आलोक छाया - सुचित्रा भट्टाचार्य Alok Chaya - Hindi book by - Suchitra Bhattacharya
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आलोक छाया

सुचित्रा भट्टाचार्य

प्रकाशक : सत्साहित्य प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :192
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3325
आईएसबीएन :81-7721-084-X

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आधुनिक बँगला साहित्य की प्रख्यात कथाकार सुचित्रा भट्टाचार्य का एक अत्यन्त रोचक एवं पठनीय उपन्यास

Aalok Chhaya a hindi book by Suchitra Bhattacharya -आलोक छाया - सुचित्रा भट्टाचार्य

प्रस्तुत है पुस्तक के कुछ अंश

आधुनिक बँगला साहित्य की प्रख्यात कथाकार सुचित्रा भट्टाचार्य के इस उपन्यास में स्त्री की पीड़ा, उसकी समस्याओं एवं उपलब्धियों का मार्मिक चित्रण है। इसमें इनसानी रिश्ते, उनकी अटूट अंतरंगता, उनकी जटिलताएँ उजागर हुई हैं। अत्यंत रोचक एवं पठनीय उपन्यास।

: एक :


निवेदिता इतमीनान से तैयार हो रही थीं। आज शाम साढ़े चार बजे सुहासिनी सोसाइटी की साप्ताहिक मीटिंग थी। उनके इस फर्न रोड के मकान से हाजरा में स्थित समिति कार्यालय की दूरी को गाड़ी से कुल पंद्रह मिनट में पार किया जा सकता है; लेकिन निवेदिता चार बजे तक निकल पड़ना चाहती थीं। चूँकि वे बेटे के ब्याह में व्यस्थ थीं, इसलिए एक के बाद एक, दो-दो मीटिंग्स में वे शामिल नहीं हो सकीं। आज उन्हें जरा पहले ही पहुँच जाना चाहिए।
हलका सा मेकअप करके उन्होंने वार्डरोब खोला। कतार-दर-कतार हैंगर सजे हुए। उन हैंगरों में साड़ियाँ झूलती हुईं-सूती, सिल्क, टसर, शिफॉन ! गहने-गुरिया के मामले में उन्हें खास दिलचस्पी नहीं है, लेकिन साड़ियाँ इकट्ठी करने का उन्हें हमेशा से ही बेहद जुनून रहा है। अलग-अलग राज्यों की चुनिंदा साड़ियों से उसका वार्डरोब ठसा हुआ। कांजिवरम्, पटोला, गढ़वाल, नारायणपेठ, बोमकाइ, इक्कत, कटकी, मदुरै, संभलपुरी। क्या नहीं है ! बोलपुर की काँथा-स्टिच, फुलिया की ताँत, विष्णुपुर की बालुचरी और बँगलादेश की जायदानी की संख्या भी कुछ कम नहीं है। लेकिन शोख रंग उन्हें कभी पसंद नहीं था। अब उम्र बढ़ने के साथ-साथ वे रंगों के मामले में और ज्यादा गंभीर हो उठी हैं। साड़ी का धरातल या तो सफेद या ऑफ-व्हाइट या धूसर रंग या हद-से-हद स्टील-ग्रे हो, बस !
निवेदिता धकिया-धकियाकर एक के बाद एक हैंगर खिसकाती गईं। आज वे कौन सी साड़ी पहने-गुर्जरी-स्टिंच या कोई हलकी सी सिल्क साड़ी। पीली किनारीवाली डोरिया टांगाइल ही क्या बुरी है ! अनिंद्य की ससुराल से भेजी गई ‘नमस्कारी’ साड़ी अभी भी हैंगर में टाँगी नहीं गई, वार्डरोब की दराज में ही पड़ी है। उस साड़ी पर नजर डालते ही निवेदिता ने नाक सिकोड़ी। सफेद रंग की बनारसी, धरातल में एकाध बूटी तक नहीं है, लेकिन किनारी सुर्ख लाल। ऐसी सुर्ख लाल किनारी तो उन्होंने जिंदगी में कभी नहीं पहनी। साँड़-भड़काऊ रंग उन्हें घोर नापसंद है। शरण्या बता रही थी कि उसकी माँ ने यह साड़ी पसंद करके खरीदी थी। निवेदिता की ही बदकिस्मती कि यह साड़ी यहीं, इसी तरह, अनंत-शय्या पर पड़ी रहेगी।
काफी सोच-विचार के बाद उन्होंने साउथ की मेरून कलर की चौड़े बार्डरवाली सूती साड़ी हैंगर से उतार ली। साथ में मेरून-बॉर्डरवाला, लंबी बाँहवाला क्रीम रंग का ब्लाउज भी निकाल लिया घरेलू साड़ी बदलकर उन्होंने जल्दी-जल्दी अपने आपको दक्षिणी सूती साड़ी के आभिजात्य में चुस्त-दुरुस्त कर लिया।
फिलहाल निवेदिता की उम्र अट्ठावन वर्ष है, मगर उनका फिगर अभी भी कमाल का था। औसत बंगाली औरतों के मुकाबले वे काफी लंबी थीं। अति मामूली साड़ी भी उनके अंग पर चार चाँद लगा देती थी। उनका चेहरा भी ऐसा कोई जानमारू नहीं था, लेकिन रंग बिलकुल गोरा ! माँग-विहीन कच्चे-पक्के, घने बाल खींचकर बाँधने और चौड़े माथे पर बड़ी सी बिंदी लगाते ही उनका व्यक्तित्व बेहद निखर आता था। यह व्यक्तित्व ही निवेदिता का आभूषण था।
बहरहाल वेश-भूषा, बनाव-श्रृंगार पूरा हो गया। मेज से चश्मा, कलम और छोटा सा राइटिंग-पैड उठाकर उन्होंने एक खूबसूरत से झोला बैग में भर लिये। उसके बाद कुछेक पल वे खड़ी-खड़ी सोचती रहीं। दिसंबर की शुरूआत थी। कलकत्ते में अभी तक ठंड का मौसम दाखिल नहीं हुआ था। लेकिन परसों से मंद-मंद, सूखी-सूखी उत्तरी बयार बहने लगी थी, हलकी-हलकी सिहरन लिये। ऐसे समय में झट से ठंड लग जाती है। वे अपने साथ ओढ़ने के लिए कुछ रख लें। आज, करीब बीस दिनों बाद, वे ‘सुहासिनी’ जा रही थीं, लौटने में देर भी हो सकती है।
गुजराती शॉल निकालकर निवेदिता अलमारी बंद कर रही थीं कि दरवाजे पर किसी की रुनझुनाती आवाज गूँज उठी-‘‘अम्मूजी, मैं आ जाऊँ ?’’
शरण्या-इस घर में कदम रखने के बाद से ही यह लड़की निवेदिता को ‘अम्मूजी’ बुलाने लगी। यह संबोधन निवेदिता के कानों में कहीं अलग से बज उठता है। उनके दोनों बेटे उन्हें ‘माँ’ बुलाते हैं। पुत्रवधू जाने क्यों उनके लिए ‘अम्मूजी’ संबोधन ढूँढ़कर लाई। किसी ने उसे सिखा दिया है या सास को ‘माँ’ कहने में हिचकिचाहट होती है ?
निवेदिता ने गला खखारकर कहा, ‘‘आओ, अंदर आ जाओ।’’
परदा हटाकर शरण्या अंदर आ गई। बदन पर प्याजी रंग की नई ताँत-साड़ी।
साड़ी फूली-फूली, थोड़ी मुड़ी-तुड़ी भी। देखते ही जाहिर होता था कि उसे साड़ी पहनने की आदत नहीं है। रेशमी-रेशमी, घने-घने बाल पीठ पर लहराते हुए ! भर माँग जगमगाता सिंदूर ! गले में मॉफ-चेन ! कलाई में चूड़ी-कंगन के साथ-साथ लाल शांखा और सोना-चढ़ा लोहा ! शरण्या के अंग-प्रत्यंग में नई-नई दुलहन की खुशबू !
गुड़िया-सी सजी-धजी पुत्रवधू को निवेदिता ने झलक भर देखा। विवाह हुए ग्यारह दिन गुजर गए, मगर यह लड़की अभी भी बदस्तूर सिमटी-सकुचाई हुई !
निवेदिता के होठों पर मंद-मंद मुसकान झलक उठी, ‘‘कुछ कहना चाहती हो ?’’
शरण्या ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखें उनके चेहरे पर टिकाकर पूछा, ‘‘आप कहीं बाहर जा रही हैं, अम्मूजी ?’’
‘‘हाँ, समिति ऑफिस जा रही हूँ।’’ निवेदिता ने गरदन हिलाई, ‘‘तुम लोगों की ट्रेन कितने बजे की है ?’’
‘‘सवा सात बजे। आपके बेटे ने कहा है, करीब छह बजे घर से रवाना होंगे। क्या आप तब तक लौट आएँगी ?’’
‘‘नहीं, शरण्या ! आज एक्जीक्यूटिव बॉडी की मीटिंग है। मुझे लौटने में देर होगी।’’
‘‘जी...’’
इस लड़की को कहीं बुरा तो नहीं लगा ! चेहरा क्या जरा बुझ गया था ! शरण्या क्या उम्मीद लगाए थी। बेटा-बहू हनीमून पर जा रहे हैं, इसलिए वे काम-काज छोड़कर दौड़ती हुई चली आएँगी। निवेदिता कामकाजी औरत थीं। इस प्रकार की थोथी भावुकता को प्रश्रय देना उनके स्वभाव में ही नहीं है।
इसके बावजूद नई बहू कहीं मन-ही-मन आहत न हो, इसलिए उन्होंने जरा और कोमल लहजे में कहा, ‘‘जाने से पहले मैं तुमसे मिलकर ही जाती। जाओ,  दोनों खूब अच्छी तरह घूम आओ। ठंडी जगह जा रही हो, गरम कपड़े ले लिये हैं न ?’’
शरण्या ने सिर हिला दिया।
‘‘तुम लोगों की पैकिंग वगैरह हो गई ?’’
‘‘जी, करीब-करीब।’’
‘‘साड़ी वगैरह ज्यादा मत रखना। सलवार-कमीज में ज्यादा फ्री रहोगी।’’
शरण्या ने लजाते-लजाते कहा, ‘‘आपके बेटे ने भी यही कहा....’’
यह लड़की बात-बात में ‘आपका बेटा, आपका बेटा’ क्यों कहती है ! सास के सामने दूल्हे का नाम लेने में सकुचा रही है ! आजकल की लड़कियों में इस तरह का पिछड़ापन तो ठीक नहीं है। एम.ए. पास शिक्षित लड़की है, यह ऐसी पुरातनपंथी भाषा क्यों बोल रही है !
खैर, छोड़ो, जहन्नुम में जाएँ। इस बारे में निवेदिता को भला क्यों सिरदर्द होने लगा। जैसा वे चाहें, उनकी पुत्रवधू अक्षर-अक्षर उसका आज्ञा-पालन करे, ऐसी सोच पर उन्हें विश्वास नहीं है। पुत्रवधू पर अपनी सोच या सलाह लादना उन्हें सख्त नापसंद है।
अपने झोला-बैग की चेन लगाते-लगाते निवेदिता ने सवाल किया, ‘‘हाँ, तुम मुझसे कुछ कहने आई थीं ?’’
शरण्या शायद भूल ही गई थी।
उसने सकपकाकर कहा, ‘‘ओ..हाँ, आपके बेटे को चाय चाहिए, मैंने सोचा, आपसे भी पूछ लूँ।’’
निवेदिता ने घड़ी पर नजर डाली, ‘‘खयाल बुरा नहीं। अभी भी पंद्रह मिनट हाथ में हैं।’’
‘‘मैं बस दो मिनट में ले आती हूँ।’’
‘‘तुम क्यों, नीलाचल कहाँ है ?’’
‘‘उसे आपके बेटे ने कहीं भेजा है।’’
‘‘अच्छा-अच्छा ! गैस सँभलकर जलाना !’’
शरण्या हँस पड़ी, ‘‘मुझे आदत है, अम्मूजी !’’
जेवरों की रुनझुन आवाज विलीन होते ही निवेदिता प्रशस्त ड्राइंग-हॉल में भारी-भरकम सोफे पर आ बैठीं। तीस साल पहले किसी नामी-गिरामी दुकान से खरीदे गए महँगे सोफों की उम्र अब लगभग खत्म होने को आई। उसपर बैठते ही सोफे की स्प्रिंग एकबारगी कराह उठी। निवेदिता के माथे पर बल पड़ गए। सोफा यूँ चरमारा क्यों रहा है ? अनिंद्य के ब्याह के धमार में सोफे पर काफी अत्याचार हुआ, अब इसकी मरम्मत जरूरी हो आई है। लेकिन इन सब चीजों की मरम्मत और रूप-रंग बदलने में तो ढेरों रुपयों का खर्चा है। अनिंद्य के ब्याह में ही पैसा पानी की तरह खर्च हो गया। चूँकि बेटे का विवाह था, इसलिए आर्य के हाथ से भी थोड़े-बहुत रुपए ढीले हुए। निवेदिता के सोफा-सेट के लिए अब भला उनके हाथ से पैसे निकलेंगे ? वैसे निवेदिता को हाथ फैलाकर माँगने की जरूरत भी क्या है। शोभा बाजारवाला मकान अब बिकने ही वाला है। उनके हिस्से के पैसे हाथ में आते ही घर-द्वार के छिटपुट काम वे खुद भी करा सकती हैं। विवाह के मौके पर सिर्फ दूसरी मंजिल के कमरे में ही रंग-रोगन कराया गया, नीचे किराएदारों के कमरों में रंग कराना अभी भी बाकी है। सुरेन बता रहा था कि गाड़ी को भी अब कुछ दिन बिठाना होगा, इंजन की हालत ठीक नहीं है।
वे अपने खयालों में डूबी हुई थीं कि सामने अनिंद्य आ खड़ा हुआ। वह हड़बड़ाई मुद्रा में अपने कमरे से बाहर निकल आया और यहाँ के कैबिनेट में कुछ खोजता रहा। नहीं मिली। झल्लाहट में उसने सिर झटका, दराज जोर से बंद की और उनकी तरफ चला आया। सेंटर टेबल पर झुककर वह नीचे पड़े कागज-पत्तर उलटता-पलटता रहा।
अचानक वह तनकर बैठ गया, ‘‘जरा, खिसको तो...’’
‘‘क्या खोज रहे हो ?’’
‘‘यहीं-कहीं मैंने एक लिफाफा रखा था।’’
‘‘कैसा लिफाफा ?’’
‘‘बादामी रंग का...’’
‘‘जरूरी लिफाफा था ?’’
‘‘वरना मैं खोजता ही क्यों ?’’ अनिंद्य का मुँह फूल गया, ‘‘उसमें ट्रेन का टिकट था।’’
‘‘कमाल है ! ट्रेन का टिकट जहाँ-तहाँ फेंककर रख छोड़ा ?’’
‘‘नो लेक्चर !’’ शॉर्ट्स, टी-शर्टधारी अनिंद्य के गोरे, गोलमटोल मोहक चेहरे पर झुँझलाहट झलक उठी, ‘‘कहा न, मैंने यहीं रखा था। तुम्हें हिलने-डुलने में क्या परेशानी है ?’’
‘‘इस लहजे में बात क्यों कर रहे हो ? तमीज से बात करो।’’
‘‘मैंने कोई बदतमीजी से बात नहीं की। हटो, जरा सोफे की दरारों में देख लूँ !’’
निवेदिता अपनी जगह से नहीं हिलीं।
उन्होंने नाखुश लहजे में कहा, ‘‘यहाँ कोई लिफाफा नहीं है। तुम अपने कमरे में जाकर देखो।’’ ‘‘जरा खिसक जाओगी तो क्या तुम्हारी इज्जत में बट्टा लग जाएगा ?’’
‘‘अजीब बात है ! इज्जत में बट्टा क्यों लगेगा ?’’
‘‘क्या पता ?’’ अनिंद्य ने होंठ बिचकाए, ‘‘इधर कई दिनों से कुल-खानदान की गरिमा को लेकर तुम मगरूर हो रही हो। लोगों के घर जा-जाकर अपनी गाथा सुना रही हो-मेरे पास यह था, वह था; मेरे पास यह है, वह है...’’
‘‘उफ, अनिंद्य, बिहेव योर सेल्फ ! शराफत से बात करो। घर में अभी-अभी एक नई लड़की आई है।’’
‘‘तो ?’’
‘‘अपना राग-रंग-रूप, अभी से उसे न दिखाओ तो ही अच्छा है।’’
जवाब में अनिंद्य फिर कुछ कहने जा रहा था, इस बीच टेलीफोन बज उठा। उसने झुँझलाकर दूरभाष यंत्र की तरफ एक बार देखा और दनदनाते हुए अपने कमरे में समा गया।
निवेदिता की आँखों में भी असंतोष !
गरदन घुमाकर बेटे की तरफ देखते-देखते निवेदिता ने फोन का रिसीवर कान से लगाया, ‘‘हैलो !’’
‘‘नमस्कार दीदी ! मैं नवेंदु बोल रहा हूँ, शरण्या का पापा।’’
‘‘ओ, नमस्कार, नमस्कार !’’ निवेदिता की आवाज पलक झपकते ही कोमल हो आई, ‘‘हाँ, बताइए, क्या खबर है ?’’
‘‘बुबली...आइ मीन, शरण्या तो आज जानेवाली है न ?’’
‘‘हाँ, अभी करीब छह बजे रवाना होंगे।
‘‘छह बजे ? सर्वनाश ! दूसरो छोर पर नवेंदु आर्तनाद कर उठे, ‘‘अरे, कम-से-कम डेढ़-दो घंटे हाथ में रखकर निकलना चाहिए। ऑफिस के ‘पीक समय में जाएँगे, जाने कहाँ, किस जाम में फँस जाएँ, कुछ ठिकाना नहीं।
‘‘अरे, नहीं-नहीं ! पहुँच जाएँगे। उन लोगों को दफ्तर मुहाल से तो जाना नहीं है। उनकी ट्रेन तो सियालदह से है।
‘‘वह रास्ता तो और भी भयंकर है। बेक बगान, मल्लिक बाजार, मौलाली, पता नहीं किस नुक्कड़ पर अटक जाएँ ! उसपर से आज के अखबार में पढ़ा, उस तरफ से कोई जुलूस भी आनेवाला है।
निवेदिता ने उनकी इस फिक्र को तरजीह नहीं दी।
उन्होंने हँसते-हँसते कहा, ‘‘बेटी-दामाद हनीमून पर जा रहे हैं, आप काफी टेंशन में लग रहे हैं।
‘‘मुझे क्या टेंशन होना है ? नवेंदु हँस पड़े, ‘‘टेंशन की असली जड़ तो उसकी माँ है। कल से ही वह सोच-सोचकर परेशान है। दोनों ही अभी बच्चे हैं, अकेले-अकेले घूमने जा रहे हैं...
‘‘दो लोग अकेले कहाँ होते हैं, समधीजी ?
‘‘फिर भी, उम्र तो कम है न !
इसे ही कहते हैं, मध्यवित्त का लाड़-दुलार ! दो जवान-जहान लड़के-लड़कियों का विवाह हुआ है, वे दोनों हनीमून मनाने जा रहे हैं, फिर भी उनकी फिक्र में माँ-बाप टाँगें कँपकँपाते सोच में डूबे रहें, भला क्यों ! ये बंगाली अभिभावक जाने क्यों तो अपने बच्चों को बडे होने देना नहीं चाहते। अपनी चौबीससाला बेटी को नन्हीं-मुन्नी समझने में भला क्या तृप्ति पाते हैं !
वैसे शरण्या के माँ-बाप निवेदिता को काफी पसंद आए थे। वे दोनों बड़े शिक्षित-शिष्ट और रुचिशील थे। उनमें विनय की भी कोई कमी नहीं और आचार-विचार में अनावश्यक कुंठा या जड़ता भी नहीं है। नवेंदु किसी बैंक में नौकरी करते थे। उनकी पत्नी महाश्वेता भी किसी सरकारी संस्था में अफसर थीं। वे खुद भी ऐसे ही किसी परिवार से वैवाहिक रिश्ता जोड़ना चाहती थीं। बस, अगर यह बेवजह की अतिशयता शरण्या के माँ-बाप में न होती।
निवेदिता ने अपनी आवाज में जरा व्यक्तित्व मिलाकर कहा, ‘‘ख्वाहमख्वाह परेशान न हों। वे दोनों ठीक-ठाक अपनी-अपनी देखभाल कर लेंगे।
‘‘आपका आशीर्वाद रहा तो जरूर कर लेंगे, दीदी !
‘‘समझ गई। निवेदिता हँस पड़ीं, ‘‘आप दोनों की क्या अभी भी छुट्टियाँ चल रही हैं ?
‘‘बुबली-अनिंद्य को आज ट्रेन में बिठा आएँ तो हमारी छुट्टियाँ खत्म ! सोमवार को हम दोनों ही अपना-अपना ऑफिस जॉइन करेंगे।
‘‘गुड, शरण्या को बुला दूँ ?
‘‘कहीं सामने ही है ?
‘‘वह चाय बना रही है- यह कहते-कहते निवेदिता ने अपने को सँभाल लिया।
‘‘रुकिए, बुला देती हूँ।
उन्हें रसोई तक नहीं जाना पड़ा, शरण्या हाथ में चाय की ट्रे समेत खुद ही हाजिर हो गई। उसे फोन पकड़ने को कहकर निवेदिता ने उसके हाथ से ट्रे थाम ली। ट्रे के साथ वे बेटे के कमरे में दाखिल हुईं।
ऊपर-ऊपर तक कपड़ों से भरे दो-दो सूटकेस पलंग पर मुँह बाए पड़े थे। एक सूटकेस की पॉकेट में अनिंद्य कुछ-कुछ भरे जा रहा था।
माँ के कदमों की आहट पाकर उसने पीछे मुड़कर देखा।
‘‘तुम्हारी चाय। निवेदिता ने कहा।
‘‘रख जाओ।
‘‘टिकट मिल गया ?
कोई जवाब नहीं मिला।
‘‘सावधानी से जाना।
‘‘हूँ !
‘‘समिति ऑफिस जाकर मैं तुम्हें गाड़ी भेज देती हूँ। और हाँ, तुम्हारे सास-ससुर शायद स्टेशन जा रहे हैं। सुरेन से कहना, उन लोगों को मानिकतला उतारकर सीधा हाजरा चला आए।
‘‘यह बात तुम खुद ही सुरेन से कह सकती हो।
बात आगे न बढ़ाकर निवेदिता अपनी चाय की प्याली उठाकर कमरे से बाहर निकल आईं।
शरण्या दत्तचित्त होकर फोन पर बातें किए जा रही थी। उनमें क्या बातें हो रही थीं, निवेदिता में जानने का कौतूहल नहीं जागा। वे कमरे के छोर पर रखी डाइनिंग मेज तक चली आईं। चाय खत्म करके निवेदिता सीढ़ियों की तरफ बढ़ गईं।
शरण्या फोन रखकर दौड़ी आई।
उसने टुप् से प्रणाम किया, ‘‘दार्जिलिंग पहुँचकर हम फोन कर देंगे, अम्मूजी !
‘‘मुश्किल न हो तो कर देना। भूल भी जाओ तो मैं माइंड नहीं करूँगी। निवेदिता ने मुसकराते हुए शरण्या का सिर छू लिया, ‘‘अच्छा, तो मैं चलती हूँ।
‘‘जी।
सीढ़ियों से नीचे उतरकर निवेदिता पल भर को ठिठक गईं। उनकी नजर तलघर के कमरे पर जा टिकी। परिचित दृश्य। नीची सीलिंग और किताबों से लदे कमरे के कोने में आर्य आरामकुरसी पर बैठे हुए। चेहरे के सामने हस्बेमामूल भारी-भरकम किताब बगल में कॉफी का फ्लास्क। नीलाचल ही कॉफी बनाकर रख गया था, ताकि पढ़ते हुए वे बीच-बीच में कॉफी के घूँट भरते रहें। वैसे कॉफी पीने की मीयाद सिर्फ शाम तक ही थी। उसके बाद आर्य को दूसरे किस्म के पेय की तलब होती है। दिन का उजाला बुझते ही आर्य किसी सॉफ्ट-पेय को हाथ भी नहीं लगाते।
निवेदिता ने आर्य को आवाज नहीं दी। आवाज देती ही किस दिन हैं। स्वयं कैदी उस गुफा मानव के दरवाजे पर भला किस दिन रुकती हैं ! आज तो खैर, फिर भी कुछेक पल थिर निगाहों से उस इनसान की तरफ देखती रहीं। ऊँहूँ वे किसी इनसान को नहीं, किसी तसवीर को देख रही थीं। पश्चिम की बुझी-बुझी उदास रोशनी, खिड़की की ग्रिल से होकर आर्य के तन-बदन पर जाली बनकर लिपट गई थी। आलोक-छाया मिले वे नक्शे ही निवेदिता को अपनी तरफ खींच रहे थे। चारों तरफ किताबें फैली हुईं। बुकसेल्फ, आरामकुरसी, मेज, स्टैंड-फैन, कागज, कलम, तारीख कलेंडर, पेपरवेट के बीच जालियों में लिपटा आर्य-सबकुछ मिलकर मिलाकर मानो कोई इंप्रेशनिस्ट पेंटिंग रच गई हो। कमरे के अंदर अद्भुत निश्चलता, बाहर हवा का शायद अता-पता नहीं था। रोशनी तक भी निष्कंप ! मानो कोई स्टिल...स्थिर जीवन हो। किताबों में डूबा हुआ आर्य भी मानो उस पथराए जीवन का हिस्सा मात्र हो। उस तस्वीर के बाहर आर्य का मानो कोई अस्तित्व न हो।
बहरहाल, उस तस्वीर को निवेदिता ने ज्यादा देर तक अपनी आँखों में नहीं रखा।
नीचे आकर उन्होंने देखा, सुरेन ने गैरज से गाड़ी निकालकर सामने खड़ी कर दी है और सड़क पर खड़े-खड़े उनका इंतजार कर रहा है। सुरेन सिगरेट के कश लगा रहा था। निवेदिता को देखते ही उसने सिगरेट फेंक दी और झटपट गाड़ी में आ बैठा।
‘‘गाड़ी में थोड़ा सा तेल लेना होगा, मासीजी।
पिछली सीट पर बैठकर निवेदिता ने गाड़ी का दरवाजा बंद किया।
उनकी भौंहें तन गईं, ‘‘अरे ! अभी परसों या तरसों ही न पाँच लीटर भरवाया था ?
‘‘उतने से तेल में पुराना अंबेसडर आखिर कितना चलेगी, मासीजी ? यह गाड़ी तो अब राक्षस की तरह तेल पी रही है।
‘‘लेकिन गाड़ी तो खास नहीं चली !
‘‘अरे वाह, बड़के भइया-भाभी अष्टमंगला करने नहीं गए ? मानिकतल्ला जाने में ही...
‘‘तेल अभी ही लगेगा ?
‘‘हाजरा पहुँचकर ले लें तो चलेगा। थोड़ा सा तेल रिजर्व में है।
‘‘तो फिर चलो।
पुराना मुहल्ला ! रास्ता-घाट खास चौड़े नहीं थे, कई-कई मोड़ ! सुरेन को जरा फर्राटे से गाड़ी चलाने की आदत थी, लेकिन इस वक्त उसने जरा भी रफ्तार नहीं पकड़ी। निवेदिता के यहाँ कुल साल भर पहले वह नौकरी पर लगा था, लेकिन इतने से दिनों में उसने निवेदिता का मिजाज-मरजी बखूबी समझ लिया था। उसकी अनुशासनप्रिय मालिकिन, जब गाड़ी में होती है, वह जरा भी लापरवाह नहीं होता।
निवेदिता सुरेन से छिटपुट बातें करती रहीं। तीस-बत्तीससाला सुरेन अपने बीवी-बच्चों के साथ यहीं करीब ही एक कस्बे में रहता था। आजकल उसका मकान-मालिक से झगड़ा चल रहा था। निवेदिता बड़े ध्यान से सुरेन की समस्या सुनती रहीं। यह उनका स्वभाव था। गरीब-असहाय लोगों की मुसीबत की कहानी उन्हें व्यथित करती थी।
सुरेन के डेढ़ वर्षीय बेटे का पेट का रोग अभी तक ठीक नहीं हुआ, यह सुनकर निवेदिता परेशान हो उठीं, ‘‘तुम कर क्या रहे हो किसी अच्छे डॉक्टर को क्यों नहीं दिखाते ?
‘‘दिखा तो रहा हूँ, मासीजी !
‘‘सुनो, तुम्हारी उस होमियोपैथी से कुछ नहीं होगा। अब एलोपैथी शुरू कर दो। ऐंटी-बायोटिक्स का एक कोर्स लेते ही देखना, वह ठीक हो जाएगा।
‘‘क्या बताया, आंटी बाटिक ....?
‘‘वह डॉक्टर को पता है। तुम्हारे कस्बे में कोई अच्छा डॉक्टर नहीं है ?
‘‘चेटर्जी डॉक्टर है न ! हेब्बी भीड़ होती है। एक सौ रुपैए फीस है।
निवेदिता फौरन समझ गईं, असली समस्या उसी फीस को लेकर है। वे सुरेन को बाईस सौ रुपए तनख्वाह देती हैं। इसके अलावा उसकी आमदनी का छोटा-मोटा जरिया और भी है। इतवार के दिन तो जरूर ही, अन्यान्य दिन भी, फुरसत पाते ही वह टैक्सी चलाता है। वैसे इन सबके बावजूद सौ रुपए उस जैसे के लिए ज्यादा ही हैं।
दो-एक सेकंड सोचकर उन्होंने कहा, ‘‘ठीक है ! समिति ऑफिस पहुँचकर तुम जरा मुझे याद दिला देना। मैं बबुआ के नाम एक चिट्ठी लिख दूँगी। बबुआ को पहचानते हो न ? ओ, वही...लंबू-सा, क्रिकेट खेलता है, मेरे पास कभी-कभार आता-जाता है। बबुआ एक दातव्य संस्था से जुड़ा हुआ है। वही...भवानीपुर में...नवमी के दिन मैं वहाँ गई थी। वहाँ चले जाओ। वहाँ बिना पैसा लिये तुम्हारे बेटे को...
‘‘मासीजी... अचानक सुरेन ने निवेदिता को बीच में ही रोक दिया, ‘‘वो देखिए, छोटू भइया...
निवेदिता ने बौखलाकर सामने की तरफ देखा। गड़ियाहाट मोड़ पार करके गाड़ी बालीगंज फाँड़ी के सिग्नल पर रुकी हुई थी। बाकी दोनों तरफ अंधाधुंध गाड़ियाँ दौड़ती हुईं। उन्हीं सबके बीच सुनंद पर नजर पड़ी। आती-जाती गाड़ी-सवारियों से लापरवाह वह अलस मिजाज में सड़क पार कर रहा था। एक मिनी बस लगभग उसकी गरदन पर ही चढ़ने वाली थी। निवेदिता की छाती धक कर उठी। ट्रैफिक सार्जेट ने उसे बुरी तरह डाँट दिया। उसकी भी परवाह न करते हुए सुनंद रास्ता पार कर गया और भीड़ में गायब हो गया।
 


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