वीर पूजा - गुरुदत्त Veer Pooja - Hindi book by - Gurudutt
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वीर पूजा

गुरुदत्त

प्रकाशक : हिन्दी साहित्य सदन प्रकाशित वर्ष : 1999
पृष्ठ :92
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5384
आईएसबीएन :0000

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हकीकत राय की संक्षिप्त जीवनी...

Veer pooja

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

वीर पुरुषों के बलिदान की कहानी सदा से प्रेरणा का स्त्रोत रही है। मैजिनीगैरीबाल्डी आदि नरपुंगवों की वीर गाथाएँ आज भी विश्व मानव की दमनियों में ऊष्ण रक्त का संचार कर उसे उद्घेलित और उत्साहित करती रहती हैं। यही स्थिति भारतीय क्रान्तिवीरों और बलिदानियों की है। इसी उद्देश्य को सम्मुख रखकर प्रस्तुत पुस्तक का प्रणयन किया गया है।

संपादकीय

बलिदानी नरपुंगवों का पुण्य स्मरण

भारत देश, राज्य अर्थात् ‘भारत माता’ की परतंत्रता की श्रृंखला तोड़ने के लिए जिन नरपुंगवों ने अपने अदम्य साहस का परिचय देते हुए अपने जीवन-प्राण तिल-तिल कर आहुति के रूप में अर्पित कर दिये उनकी बलिदान-गाथा का गान कराने में स्वातंत्र्योत्तर काल के ‘नेता’ विशेष रूप से, और जन-साधारण सामान्य रूप से, उपेक्षा का भाव रखते हुए जघन्य अपराध कर रहे हैं। नेता अर्थात् सत्तासीन पक्ष निम्न कोटि का स्वार्थी और अहंकारी सिद्ध हुआ और जन- साधारण तो भुल्लकड़ स्वभाव का माना ही जाता है उसे नेता नाम के अभिनेता ने जैसा-सिखा-पढ़ा-रटा वह तोते की भाँति उसे रटने लगता है। यह आज प्रयत्यक्ष देखने में आ रहा है। भारत की वर्तमान अवनति का मूल कारण है-अपने मूल से कटना। इसके निवारण की दिशा में ही यह छोटा-सा प्रयास है।

वीर पूजा अर्थात् ‘हीरो वर्शिप’ संसार के सभी देशों में एक समान पाई जाती है किन्तु कुछ राजनैतिक पैंतरेबाजी इसमें भी मीन-मेख निकालने लगते हैं। जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण भारतीय कम्युनिस्ट हैं। यह  एक विचित्र सत्य है कि जहाँ कम्युनिज्म में ‘वीर पूजा’ के लिए कहीं स्थान नहीं है वहीं भारत के भगतसिंह जैसे अनेक वीराग्रणी तत्कालीन रूसी कम्युनिज्म से प्रभावित रहे थे। भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन तथा उसके पुरस्कर्ताओं की पीठ पर कम्युनिस्टों ने सदा ही छुरा घोंपा है। भारत स्वाधीनता के संघर्ष में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने जर्मनी और जापान से जो सहायता ली उसके लिए कम्युनिस्टों ने उन्हें कभी क्षमा नहीं किया। किन्तु स्वयं कम्युनिस्टों ने भारत की स्वाधीनता के लिए कब, कहाँ, कैसा और कितना संघर्ष किया ? कम्युनिस्टों के पास कोई उत्तर नहीं है। आजाद भगतसिंह आदि जो भी क्रान्तिवीर देश-धर्म पर बलि हुए, तत्कालीन परिस्थिति के अनुसार उनका रुझान वामपंथी की ओर भले ही रहा हो किन्तु वे कम्युनिस्ट नहीं थे। कम्युनिज्म बलि लेता है, अपनी बलि कभी नहीं देता।

पुस्तक के द्वितीय परिच्छेद में जिन यशपाल, प्रकाश, जसवन्तसिंह और मास्टर जी का उल्लेख आया है। उसने प्रत्यक्ष वार्तालाप का सौभाग्य इन पंक्तियों के लेखक को भी प्राप्त हुआ है।’ ‘झूठा सच’ प्रख्यात उपन्यासों के रचयिता यशपाल ही इस पुस्तक के  क्रान्तिकारी यशपाल हैं, प्रकाशवती उनकी धर्मपत्नी का नाम है। वे कालान्तर में लखनऊ में स्थिर हो गये थे। दिल्ली आते-जाते रहते थे। अनेक बार वे स्व० श्री गुरूदत्त जी के निवास पर भी आये, वहीं उनसे प्रत्यक्ष साक्षात्कार का अवसर प्राप्त होता रहा था। खादी भण्डार के प्रबन्धक सरदार जसवन्तसिंह कालान्तर में नई दिल्ली के खादी ग्रामोद्योग भवन में अधिकारी रहे और सेवा-निवृत्ति के उपरान्त कनॉट सरकस नई दिल्ली के ‘जी’ ब्लाक में एक छोटी-सी दुकान चलाने लगे। ‘जी’ ब्लाक और ‘पी’ ब्लाक आमने-सामने हैं। अतः वे प्रतिदिन ही स्व० श्री गुरूदत्त जी के निवास पर पधारते थे। रही ‘मास्टर जी’ की बात-वे अन्य कोई नहीं, अपितु स्वयं श्री गुरुदत्त जी थे। जिन दिनों की चर्चा पुस्तक में है उन दिनों वे लखनऊ के निकट छोटे-से रजवाड़े ‘अमेठी’ के कुँवर राजा रणञ्जयसिंह निजी सचिव के रूप में कार्य करते थे। स्व० श्री गुरुदत्त जी कालान्तर में लखनऊ और फिर नई दिल्ली में आयुर्वेदिक चिकित्सक के रूप में स्थापित होने के उपरान्त ही उपन्यासकार एवं महान लेखक बने। वे एम० एस-सी थे और लाला लाजपतराय द्वारा स्थापित लाहौर के नेशनल स्कूल के प्रधानाचार्य के रूप में कार्य कर चुके थे। इसी कारण तत्कालीन उनका शिष्य एवं परिचित वर्ग उन्हें ‘मास्टर जी’ के नाम से सम्बोधित करता था।

प्रस्तुत पुस्तक के लेखक का भले ही आज़ाद से सीधा परिचय न रहा हो किन्तु उनके साथियों में से अनेक लोगों से सम्पर्क एवं सम्बन्ध होने से यह निश्चित है कि पुस्तक में उनके बलिदान का विवरण अधिकृत है।, केवल रोचकता के लिए उसमें औपचारिकता का पुट दिया गया है।
वीर पुरुषों के बलिदान की कहानी सदा से प्रेरणा का स्त्रोत रही है। मैजिनी। गैरीबाल्डी आदि नरपुंगवों की वीर गाथाएँ आज भी विश्व-मानव की धमनियों में ऊष्ण रक्त का संचार कर उसे उद्वेलित और उत्साहित करती हैं। यही स्थिति भारतीय क्रान्तिवीरों और बलिदानियों की है। इसी उद्देश्य को सम्मुख रखकर प्रस्तुत का प्रणयन किया गया है और इसी उद्देश्य से इसे इस रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है जिससे कि भावी पीढ़ी अपने पूर्व पुरुषों के बलिदान का पुण्य स्मरण कर देश की एकता और अखण्डता को अक्षुण्णा रखने में निरन्तर यत्नशील रहे।


अशोक कौशिक

पहला परिच्छेद


 कानपुर के मैस्टन रोड पर, एक मकान की दूसरी मंजिल के कमरे में बैठे दो युवक बातें कर रहे थे। एक घर का स्वामी था और दूसरा अतिथि। दोंनों कुर्सियों पर बैठे थे। सामने तिपाई पर चाय के बर्तन लगे थे। एक प्लेट में मक्खन लगे टोस्ट और दूसरी प्लेट में बिस्कुट रखे थे। अतिथि कह रहा था, ‘‘खन्ना जी ! मेरे हृदय में अग्नि धधक रही है। उस अग्नि की शांति तो इन गोरों के रक्त से ही....’’
वह बात आगे कह नहीं सका। मिस्टर खन्ना की पत्नी  इनके लिए टी-पॉट में गरम-गरम चाय का पानी लिए कमरे में आ गयी थी। आगन्तुक अतिथि कहता-कहता रुक गया। उस स्त्री ने मुस्कराते हुए क्षणभर अतिथि के मुख पर देखा, फिर गम्भीर हो चाय का पाट मेज़ पर रख दिया। पाट रखकर खाली ट्रे लिये वह लौटने लगी तो अतिथि ने कह दिया ‘‘भाभी। आप चाय नहीं पियेंगी क्या ?’’
‘‘आप पीजिए।’’

इस पर खन्ना ने कह दिया, ‘‘सरला ! आओ न। तुम्हारा इनसे परिचय करा दूँ।’’
सरला कमरे के द्वार पर पहुँच चुकी थी। वह अपने पति के कहने पर रुकी, घूमी, परन्तु वह खड़ी-ख़ड़ी बोली, ‘‘आपकी गुप्त बातों में विघ्न पड़ेगा। परिचय तो कुछ देर बाद में भी हो जाएगा।
इतना कह वह द्वार से बाहर निकल गई, अतिथि ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘भूल हो गयी है। आपकी श्रीमती जी के कान में ‘रक्त’ शब्द पड़ गया है। बेचारी का हृदय काँप उठा होगा।’’
‘‘नहीं दादा ! बहुत कड़े हृदय की स्वामिनी है यह। रक्त की बात नहीं तुम्हारे, बात करते-करते रुक जाने पर ही उसने यहां रहना उचित नहीं समझा। तुमने ध्यान नहीं दिया उसने गुप्त शब्दों पर विशेष बल दिया था।’’
अतिथि था चन्द्रशेखर आज़ाद। उससे स्त्री की प्रशंसा अथवा निन्दा का विचार छोड़कर अपनी बात कहनी आरम्भ कर दी और खन्ना अब चाय बनाने लगा था। आज़ाद ने एक टोस्ट उठा, एक ग्रास चबाते हुए कहा, ‘‘मैं कह रहा था कि इन गोरे शासकों के रक्त से ही मेरे भीतर धधक रहा दावानल बुझ सकता है। जब तक एक भी गोरा इस भूमि पर शासक के रूप में रहेगा, तब तक यह अग्नि धधकती रहेगी।

‘‘पर गाँधी जी भी तो यही कह रहे हैं। वो भी अंग्रेजों को यहां निकालकर ही दम लेना चाहते हैं।’’
‘‘चाहते होंगे। उनके मन की बात तो मैं जानता नहीं। एक बात मैं जानता हूँ कि वह बुद्धि का धनी और अपने अतिरिक्त अन्य सबको भ्रमित और निन्दनीय मानता है। उन्होंने हमारे विचार के लोगों की भरकस निन्दा की है।’’
‘‘देखो दादा ! अपने मत को ठीक कहना और विरोधी को गलत कहना किसी की निन्दा-प्रसंशा नहीं कही जा सकती। बुद्धिशीलों का यह कर्तव्य है कि वे अपने मत का प्रचार करते रहें।’’
‘‘पर वे हमें देश को हानि पहुंचाने वाले कहते हैं।’’
‘‘तो यह निन्दा हो गयी ? तुमने कभी मज़हबी मुबाहिसे नहीं सुने। सुने होते तो तुमको गांधी जी पर रोष नहीं होता।’’
‘‘परन्तु हम समझते हैं इससे देश का भारी अहित हो रहा है।’’

चाय बन चुकी थी और आज़ाद प्याला उठाकर पीने लगा था। खन्ना ने भी एक सुरुकी लगाई और अपने विचारों को सुव्यवस्थित कर कहा, ‘‘दादा ! मैं इसको इस प्रकार नहीं समझता। इसमें तुम्हारा और गांधीवादियों का दोष नहीं है। दोष किसी का है तो हिन्दुस्तान की जनता का है। वह आपके साथ उतनी नहीं है, जितनी गांधी जी के साथ है।
‘‘और फिर मैं कभी-कभी यह विचार करती हूं कि जनता का भी क्या दोष है ? तुम्हारा मार्ग ऐसा है कि जनता उसमें भाग नहीं ले सकती और गांधी जी का मार्ग ऐसा है जिसमें एक बहुत बड़ी संख्या में लोग भाग ले सकते है फिर भी।
‘‘देखो, मैं लाहौर के कांग्रेस अधिवेशन में गया था। वाइसराय की ट्रेन के नीचे बम्ब रखने वालों की निन्दा का प्रस्ताव गांधी जी ने रखा था। मैं तो एक डैलिगेट’ मात्र था। हमारे कैम्प में यह बात विख्यात थी कि गांधी जी के प्रस्ताव का समर्थन बहुत कम लोग कर रहे हैं। विषय-निर्धारिणी समिति में भी बहुमत आप लोगों की निन्दा न करने के पक्ष में था। परन्तु गांधी जी ने इतना नाम पाया है।

 कि उनके कांग्रेस छोड़ देने की धमकी से विषय-निर्धारिणी समिति के सदस्यों के हाथ-पाँव फूलने लगे थे। जब प्रस्ताव खुले अधिवेशन में उपस्थित हुआ, तब भी गाँधी जी को विश्वास नहीं था कि उनका प्रस्ताव पारित हो जायेगा। पारित तो हो गया परन्तु केवल सत्तर-अस्सी मतों के बाहुल्य से। सब समझ   रहे थे कि वास्तव में यह गांधी जी की पराजय हुई है।
‘‘तदपि लोग आपके कार्यक्रम में भाग ले नहीं सकते। इस कारण वे गाँधी जी के साथ हो जाते हैं। परन्तु इसमें संदेह नहीं कि वे आपको गलत नहीं समझते आप उनको करने के लिए कुछ बताते भी तो नहीं।’’
आज़ाद मुख देखता रह गया। फिर कुछ विचार कर कहने लगा, ‘‘एक काम तो है, जो वे कर सकते हैं।’’
‘‘क्या ?’’

‘‘वे हमको धन दे सकते हैं।’’
‘‘कांग्रेस को धन देते हैं धनी-मानी-लखपति। उनसे आप न माँग सकते हैं, न आपको देने में वे अपना हित मानेंगे। आप अपने को समाजवादी कहते हैं न ? भला कोई धनी व्यक्ति आपको धन क्यों देगा ? आप तो उससे सब कुछ छीन लेने की बात कहते फिरते हैं।
‘‘जन-साधारण तो चार-चार आने चन्दा देनेवाला है। वह आपको भी दे सकता है यदि आप चार-चार आने एकत्रित करने का आयोजन चला सकें। मैं जानता हूँ यह आपके लिए संभव नहीं है।’’



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