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प्राणायाम रहस्य

स्वामी रामदेवजी

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :68
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4823
आईएसबीएन :81-7525-484-X

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प्राणायाम, ध्यान एवं कुण्डलिनी जागरण के अनुभव-सिद्ध प्रयोगों का सचित्र-वर्णन...

Pranayam Ke Rahasya

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

पूज्यपाद स्वामी रामदेवजी महाराज जन्म-जन्मान्तरों के पुण्य प्रताप से बालब्रह्मचारी, व्याकरण, आयुर्वेद सहित वैदिक दर्शनों के महान् मनीषी, श्रोत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ एवं तितिक्षु सन्यासी हैं। आप वेदों के प्रकाण्ड विद्वान, परम तपस्वी, कर्मयोगी ऋषी, आचार्य श्री बलदेवजी महाराज गुरुकुल कालवा के शिष्य हैं। आपने ब्रह्मचर्य आश्रम से ही, पूजनीय तपस्वी अनासक्त संत श्री शंकरदेवजी महाराज से भगीरथी के पावन तट पर सन्यास दीक्षा धारण की।

अष्टध्यायी, महाभाष्य, व दर्शनोपनिषदादि ग्रन्थों को गुरुकुलों में पढ़ाया। हिमालय विचरण करते हुए गंगोत्री की पवित्र गुहाओं में तपश्चर्या व ब्रह्माराधना के द्वारा आध्यात्मिक शक्तियों का अर्जन कर हरिद्वार में अपने परम तपस्वी विद्वान व आयुर्वेद के महान् मनीषी, गवेषक आचार्य श्री बालकृष्ण को साथ लेकर सन् 1995 पावन तीर्थ कनखल में दिव्य योग मन्दिर (ट्रस्ट) की स्थापना कर साधना करते हुए आरोग्य आध्यात्मिक एवं शैक्षणिक सेवा प्रकल्पों का प्रारम्भ किया।

आपके पावन सान्निध्य में आयोजित शताधिक निःशुल्क योगसाधाना एवं योग चिकित्सा शिविरों में लाखों ने असाध्यरोगों से मुक्ति व आध्यात्मिक मार्ग दर्शन प्राप्त किया है। आश्रम के आयुर्वेदिक चिकित्सा आदि सेवा कार्यों से प्रतिवर्ष लाखों लोग तन-मन का स्वास्थ्य एवं आध्यात्मिक रोशनी पा रहे हैं। वैदिक संस्कार एवं आधुनिक शिक्षा पर आधारित एक विशाल आवासीय गुरुकुल किशनगढ़ घासेड़ा का हरियाणा के रेवणी जिले में संचालन कर रहें हैं। फलाहार मात्र पर आश्रित आपका तपस्वी सरल, सहज, स्नेही योगमय व्यक्तित्व सबकी श्रद्धा का केन्द्र है। सेवा व साधना में अहर्निशरत आप हम सबके प्रेरणास्त्रोत, वन्दनीय, श्रद्धेय व अनुकरणीय हैं।

आचार्य बालकृष्ण

प्रकाशकीय


धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम् : धर्म का अनुष्ठान, अर्थोपार्जन, दिव्यकामना (शिव-संकल्प) से सन्तति-उत्पत्ति तथा मोक्ष की सिद्धि- इन चतुर्विध पुरुषार्थों को सिद्ध करने के लिए सर्वतोभावेन स्वस्थ होना परम आवश्यक है। जहाँ शरीर रोग-ग्रस्त है, वहाँ सुख शान्ति एवं आन्नद कहाँ ? भले ही धन, वैभव, ऐश्वर्य इष्ट-कुटुम्ब तथा नाम, यश सब कुछ प्राप्त हो, फिर भी यदि शरीर स्वस्थ नहीं है तो जीवन एक भार बन जाता है। जिनके शरीर एवं मन स्वस्थ नहीं, मष्तिष्क में चेतना, देह में स्फूर्ति तथा धमनियों में शक्ति नहीं, शरीर में रक्त-संचार ठीक से नहीं होता, अंग-प्रत्यंग सुदृढ़ नहीं, एवं स्त्रायुओं में बल नहीं, वह मानव-शरीर मुर्दा ही कहा जायेगा। मनाव-जीवन में नीरोग देह और स्वास्थ मन प्रात्त करने के लिए आयुर्वेद का प्रादुर्भाव हुआ है, जो आज भी विद्यमान है। शरीर के आन्तरिक मलों एवं दोषों को दूर करने तथा अन्तःकरण की शुद्धि करके समाधि द्वारा पूर्णानन्द की प्राप्ति हेतु ऋषि, मुनि तथा सिद्ध योगियों ने यौगिक प्रक्रिया का अविष्कार किया है। योग-प्रक्रियाओं के अन्तर्गत प्राणायाम का एक अतिविशिष्ट महत्त्व है। पतंजलि ऋषि ने मनुष्य-मात्र के कल्याण हेतु अष्टांग योग की विधान किया है। उनमें यम, नियम और आसन-बहिरंग योग के अन्तर्गत हैं, जो शरीर और मन को शुद्ध एवं पवित्र करने में सहायक हैं।

धारणा, ध्यान और समाधि अन्तरंग योग के अन्तर्गत हैं जो आत्मोत्थान एवं कैवल्यानन्द की प्राप्ति के साधन हैं। प्राणायाम-अन्तरंग एवं बहिरंग योग के बीच सेतु का कार्य करता है।, यदि शरीर को स्वस्थ एवं रोगमुक्त करना हो या मन को पवित्र या आत्मा को निर्मल करना हो, तो वह प्राणायाम से सम्भव है। प्राणायाम के द्वारा वृत्ति-निरोध करके और आत्मास्थ होकर ही साधक जीवन्मुक्ति प्राप्त कर सकता है।

दिव्य योग मन्दिर ट्रस्ट, कनखल, हरिद्वार के संस्थापक अध्यक्ष योग ऋषि श्रद्धेय स्वामी रामदेव महादेवजी महाराज के सान्निध्य में लाखों साधक प्रतिवर्ष प्राणायाम, ध्यानाधि योग की विशिष्ट प्रक्रियाओं का क्रियात्मक प्रशिक्षण प्राप्त करते हुए तन के रोगों एवं मन के दोषों से मुक्ति पाते हैं। स्वामीजी महाराज का अपने अनुभवों के आधार पर विश्वास है कि अस्थमा, हृदयरोग, मधुमेह, मोटापा, कब्ज, अम्लपित्तादि लगभग 80 प्रतिशत व्याधियाँ मात्र प्राणायाम के 45 मिनट के अभ्यास से अल्प समय में ही दूर हो जाती हैं तथा प्राणायाम से मन का निग्रह होने से ध्यान एवं समाधि की सिद्धि भी सहज ही हो जाती है।
इस पुस्तक से बालक, वृद्ध युवक, रोगी, निरोगी, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी संन्यासी तथा सर्वसाधारणजन लाभान्वित होंगे, ऐसी आशा हम करते हैं।

आचार्य बालकृष्ण


आत्म निवेदन


सिद्ध योगियों एवं पतंजलि आदि ऋषि-मुनियों द्वारा प्रतिपादित प्राणायाम एक पूर्ण वैज्ञानिक पद्धति है, जिससे असाध्य रोगों से मुक्ति के साथ मन की शान्ति एवं समाधि की प्राप्ति भी होती है। आज योग के नाम पर कुछ तथाकथित योगी व्यक्ति एवं समाज के लिए अष्टांग योग की अतिमहत्ता एवं उपयोगिता को भुलाकर मात्र आसनों का ही अधिक प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। इससे समाज में योग के नाम पर भ्रम व्याप्त होता जा रहा है। इसके लिए महर्षि पतंजलि-प्रतिपादित अष्टांग योग को प्रचारित करना बहुत आवश्यक है, अन्यथा योग जैसा गरिमामय अति उदात्त शब्द भी संकीर्ण-सा होकर रह जायेगा।

हमने ‘योग-साधना एवं योगाचिकित्सा-रहस्य’ नामक पुस्तक में प्राणायाम को छोड़कर योग का संमग्र रूप से वर्णन किया है। इस ‘प्राणायाम–रहस्य’ पुस्तक में प्राणायाम एवं कुण्डलिनी-जागरण का अनुभवात्मक प्रामाणिक वर्णन देने का प्रयत्न किया है। लाखों व्यक्तियों पर प्रयोगात्मक अनुभवों के आधार पर मेरा मानना है कि प्राणायाम का आरोग्य एवं आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टियों से विशेष महत्त्व है। रोगोपचार की दृष्टि से भी हड्डी के रोगों को छोड़कर शेष सभी व्याधियाँ आसनों से नहीं, अपितु प्राणायाम से ही दूर हो सकती हैं। हृदयरोग, अस्थमा, स्नायुरोग, वातरोग, मधुमेह आदि जटिल रोगों की प्राणायाम के बिना निवृत्ति नहीं हो सकती तथा आसन भी तभी पूर्ण लाभादायक होते हैं, जब वे प्राणायामपूर्वक किये जाते हैं।

प्राणायाम बालक से वृद्ध पर्यन्त सभी सहजता से कर सकते हैं। प्रस्तुत पुस्तक को रोग-साधकों के आग्रह पर पृथक् से प्रकाशित किया जा रहा है। इस पुस्तक को आकर्षण एवं उपयोगी स्वरूप प्रदान करने के लिए साधक एवं परोपकारशील माननीय श्रीलक्ष्मीचन्द्रजी नागर को हार्दिक साधुवाद देता हूँ, जो आश्रम के प्रकाशन-सेवा-प्रकल्पों में अहर्निश संलग्न हैं। यथोचित परामर्श हेतु आयुर्वेद के महान मनीषी एवं गवेषक पूज्य आचार्य श्रीबालकृष्णजी महाराज के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए प्राणायाम एवं ध्यान-विषयक रंगीन चित्रों-सहित पुस्तक को भव्य-रूप में प्रकाशित करने के लिए साईं सिक्यूरिटी प्रिंटर्स लिमिटेड को भी धन्यवाद देता हूँ तथा भगवान् से इनके समृद्ध दीर्घजीवन के लिए प्रार्थना करता हूँ।
योगिराज श्रीजगन्नाथजी पथिक, जिनके आध्यात्मिक ज्ञान एवं अनुभवों से मैंने स्वयं बहुत कुछ पाया है; उनकी पुस्तक ‘सन्ध्या-योग और ब्रह्म-साक्षात्कार’ से इस पुस्तक में चक्रादि से सम्बद्ध रंगीन छायाचित्रादि का संकलन किया गया है। एतदर्थ मैं ब्रह्मलीन साधक पूज्यपाद श्रीपथिकजी महाराज के प्रति कृतज्ञ हूँ और आशान्वित हूँ कि योग-साधकों के साधना-पथ में यह पुस्तक सहयोगी होगी।

स्वामी रामदेव


प्राण का अर्थ एवं महत्त्व


पंच तत्त्वों में से एक प्रमुख तत्त्व वायु हमारे शरीर को जीवित रखती है और वात के रूप में शरीर के तीन दोषों में से एक दोष है, जो श्वास के रूप में हमारा प्राण है।

पित्तः पंगुः कफः पंगुः पंगवो मलधातवः।
वायुना यत्र नीयन्ते तत्र गच्छन्ति मेघवत्।।
पवनस्तेषु बलवान् विभागकरणान्मतः।
रजोगुणमयः सूक्ष्मः शीतो रूक्षो लघुश्चलः

(शांर्गधरसंहिताः 5.25-26)

पित्त, कफ, देह की अन्य धातुएँ तथा मल-ये सब पंगु हैं, अर्थात् ये सभी शरीर में एक स्थान से दूसरे स्थान तक स्वयं नहीं जा सकते। इन्हें वायु ही जहाँ-तहाँ ले जाता है, जैसे आकाश में वायु बादलों को इधर-उधर ले जाता है। अतएव इन तीनों दोषों-वात, पित्त एवं कफ में वात (वायु) ही बलवान् है; क्योंकि वह सब धातु, मल आदि का विभाग करनेवाला और रजोगुण से युक्त सूक्ष्म, अर्थात् समस्त शरीर के सूक्ष्म छिद्रों में प्रवेश करनेवाला, शीतवीर्य, रूखा, हल्का और चंचल है।
उपनिषदों में प्राण को ब्रह्म कहा है। प्राण शरीर के कण-कण में व्याप्त है, शरीर के कर्मेन्द्रियादि तो सो भी जाते हैं, विश्राम कर लेते हैं, किन्तु यह प्राण-शक्ति कभी न सोती है, न विश्राम ही करती है। रात-दिन अनवरत रूप में कार्य करती ही रहती है, चलती ही रहती है-‘चरैवेति चरैवेति’ यही इसका मूलमन्त्र है। जबतक प्राण-शक्ति चलती रहती है, तभी तक प्राणियों की आयु रहती है। जब यह इस शरीर में काम करना बन्द कर देती है, तब आयु समाप्त हो जाती है। प्राण जबतक कार्य करते रहते हैं, तभी तक जीवन है, प्राणी तभी तक जीवित कहलाता है। प्राण-शक्ति के कार्य बन्द करने पर वह मृतक कहलाने लगता है। शरीर में प्राण ही तो सब कुछ है। अखिल ब्रह्माण्ड में प्राण सर्वाधिक शक्तिशाली एवं उपयोगी जीवनीय तत्त्व है प्राण के आश्रय से ही जीवन है।

प्राण के कारण ही पिण्ड (देह) तथा ब्राह्माण्ड की सत्ता है। प्राण की अदृश्य शक्ति से ही सम्पूर्ण विश्व का संचालन हो रहा है। हमारा देह भी प्राण की उर्जा-शक्ति से क्रियाशील होता है। हमारे अन्नमय कोश (PHYSIKAL BODY) तथा दृश्य शरीर भी प्राणमय कोश (ETHRICAL BODY) की अदृश्य शक्ति से संचालित होता है। अहार के बिना व्यक्ति वर्षों जीवित रह सकता है, परन्तु प्राण-तत्त्व के बिना एक पल भी जीवित नहीं रह सकता। प्राणिक ऊर्जा (ओरा) ही हमारी जीविनी-शक्ति तथा रोग- प्रतिरोधक शक्ति का आधार है। सभी महत्त्वपूर्ण ग्रन्थियों (GLANDS), हृदय, फेफड़े, मस्तिष्क एवं मेरूदण्ड-सहित सम्पूर्ण शरीर को प्राण ही स्वास्थ्य एवं ऊर्जावान् बनाता है। प्राण की ऊर्जा से ही आँखों में दर्शन-शक्ति, कानों में श्रवण-शक्ति, नासिका में घ्राण-शक्ति, वाणी में सरसता, मुख पर आभा, ओज एवं तेज, मस्तिष्क में ज्ञान-शक्ति एवं उदर में पाचन-शक्ति कर्यरत रहती है। इसलिए उपनिषदों में ऋषि कहते हैं :

प्राणस्येदं वशे सर्वं यत् त्रिदिवे यत्प्रतिष्ठितम्।
मातेव पुत्रान् रक्षस्व श्रीश्च प्रज्ञां च विधेहि न इति।।

(प्रश्नोपनिषद्:2.13)

पृथिवी, द्यु तता अन्तरिक्ष तीन लोकों में जो कुछ भी है, वह सब प्राण के वश में है। हे प्राण ! जैसे माता स्नेहाभाव से पुत्रों की रक्षा करती है, ऐसे ही तू हमारी रक्षा कर। हमें श्री (भौतिक सम्पदा) तथा प्रज्ञा (मानसिक एवं आत्मिक ऐश्वर्य) प्रदान कर।

प्राण के प्रकार


प्राण साक्षात् ब्रह्म से अथवा प्रकृति-रूपी माया से उत्पन्न है। प्राण गत्यात्मक है। इस प्राण की गत्यात्मक सदागतिक वायु में पायी जाती है, अतः गौणी वृत्ति में वायु को प्राण कह देते हैं। शरीरगत स्थानभेद से एक ही वायु प्राण, अपान आदि नामों से व्यवहृत होता हैं। प्राण–शक्ति एक है। इसी प्राण को स्थान एवं कार्यों के भेद से विविध नामों से जाना जाता है। देह में मुख्य रूप से पाँच प्राण तथा पाँच उपप्राण हैं।

पंचप्राण की अवस्थिति तथा कार्य :


1. प्राण : शरीर में कण्ठ से हृदय पर्यन्त जो वायु कार्य करता है, उसे ‘प्राण’ कहा जाता है।
कार्य : यह प्राण नासिका-मार्ग, कण्ठ, स्वर-तन्त्र वाक्-इन्द्रिय, अन्न-नलिका, श्वसन-तन्त्र, फेफड़ों एवं हृदय को क्रियाशीलता तथा शक्ति प्रदान करता है

2. अपान : नाभि के नीचे से पैर के अंगुष्ठ पर्यन्त जो प्राण कार्यशील रहता है, उसे ‘अपान’ प्राण कहते हैं।

3. उदान : कण्ठ के ऊपर से सिर पर्यन्त देह में अवस्थित प्राण को ‘उदान’ कहते हैं।

कार्य : कण्ठ से ऊपर शरीर के समस्त अंगों-नेत्र, नासिका एवं सम्पूर्ण मुखमण्डल को ऊर्जा और आभा प्रदान करता है। पिच्युटरी तथा पिनियल ग्रन्थि-सहित पूरे मष्तिष्क को यह ‘उदान’ प्राण क्रियाशीलता प्रदान करता है।
4. समान : हृदय के नीचे से नाभि पर्यन्त शरीर में क्रियाशील प्राणवायु को ‘समान’ कहते हैं।

कार्य : यकृत्, आँत, प्लीहा एवं अग्न्याशय-सहित सम्पूर्ण पाचन-तन्त्र की आन्तरिक कार्य-प्रणाली को नियन्त्रित करता है।

5. व्यान : यह जीवनी प्राण-शक्ति पूरे शरीर में व्याप्त है। शरीर की समस्त गतिविधियों को नियमित तथा नियन्त्रित करती है। सभी अंगों मांस-पेशियों, तन्तुओं, सन्धियों एवं नाड़ियों को क्रियाशीलता, उर्जा एवं शक्ति यही ‘व्यान प्राण’ प्रदान करता है।

इन पाँच प्राणों के अतिरिक्त शरीर में ‘देवदत्त’, ‘नाग’ ‘कृंकल’, ‘कूर्म’ एवं ‘धनंजय’ नामक पाँच उपप्राण हैं, जो क्रमशः छींकना, पलक झपकाना, जँभाई लेना, खुजलाना, हिचकी लेना आदि क्रियाओं को संचालित करते हैं।
प्राणों का कार्य प्राणामय कोश से सम्बन्धित है और प्राणायाम इन्हीं प्राणों एवं प्राणमय कोश को शुद्ध, स्वस्थ और नीरोग रखने का प्रमुख कार्य करता है, इसलिए प्राणायाम का सर्वधिक महत्त्व और उपयोग भी है। प्राणायाम का अभ्यास शुरू करने से पहले इसकी पृष्ठभूमि का परिज्ञान बहुत आवश्यक है। अतः, प्राणायाम-रूपी-साधना के प्रकरण के आरम्भ में प्राणों से सम्बन्धित विवरण दिया गया है। पाठकों को सुविधा के लिए प्राणदर्शन-तालिका अगले पृष्ठ पर दी जा रही है।


देह में स्थति पंचकोष


मनुष्य की आत्मा पाँच कोशों के साथ संयुक्त है, जिन्हें पंचशरीर भी कहते हैं। ये पाँच कोश निम्नांकित हैं :

1. अन्नमय कोश : यह पांचभौतिक स्थूल शरीर का पहला भाग है। अन्नमय कोश त्वाचा से अस्थिपर्यन्त पृथ्वी-तत्त्व से सम्बन्धित है। आहार-विहार की सुचिता, आसन-सिद्ध और प्राणायाम करने से अन्नमय कोश की शुद्धि होती है।

2. प्राणमय कोश : शरीर का दूसरा भाग प्राणमयकोश है। शरीर और मन के मध्य में प्राण माध्यम है। ज्ञान-कर्म के सम्पादन का समस्त कार्य प्राण से बना प्राणमय कोश ही करता है। श्वासोच्छ्वास के रूप में भीतर-बाहर जाने-आनेवाला प्राण स्थान तथा कार्य के भेद से दस प्रकार का माना जाता है। जैसे-व्यान, उदान, प्राण, समान और अपान मुख्य प्राण हैं तथा धनंजय, नाग, कूर्म, कृंकल और देवदत्त गौण प्राण या उपप्राण हैं। प्राण मात्र का मुख्य कार्य है- आहार का यथावत् परिपाक करना, शरीर में रसों को समभाव से विभक्त तथा वितरित करते हुए देहेन्द्रियों का तर्पण करना, रक्त के साथ मिलकर देह में सर्वत्र घूम-घूमकर मलों का निष्कासन करना, जो कि देह के विभिन्न भागों में रक्त में आ मिलते हैं। देह के द्वारा भोगों का उपभोग करना भी इसका कार्य है। प्राणायाम के नियमित अभ्यास से प्राणमय कोश की कार्यशक्ति बढ़ती है।

3. मनोमय कोश : सूक्ष्म शरीर के इस पहले क्रियाप्रधान भाग को मनोमय कोश कहते हैं। मनोमय कोश के अन्तर्गत मन, बुद्धि, अंहकार और चित्त हैं जिन्हें अन्तः-करणचतुष्टाय कहते हैं। पाँच कार्मेन्द्रियाँ हैं, जिनका सम्बन्ध बाह्य जगत् के व्यवहार से अधिक रहता है।

4. विज्ञानमय कोश : सूक्ष्म शरीर का दूसरा भाग, जो ज्ञानप्रधान है, वह विज्ञानमय कोश कहलाता है। इसके मुख्य तत्त्व ज्ञानायुक्त बुद्धि एवं ज्ञानेन्द्रियाँ हैं।

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