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न जाने कहाँ कहाँ

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2012
पृष्ठ :138
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 405
आईएसबीएन :9788126340842

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ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित लेखिका श्रीमती आशापूर्णा देवी जी का एक और उपन्यास

 

25


अच्छा, प्रवासजीवन के वे चचेरे, ममेरे, फुफेरे, मौसेरे रिश्तेदार सब गये कहाँ? कोई तो आता नहीं है !

वे लोग भी आयें क्यों भला? वे क्या इस बात का अन्दाज़ा नहीं लगा सके हैं कि अब वह बात नहीं रही?

जहाँ आकर देखते हैं गृहस्वामी फालतू माल बना एक तरफ़ पड़ा है, वहाँ उसके रिश्ते का ज़ोर ही कहाँ रहा?

लेकिन यह सब कुछ कहना सम्भव नहीं।

प्रवासजीवन इसीलिए छोटे लड़के से बोले, “दिमाग खराब होने की क्या बात है? जब हमारे समाज में यह व्यवस्था चल पड़ी है, और रोज़ ही ऐसी संस्थाओं में वृद्धि हो रही है तब ज़रूर इनमें कुछ अच्छाइयाँ हैं।”

सौम्य गम्भीर होकर बोला, “अच्छाइयाँ कैसी?'

“यही जैसे, मेरे-जैसे बूढ़े लोगों को गपशप करने के लिए साथी मिल जाते हैं। सभी निकम्मे हैं, बेकार हैं हालात मेल खा जायेंगे।"

“सिर्फ कुछ बुड्ढों का साथ पाओगे इसीलिए तुम अपना घर छोड़कर 'ओल्ड होम' में जाकर रहना चाहते हो?'

सौम्य की नज़रें तीक्ष्ण अनुसन्धानात्मक थीं। “अरे बाबा, वही क्या कम है? हर समय लोनली फील करना."

“देखो पिताजी, इसे तो किसी हद तक मान ही लेना होगा। लेकिन बूढ़ों का साथ पाने के लिए शाम को पार्क में जाने का भी तो एक नियम है।"

प्रवासजीवन बोले, "है नहीं, था। अब नहीं है। बैठने योग्य जितने भी पार्क थे वे सब समाजविरोधियों के क़ब्जे में चले गये हैं। लोहे की सारी बेंचे उखाड़कर 'टूटे-फूटे लोहा-लक्कड़' खरीदनेवालों को बेच दी गयी हैं। खुद वे लोग घास पर बैठकर शराब पीया करते हैं।"।

“ठीक है। अब से तुम रामकृष्ण कल्चरल इन्स्टीट्यूट में नियमित जाना तो शुरू करो। यहाँ से ज़्यादा दूर भी नहीं है। वहाँ तुम्हें ज़रूर कुछ हमउम्र मिलेंगे। सत, सभ्य, भद्र और सुन्दर परिवेश है वहाँ। अच्छी-अच्छी बातों की चर्चा होती है। मन को शान्ति मिलेगी।”  सहसा प्रवासजीवन बोल बैठे, “यह सब कितनी देर के लिए? उसके बाद तो यहीं लौटना पड़ेगा। वही पराधीनता, वही निःसंगता.."

सौम्य ने पिता के चेहरे की ओर स्थिर दृष्टि से देखते हुए कहा, “पिताजी?' प्रवासजीवन ने उसे देखा। "तुम ज़रा खुलकर असली बात बताओ तो।" प्रवासजीवन काँप उठे। “वाह ! असली बात क्या होगी? यही बात है।"

"पिताजी ! यह तिमंजिला मकान स्वयं तुमने बनवाया था। यह गृहस्थी माँ ने अपने हाथों से बनायी थी।"

केवल बनायी भर थी?

ज़र्रा-ज़र्रा जोड़ा था। हर रोज़ जोड़ने के सपने देखती थी।

घर से बाहर निकली नहीं कि दुकानों की ओर उत्सुकतापूर्वक देखा करती।

'सुनते हो? देखो ज़रा, कितनी सुन्दर बेंत की रैक्स हैं। पूछो न ज़रा, क्या दाम है।'

‘आश्चर्य ! जो देखोगी वही चाहिए? क्या करोगी?

'करना क्या है, काम आयेंगी। बरामदे में दोनों खिड़कियों के बीचोंबीच रसूंगी। अखबार, मैगजीन, सजा-सँवारकर रखने पर साफ-सुथरा लगेगा।'

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