स्वाहा - महाश्वेता देवी Swaha - Hindi book by - Mahashweta Devi
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स्वाहा

महाश्वेता देवी

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :108
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 6002
आईएसबीएन :78-81-8143-674

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प्रस्तुत है उपन्यास स्वाहा...

Swaha

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

बांग्ला भाषा की प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी ने जिस निर्भीक और बेखतर भाव से नक्सलियों तथा आदिवासियों के क्षेत्रों में दिन रात भटककर, वहां के जीवन संघर्ष, शोषण, अत्याचारों को देखा और बहुत गहरे तक महसूस किया.... उनका अधिंकाश लेखन उन्हीं जीवन्त अनुभवों का आख्यान है। सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे युग की महान लेखिका महाश्वेता देवी ने जब भी लिखा तथा जो भी लिखा उसमें प्रतिवाद की गूँज हमेशा सुनाई दी है।

प्रस्तुत उपन्यास एक ऐसा पारिवारिक उपन्यास है जिसमें महाश्वेता देवी ने स्वाहा राय जैसी सम्पन्न और अहंकारी स्त्री के पेचीदा चरित्र को बड़ी कुशलता और मनोवैज्ञानिक ढंग से व्यक्त किया है। उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता पात्रों का सूक्ष्म अन्वेषण तो है ही, उनका आत्ममन्थन भी है। स्वाहा राय जैसे सामन्ती मानसिकता की स्त्री की आत्ममुग्धता और गरूर, अन्ततः सर्वस्व नष्ट कर देता है।
उपन्यास बेहद दिलचस्प है और स्थितियाँ तथा घटनाएँ पाठक को निरन्तर बाँधे रखती हैं।
नये शिल्प और भाषा में लिखे 35 उपन्यास का पाठक स्वागत करेंगे।

 

स्वाहा

(कहानी की जरूरत के तकाजे पर, मैंने समय को जरा आगे-पीछे करके इस्तेमाल किया है। इस तरीके की खोज मेरी अपनी नहीं है। वैसे मेरी कहानी भी नहीं है, क्योंकि आदिकाल से ऐसा होता आया है....)
 
दिसंबर, 1960
शाम होने से काफी पहले ही, मिंटो पार्क स्थित मकान में, बत्तियाँ जल उठीं। सर्दी की शामें बहुत जल्दी चली आती हैं। समूचे मकान में बत्तियाँ रौशन हो उठीं। नीचे काँच के बर्तनों की टन-टुन्न की आवाज़ें गूँजती हुईं !
नील आकर दरवाजे़ पर दस्तक दे गया, ‘गेट रेडी, मॉम ! मैं सोनाली को लेने जा रहा हूँ।’
‘ये –स !’ स्वाहा ने अंदर से जवाब दिया।

दीवार पर जड़े विशाल आदमक़द आईने के सामाने, वे गोल-गोल घूमती रहीं। घूम-घूम कर वे अपने को निहारती रहीं कि साड़ी की चुन्नट ठीक तरह पड़ी या नहीं। गोलाकार घूमते हुए, उनकी उम्र भी धीरे-धीरे कम होती गई। किसी जमाने में वे वायसराय के शिमला में सौंदर्य साम्राज्ञी घोषित की गई थीं। वे अपने मन की आँखों से वह दृश्य, वे आज भी देख पा रही थीं। ..... अचानक समूचा कमरा गुलाबों की खुशबू से भर उठा। कमरे की दीवारें एकदम से कहीं गायब हो गईं। खिड़की के काँच से बाहर बर्फ के पहाड़ नजर आते हुए ! बर्फ पड़ रही है ! बर्फ की बारिश ही बारिश ! सबकुछ हिम-तुषार से ढँका हुआ ! चारों  तरफ, सारा कुछ श्वेत-शुभ्र ! निस्तब्ध ! स्वाहा ने नज़रे उठाईं।

.....वह रही....वे ही तो हैं ! संगमरमर की सीढ़ियों से नीचे उतरती हुईं। उनकी उम्र भी घटकर पच्चीस पर आ टिकी। बदन पर सफ़ेद बनारसी साड़ी ! सफ़ेद साटन का कटी-बाह का ब्लाउज ! ताजनुमा जूड़े में  मोती की सतलड़ी माला लिपटी हुई ! गले में मोती की माला ! कलाई पर लड़ीदार मोतियों की चौड़ी पट्टी ! कानों में मोतियों के झुमके !

..... लोग उल्लास से तालियाँ बजा रहे हैं। बैंड बज उठा ! दौलतमंद-अमीर लोगों ने हाथ में जाम उठा लिए। शिमला शहर में लाट-बहादुर की बॉल-डांसर, मिसेज स्वाहा राय, सौंदर्य-साम्राज्ञी बन गईं ! कितनी खुशी ! कितना हर्ष !

स्वाहा राय को सब कुछ साफ़-साफ़ नज़र आ रहा था। जब भी वे अकेली होतीं, वक्त के सीने पर पाँव  रखकर, वे अतीत में पहुंच जाती थीं, दुबारा वर्तमान  में लौट आती थीं। इस वक्त वे शिमला में पहुँच गईं ! इस वक्त वे ब्यूटी-क्वीन थीं। वे सब कुछ साफ़-साफ़ देख पा रही थीं- दर्शक उत्साह से तालियाँ बजा रहे हैं। लेकिन अनल राय, उनके पति उनकी तरफ हिंस्र गुस्से से घूर रहे हैं।
....अनल, तुम मुझे यूँ घूरकर मत देखो। मेरे सिर पर यह फूलों का मुकुट, वाद्य-संगीत, रोशनी, तालियाँ-मुझे प्रिय हैं ! इनकी मुझे ज़रूरत है। लेकिन, तुम्हें मैं प्यार करती हूँ ! तुम अनल हो मैं स्वाहा हूँ। तुम ही तो कहते हो कि तकदीर ने हमें एक दूसरे के लिये गढ़ा है। अब मैं सौंदर्य-साम्राज्ञी बन गई हूँ। सारे मर्द आज मुझ पर फिदा हैं; मुझे मुग्ध निगाहों से निहार रहे हैं। आज रात मैं प्रिंस के साथ नाचूँगी कल वे मुझे घुड़सवारी के लिये ले जा रहे हैं। लेकिन मैं तो तुम्हें ही प्यार करती हूँ तुम्हारी निगाहे इतनी हिंसक क्यों हो उठी हैं ?

तुम्हारी आँखों में तो आग धधक रही है। कभी-कभार, जब तुम मुझे करीब खींचते हो, उस पल भी तुम्हारा तन-बदन तपता रहता है। इसीलिये तुम अनल हो। चूँकि मैं तुम्हें ही प्यार करती हूँ, इसीलिये मैं स्वाहा हूँ।

आज रात तुम मुझे निर्मम तानों से भेद डालोगे, मुझे पता है ! तुम कहोगे, ‘न्ना, स्वाहा, तुम कहीं नहीं जायोगी।’ तुम मुझे अपना फैसला सुनाओगे- तुम्हें घेरकर वे लोग दीवानगी पर उतर आएँ; इश्किया तारीफ करें, यह मुझसे हरगिज बर्दाश्त नहीं होगा। आज रात तुम मुझे.....

उसके बाद, तूफान शांत हो जाएगा, आग बुझ जाएगी। लेकिन, न्ना, तुम्हारी आग नहीं बुझेगी। आग तो और ज़्यादा धधक उठेगी। धधकती रहेगी। हम दोनों एक-दूसरे से काफी देर तक मिले रहेंगे और कालपुरुष को आकाश के इस पार से, उस पार भेज देंगे। उसके बाद, जब शिमला के आसमान पर, बर्फ से ढंके शिखर, नए सूर्योदय की आभा से लाल हो उठेंगे, तब तुम कहोगे- ‘जानती हो, सुंदर, बिल्कुल तुम्हारी ही तरह सुंदर हमारी बेटी होगी। हम उसे नाम देंगे-नीलांजना !’

मैं कहूँगी, ‘हम उसे नील कहकर बुलाएँगे !’
लेकिन मेरी-तुम्हारी इतनी-इतनी चाहत के बावजूद, हमें बेटी नहीं होगी ! हमें बेटा मिलेगा। उसे तुम्हारा  पौरुष और मेरा रूप नसीब नहीं होगा। फिर भी, हम उसे ‘नील’ ही बुलाएँगे ! लेकिन नील जैसे-जैसे बड़ा होगा तुम्हरा दिल टूट जाएगा।
दिल तो टूटना ही था अनल ! तुम और मैं दिल्ली-शिमला के महशूर-मारूह, हसीन दंपती हैं। काफी वक्त गुज़र गया हमें कोई संतान नहीं हुई !
जाने कितने ही लोगों ने सवाल किया, ‘तुम लोगों का कोई बच्चा क्यों नहीं है ?’’

हमने जवाब दिया कि हम चाहते हैं कि हमारी संतान हम दोनों से भी ज़्यादा सुंदर हो और ऐसी सुन्दर संतान क्या झट से पैदा हो जाती है ?’’
सबने कहा, ‘भई, यह तो तुम लोगों की ज्यादती है। संतान चाहे जैसी भी हो, माँ-बाप तो उससे प्यार ही करेंगे।’
हमने कहा, ‘अरे, नहीं, नहीं, हरगिज नहीं ! काला-कलूटा, बदसूरत बेटा या बेटी भला कौन चाहता है ?’
मेरी माँ तक ने कहा, ऐसी बात नहीं करते। ऐसी बात जुबान पर लाना तक पाप है। सिर्फ रूप ही क्या सबकुछ होता है, बिट्टी ?’
आखिरकार हमारे यहाँ बेटे ने जन्म लिया। उफ ! कितना निकष काला ! सूरत-शक्ल किस कदर साधारण ! समूची दिल्ली में टिट्कारी गूँज उठी। हँसते-हँसते लोगों के पेट में बल पड़ गये।

‘भई स्वाहा को अपने रूप पर जितना गरूर था, उतना ही काला-कलूटा, कुरूप बेटा हुआ है उसे ! अच्छा हुआ ! बहुत अच्छा हुआ ! दूसरों के बच्चों को कभी उसने अपनी गोद में नहीं उठाया, कभी प्यार नहीं किया ! बहुत अच्छा हुआ ! रूप का इतना गरूर था उसे, कि जमीन पर उसके पांव नहीं पड़ते थे।’

मेरे-तुम्हारे मन की क्या हालत हुई है याद है ?
तुमने हिदायत दे डाली, ‘ऐसे कल्लू-कुरूप लड़के को तुम अपना दूध हरगिज नहीं पिलाओगी ! इसके लिये कोई दूध धाय रख लो।’
तुमने कहा मेरे सामने उसे हरगिज मत लाना।’
बताओ, यह क्या तुमने ठीक किया था ? तुम्हारी बात मानकर, अपने ही बच्चे की उपेक्षा करके, क्या मैंने ठीक किया ?

मैं पागल नहीं हूँ, अनल ! मुझे बखूबी अहसास है कि अर्सा हुआ, तुम इस संसार से विदा ले चुके हो। तुम खुशनसीब थे। जब धू-धू आग जल रही थी, तुम्हारी साँस अटक गई और तुमने दम तोड़ दिया। असल में मुझे बचाने की कोशिश में, तुमने अपनी जान दे दी, वर्ना आग की लपटें मुझे ही जला डालतीं।

मुझे पता है तुम तो जाने कब ही स्वर्ग चले गए, पूरे पैंतीस साल गुजर गए। मुझे यह भी पता है कि मेरा-तुम्हारा बेटा नील, किसी लड़की, सोनाली को इस घर में ला रहा है। नील सोनाली से विवाह करेगा। मुझे सब पता है। लेकिन मैं भी जादूगरनी हूँ। तुम भी तो कहा करते थे कि मुझे जादू आता है। मैं मायाविनी  हूँ। जब भी मेरा अतीत में लौट जाने को मन करता है, अनल से बात करने को जी चाहता है, तभी अतीत एकदम से सच हो उठता है। वर्तमान जाने कहाँ गायब हो जाता है, कहीं अलीक हो जाता है।

मैं बेटी क्यों चाहती थी, बोलो तो ? बिल्कुल मेरी ही तरह रूप की दाह में चंचल चपल बेटी ?
तुम कहा करते थे, ‘किसी दिन तुम बूढ़ी हो जाओगी उस दिन तुम हजारहा कोशिशों के बावजूद, यौवन लौटा नहीं पाओगी। तुम्हारे बाल सुनहले-रक्तिम नहीं हो पाएँगे ! होठों से सारी सरसता झर जाएगी छाती के उभार भी सुनहरे क्वीन-ऐपल जैसे नहीं रहेंगे।’

‘तुम क्या सोचते हो तुम्हारा यह आग जैसा धधकता चेहरा क्या सलामत रहेगा ?’ मैंने पूछा।
‘तो ठीक है ! तुम एक बेटी पैदा करो सूरत शक्ल में बिल्कुल तुम्हारी जैसी ! जब वह घर में घूमती-फिरती-डोलती फिरेगी, तब उसमें मैं तुम्हें ही नए सिरे से देखूँगा।’
‘क्यों बेटी का ब्याह नहीं करोगे ?’
‘मैं दामाद भी अपनी ही तरह रूपवान लाऊँगा।’
‘रुको-रुको, इससे पहले, हम पेरिस तो घूम आएं। वहाँ से अपना ब्यूटी-ट्रीटमेंट करा आएँगे। बेटी के मुक़ाबले और ज़्यादा सुंदर हो जाऊँगी मैं।’
‘क्यों ? अब तुम्हें और ज़्यादा सुन्दर होने की ज़रूरत है ? मुझे तो तुमने पा ही लिया है। जहाँ तक दूसरे लोगों का सवाल है वे लोग तुम्हें सुन्दर कहें, मैं यह बिल्कुल नहीं चाहता।’
तुम इतनी ईर्ष्या करते थे, अनल ! तुम्हार वह ईर्ष्यालु रूप देखकर मुझे कितना मज़ा आता था ! मानो देह के अंदर, रग-रग में आग बहने लगती थी !
लेकिन बेटी हमें नसीब ही नहीं हुई ! तुम्हें याद है मैं तुम्हारी छाती में मुँह गढ़ाकर रो रही थी ? तुम मातृत्व को सुंदर नहीं मानते थे। मुझे भी मातृत्व भला नहीं लगता था।
मेरी माँ कहती थी, ‘राक्षसी है तू ! रूप नष्ट हो जाएगा, इस डर से तू माँ नहीं बनी !’
हाँ, मैं सोचा करती थी, शरीर की तमाम रेखाएँ टूट-फूटकर बीभत्स हो जाएँगी। मुझे तो इस खयाल से ही डर लगता था। तुम्हारा भी बिल्कुल यही ख्याल था। तुम भी यही चाहते थे कि मेरी जवानी बिल्कुल अटूट रहे। लेकिन जब नील आया हम दोनों ही खुश थे। हाँ  जितनी देरउसे देखा नहीं था बस उतनी ही देर, हमारी खुशी क़ायम रही थी।

उन दिनों हम दोनों को जितनी सर्वशक्तिमान समझते थे ! लेकिन असल में तकदीर ही हमसे खेल रही थी। हम दोनों ने एक-दूसरे को चाहा, एक दूसरे को पा भी लिया। कलकत्ता में परिवारवालों के साथ गृहस्थी चलाने का हमारा कभी कोई इरादा नहीं बना। तुम्हें दिल्ली में ऊँची नौकरी मिल गई। तुम्हें ऐश्वर्य स्वयं हासिल हुआ, तुम्हें अर्जित नहीं करना पड़ा। तुम हमेशा ऐश्वर्य में ही डूबे रहे। तुम्हें अपनी नानी का वैभव नसीब हुआ। अपने रूप के दम पर, मैंने तुम्हारी गृहस्थी में क़दम रखा।
लेकिन, तकदीर हमारा तमाशा देखती रही। हमारा तो यह खयाल था कि हम लोगों ने जब, जो चाहा, वह मिला। अब अगर हमें बेटी चाहिए, तो बेटी ही नसीब होगी। लेकिन, आखिरकार बेटा हो गया। बेटा मेरी तुम्हारी तरह हो सकता था, मगर नहीं। किस्मत ने  हमारे गाल पर करारा तमाचा जड़ा था। तुम्हें याद हैं मैंने चीखकर कहा था ?
‘यह मेरा बेटा नहीं है ! तुम लोगों ने बच्चा बदल दिया है ! नर्स, यह तुम किसका बच्चा उठा लाईं ?’
नर्स बेतरह अचकचा गई, ‘आप ही का बेटा लाई हूँ ! देखिए, कितना प्यारा बच्चा है !’’
मैं रो पड़ी थी, ‘यह काला-कलूटा बदसूरत बच्चा ! यह मेरा बेटा हरगिज नहीं हो सकता। तुम लोगों ने मेरा बेटा, ज़रूर किसी और को दे दिया है।’
‘इसे, अभी.. इसी वक़्त, हमारी नज़रों के सामने से ले जाओ।’ तुम दहाड़ उठे थे। नर्स बेतरह अवाक् ! वह नील समेत, वहाँ से हट गयी।
जो लोग बच्चे को देखने आए, नर्स ने उन लोगों से भी कहा, ‘यह कैसी माँ है ? यह कैसा बाप है ?


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