आवारा - खलील जिब्रान Awara - Hindi book by - Khalil Jibbran
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आवारा

खलील जिब्रान

प्रकाशक : राजपाल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :112
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6715
आईएसबीएन :978-7028-762-9

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यह पुस्तक ख़लील जिब्रान की अंतिम रचना है, जो वर्ष 1931 में उन्होंने अपनी मृत्यु के बस कुछ ही पहले पूरी की। इस पुस्तक को भी ‘मसीहा’ की ही तरह एक श्रेष्ठ कृति का सम्मान दिया गया।

Awara - An Hindi Book by Khalil Jibbran

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

 

ख़लील जिब्रान बीसवीं सदी के एक लोकप्रिय लेखक थे। 6 जनवरी 1883 को उनका जन्म लेबनान में हुआ। उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश भाग अमेरिका में बिताया और अपने जीवन काल में पचीस किताबों की रचना की। वह एक निबंधकार, उपन्यासकार, कवि तथा चित्रकार के रूप में जाने गये और उनकी रचनाएं पीढ़ी दर पीढ़ी पढ़ी जाती रहीं और पाठकों को जीवन, प्रेम और सहभागिता के नये अर्थ समझाती रहीं।

यह पुस्तक ख़लील जिब्रान की अंतिम रचना है, जो वर्ष 1931 में उन्होंने अपनी मृत्यु के बस कुछ ही पहले पूरी की। इस पुस्तक को भी ‘मसीहा’ की ही तरह एक श्रेष्ठ कृति का सम्मान दिया गया।

इस पुस्तक में ख़लील जिब्रान ने कविता और सूक्तियों के माध्यम से अपना कालातीत जीवन-दर्शन तथा ज्ञान प्रस्तुत किया है जिसने विश्व-स्तर पर मान्यता पाई है। इस अधुनातन गौरव-ग्रंथ को ख़लील जिब्रान के रहस्यपूर्ण चित्रांकन ने और भी निखार दे दिया है।

 

आवारा

मैं उसे चौराहे पर मिला। वह एक अपरिचित व्यक्ति था; जिसके हाथ में लाठी, शरीर पर एक चादर और चेहरे पर एक अथाह दर्द का अज्ञेय परदा था।
हमारे इस मिलन में गरमी और प्रेम था। मैंने उससे कहा, ‘‘मेरे घर पधारिए और मेरा आतिथ्य स्वीकार कीजिए।’’ और वह मेरे साथ हो लिया।

मेरी पत्नी और बच्चे हमें द्वार पर ही मिल गए। वे सब उससे मिलकर बहुत प्रसन्न हुए और उसके आने पर फूले न समाए।
फिर हम सब एक साथ भोजन के लिए बैठे। हम बहुत प्रसन्न थे और वह भी खुश था, किन्तु मौन। उसका मौन रहस्यपूर्ण था।

भोजन के बाद हम आग के पास आ बैठे। और मैं उससे उसकी यात्राओं की बाबत पूछता रहा।
इस रात और दूसरे दिन उसने हमें बहुत-सी कहानियां सुनाईं। किन्तु यह जो मैं लिख रहा हूं, यह पुस्तक उसके कटु दिनों का अनुभव है। यद्यपि वह स्वयं अत्यन्त कृपालु तथा दयालु था, परन्तु ये कहानियां ! ये तो उसके मार्ग की धूलि और धीरज की कहानियां हैं।

और तीन दिन पीछे जब वह हमसे विदा हुआ तो हमें यह अनुभव नहीं होता था कि अतिथि को विदा किया, वरन् ऐसा मालूम होता था, जैसे हममें से ही कोई बाहर वाटिका में गया है और उसे अभी घर आना है।

 

वेश

एक दिन समुद्र के किनारे सौन्दर्य की देवी की भेंट कुरूपता की देवी से हुई। एक ने दूसरी से कहा, ‘‘आओ, समुद्र में स्नान करें।’’

फिर उन्होंने अपने-अपने वस्त्र उतार लिए और समुद्र में तैरने लगीं।
कुछ देर बाद कुरूपता की देवी समुद्र से बाहर निकली, तो वह चुपके-से सौन्दर्य की देवी के वस्त्र पहनकर खिसक गई।
और जब सौन्दर्य की देवी समुद्र से बाहर निकली, तो उसने देखा कि उसके वस्त्र वहां न थे। नंगा रहना उसे पसन्द न था। अब उसके लिए कुरूपता की देवी के वस्त्र पहनने के सिवा और कोई चारा न था। लाचार हो उसने वही वस्त्र पहन लिये और अपना रास्ता लिया।

आज तक सभी स्त्री-पुरुष उन्हें पहचानने में धोखा खा जाते हैं।
किन्तु कुछ व्यक्ति ऐसे अवश्य हैं, जिन्होंने सौन्दर्य की देवी को देखा हुआ है और उसके वस्त्र बदले होने पर भी उसे पहचान लेते हैं। और यह भी विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि कुछ व्यक्ति ऐसे भी जरूर होंगे जिन्होंने कुरूपता की देवी को भी देखा होगा और उसके वस्त्र उसे उनकी दृष्टियों से छिपा न सकते होंगे।

 

उकाव और कौआ

पहाड़ी की एक ऊंची चोटी पर एक कौआ एक उकाव से मिला।
कौए ने उसका अभिवादन किया।
उकाव ने अभिमान से उसकी ओर देखा और धीरे से उसका अभिवादन किया।
कौए ने पूछा, ‘‘आशा है, श्रीमान् जी कुशल से होंगे ?’’

‘‘हूं’’ उकाव बोला, ‘‘हम सकुशल हैं। परन्तु क्या तुम यह नहीं जानते कि हम सब पक्षियों के राजा हैं और राजा से सम्बोधन करने का साहस उस समय तक न करना चाहिए जब तक हम स्वयं ऐसा पसन्द न करें ?’’
कौआ बोला, ‘‘मेरा तो विचार है कि हम सब एक कुटुम्ब से हैं।’

उकाव ने उसकी तरफ बड़ी घृणा से देखा और कहा, ‘‘यह तुझे किसने बताया है कि हम और तुम एक ही कुटुम्ब से हैं ?’’
कौआ बोला, ‘‘तो फिर शायद मुझे श्रीमान को यह जतलाना ही पड़ेगा कि मेरी उड़ान श्रीमान की उड़ान से ऊंची है और मेरी बोली आपकी बोली से सुरीली है और मैं गाकर दूसरे जीवों को आनंद देता हूं और श्रीमान् न किसी को प्रसन्न कर सकते हैं और न आनन्द दे सकते हैं।’’

 

परछाई

जून के महीने का एक प्रभात था। घास अपने पड़ोसी बलूत वृक्ष की परछाई से बोली, ‘‘तुम दाएं-बाएं झूल-झूलकर हमारे सुख को नष्ट करती हो।’’
परछाई बोली, ‘‘ अरे भाई, मैं नहीं, मैं नहीं ! जरा आकाश की ओर देख तो। एक बहुत बड़ा वृक्ष है जो वायु के झोकों के साथ पूर्व और पश्चिम की ओर सूर्य और भूमि के बीच झूलता रहता है।’’
घास ने ऊपर देखा तो पहली बार उसने वह वृक्ष देखा। उसने अपने दिल में कहा, ‘‘घास ! यह मुझसे भी लम्बी और ऊंची-ऊंची घास ही तो है।’’
और घास चुप हो गई।


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