तिन पहाड़ - कृष्णा सोबती Tin Pahad - Hindi book by - Krishna Sobti
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तिन पहाड़

कृष्णा सोबती

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :92
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3164
आईएसबीएन :81-267-0794-1

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दार्जलिंग के एक भीने यात्रा-वृत्तान्त का वर्णन

Tin Pahar

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘साँझ की उदास-उदास बाँहें अँधियारे से आ लिपटीं। मोहभरी अलसाई आँखें झुक-झुक कर आयीं और हरियाली के बिखरे आँचल में पत्थरों के पहाड़ उभर आये। चौंककर तपन से बाहर झाँका। परछाई का सा सूना स्टेशन, दूर जातीं रेल की पटरियाँ और सिर डाले पेड़ों के उदास साए। पीली पाटी पर काले अक्खर चमके ‘तिन पहाड़’ और झटका खा गाड़ी प्लेटफॉर्म पर आ रुकी।’

इन्हीं वाक्यों के साथ मनुष्य द्वारा चुनी गई और बुनी गई नियति की यह कथा खुलती है। जया, तपन, श्री एडना इसके अलग-अलग छोर हैं। झील के अलग-अलग किनारे जिस तरह उसके पानी से जुड़े रहते हैं, उसी तरह आकांक्षा के भाव में एक साथ बँधे। आकांक्षा सुख की, चाह की, प्रेम की।

दार्जलिंग के नीले निथरे आकाश, लाल छतों की थिगलियों, पहरुओं से खड़े राजबाड़ी के ऊँचे पेड़ों, चक्करदार, ‘सँकरी घुमावोंवाली चढ़ाइयों-उतराइयों,’ ‘हवाघर के बेंचों,’ और गहरे उदास अँधेरों के बीच घूमती यह कथा जिन्दगी के अँधेरों-उजालों के बारे में तो बताती ही है, एक भीने यात्रा-वृत्तांत का भी अहसास जगाती है। लेकिन एक उदास ‘नोट’ के साथ— ‘जिसकी साड़ी का टुकड़ा भर ही बच सका, वह इन सबकी क्या होती होगी...क्या होती होगी।’
 

तिन पहाड़

साँझ की उदास-उदास बाँहें अँधियारे से आ लिपटीं। मोहभरी अलसाई आँखें झुक-झुक आई और हरियाली के बिखरे आँचल में पत्थरों के पहाड़ उभर आए। चौंककर तपन ने बाहर झाँका। परछाई का-सा सूना स्टेशन, दूर जाती रेल की पटरियाँ और सिर डाले पेड़ों के काले उदास साए। पीली पाटी पर काले अक्खर चमके ‘तिन पहाड़’, और झटका खा गाड़ी प्लेटफार्म पर आ रुकी।
नीचे उतर पुरानी आँखों से चारों ओर देखा। वही ‘तिन पहाड़’, वही एक-दूसरे से लगी पहाड़ियाँ, वही बह-बह आती हवाएँ, हवाओं के भरे-पूरे पर। इंजिन की बेसाँस चीख ने फिर अपनी सीट की ओर लौटा दिया। खिड़की से आँखें बाहर गड़ाई तो रात का अंधियारा गाड़ी के साथ-साथ भागने लगा-आगे...आगे...और आगे।

    तपन...! तपन...! वह तन-मन को छू-छू जाती आवाज़, वह छलछलाता कंठ, वे भर-भर आती आँखें, तारों की पाते गाड़ी के साथ होड़ लेती रहीं। दूरी मापते गाड़ी के चक्के कोस-पर-कोस फलाँगते रहे और दूर अँधेरे में चमकती लौ का-सा एकाकी मुख बार-बार आँखों में झलक मारता रहा। पहचानने के पल...वे जानने के पल...
    गाड़ी सँकरी गलीघाट पर आ रुकी। खोए-खोए मन नीचे उतर सामान उठवाया और किनारे लगे स्टीमर के आगे पग बढ़ा दिए।
    डेक के कोलाहल से बेखबर रेलिंग पर झुक पानी के भँवर देखते-देखते मन न जाने कैसा हो आया। गहरे गहन जल में बँधे भाग्य-सा यह स्टीमर और एक संग पार उतरने की बाट जोहते अगणित अपरिचित मुसाफिर। गलबहियों-सी उमड़ती-छलछलाती लहरों-भरा गंगा का पाट ओझल होता गया और दूर किनारों के संग-संग तारों-टँके आकाश का पर्दा झिलमिलाता चला।

    वही दिशा, वही राह, वही अंधेरा चीरते स्टीमर की तेज़ रोशनी। पर मणिहारी घाट के प्लेटफार्म पर खड़ी छाया आज वह क्यों नहीं होगी। यहीं खड़े-खड़े उस रात बदली बरसी थी। इसी रेलिंग के सहारे सिहरते मन में बूँदें सरसी थीं। इसी पर झुके मन की व्यथा आज फिर उस रात को लौटा-लौटा कर लाती है। पर अब कौन लौट-लौट आएगा ? कौन राह चलते मिल जाएगा ? कौन आँखों के आगे बिछुड़ जाएगा ?
    दर्जिलिंग के नीले निथरे आकाश से बरसती दूधिया मीठी धूप। चाय की क्यारियों पर हँसती-थिरकती हवा। कब जाना था, फिर कभी मिलना नहीं होगा। उन प्रिय आँखों के आगे झुकना नहीं होगा।
    धूप की उमड़ती छाँह में आँखों की गहराइयाँ, माथे पर टिका कुछ कहता सा सुकुमार हाथ और ढीले बालों को चूम-चूमकर जाते हवाओं के हल्के आलिंगन। वे बरसते मेंह-सी लहरे-लहरों पर घिर-घिर आते फेन के बादल और तिस्ता के वक्ष पर बँधा लम्बा एकाकी पुल। रेलिंग पर झुके उस दिन वे दो आँखें निर्मोही पानी के वेग में क्या ढूँढ़ती होंगी, क्या खोजती होंगी ?

    गंगा के तीर सुनसान पड़ा मणिहारी घाट स्टीमर के किनारे लगते ही कोलाहल में डूब गया। ढेर-का-ढेर सामान कुलियों के कंधो पर लद गया और उतावली से लोग जैटी की ओर बढ़ चले।
    कुली के पीछे आते तपन के भारी कदम सहसा ठिठक गए। लैम्प की मद्धिम रोशनी में उभर आई काले कोट की रात पर उन्हीं दो आँखोंवाले मुखड़े का चांद चमक आया। लम्बी घनी पलकें, सँवरा-सँवरा रंग और माथे पर गहरी लाल टिकुली। बालों के उलझे जाल पर गंगा की भीगी हवा थिरकती है और हौले से कहती है—जया! जया!!
    चौंककर देखा, सामने कुछ नहीं था। बस, देखने को तो आँखें ही मन को भटकाती थीं।

    समान टिका कुली ने बिस्तर बिछाया और मजूरी से नीचे उतर गया। डिब्बे के सामने खड़े-खड़े घाट की ओर देखा। दूर पानी के अँधियारे पाट पर सँकरी गली का वह चावभरा स्टीमर बीत गए आतीत का-सा अकेला उदास दीखता था।
    इंजिन की चुनौती से चौंक ऊपर पैर रखा। चिटखनी चढ़ा देखा, गाड़ी के अपरिचित साथी बिछौने में सोने की तैयारी में थे। कपड़े बदल, बत्ती हल्की की और सिरहाने सिर डालते ही बँधा-बँधा मन छलछला आया। बीत जाने को जब सभी कुछ बीत जाता है तो क्यों दर्दीली स्मृतियाँ मन को बार-बार सिहराती हैं ? बार-बार तरसाती हैं ?
    यही गाड़ी उस दिन सिलुगड़ी खींच ले गई थी। यहीं किसी की व्यथा जान लेने की राह बनी थी। इसी में लेटे-लेटे उस रात पहली बार वह बिलखता स्वर सुना था।
    बिछौने में सिमटे-सिकुड़े पड़े थे कि किसी की सिसकारियों ने आ मन के द्वार पर थाप दी।

    मुख उघाड़ चौकन्ने हो देखा। सामने की सीट पर कोई रह-रहकर सिसकारियाँ भरता था। सिरहाने पर ढुका सिर विवशता से काँप-काँप जाता था और गाड़ी की खड़खड़ाहट में से बार-बार वही गीला स्वर इन कानों को छुए जाता था। ओढ़ना उतार जाने कैसी-सी घबराहट से उठ बैठे। कुछ पूछ लें, कुछ जान लें कि नीचे पड़े दो मखमली स्लीपरों ने आँखों को वापस लौटा दिया।
    फिर भोर बेला अचकचाकर जगे। खिड़की के उठे काँच से तीखी हवा बह-बह आती थी। आकाश में तारे गाड़ी के साथ-साथ कुलाचे भरते थे और दूर लालिमा में नहाई बर्फ़ीली चोटियाँ। एकाएक सब-का-सब ठिठक गया। खिड़की की चौखट पर झुका सिर बहुत छोटा, बहुत अकेला दीखता था। साँस रोके सोचते रहे—कौन मुख होगा ! कौन आँखें होंगी !
    कंगनोंवाली बाँहों ने पलटकर रजाई में सिर छिपा लिया तो मन-ही-मन सोचते रह गए—
    इस एक ही कम्पार्टमेन्ट में संग-संग सफर करते कौन कहाँ भटकता है, किन गीली विदाइयों के लिए आँखे भर-भर लाता है, यह कोई दूसरा तो नहीं जान पाता।

    खड़...खड़...खड़—गाड़ी विराने में दूरियाँ मापती रही और मुँदी आँखें छूट गई राहों पर भटकती रहीं।
    नींद खुली तो काँच में से पतली सुहाती धूप मुँह पर बिछी आती थी। पहाड़ों के चेहरे जाने-पहचाने दीखते थे। उतावली से ब्रश कर कपड़े पहने और आँखें खिड़की से बाहर गड़ा दीं।
    आखिर दौड़ लगा गाड़ी सिलुगड़ी पर आ रुकी। फिर भीड़ मची, कुली बढ़े और खिलौने-सी रेल की लगेज-वॉन से सामान उतर गया।

    प्लेटफार्म पर खड़े-खड़े तपन मन-ही-मन पुराने क्षण दोहराते रहे। पुराने पल लौटते रहे।
    धूप में नहाई यही सुबह की वेला थी। छाँह तले बिछा यही प्लेटफार्म था। साथ लगी नन्ही-सी रेल यही थी। इन्हीं पाँव दो डग भर तपन आगे बढ़े थे कि खिड़की में से रात वाली दो आँखोंवाला मुख झाँक गया। चाह हो आई पास जा कुछ कहें कि अपनी ही झिझक से अपने कम्पार्टमेंट की ओर लौट आए।
    दूर-दूर फैले चाय-बागान, ऊँचे गम्भीर चुप्पी के पेड़, उदास-उदास दुकानोंवाले पहाड़ी बाज़ार और गोरे चिट्टे छोटी आँखोंवाले भोटिया बच्चे—बड़ी चौखटों में जड़े सचमुच के-से चित्रों से दीखते थे।
    तन्दारिया पर नीचे उतर देखा। कुर्सी की टेकन से सिर लगाए वह आँखें मूँदे बैठी थी। गोद में एक-दूसरे से गुँथे हाथ जैसे अपने को ही दिलासा देते थे।

    लम्बी चढ़ाई चढ़ गाड़ी करसियोंग आ पहुँची। दूधिया गुम्बदों की छाँह-तले खुला चौड़ा रिफ्रेशमेंट-रूम और प्लेटफार्म को महकती खाने की गरम महक से बहुत-से जन एक संग छुरी-काँटों में जा उलझे। खाते-खाते दाईं ओर मुड़कर देखा तो प्लेट पर झुकी फिर वही गम्भीर मुद्रा दीख पड़ी।
    बाहर घंटी बजी। व्यस्त लोग अपने-अपने डिब्बों की ओर लौट चले। बिल चुका द्वार तक आए। जिज्ञासावश फिर मुड़कर देखा। काफी के प्याले को हाथ से घेर वह अब भी वैसे ही बैठी थीं।
    टन...टन...टन—घंटी फिर बजी। जल्दी में कुछ ठीक-ठाक निश्चय नहीं कर पाए। बाहर जाते-जाते पलटे और पास आ विस्मय से कहा—
        ‘‘गाड़ी चली जा रही है। आप क्या जाएँगी नहीं ?’’

    वह न चौंकीं, न आँखें ऊपर कीं। ठिठकी-सी दृष्टि जैसे क्षण भर अपने रूठे हाथों को मनाती रहीं। तब उठी और सिर झुकाए-झुकाए ही बाहर हो गईं।
    अम्बर से बादलों की पाँतें फैल-फैल धुँध बनने लगीं। पहाड़ों की चोटियाँ धुँध की ओट होने लगीं। नीचे के गहरे खड्ड धुँध के असीम आँचल में खो गए। ऊपर के पहाड़ झुक धुँधलकी बाँहों में सो गए।
    गाड़ी के पहिए बताशिया लूप से नीचे उतरने लगे। दूर-दूर फैले धुँध के फैलाव को मापती गाड़ी धरती पर नहीं मानो आकाश पर जा रुकेगी।
इंजिन अपने अन्तिम पड़ाव पर आ गया तो दार्जिलिंग का प्लेटफार्म बादलों की बनी संगमरमर की लम्बी बालकनी-सा दीख पड़ा।

    यात्रियों का समूह लगेज-वॉन के आगे आ जुटा। उड़ती नज़र से देखा, खम्भे के पास भारी कोट में लिपटी वह किसी गहरी सोच में खोई दिखती थी। खड़े-खड़े जाँचते रहे, कोई लिवाने आया हो, पर कुली के संग जब वह अकेली ही बाहर निकल चली तो चाहने पर भी कुछ पूछ नहीं पाए। कई क्षण दूर जाते रिक्शे को देखते रहे, फिर कुली को रुकने के लिए कह रिफ्रेशमेंटी रूम की सीढ़ियाँ चढ गए।
    ऊपर बैठे-बैठे चाय के प्याले  में पूरे दार्जिलिंग का चित्र उतार डाला। गाइड के पन्ने पलट मन-ही-मन कई नाम दोहराए—जलपहाड़, सिंगरापोंग, टाइगर हिल्स-चौरस्ता—कालिंगपोंग...
    शाम हुए होटल पहुंचे तो खूब पानी बरस रहा था। कमरे में आ चाय ली। थकान उतरी। रात को खाने के लिए ‘डाइनिंग-हॉल’ पहुँचे तो असंख्य अनजान चेहरों में वे वही राह वाला परिचित मुख पहचानकर ठिठक गए।

    प्यार की-सी मीठी अक्तूबर की धूप में कंचनजंगा की चोटियाँ निहाल हो-हो जाती थीं। खुली खिड़की में से हवाएँ रह-रह पर्दा हिलाती थीं और सिरहाने पर सिर डाले तपन सगेपन से पूतूल को याद कर लेते थे।
    कलकत्ता की भीड़भाड़ और कोलाहल से दूर इस कमरे के मधुर एकान्त में पूतूल की पा लेने की चाह सिमट कर बाँहों में घिर आई। गुड़िया-सी मोहक हँसी-पूतूल कब मिलेगी, कब इन आँखों के आगे जागेगी, कब इन बाँहों से आ लगेगी।
    पिछली सर्दियों में माँ से मिलने प्रयाग गए तो माँ कुरेद-कुरेद नौकर-चाकरों के ढंग-जुगत पूछती रही। फिर भाँपकर कि बेटा कुछ और कहलवाना चाहता है, हँसकर बोली—
    ‘‘तनिक अपनी गुड्डी को सँभल जाने दो, तपू ! डेढ़-दो साल में तुम्हारी गृहस्थी जुटा दूँगी।’’

    मन हुआ, माँ से कहें, पूतूल को मैं सँभाल लूँगा पर जान कर कि माँ आँखों का संकोच ही नहीं मन की झुँझलाहट भी पढ़ लेती हैं, भरसक नाराज़ हो कहा—
    ‘‘डेढ-दो साल कहती हो, माँ, मैं पूरे पाँच साल ब्याह नहीं करूँगा।’’
    ‘‘बस...बस...तपू, इतनी नाराज़ी...’’
    और माँ लाड़ से हँस देती।  
    होस्टल के द्वार पर साड़ी का छोर सहेजती पूतूल की इकहरी छवि दिख गई। तपन से विदा ले अन्दर जाते-जाते मुड़ी और आँखों में स्नेह भर बोली—
    ‘‘अगले शनिश्चर आएँगे न ?’’

    सिर हिला मीठे आग्रह को झेलते तपन यही देखते रह गए-पूतू कितनी बड़ी हो गई...कितनी बड़ी हो गई।
    पाँव ज्यों-ज्यों होस्टल से दूर होने लगे, प्यार में उलझा मन उड़-उड़ पूतूल के पास लौटने लगा। अगला शनिश्चर तो छः दिन बाद होगा।
एक..दो..तीन-सहसा कल्पना का ताल थिरक गया। चाय आने की आहट सुन कर चौंककर उठ बैठे। हाथ बढ़ा चाय का प्याला थामा तो खिड़की में से चाँदी के शिखर देखते-देखते मन का समूचा आँगन मुखर हो आया।
    ब्याह कर पूतूल को यहीं लिवा लाएँगे। यहीं लेटे-लेटे एक दूसरे में डूबी चार आँखें मुस्कराएँगी। इसी खिड़की से झाँकती हिमालय की चोटियाँ हर सुबह टेर-टेर बुलाएँगी है।
    नहा-धो तैयार हुए। खुले मन नाशता ले बाहर निकले तो सामने कंचनजंगा की छोटी बड़ी बहनेलियाँ सिरों पर रूपे के चौंक-फूल पहने हँस-हँस इतराती थीं। आस-पास फैली दार्जिलिंग की बस्तियाँ हरियाले आँचल पर बिखरी लाल-पीली बिन्दिकियों सी लगती थीं।

    चढ़ाई उतर चौरस्ते पर पहुँचे। रंग-बिरंगी जर्सियों और फ्रॉकों में लिपटे नन्हे बच्चे हवा में झूमते-झामते फूलों से दीख पड़े। जंगल से लगे देर तक उन्हें निहारते रहे। हरे फ्रॉक पर पीला रिबन बाँधे कोई नन्ही सी बच्ची छोटे-छोटे पाँव चल बेंच तक जाती थी और लौट चाव भरी माँ की बाँहों से लिपट जाती थी।
    सोचते रहे, यह कैसा मीठा जादू है ! बाँहों से बाँहे मिलती हैं और बाँहे खिलती हैं इन सलोने हाथ पाँववाले फूलों को सहलाती चली जाती हैं।
    खाने के लिए लौटे तो मीलों चलने पर भी थके नहीं थे। दोपहर की निथरी धूप आगे-पीछे ऊपर तले बिछी चली आती थी, और तेज़-ते़ज़ चलने को उकसाती थी।

    किसी मीठे गीत के बोल गुनगुनाते अपने कमरे की ओर बढ़े। कोट उतार जर्सी पहनी, बालों में कंघी छुआई और हल्के मन बाहर निकल आए। बरामदे से हो डाइनिंग-हॉल की ओर मुड़े कि हाथ में कोट लिए वह उसी रूठी चाल से उनके सामने से निकल गईं। कुछ क्षण दूर होता साड़ी का मोतिया आँचल निहारते रहे, फिर अनमने मन लंच ले कमरे में लौट आए।
    खुली खिड़की से बाहर झाँका। होटल की अनक्सी गुड़िया के सचमुच के-से घर-सी भर-भर धूप में चमकती थी। छाँह किए धूप की रंगीन छतरियाँ रंग-बिरंगी पँखुरियोंवाले कमलों-सी दीखती थीं और छोटी-छोटी फूलों की क्यारियाँ गुड़िया के पटोलों सी इधर उधर बिखर पड़ी थीं।

    मन बाहर के लिए फिर मचल आया। चंचल पाँव राह के कंकर उछालते ओबजर्वेटरी हिल्स की ओर बढ़ गए। दूर सामने पहाड़ की चोटी पर मन्दिर की श्वेत पताकाएँ पहाड़ों के हरियाले सागर में तैरती पालवाली नौकाओं-सी लगती हैं और धूप सनी हवाएँ रह-रह निमन्त्रण देती हैं—आओ...आओ...!
हवाघर के पास पहुँच ठिठक गए। बेंच पर सिमटा मोतिया आँचल और रुलाई में रह-रह उठता सिसकियों का स्वर।
कई क्षण असमंजस में खड़े-खड़े देखते रहे, फिर पास आ नीचे लटकता शॉल उठाया और काँपते अनुरोध से कहा, ‘‘उठिए...’’
वह बैठी-बैठी रोती रहीं।
आदर से बाँह छू सहारा दिया और पुचकार के-से स्वर में समझाया—
‘‘इस राह तो बहुत जन आते-जाते हैं...’’
और सयानों की तरह कंधे पर हाथ दिए-दिए बाहर लिवा ले आए।



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