ईंट के ऊपर ईंट - महाश्वेता देवी Eent Ke Upar Eent - Hindi book by - Mahasweta Devi
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ईंट के ऊपर ईंट

महाश्वेता देवी

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :156
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3786
आईएसबीएन :9788183611756

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कलकत्ता और आसपास के इलाकों में ईंट के भट्ठों पर आदिवासी बँधुआ मजदूरों के क्रूर शोषण पर आधारित कहानी

Iit Ke Upar Iit

प्रस्तुत है पुस्तक के कुछ अंश

कलकत्ता और उसके आसपास के इलाकों में ईंट के भट्टों पर आदिवासी बँधुआ मजदूरों के क्रूर शोषण को इस कहानी-संग्रह में महाश्वेता देवी ने अपनी तीक्ष्ण दृष्टि और बेबाक कलम से नंगा किया है। आदिवासी क्षेत्रों में सक्रिय ठेकेदारों, सरकारी नौकरशाहों और पुलिस की संगीनों-बूटों की मार से लाचार, भूखे, नंगे आदिवासी स्त्री-पुरुष, लड़के-लड़कियाँ अपने मूल निवासों से खदेड़े जाकर कैसे भट्टों की जलती आग का ईधन बनते हैं; भट्टों के मालिकों के गुण्डे, दलाल, कुटनियाँ और रेल-स्टेशनों के पिट्ठू किस तरह मिलकर उन्हें ईंट-भट्टों तक लाते हैं; जंगल में छिपी नंगी आदिवासी लड़कियों को अच्छे भोजन, वस्त्र और अच्छी मजदूरी का लालच किन अमानवीय स्थितियों तक घसीट लाता है; वहाँ कैसे उनके शरीर और मन का शोषण किया जाता है, इन सबका इन कहानियों में बेबाक चित्रण है। प्रताड़ितों में भी प्रताड़ित आदिवासी नारी के तन और मन की व्यथा को इस संकलन में विशेष रूप से उकेरा गया है। साथ ही उन आदिवासी क्रान्तिकारियों का आह्वान और उनके आह्वान से उद्वेलित मन का चित्रण भी बखूबी हुआ है।
आदिवासियों के शोषण के प्रति महाश्वेताजी का गहरा सरोकार इन कहानियों में और तीखा होकर उभरा है। क्रान्तिकारी दिशा-संकेत इन कहानियों को विशिष्ट दस्तावेज बनाते हैं।

बयान

 

भरमी थाने के दारोगा के पूरमाशी-भरे जीवन को अचानक शनि की साढ़े साती लग गयी। नौकरी को दस साल होने को आये, कभी यह सोचा भी न था कि परिस्थितियाँ इस प्रकार बदलेंगी। विवश होकर वे आज बी.डी.ओ. साहब के पास जा रहे हैं। बी.डी.ओ. बाबू...अजी उनके भी क्या कहने ? द्विवेदी ब्राह्मण हैं वे। और दारोगा चतुर्वेदी ब्राह्मण। किसमें कितना दम है, किसकी मर्यादा बेशी है—उन्हीं से समझ लो, भैया। अब चतुर्वेदी को चापलूसी पसंद नहीं। वैसे भी चतुर्वेदी के पूर्वजों का चार वेदों पर अधिकार था, लेकिन द्विवेदी के पुरखे सिर्फ़ दो वेदों के अधिकारी थे।

लेकिन अब मर्यादा को धो पोंछकर तो ज़्यादा दिन चलाया नहीं जा सकता। द्विवेदी की पत्नी कॉलिज में पढ़ी है, नायलोन की नाभि-दर्शना साड़ी बाँधती है। पाँव में पाजबें और चप्पल पहनती है। पाजेबें फ़ैशन के लिए पहनती है। रात-दिन गुलशन नन्दा के नाविल और फ़िल्मी पत्रिकाएँ पढ़ती है। उनकी बेटी का नाम है ‘‘पूपसी’। क्या अंदाज़ है ! माँ को ‘मम्स’ और बाप को ‘डैडी’ बुलाती है। दारोगा जी तो बस हैरान हैं। द्विवेदी की खूबसूरत पत्नी ने तो जैसे उनके नहले पर इक्का मार दिया हो।
दारोगा की पत्नी सुसराल में रहती है। जैसी मोटी है वैसी ही ठस्स। अब जब वंश-कुल देखा जाये तो उम्र का खयाल ही कहाँ रहता है ? पत्नी दारोगा की ही उम्र की है। चर्बी की गर्मी इतनी ज़्यादा है कि बदन पर कपड़े बरदाश्त नहीं होते। कुरसी पर बैठी, हुक्का गुड़गुड़ाया करती है और दासी से वह हाथ-पैर दबवाती है। किताब पढ़ती नहीं। वैसे ही संसार का कोई काम वह नहीं कर सकती। और तो और, दारोगा जी के बेटे-बेटी भी तो उन्हें ‘पिताजी’ और ‘माँ’ कहकर बुलाते हैं। अपने जीवन में दारोगा की पत्नी ने कभी साबुन नहीं लगाया। वह सुन्दर नहीं है और दिखना भी नहीं चाहती।

द्विवेदी चलायें स्कूटर, चतुर्वेदी हाँकते टट्टू,
द्विवेदी जात-पाँत नहीं मानते, चतुर्वेदी मानते हैं।
द्विवेदी किताब खरीदते हैं, चतुर्वेदी भैंस खरीदते हैं।
दोनों में कोई मेल नहीं है, सब-कुछ बेमेल। तब भी दारोगा, द्विवेदी के पास जा रहे हैं। किसी भी तरह से कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है। सारे समीकरण उलट गये हैं। ऐसी घटना तो भरमों में पहले कभी नहीं हुई थी।
द्विवेदी अपने बँगले के लॉन में बैठे थे और उनके ब्लॉक-ऑफ़िस के चपरासी पौधों को पानी दे रहे थे। कुएँ से पानी खींचने की रस्सी बड़े से चक्के से होकर आती थी। चक्का घूम रहा था और घर्र-पों की एकतान आवाज़ आ रही थी।
सामने बेंत टेबुल पर रखी थी चाय। ‘‘आइए, आइए। चाय पियेंगे ?’’
‘‘नहीं नहीं !’’
‘‘क्यों ? ‘‘कभी नहीं पीता। आप भी क्यों पीते हैं ? भरमों में रहते हुए तो दूध पीजिए, दूध।’’
‘‘दूध तो भई हमसे नहीं चलता।’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘बदहज़मी हो जाती है।’’
‘‘अफ़सोस की बात है।’’
‘‘शरबत पीजिए।’’
‘‘नहीं-नहीं।’’
‘‘अच्छा बोलिए, क्या बात है ?’’
‘‘आप तो जानते हैं।’’
‘‘क्या ?’’
यही जो कमीशन आ रहा है न, उसी की बात है।’’

द्विवेदी के चेहरे की चमड़ी के अन्दर जैसे अचानक कुछ आमूल-चूल परिवर्तन हुए। कण मात्र में द्विवेदी एक दूसरा आदमी नज़र आने लगा।
‘‘उससे आपको क्या ?’’
‘‘क्यों ? वही तो समझ में नहीं आया। क्या हुआ है जो कमीशन आ रहा है ? फिर वह वैसे भी काफी़ शर्मनाक बात है। छि, छि, छि ! नारी दमन (बलात्कार), नारी-दमन ! अब बताइए, लड़कियों की लज्जा-कथा को लेकर क्यों इतना गुलगपाड़ा मचाया जा रहा है ?’’
‘‘कमीशन क्यों आ रहा है ? एक जरूरी सूचना आपको भी दे दूँ। नया क़ानून पास हो गया है ?
‘‘अचानक...भरमो थाना ही क्यों ? सेओपुर भी तो आपके थाने में पड़ता है—है न ?’’
‘‘वही तो मैं सोच रहा हूँ। सेओपुर...हाँ, वहीं तो...लगनसिंह और छत्तरसिंह, और उनके खेतिहर मजदूरों के बीच झगड़ा फ़साद होता रहता है। साले मजदूरी भी तो नहीं देते। लगन और छत्तर भी तो बढ़ावा देते हैं। और फलस्वरूप दंगा-हंगामा, हाँ...वो तो होता ही है।’’
द्विवेदी अक़्लमंदी की-सी भावभंगिमा में बोले, ‘‘लेकिन बँधुआ प्रथा तो ख़तम हो गयी है। क्यों देंगे ? क़ानून नहीं है क्या ?’’
‘‘जी, क़ानून तो है। पर...?’’
‘‘पर क्या ?’’

‘‘दूसरी बातें भी हैं। वो भैया साहेब के आन्दोलन से ख़त्म हो गयी। बड़ा तेज़ लड़का था। स्कूल में मास्टर, किन्तु बहुत हिंसात्मक आन्दोलन चलाया उसने। इसी कारण लगन और उसके साथी नाराज़ रहते हैं। गुस्से में भरे रहते हैं।’’
‘‘देखिए, वास्तविकता स्वीकार कीजिए।’’
‘‘तो अब क्या...कोई नया आफ़िसर ?’’
‘‘अरे नहीं। कैसे समझाऊँ ? जो भी है इस घटना से समझ लीजिए कि नारी दमन अत्यंत घृणित कार्य है।’’
‘‘हाँ-हाँ, क्यों नहीं ? रावण सीता को ज़बरदस्ती अनाचार के लिए उठाकर ले गया था। फल क्या निकला ? समूची लंकापुरी राख हो गयी।’’
‘‘वह तो पुराणों की बातें हैं। अभी की बात कीजिए। 1980 के सितम्बर में क्या हो रहा है ! एक बलात्कार को लेकर जैसे सभी उसी से चिपक गये हैं। सभी अख़बारों में ख़बर आ गयी है। काफ़ी मीटिंग-वीटिंग भी हो रही है। काफ़ी कुछ हो रहा है। हमारे राज्य, हमारे जिले में कभी कोई ऐसी-वैसी बात नहीं हुई। पता नहीं किस अखबार वाले ने लिख दिया कि सेओपुर में पिछले आठ वर्षों में तीन बार हरिजनो को भगाया गया, अनेकों बलात्कार हुए। और लिखता है कि सेओपुर की कोई भी हरिजन लड़की ज़रा बड़ी हुई नहीं कि मालिक-महाजनों ने उससे बलात्कार किया। यही आदत है इनकी, तभी तो इतना हो-हंगामा है।’’
चतुर्वेदी बैठा रहा जैसे वज्र-मूर्ख हो। शून्य में ताकता रहा।

फिर बोला, ‘‘लेकिन कमीशन क्यों ? किसके लिए ? किसने भेजा है ? यह कोई सरकारी कमीशन नहीं है। यह ‘गणतांत्रिक’ अधिकार रक्षा कमेटी का कमीशन है। मावलंकर, किंकर, पाठक जैसे विचारक और चिन्ता बाई, रोज़िला गोमेऊ जैसे वक्ता आ रहे हैं।’’
‘‘वे कौन हैं ?’’
‘‘बड़े नामधारी हैं।’’
‘‘क्या इनकी मदद करनी होगी ?’’
‘‘निश्चय ही...उचित होगा !’’
‘‘यही तो मेरी समझ में नहीं आ रहा है। पिछले आठ वर्षों से बस तीन बार सेओपुर में क़ानून तोड़ने की घटनाएँ हुई हैं। अरे...इतने पर...।’’
चतुर्वेदी मन की बात कहने लगा, ‘‘लगनसिंह और उसके साथियों ने काफ़ी दिनों से मज़दूरों के साथ, बँटाईदारों के साथ झगड़ा-टंटा खड़ा कर रखा है। घर जलते हैं, आदमी भी मरते हैं। क्या यह कोई नई बात है ? इसे हरिजन-दमन या जाति-भेद कहते हैं क्या ? इससे पहले तो कभी नहीं सुनी यह बात।’’

‘‘तो अब सुन लीजिए।’’
‘‘सब-कुछ उलट पुलट हो रहा है।’’
‘‘हरिजन कन्याओं की इज़्ज़त भी लूटी गयी है।’’
‘‘अरे जैसे घर जलाते हैं, आदमी मारते हैं, वैसे ही....।’’
‘तब क्या वह बलात्कार नहीं हुआ ?
‘‘कैसे, क्योंकर ? पहले तो किसी ने कुछ भी नहीं कहा।’’
‘‘हाँ, यही तो समझने की बात, महसूस करने की बात है। और क्या बताया आपने ? सेओपुर में ऐसी अनेक वारदातें हुई हैं ?
‘‘यही तो लिखा है।’’
‘‘अरे, वह तो होता ही रहता है—बंदूक की गोली की तरह। और हरिजन-लड़कियाँ...कोई बकरी चराने जा रही है, कोई दिशा-मैदान को, कोई और किसी काम को। इसी दौरान... ! तब भी है तो बलात्कार ही।’’
‘‘नहीं ! बलात्कार तभी होता है जब किसी थाने-वाने में रिपोर्ट विपोर्ट दर्ज हो। यदि थाने में लिखाया नहीं गया तो कोई केस नहीं होगा। यह आप नहीं समझेंगे। खून खून नहीं होगा, डकैती डकैती नहीं होगी यदि थाना में दर्ज नहीं हुआ। फिर बलात्कार-वलात्कार को लेकर कभी कोई बात नहीं उठी।’’
‘‘ख़बर दूसरी तरह से पहुँची।’’
‘‘कैसे ?’’
‘‘पुलिस भी लड़कियों पर अत्याचार करती है।’’

‘‘राम-राम ! क्या कह रहे हैं आप ? पुलिस कभी ऐसा काम नहीं करेगी। अगर वो ऐसा करे तो क्या आपकी पत्नी, डाक्टर बाबू की पत्नी, थाने के बगल से निश्चिंत गुज़र सकती हैं ?’’
‘‘कमीशन को यही बताइएगा।’’
‘‘क्यों नहीं बताऊँगा ? पुलिस गाँव में जाती है जब उसे चौकीदार या दफ़ादार ख़बर दें। कभी किसी लड़की-लड़के के साथ अनाचार हुआ ? हाँ, हाँ....उसी को थाने लाते हैं जिसका बयान वगैरह लेना होता है।’’   
‘‘बस इतना ही ?’’
‘‘और क्या ? सिर्फ़ बयान लेते हैं।’’
‘‘तब तो आपको कोई चिन्ता नहीं होनी चाहिए।’’
सुनकर पता नहीं चतुर्वेदी कहाँ खो गये। कुछ सोचते-सोचते बोले, ‘‘पिछले साल सेओपुर में जो हुआ, उसके पीछे काफ़ी मंत्री-शंत्री आये थे। वे सब-कुछ देख गये। ‘बलात्कार’ की चर्चा तक नहीं हुई।’’
‘‘तो झंझट ख़तम ?’’
‘‘कमीशन न आता तो भी चलता।’’
‘‘आप लोगों के लिए मुसीबत हो गयी। आपके यहाँ कोई ऐजुकेशन वाला तो है नहीं, और बाहर की ख़बर आप रखते नहीं।’’
‘‘कौन-सी ख़बर रखें ?’’
‘‘वही समाचारपत्रों की ख़बरें, और क्या ? कि इलाके में जवान लड़कियों को अग़वा किया जा रहा है, कहीं बँधुआ मज़दूर बनाये जा रहे हैं, कहीं रंडियाँ बन रही हैं, धंधा कर रही हैं।’’

‘‘द्विवेदी जी, एक बात का जवाब तो पहले ही दे चुका हूँ कि चाहे तमाम जवान आदिवासी लड़कियाँ उठा ली जायें तो भी हम कुछ नहीं कर सकते। थाने में ख़बर मिले तभी न !’’
‘‘हाँ....हाँ....क्यों नहीं ? जो ये काम करते हैं वह पहले थाने की डायरी में लिखवायेंगे, फिर अग़वा करेंगे, क्यों ?’’
‘‘अब इसका जवाब जो है, उसे आप पसंद नहीं करेंगे। ये सारी लड़कियां बदज़ात हैं, जंगली जानवरों जैसी। क्या बताऊँ, स्त्री-पुरुष एक साथ शराब पियेंगे, गायेंगे, नाचेंगे। और छोटे-छोटे कपड़े पहनेंगी और मर्दों जैसे सारे काम करेंगी। यह कोई अच्छी आदत है क्या ?’’
‘‘भई वो हैं ही वैसे।’’
‘‘तो, क्या कहूँ ! हरिजन और आदिवासी के साथ नाचना एक फैशन हो गया है।’’
‘‘यही तो बताइयेगा कमीशन को।’’
‘‘ज़रूर। पुलिस यूँही बदनाम है। वह कुछ नहीं करती। सिर्फ़ फ़रियाद लाती हैं, बयान लेती है, गवाही लेती है। बिना बयानों के क्या, वाद-फ़रियाद होता है ?’’
द्विवेदी पता नहीं क्या सोचने लगे। फिर बोले, ‘‘मुसम्मत दुसांधी की कोई ख़बर मिली ?’’
‘‘नहीं। यही तो कहने आया था।’’
‘‘थोड़े दिन की बात तो नहीं, एक महीने से ज़्यादा हो गया है।’’

‘‘जो भी हो। ख़बर मिले तो जरूर बताइएगा। उनकी भलाई कोई कर सकता है क्या ? हाँ, कितनी अफ़सोस की बात है कि पिछले साल के हंगामे में लगनसिंह ने गोली चला दी थी। बूड़न दुसाध मारा गया। केस भी चला। लालसिंह छूट गया। अदालत में केस नहीं बना। सरकार है, क़ानून है...इतना तो मानोगे ? तुमने कुछ नहीं माना। लगनसिंह की गरदन पर वार कर दिया ! अगर वह मर जाती तो ?’’
‘‘लेकिन वह मरा नहीं।’’
‘‘जी। लेकिन मरने से कहीं ज़्यादा हो गया। गरदन टेढ़ी हो गयी है। ऐसी जगह मार पड़ी है कि ज़िंदगी-भर ठीक नहीं होगी। जड़भरत जैसा हो गया है। और क्या ? लड़कियाँ हैं कि बाघिन ? थाने में लाया। वहाँ से भी कान्स्टेबुल की आंखों में धूल झोंक कर भाग गयी ! उसे जब तक नहीं पकड़ूंगा तब तक लगन का लड़का मुझे शांति से नहीं रहने देगा। कहाँ गयी ?’’
‘‘पता नहीं। यह तो चिन्ता की बात है।’’
‘‘क्या करूँ ? सारे राजपूत गर्म हैं। लगन के लड़के समुन्दरसिंह ने कहा कि उसकी जान खतरे में है, पता नहीं कौन कब मार दे। वे बंदूकों के लाइसेंस माँग रहे हैं। मैंने कहा कि बेशक तुम्हारे पास लाइसेंस वाली बंदूक न हो, लेकिन चलाने को दसियों बन्दूक है। क्या कर सकता हूं ? आंखें बन्द करके रहता हूँ। आँखें बन्द करके ही चला जाऊंगा।’’
‘‘ग़ैरक़ानूनी बंदूक रखते हैं ?’’
‘‘कई।’’
‘‘कौन-कौन ?’’
‘‘कौन नहीं ?’’
‘‘आप छीन सकते हैं।’’

‘‘कैसे ? अवैध बंदूकें बनाना आजकल कुटीर उद्योग बना हुआ है। बंदूकों की खरीद-बिक्री तो और भी आसान।’’
द्विवेदी इस अंचल की प्रकृति या तो जानते नहीं, या जान-बूझकर समझते नहीं। प्रत्येक जगह के, हर इलाके के, हर अंचल-मुहल्ले के, थाने के, ब्लॉक के, पंचायत के अपने विश्वास, अपने रिवाज, अपने चयन होते हैं।
यही सब जगह जन्म देते हैं जंगलों, ऊँची-नीची ज़मीनों, खनिज संपदाओं, उद्वत कारखानेदारों, बर्बर भूमिपतियों को। ज़मीनें रखी जाती हैं दस के पास और नब्बे आदमी मज़दूर, बँधुआ और भिखारी बन जाते हैं। अंचलों में आते हैं विदेशों से पैसा पाने वाले मिशनकारी, वर्णोद्धत, दम्भी और अत्याचारी ब्राह्मण, देश-सेवक, बदमाश सरकारी अफ़सर, लुच्चे-खूनी, राजनीतिक अराजनीतिक गुंडे, ठेकेदारों के हथकड़े। ऐसे अंचलों में बंदूकें नहीं चलेंगी, गोलाबारी नहीं होगी तो क्या होगा ?
‘‘मालिक-ठेकेदार-गुंडों के पास अगर बंदूकें न हों तो अंचल की गरिमा समाप्त हो जाती है। इंसान की तरह ही अंचलों की अपनी कुलीनता होती है। भरमो थाना में क्या स्थिति है ?’’
‘‘बहुत बढ़िया जगह है। ग़ैरक़ानूनी बंदूक भले ही हज़ार हों, लेकिन आठ सौ बंदूकें बेकसूर हैं।’’
‘‘बस---। जगह तो ऊँची जात वालों की है।’’
‘‘बंदूकें किनके पास हैं ?’’

‘‘क्यों ? ऊँची जात वालों के पास ? ‘‘बस...तब तो बढ़िया जगह है। कई साल पहले...जानते हो, क्या हुआ था....? भरमो थाने की जात चली गयी थी। भैया साहेब द्वारकानाथ ने खूब आंदोलन चलाया। खूब चला। बात तोहरी थाने की है। लेकिन जंगल की आग यहाँ भी पहुँची थी। नीची जात के लोगों के हाथों में उसी ने बंदूकें पकड़ायीं। यही एक दाग़ है इस इलाक़े पर।’’
ग़ैरक़ानूनी बंदूकें दीर्घकाल से यहाँ की हाकिम रही हैं, द्विवेदी यह बात जानते नहीं हैं। उन्होंने ‘पेपरबैक’ में ‘लोलिता’ पढ़ी है और कुछ अंग्रेज़ी फ़िल्म देखी हैं। शादी के समय उन्होंने ज़मीन-जायदाद कुछ नहीं लिया। बहन की शादी तक के लिए कुछ नहीं लिया। स्कूटर, फ्रिज (बिजली-किरॉसिन दोनों से चलने वाला) और भाई के डॉक्टरी पढ़ने का ख़र्च-भर लिया है। इसलिए ख़ुद को वह आधुनिक समझते हैं। नौकरी के विषय में उनकी अवधारणा है कि जो कानून बोलता है, वही करेंगे। काम हो, नहीं हो—उन्हें कोई मतलब नहीं। ग़ैरक़ानूनी बंदूकों की आबत दरोगा से सुनकर बोले, ‘‘यह क्या बात हुई ?’’
‘‘क्यों, क्या हुआ ?’’
‘‘ग़ैरक़ानूनी बंदूकें हैं, आप जानते हैं। तो बंद कीजिए।’’ चतुर्वेदी मुस्कुराए।

‘‘आप तो क़ानून की बात करते हैं। किस-किस के पास है ग़ैरक़ानूनी बंदूकें...जानते हैं ? एम.एल.ए. साहेब के पास। आपके अस्पताल में, थाना जोगावर के ठेकेदार के पास। शहर के विश्वनाथ मंदिर के पुराने पंडित हनुमान मिश्र के पास। आप लोग जिन माडर्न साधु के पास जाते हैं, गंभीर गाँव के अमृतरूपी स्वामी—उनके पास।’’
सुनकर द्विवेदी तिलमिलाए।
‘‘यह क्या बात हुई ?’’
‘‘ज़मीन बाप की नहीं होती, बंदूक की होती है। और मैं जाऊँ बर्र के छत्ते को छेड़ने ? न भई, राम-राम कहिए। घास क्या साल के पेड़ से लड़ सकती है ? चूहा क्या खाकर बाघ से लड़ेगा ? मैं चला, द्विवेदी जी ! मुसम्मात दुसाधी की कोई ख़बर मिले तो ज़रूर पकड़वा दीजिएगा।’’
‘‘हाँ-हाँ, ज़रूर। क़ानून अपने हाथ में लेना अच्छी बात नहीं है। उसे पकड़िए। ऐसे खूनी लड़के-लड़कियाँ स्वच्छन्द घूम रहे हैं, यह तो डरने की बात है।’’

2

 


वहाँ से दारोगा जी भरमो स्टेशन आये। स्टेशन छोटा है। लाइन टालू पहाड़ के बीच से उठकर आयी है, पर कुछ फ़ासले के बाद नीचे उतर गयी है। अगर भरमो आना हो तो बस से आइये। ट्रेन से भी आ सकते हैं। कुछ दिनों पहले तक इलाक़े में कुलियों के दलाल घूमते थे। आदिवासियों को बरगला कर वे फिरंगियों के चाय-बागानों, कॉफ़ी-बागानों और कोयले की खानों में ले जाते थे। कहते थे, वहाँ जाओगे तो अपनी ज़मीन मिलेगी। कौन-सी कैसी ज़मीन ? अरे मिट्टी में लात मारोगे, धान के बीज छींटोगे तो धान होगा।
वे दलाल-लड़कियों के लिए लाते थे, जस्ते की चूड़ियाँ, काँच की गोलियों की मालाएँ और सस्ते आइने। मर्दों के लिए लकड़ी की कंघियाँ और लाल टुहुक गमछे लाते थे। और सबसे पहले वे ग्राम-प्रधान के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने के लिए एक सस्ता चुरुट और चाँदी का एक रुपया भेंट करते थे। तब आदिवासी नर-नारी उनके साथ चले जाते थे। उस समय की कहानी आज भी वे गाते हैं—जब भी वे पत्थर तोड़ते हैं या रास्तों पर काम करते हैं।

जाना नहीं, जाना नहीं ओ बहिन,
कुली लाइन में मशीन की गाड़ी
बुलाती है, झुकझुक, झुकझुक।
लेना नहीं, लेना नहीं, ओ बहिन, जस्ते की चूड़ियाँ,
पहनो नहीं, पहनो नहीं, गोलियों की माला।
काठ की बाला देंगे, बहिन ओ
ऐसे ही देंगे मिट्टी की माला।
जाऊँगी मैं जाऊँगी ओ बहिन
कुली लाइन मशीन की गाड़ी
बुलाती है झुकझुक झुकझुक।
बुलाती है झुकझुक झुकझुक झुकझुक-झुकझुक।

 


   


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