लोभ स्वार्थ दिखाकर, दण्ड-भय दिखाकर, बनावटी क्रोध दिखाकर, भेद-खूफिया पुलिसकी तरह। यह चौथी भेदनीति सबसे नीचे दर्जेकी बात है, जहाँतक हो इसको काममें नहीं लाना चाहिये। साधु पुरुषोंके लिये ऊँचा-नीचा दर्जा कोई नहीं है, वे कभी कोई अनुचित क्रिया करते ही नहीं। उनकी प्रत्येक
क्रिया आदर्श होते हुए भी हमारे लिये जो बात वे कहें, हमारे लिये वही करना श्रेष्ठ है। महात्मापर क्रोधका असर नहीं होता। इसीलिये ही उनके लिये कहा गया है- समरथको नहीं दोष गुसाड़। उनपर क्रोधका असर नहीं होता। हम अपनेको वश में नहीं रख सकते, इसलिये महात्मा लोगोंके अनुसार आचरण न करके वे जैसी आज्ञा दें उसीके अनुसार करना चाहिये। जैसे महात्माने ३० वर्षकी अवस्थामें विवाह नहीं किया वह आदर्श है, पर दूसरेने ३० वर्षकी अवस्थामें उनकी नकल करनी चाही, कहा कि तुम विवाह कर लो। वे जैसा कहें वही करना चाहिये। नीति और धर्मकी व्याख्या- जयदेव कविकी एक राजाने काफी धन दिया। रास्तेमें डाकुओंने उनके हाथ काटकर एक सूखे कुंएमें डाल दिया तथा धन लूटकर ले गये। उस राजाने जंगलसे जाते समय कीर्तन-ध्वनि सुनकर उन्हें निकाला और अपने साथ ले गये। एक बार वे डाकू पकड़े गये एवं दरबारमें लाये गये। जयदेवजीने काफी धन दिलवाकर उन्हें छुड़वा दिया। रास्तेमें कोतवालने पूछा कि भक्तजीकी आपके ऊपर इतनी कृपा क्यों है? उन्होंने कहा कि वह हमारा साथी है हम इसकी पोल न खोल दें इसलिये इसने हमें धन दिलाया है। इतना कहते ही धरती फट गयी और चारों डाकू उसीमें समा गये। मेरेसे तो ऐसा काम पड़नेपर इस तरहका व्यवहार नहीं होता। आखिर में नतीजा क्या हुआ चारों मारे गये। उस नीतिका परिणाम तो यही हुआ। जिस साधुतासे उनकी मृत्यु हो जाय, उस साधुतामें धब्बा लगाकर भी उनकी जान बच जाती तो उससे भी अच्छा था। उनका हित कैसे ही यह भाव ही हृदयमें रखना चाहिये। जयदेव कविका व्यवहार, भाव सबकी प्रशंसा ही की जाती है। उनको किसी प्रकारका दोष नहीं लगाते हैं, पर इससे भी बढ़कर दूसरी नीति हो सकती है। साधुकी साधु ही जानें। महात्माको किस प्रकार करना चाहिये यह हम नियत नहीं कर सकते। उसका हित कैसे ही यही भाव
दृढ़ करना चाहिये। दण्डका नम्बर तीसरा ही है, पर हम नहीं कह सकते कि महात्मा उसको काम में ले ही नहीं। उनके लिये हम कोई विधान नहीं कर सकते। उनका तो सारी दुनियापर लक्ष्य है वे सबके लिये धर्म और नीतिका ख्याल करते हैं। जो कुछ क्रिया करनी है वह इसी उद्देश्यसे करनी चाहिये कि उसका हित कैसे हो। रागद्वेषके वशीभूत होकर नहीं करना चाहिये। ऐसा तो कोई एक ही निकलता है जो रागद्वेषके वशीभूत न हो। यदि वास्तव में आपका भाव ठीक है तो सत्य तो सत्य ही है। कभी-न-कभी उसमें यह भाव आयेगा ही कि वे मेरा हित ही चाहते थे, मेरी ही भूल थी। मेरे साथमें बुराई करनेपर भी बदलेमें यदि मेरे द्वारा उसकी हितकी क्रिया होगी तो आखिर में उसको समझ आयेगी ही। यदि नहीं भी आये तो कोई परवाह नहीं अपने तो हितकी ही चेष्टा करते रहना चाहिये। उसको यदि चेत कराना हो तो उसके हितकी विशेष चेष्टा करो, अपनी आत्माको जोरदार बनाओ। हृदयमें यह भाव रखो कि उसका हित हो, उसका हित चाहते रहो इसका भी असर पड़ेगा। यदि हम वास्तव में किसीका हित चाहते हों तो साम, दाम, दण्ड, भेद सबका ही उपयोग कर सकते हैं। पहले साम, दाम, दण्ड फिर भेद-यही इसका क्रम है। संन्यास आश्रममें जहाँतक हो साधुताका ही व्यवहार करना है, उसे कोई शासन तो करना है नहीं। अपने स्वार्थके लिये अच्छे पुरुष भेद नीति काम में नहीं लाते।

किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥
(गीता ४।१६)

कर्म क्या है? और अकर्म क्या है?-इस प्रकार इसका निर्णय करनेमें बुद्धिमान् पुरुष भी मोहित हो जाते हैं। इसलिये वह कर्मतत्त्व मैं तुझे भलीभाँति समझाकर कहूँगा, जिसे जानकर तू अशुभ अर्थात् कर्मबन्धनसे मुक्त हो जायगा।

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    अनुक्रम

  1. सत्संग की अमूल्य बातें

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