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जीवनी/आत्मकथा >> मुझे घर ले चलो

मुझे घर ले चलो

तसलीमा नसरीन

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :359
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5115
आईएसबीएन :81-8143-666-0

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औरत की आज़ादी में धर्म और पुरुष-सत्ता सबसे बड़ी बाधा बनती है-बेहद साफ़गोई से इसके समर्थन में, बेबाक बयान


यह जो मैं छोटू दा को इतनी-इतनी बार फोन करती हूँ, छोटू' दा तो कभी भूल से भी मुझे फोन नहीं करता। सभी लोगों ने क्या यह समझ लिया है कि उन लोगों का कहीं, कोई दायित्व नहीं है? संपर्क करने की और बातचीत करने की सारी जिम्मेदारी सिर्फ मेरी है? उन लोगों ने शायद यह सोच लिया है कि मैंने अथाह दौलत कमा ली है। इसलिए सवको पार करने की भी सारी जिम्मेदारी मेरी ही है। जिनके पास दौलत नहीं है उनके लिए प्यार करने की भी कोई जिम्मेदारी नहीं है। तो क्या ऐसा है, उनका हिसाब-किताव : मैंने तो ऐसा हिसाब-किताव नहीं सीखा। पहले अब्बू कितने-कितने खत लिखा करते थे। पन्ने रंग डालते थे, लेकिन अब वे आधे पन्ने का खत भी मुझे नहीं लिखते। क्यों? इसलिए कि अब मैं बड़ी हो गई हूँ? लेकिन मरे बड़े हो जाने के बाद भी तो वे मुझे लिखते रहे हैं या इसलिए नहीं लिखते, क्योंकि अब मैं उस देश में नहीं हूँ? लेकिन, जब देश में नहीं हूँ, तब तो उन्हें और भी ज्यादा लिखना चाहिए था। उन्हें तो इसलिए भी लिखना चाहिए था, क्योंकि अब चाहकर भी मुझसे उनकी भेंट नहीं हो पाती, चूंकि अब मैं उनसे दूर हूँ। कहीं ऐसा तो नहीं कि वे इसलिए नहीं लिखते, क्योंकि मैं दूर हूँ? दूर चले जाने के बाद, इंसान मन से भी दूर हो जाता है! अच्छा, माँ क्यों नहीं लिखती? माँ भी क्या मुझसे प्यार नहीं करती? या माँ सैकड़ों काम-काज़ में व्यस्त है? मुझे याद करने के लिए माँ के पास वक्त नहीं है? मारे अभिमान के मेरा गला रुंध आया। मैंने सोच लिया, अव मैं कभी फोन नहीं करूँगी। अब किसी से भी संपर्क करने की मुझे ज़रूरत नहीं है, लेकिन कुछ ही दिनों बाद, मुझसे रहा नहीं गया। यह जो मारे अभिमान के, इधर कुछ दिनों मैंने उन लोगों को फोन नहीं किया, यह तक समझने की क्षमता भी, उन पास के लोगों में नहीं थी। मेरे अभिमान, मेरे गुस्से-क्षोभ, मेरी दुःख-तकलीफ का अब किसी के लिए कोई मोल नहीं रहा। सब अपने-अपने में रमे हुए! सिर्फ मैं ही अपनी जैसी नहीं हूँ। मेरा सारा कुछ उलट-पलट गया है। अब अतीत के अलावा मुझसे और कहीं भी नहीं रहा जाता।

बहुतों का यह ख्याल है कि मैंने बहुत सारी दौलत बना ली है, लेकिन कोई नहीं जानता कि मुझे भले ही और किसी चीज़ का मोह हो, धन का मोह विल्कुल नहीं है। रुपए तो फूस-तिनके की तरह पड़े रहते हैं। मुझे तो पता भी नहीं कि कहाँ, कितने रुपए जमा हो रहे हैं। मैंने तो इस बारे में कुछ सुना भी नहीं। रुपए तो पानी की तरह बह जाते हैं। ढेरों रुपए तो मैं यूँ ही उड़ाती रहती हूँ और इसके लिए मुझे अफसोस भी नहीं होता। रुपए चोरी चले जाते हैं, डकैती हो जाती है, कुछ ही पलों में मैं भूल भी जाती हूँ। प्रकाशकों ने मुझे अग्रिम राशि भेजी है। जर्मन प्रकाशक की तरफ से पचास हज़ार डॉलर आया है। इटली, स्पेन, आइसलैंड और नॉर्वे के प्रकाशकों ने उतनी राशि न सही, करीब-करीब इसके आस-पास की रकम भेजी है। प्रकाशक लोग सीधे मेरे बैंक एकाउंट में रुपए भेज देते हैं। कोई-कोई प्रकाशक मेरे घर के ठिकाने पर भी चेक भेजते रहते हैं। वह चेक कागज-पत्तरों के ढेर में गुम हो जाता है। अचानक कुछ खोजते हुए एकदम से बाहर निकल पड़ता है। हमेशा इनकी सद्गति भी नहीं हो पाती। पुरस्कारों के चेक भी उपेक्षित-से इधर-उधर पड़े रहते हैं। एक दिन तो लाख डॉलर का एक चेक मेरे हैंडवेंग में कंघी, चिल्लर पैसों, मूंगफली, कलम, लिपस्टिकं, नाखून-कटर और ढेरों कागजों के साथ, कुछ महीनों उसी में चिंदी-चिंदी हाल में पड़ा रहा। पता नहीं अमीरों का स्वभाव क्या ऐसा ही होता है? मुझे नहीं लगता कि धन की उपेक्षा करके धनी हुआ जा सकता है, लेकिन धनी न होते हुए भी, धन की उपेक्षा करने के लिए, हिम्मतभरी चौड़ी छाती के बजाय जीने की वजह बड़ी होती है। मैं साधु-संत नहीं हूँ, ऐशो-आराम में भी अरुचि नहीं है। लेकिन धन के लिए खींचतान करने वाला मन, मेरा कभी नहीं रहा। विदेश में चरम अनिश्चितता में भी मैं रुपए-पैसों की खवर नहीं लेती। यह स्वभाव शायद मेरे खून में है। उत्तराधिकार सूत्र से प्राप्त है। धन-दौलत के बारे में मेरी माँ का कोई सपना नहीं था। माँ तो बस, सुख-शांति चाहती है। वे प्यार चाहती हैं। मैं भी तो मन-ही-मन यही चाह लिए फिरती रहती हूँ। पाँच सितारा होटल-कमरे से अपने दूर-देश में फोन करने में ढेरो रुपए खर्च हो जाते हैं। मैं इस तरफ भी पलटकर नहीं देखती, देश में बार-बार फोन करते हुए मैं हर बार ही कुछेक हज़ार डॉलर, डयेचमार्क, पाउंड, फ्रां, कई लाख पेसेतो, लिरा में बिल चुकाती रही हूँ। नहीं, मैं बिल्कुल अफसोस नहीं करती। उड़ते हुए ब्रिटिश एयरवेज़ के विमान के अंदर से, क्रेडिट कार्ड पर, धरती की माटी से फोन पर रिश्ता जोड़ा है। यूरोप में धनी-से-धनी व्यक्ति भी ऐसा नहीं करते। जिसे मैंने फोन किया था, वह भी चकित रह गया कि आसमान से मैंने फोन क्यों किया, किसी हवाई अड्डे से क्यों नहीं किया। विमान में भी सभी यात्री मुझे विस्मय से देखते रहे। शायद उन लोगों ने मुझे पूरी तरह पागल या पूरी तरह मूर्ख समझ लिया, लेकिन मेरे अंदर अगर किसी से बात करने का चाव जाग उठे तो भले वह बेतुका हो, मैं उस चाव का मूल्य क्यों न चुकाऊँ? लाख रुपए निकल गए? निकल जाने दो। क्या फ़र्क पड़ता है? रुपए-पैसे आखिर किसके लिए जमा करूँ? क्यों जमा करूँ? किसलिए? जिससे मैं प्यार करती हूँ, उससे बात करने के लिए अगर फकीर भी हो जाना पड़े तो हो जाऊँगी। प्यार पाने के लिए अगर जान जाती है तो जाए। बस, मेरे साथ तो यही है। फोन के दूसरे छोर से अगर बूंद-भर भी प्यार या प्रीति का परस मिल जाए तो इसका हिसाब धन-दौलत में नहीं किया जा सकता। रुपए जब मेरे लिए नितांत कागज-भर बन गए तो रुपए देश भेजने लगी. कलकत्ता भेंट-उपहार भेजने लगी। महँगे-महँगे रेस्तराँओं में यार-दोस्तों को खिलाने लगी। जिधर भी मन होता सैर-तफरीह के लिए निकल जाती। जो भी मन होता, खरीद लाती-यह सब विदेशियों की नज़रों में भी विस्मयकारी था। वे लोग, यानी अमीर लोग भी हिसाब से चलते हैं। मैं अमीर नहीं हूँ, फिर भी मैं हिसाब-किताव नहीं करती।

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    अनुक्रम

  1. जंजीर
  2. दूरदीपवासिनी
  3. खुली चिट्टी
  4. दुनिया के सफ़र पर
  5. भूमध्य सागर के तट पर
  6. दाह...
  7. देह-रक्षा
  8. एकाकी जीवन
  9. निर्वासित नारी की कविता
  10. मैं सकुशल नहीं हूँ

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