स्व-अस्तित्व की रक्षा - गुरुदत्त Sva-Astitva Ki Raksha - Hindi book by - Gurudutt
लोगों की राय

विविध उपन्यास >> स्व-अस्तित्व की रक्षा

स्व-अस्तित्व की रक्षा

गुरुदत्त

प्रकाशक : हिन्दी साहित्य सदन प्रकाशित वर्ष : 1990
पृष्ठ :143
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5388
आईएसबीएन :0000

Like this Hindi book 9 पाठकों को प्रिय

362 पाठक हैं

प्रस्तुत है स्व-अस्तित्व की रक्षा

Sva Astitva Ki Raksha-2

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

सम्पादकीय

‘स्व-अस्तित्व की रक्षा’ स्व. श्री गुरुदत्त जी की उन पाण्डुलिपियों में से एक है जो अभी प्रकाश में नहीं आई हैं। पुस्तक में आरम्भ में ही बताया गया है कि इस संसार में दो प्रकार के मनुष्य होते हैं- एक दैवी स्वभाव वाले और दूसरे आसुरी स्वभाव वाले।

इस पुस्तक के प्रथम परिच्छेद में दैवी और आसुरी स्वभाव का विस्तार से वर्णन किया गया है। श्रीमद्भागवद्गीता में कृष्ण का अर्जुन को जो उपदेश है उसकी इस परिच्छेद में विस्तार से व्याख्या की गई है। दैवी और आसुरी स्वभाव का वर्णन करने के उपरान्त दोनों की तुलना करके मनुष्य को दैवी स्वभाव का क्यों बनना चाहिए, इस तथ्य को प्रतिपादित करते हुए दैवी स्वभाव से क्या-क्या हानियाँ होती हैं तथा वर्तमान में जिन-जिन नेताओं का स्वभाव आसुरी रहा है, उन्होंने देश, जाति और धर्म को कितनी तथा क्या-क्या हानियाँ पहुँचाई हैं, इसका भी उल्लेख कर दिया है। प्रशंगवशात् यह भी उल्लेख कर दिया गया है कि जो परिवार दैवी स्वभाव का होता है उसके परिवार में संतति भी सामान्यता दैवी स्वभाव की ही उत्पन्न होती है। किंतु इसके अपवाद भी होते हैं। उसका कारण मनुष्य के पूर्वजन्म के कर्म तथा वर्तमान जन्म का परिवारेतर वातावरण मुख्य होता है। लेखक का कथन है कि पूर्वजन्म के कर्म के विषय में तो विवशता किंतु वर्तमान परिवेश को सुधारना व्यक्ति के स्वयं के वश में है। बस आवश्यकता है उसको दैवी स्वभाव के गुणों को समझने की। परिच्छेद के अन्त में यही कामना की गई है कि मनुष्य यथा-शक्ति दैवी स्वभाव का बने तथा अन्यों को भी इसके लिए प्रेरित करे।

पुस्तक के द्वितीय परिच्छेद का शीर्षक है ‘वर्तमान स्थिति’। इस परिच्छेद में सामान्य जन की स्थिति के साथ-साथ उनके परिवेश का भी चित्रण किया गया है। इस परिच्छेद में वर्तमान शिक्षा प्रणाली और उसके परिणाम पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। इसमें तो कोई सन्देह नहीं है कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली न तो भारतीय है और न इसका प्रचलन भारतीयों ने किया है। हाँ, इसके संचालन में भारतीय जन-भले ही उपकरण बन गये हों और अपने स्वार्थवश उन्होंने इसके पूर्वापर परिणाम को न समझा हो अथवा समझकर भी उसकी उपेक्षा कर दी हो। मनुष्य का ‘स्वार्थ’ न केवल उसको अपितु उससे सम्बन्धित अथवा उसके कार्य से सम्बन्धित सभी को विनाश की ओर ले जाने में सहायक होता है।

वर्तमान शिक्षा प्रणाली ब्रिटिश सरकार के अधिकारियों द्वारा प्रचलित शिक्षा प्रणाली है। इसका प्रचलन सरकार के लिए कर्मचारी निर्माण करना था, देश के सुशिक्षित सभ्य नागरिक निर्माण करना नहीं। क्योंकि यदि नागरिकों का निर्माण करने के लिए शिक्षा प्रणाली का प्रचलन किया जाता तो भारत में अंग्रेज-राज आज से दो सौ वर्ष पूर्व ही समाप्त हो गया होता। किंतु सरकारी कर्मचारी निर्माण करने वाली शिक्षा प्रणाली प्रचलित करने का अंग्रेजों के लिए यह सुपरिणाम निकला कि आज भारत में स्वत्रन्त्र होने के चार दशक बीत जाने के उपरान्त भी वही शिक्षा प्रणाली प्रचलित है और उसी प्रकार अंग्रेजों का महत्त्व बखाना जा रहा है। क्योंकि उस काल में शिक्षित तथाकथित पठितों के हाथ में ही भारत सरकार की बागडोर दी गई थी। किन्तु भारत के लिए यह शिक्षा प्रणाली विष के समान सिद्ध हुई और आज भी हो रही है। वर्तमान में प्रचलित चरित्रहीनता, स्वार्थपरता, मदान्धता, इन सबसे बढ़कर भौतिकता को ही जीवन-सर्वस्व स्वीकार कर लेना न केवल व्यक्ति के लिए अपितु समाज और देश के लिए घातक सिद्ध हो रहा है और देशवासी हैं कि इस दुर्गुण को दूर करने के उपाय ही नहीं करते।

लेखक ने इसके लिए केवल अँग्रेजों को ही दोषी नहीं माना है। उनका कहना है कि उससे भी पूर्व इस्लाम जब भारत में आया तो ये त्रुटियाँ और न्यूनताएं सर्वप्रथम उनकी ही देन है। भौतिकता की भूमि इस्लाम के समर्थकों ने तैयार की थी और उस पर चरित्रहीनता, स्वार्थपरता आदि का बीजारोपण अँग्रेजों ने किया है।
न केवल इतना अपितु अंग्रेजों तथा इस्लाम की ही मानस सन्तान कांग्रेस को जब सरकार सौंपी गई तो उसने इस्लाम और अंग्रेजों की विरासत को सजाने सँवारने में ही अपने कर्तव्य की इतिश्री समझी है। उस विरासत को सँजाने-सँवारने में इन कांग्रेसी शासकों ने देश तथा देश-वासियों को रसातल में भेजने का उपक्रम किया है।

इसी परिप्रच्छेद में भारत किस प्रकार स्वतन्त्र हुआ, उसमें कौन-कौन से प्रयत्न कारण बने अनावश्यक श्रेय किसने प्राप्त किया तथा उस श्रेय-प्राप्ति के अनन्तर उससे देश तथा देशवासियों के साथ किस प्रकार का व्यवहार किया, इन सबका विवरण इस परिच्छेद में दिया गया है।

लेखक का मत, जिससे कि कोई भी प्रबुद्ध व्यक्ति सहमत हुए बिना नहीं रह सकता है कि जिस समय स्वतन्त्र भारत के संविधान का निर्माण किया जा रहा था, उस समय उसके सदस्यों में एक-दो भी सदस्य ऐसे होते जो नितान्त भौतिकता के जाल को अन्य सदस्यों को समझाने में समर्थ होते अर्थात जिन्हें भारत और भारतीयता का ज्ञान और मान होता तो कदाचित् वे संविधान-निर्माताओं को कुछ सीख दे पाते है और आज जो भारत का संविधान कहा जाता है और जो वास्तव में भारतवासियों के लिए नहीं अपितु लगता है भौतिकवादी देशों अथवा जातियों के लिए बनाया गया है, वह इतना निकृष्ट और पिलपिला न होता। लचीला तो हम उसको कह नहीं सकते। क्योंकि लचीले में तो फिर भी स्फुरन होता है जिसके कारण वह कभी भी सहसा खड़ा होकर ललकार सकता है। किन्तु भारत के नेता संविधान के निर्माता, क्रीतदास बुद्धिजीवी, जिन्होंने इस संविधान का निर्माण किया है, सभी तो पिलपिले सिद्ध हुए हैं।

तृतीय परिच्छेद में लेखक ने देश, देशवासियों, देश की राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक-धार्मिक-शैक्षिक आदि अवस्थाओं का विस्तार से वर्णन और विश्लेषण किया है लेखक ने बताया है कि वर्तमान स्थिति की उत्पत्ति का कारण क्या था और किस प्रकार उसका निराकरण किया जा सकता है। इसके लिए आध्यात्म की ओर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता पर लेखक ने आग्रह किया है। लेखक ने समाज के विभिन्न वर्गों और अंगों की तुलना मनुष्य शरीर के विभिन्न अंगों से करने के उपरान्त स्पष्ट किया है कि जिस प्रकार मानव की उन्नति के लिए आध्यात्म ही एकमात्र शरण अथवा उपाय है उसी प्रकार देश और जाति के उत्थान के लिए भी आध्यात्मविद्या ही एकमात्र उपाय है। बिना इसके भौतिकता की चकाचौंध में मोहग्रस्त प्राणी न अपनी उन्नति कर सकता है और न देश तथा जाति की।

लेखक ने इस भ्रम का भी मूलोच्छेदन किया है कि भौतिकवादी देशों में जो कुछ हो रहा है उसका ही अनुकरण भारत में करने का इसलिए यत्न किया जा रहा है क्योंकि वे देश और जातियाँ सुख-सुविधा का भरपूर उपयोग कर अपना जीवन आन्नदमय कर रहे हैं। लेखक ने यह सिद्ध किया है कि सब भ्रम है। न भौतिकवादी देश सुखी हैं और न उनका अनुकरण करने वाले देश ही सुखी हो सकते हैं।

भौतिकता का अनुकरण करने से मनुष्य अथवा समाज अथवा जाति या देश को क्षणिक अथवा तात्कालिक कोई सुख मिल जाए तो सम्भव है, किन्तु वह सुख स्थायी नहीं हो सकता। न केवल इतना अपितु वह भोगा हुआ सुख कालान्तर में बड़ा दुखदायी सिद्ध होगा। अनेक उदाहरणों से लेखक ने अपने इस कथन की पुष्टि की है।

लेखक ने स्थान-स्थान पर वर्तमान शिक्षा प्रणाली, उसके कारण होने वाली हानियों की ओर विशेष ध्यान आकर्षित किया है। केवल इतना ही नहीं अपितु इसका निराकरण किस प्रकार किया जाए, इस पर भी उन्होंने विस्तार से प्रकाश डाला है। लेखक के मतानुसार शरीर, मन, बुद्धि और जीवात्मा इन सबका प्रशिक्षण अत्यन्त आवश्यक है। उनका कहना है कि केवल शरीर और इन्द्रियों की शिक्षा मनुष्य को असुर बनाती है। जिस प्रकार शरीर के विकास के लिए भोजन का पौष्टिक होना आवश्यक है उसी प्रकार मन तथा बुद्धि के विकास के लिए स्वच्छ वायु, स्वच्छ अचार-विचार की आवश्यकता है। इन सबको लेखक ने योगदर्शन का विषय बताया है।

चतुर्थ परिच्छेद में लेखक ने मनुष्य अथवा देश तथा जाति के लिए आवश्यक ‘करणीय’ पर विस्तार से विचार-विमर्श किया है। वास्तव में पुस्तक का अन्तिम तृतीयांश इसी एक विषय पर पूर्ण किया है। इससे ही अनुमान लगाया जा सकता है कि लेखक इसको कितना आवश्यक अनिवार्य और करणीय मानते थे। यदि मनुष्य को अपने करणीय कर्तव्य का ज्ञान हो जाए तो फिर इसमें सन्देह नहीं कि वह सुमार्ग पर अग्रसर होगा ही होगा।

हम आरम्भ से ही बता आये हैं कि लेखक ने शिक्षा को महत्त्व दिया है। उस शिक्षा के परिणामस्वरूप देश के वातावरण की विकृति का लेखक ने वर्णन किया है और उस वातावरण के कारण देश की वर्तमान अवस्था का चित्रण करने के उपरान्त चतुर्थ ‘करणीय परिच्छेद’ में सर्वप्रथम उन्होंने करणीय में बुद्धि और जीवात्मा को मुख्य मानकर उसके लिए दिशा-निर्देश करते हुए गीता के अनेक श्लोकों के उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। लेखक का मानना है कि जीवात्मा ही प्राणी का स्वामी होता है और बुद्धि उसको सम्मति देने वाली होती है। भगवद्गीता के तृतीय अध्याय के अनेक श्लोक उन्होंने इसके लिए उद्धृत किये हैं।

उनका यह कहना सर्वथा उचित ही है कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली में इस प्रकार की बातों के लिए कहीं कोई स्थान नहीं है। और हम तो यहाँ तक कहना चाहते हैं कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली में कहीं इस प्रकार की कोई बात आ भी गई होगी तो अब उसको उसमें से हटाने के लिए प्रयत्न किये जा रहे हैं। वर्तमान पाठयक्रम में भारत के प्राचीन इतिहास को विकृत किया गया है, भारतवासियों को विदेशागत आक्रमणकारी बताया जा रहा है तथा यहाँ के रहन-सहन और खान-पान की प्रणालियों को निकृष्ट सिद्ध करने के उपाय किये जा रहे हैं, जिससे यह सिद्ध हो सके कि आक्रामक इस्लाम और ईसाइयत का धर्म-कर्म ही इस देश के वासियों के लिए हितकर था और उसका जिसने अनुकरण किया उसका उद्धार हो गया है।



अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book