आदिवासी कथा - महाश्वेता देवी Aadivasi Katha - Hindi book by - Mahasweta Devi
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आदिवासी कथा

महाश्वेता देवी

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :335
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3038
आईएसबीएन :81-8143-128-6

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महाश्वेता देवी का एक और सामाजिक उपन्यास...

Aadivasi Katha

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

पिछले चालीस सालों में किसी सरकारी आदमी ने शायद भी जहाँ कदम नहीं रखा, वहाँ ये आदम लोग, भला कैसे जिंदा थे रोशनी के नाम पर किरासिन तेल की ढिबरी या लालटेन, अटाई गाँव के सारे टोले-मोहल्ले मिला दिये जाएँ, बूढ़े-बूढ़ी, अधेड़ और जवान औरत-मर्द, बाल बच्चे, शिशु समेत कुल मिलाकर तीन सौ के लगभग बाशिंदे, गाय एक भी नहीं। बकरी सौ के करीब, मुर्गी, बस, गिनती पूरी करने की। पूरे गाँव में सिर्फ तीन लोगों के पास टार्चलाइट कुल्लमकुल एक आदमी के घर में प्लास्टिक का हाथ का पंखा। ले-देकर चार अदद पतलून धारी नौजवान।

भारतवर्ष

अटाई गाँव तक पहुँचने के लिए पथरीली सड़क छोड़कर, बाईं तरफ, जहाँ से चढ़ाई शुरु होती है, वहाँ प्रागैतिहासिक भारी-भरकम चट्टानें, जंगली झोंप-झाड़ और हरिया घास की झाड़ियों के बीच, अँटी-धँसी पगडंडी ! पगडंडी, मोच खाकर ढाई बार मुड़ी हुई !!
यदि आसमान से कोई नीचे की तस्वीर ले, तो अगगिनत अजीबोगरीब चीज़ें उस तस्वीर में आएँगी; समूचे पलामू ज़िला में शायद यही एक जगह है, जिसका असली चेहरा, आज भी कहीं से नहीं बदला है। यह जगह आज भी अपने आदिम रूप में विद्यमान है।
आदिम रूप ! रुक्षता या शून्यता का नहीं, अपार सौंदर्य का आदिम रूप !!
अटाई नदी की तिरतिर धार, अबाध रूप से बहती हुई ! एक पहाड़ी चट्टान तक आते-आते बल खाकर मुड़ गई है और एक विशाल, लंबी-चौड़ी झील में संचित हो गई है। संभवतः प्रागैतिहासिक काल में रची गई, यह कोई खाई थी, जब धरती टूट-टूटकर पाताल में घँस गई होगी और पाताल फोड़कर पहाड़ ऊपर उठ आया होगा, बस, उसी काल में इस जगह ने खाई का रूप ले लिया होगा।

सैकड़ों वर्षों से अटाई नदी का पानी यहाँ जमा होता रहा होगा और अब विशाल झील का रूप ले चुका है। पलामू की मिट्टी रूखी और अन-ऊपजाऊ है। चारों तरफ बस कंकरीला प्रांतः....चटियल पहाड़...दूर तक फैले अरण्य के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं था।
उस जगह ऐसी भरी-भरी, शांत झील। जिस पर अनंत आकाश की नीलाभ छाया, निरंतर तैरती हुई। इस झील की गहराई तक नापना मुश्किल। क्योंकि वहाँ अटाई नदी का बरसाती पानी जमा होने के बावजूद झील का किनारा कभी बाँध तोड़कर नहीं उमड़ता। है न आश्चर्यजनक बात ?
झील के पूर्वी किनारे पर बसा अटाई गाँव भी बेहद अजीबोग़रीब ! काँटेदार जंगली पौधे !! हरिया घास की झाड-झंखाड़ और ‘फनीमनसा’ के सर्पिल, काँटेदार छोटे-बड़े पेड़ ! कंकरीली मिट्टी ! थोड़े-थोड़े फासले पर ‘खरवार’, ‘मुंडा’ और ‘ओराँव’ आदिवासियों के टोले ! ‘मुंडा’ जाति तो यहाँ सबसे बाद में आई ? ‘खरवार’ यहाँ के मूल आदिवासी हैं। गाँव के प्रवेश-पथ पर खड़े पेड़ के तने पर कील से जड़ा हुआ टिन का पत्तर ! पत्तर पर तारकोल से लिखा हुआ है-तहसील अटाई, ब्लॉक, रामांदा।

अटाई झील के पूर्वी तट पर किसी ने घर नहीं बनाया। सरकार के तहत वन-विभाग दफ़्तर भी इस अटाई गाँव को भूल गया। यह भी एक अलौकिक घटना है कि इतना अथाह पानी और एक अदद जनपद में बसे मुट्ठी भर लोगों के अस्तित्व को किसी ने भी याद नहीं रखा।
बस, इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं। यहाँ वर्तमान बीसवीं सदी का कहीं, कोई नामोनिशान तक नहीं था। सड़क, कुआँ, प्राइमरी स्कूल, दुकान-पाट, कहीं, कुछ भी नहीं।
इसका मुख्य कारण यह था कि ऐसी पथरीली ज़मीन में किसी भी भूस्वामी की कतई कोई दिलचस्पी नहीं थी। झील ऐसी जगह बहती थी कि वहाँ से पानी लाकर खेती करने का ख़याल अटाईवासियों को भी कभी नहीं आया। यों खेती करने का उन्हें शऊर भी नहीं था। पूरे अटाई गाँव में एकमात्र रघुबर ही लिखा-पढ़ा आदमी था। एक वही आदमी कभी-कभार अटाई गाँव और बीसवीं सदी को आपस में करीब लाने की छिटपुट कोशिश करता रहता था। उसने ‘रामांदा स्वास्थ्य केंद्र’ के डॉक्टर नवीन परसाद से अनुरोध किया, ‘‘ए हो, डांग्दर’ साब, खिंचाई मशीन से सिंचाई नाहीं हो सकती ?’’
‘‘लिफट इरीगेशन ? हाँ, हो तो सकती है।’’
बस, रघुबर अपने साथियों को लेकर ब्लॉक तक जा पहुँचा।

लेकिन दौरे पर आकर झील का नीला पानी, उस पर पड़ती हुई पहाड़ की छाया, चलती-फिरती चट्टान की तरह कुछेक आदिम लोग और पथरीली ज़मीन देखकर अफसर लोगों ने मन-ही-मन हताशा महसूस की। प्रकृति का यह आदिम रूप देखकर उन लोगों ने तत्काल नाउम्मीदी जतायी। यहाँ का पानी, पहाड़, सुदूर पश्चिमी तट पर कुलाँचे भरता, कुल एक अदद हिरण, जो इंसानों को देखकर भी भागने का नाम नहीं लेता-मानो ये सब उपेक्षित भाव से चेतावनी दे रहे हों-चलो, चलो, हटो। आगे बढ़ जाओ ! कौन हो तुम लोग ? तुम, बाहरी लोग, हमारे इलाके में कैसे चले आए ?
ज़मीन की हालत देखकर अफसर लोगों का अफसरशाही विश्वास, मानो लौट आया।
उन्होंने सिर हिलाते हुए कहा, ‘‘इस मिट्टी की अगर सिंचाई की भी जाए, तो फ़ी एकड़ पीछे, तीन मन से ज्यादा फसल नहीं होगी। इसलिए ऐसी ऊबड़-खाबड़ जगह की सिंचाई में लिफ्ट-पंप और पंप-चालक का खर्च भी नहीं उठेगा।’’
किसी जमाने में यहाँ खरवार शासन की प्राचीन महिमा, दर्जा छह तक पढ़े हुए रघुबर के सीने में आज भी सोई पड़ी थी।
उसने मन-ही-मन दो-दूनी चार का हिसाब करते हुए अपने अंदर जो थोड़ा-बहुत साहस था, जुटाकर कहा, ‘‘लेकिन, साब ई तो आदिवासी इलाका है और आदिवासी लोगों के लिए कोई-न-कोई सरकारी इंतिजाम भी तो है।’’
अफसरान सिर हिलाते रहे। सरकारी कार्यों की भाषा रघुबर को समझाना असंभव था।
‘‘भई, यह इलाका वन-विभाग का है।’’
‘‘लेकिन, यहाँ रहने-सहने वाले तो आदिवासी हैं ?’’

‘‘बात यह है कि कहीं भी आदिवासियों के बस जाने भर से, कोई इलाका आदिवासी इलाका नहीं हो जाता।’’
इस तर्क के आगे रघुबर हार गया। खिंचाई-सिंचन का इंतज़ाम वह नहीं कर पाया।
रघुबर ने और भी कई-कई तरह की कोशिशें कीं। उसने काफी हाथ-पाँव मारे, ताकि उसके गाँव में एक स्कूल खुल जाए, सड़क बन जाए।
नवीन डॉक्टर उनका मुख्य सलाहकार था।
लेकिन कहीं, कुछ नहीं हुआ। अटाई गाँव की बदहाली ज्यों की त्यों बनी रही। नदी तक, वही ढाई बांक; सड़क के वही ढाई मोड़ ! गाँव में प्रवेश-पथ पर एक अदद जीर्ण-शीर्ण, बूढ़ा, गाँठ-गाँठ पलाश का पेड़ ! पेड़ की शाखों में रंगीन धागे बँधे हुए ! हाँ, पूजा-पाठ के अवसर भी, आज भी वह पेड़ ग्राम-देवता है। करौंदे की डाल लाने के लिए वे लोग पगडंडी की दाहिनी ओर रामांदा के जंगल में चले जाते। अटाई की प्रकृति ने झील के पूर्वी तट के बाशिन्दों को महुआ का एकाध पेड़ तक नहीं दिया।

नवीन परसाद पगडंडी की चढ़ाई पर अपनी साइकिल धकेलते हुए ऊपर आ रहा था। रघुबर ने ‘रामांदा स्वास्थ्य केंद्र’ के पते पर जो चिट्ठी भेजी थी, वह उसे शाम को मिली। वह इन दिनों तीन महीनों की छुट्टी मंजूर कराने के लिए, डाल्टेनगंज तक दौड़-धूप में लगा हुआ था। कल भी वह टाउन की तरफ गया हुआ था। इसलिए एकाध फ़िल्म देखना और छिटपुट सामानों को खरीदना, हमेशा की तरह आम बात थी। नवीन डॉक्टर जो रमांदा में पड़ा हुआ है, वह तो उसकी सजा थी। ‘पनिशमेंट पोस्टिंग’...यानी दंडस्वरूप पोस्टिंग ! जब वह गड़वा में था, तो मेहतरों के क्वार्टर में पखाना क्यों नहीं है, इस बात को लेकर वह विभागीय दफ़्तर से लड़ बैठा। नतीजे में यह सज़ा ! वन-जंगल का यह इलाका ! गरीब-गुरबा लोग ! आबादी कम ! शाम होते ही वहाँ असहनीय सन्नाटा छा जाता था। ट्रांजिस्टर और कैसेट ही एकमात्र साथी थे।
रघुबर का लिखा हुआ ख़त ! ‘अजीब’ चूरन की खूबियाँ ज्ञापित करते हुए हैंडबिल की उल्टी तरफ लिखा हुआ ख़त ! हाँ, रघुबर ने अपनी ओर से पूरी कोशिश की कि उसका चूरन चल निकले। लेकिन वह हार गया। उसने बिना सिंचाई वाली खेती-बाड़ी शुरू की, मगर यहाँ की माटी में वह मूँगफली तक नहीं उगा पाया नवीन डॉक्टर को यहाँ की तमाम जरूरी ख़बरें वह हैंडबिलों पर ही लिख भेजता था। चिट्ठी की भाषा काफी गड़बड़ थी। नवीन के अलावा उसका ख़त शायद ही किसी की समझ में आता हो।
रघुबर अपना ख़त बँधे-बँधाये तरीक़े से शुरू करता और हटिया में सस्ते दाम ख़रीदे हुए डॉट पेन से बेहद महीन-महीन अक्षरों में लिखना, उसकी हमेशा की आदत थी। किसी शब्द पर वह मात्रा भी नहीं लगाता था और तारीख, रोमन अक्षरों में लिखता था, जिससे यह जानकारी दे सके कि उसने अंग्रेजी भी पढ़ी थी।

‘...सौ, सौ, परनाम, डांग्दर बाबू ! आसा है, आप परिवार समेत कुशल-मंगल होंगे (नवीन की बीवी-बेटा गौतमधारा में रहते थे, रघुवर जानता था)। भगवान आपका मंगल करें। (यद्यपि, रघुबर और नवीन का भगवान-बोध कहीं से भी एक नहीं था)। इस बार आप रघुबर खरवार को नहीं बचा सकेंगे। बूढ़े जिउबाबा ने रघुबर का फूल नाहीं सवीकार किया। मरने से पहिले अगर आपका दरसन हो जाता, तो हम चैन से मरते। रघुबर नाहीं रहा, तो का हुआ, डांग्दर, अटाई मउजा को याद रखिएगा।’
यह बात रघुबर को भी मालूम थी कि नवीन डॉक्टर, अटाई मउजा छोड़कर, चैनपुर गढ़वा, मंडार, चाइ, टोड़ी-कहीं भी जाने को तैयार था। ख़ासकर अटाई ताल देखते-देखते उसके पैरों का ख़ून सिर तक चढ़ जाता था। ऐसा भरा-भरा ताल ! इतना-इतना पानी ! यही तो घनघोर अचरज की बात थी। मानो वहाँ कहीं किसी देवी का वास हो।
शुकरा कारकेटा ! बूढ़ा बुजुर्ग मुंडा ! वह कहा करता है, ‘‘सृष्टि के आदिकाल में स्त्रष्टा (देवता) ने जब देखा कि इस धराधाम ‘पिरथिमी’ पर पापों का घड़ा भर गया है, तो विन्होंने ‘संगल दा’ यानी ‘आग की बरखा’ कर डाली। सब कुछ जलकर खाक़ हुइ गवा। उसके बाद, वही देवता पानी ढालकर धरती को सराबोर कर दिहिन। अपने ई अटाई ताला में आदिम बरखा का पानी सँजोया भया है....’’

रघुबर खरवार ने उसकी हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा, ‘‘इस झील के पानी के अतल में खरवार के जंगी, महापराक्रमी, शूर-वीर रहत हैं। उनके घोड़ों की हिनहिनाहट, तलवारों की झनझनाहट, आज भी सुनाई देत है।’’
बहरहाल, इन किस्से-कहानियों पर नवीन डॉक्टर यक़ीन नहीं करता था। अपनी साइकिल चट्टान से टिकाकर उसने अपने जूते उतारे और हाथ-पाँव-मुँह धोकर झील की तरफ एकदम निगाहें गड़ा दीं। प्राकृतिक झील ! झील को निहारता हुआ स्वास्थ्य केंद्र का एक अदद डॉक्टर !!
यह डॉक्टर अपेक्षा से अधिक खरा और अपने कार्य के प्रति निष्ठावान था। इसलिए विभागीय दफ़्तर उसे बेतरह रगड़ रहा है। डॉक्टर बेचारा दौ़ड़-धूप करके यह साबित करने में लगा हुआ था कि वह पूरी तरह आज्ञाकारी गुलाम है। चाहे जैसे भी हो, अब वह रिहाई चाहता था। इस प्रकृति, पानी, निस्तब्धता, झुके हुए, चिंतामग्न पहाड़ और वहाँ बसे हुए तमाम लोगों के साहचर्य से मुक्ति पाने के लिए वह छटपटा उठा था, जिनका ख़्याल था कि अटाई ताल, दुनिया का पहला ऐसा ताल है, जो बारिश के पानी में रचा गया है, जो लोग कान लगाकर इस गहरे नीले जल के अतल में योद्धा सैनिकों की तलवारों की झनझनाहट सुना करते थे। वे सब आदिम लोग हैं। आदिवासी ! डॉक्टर वर्तमान सदी का इंसान ! किसी जमाने में डॉक्टर को कविताएँ पढ़ने का शौक था। उन कविताओं में प्रकृति और इंसान की परस्पर निर्भीकता का जिक्र हुआ करता था। टेनिसन की ‘दी ब्रुक’ कविता पढ़कर उसने भी झरने पर एक कविता लिखी थी-‘पर्वत की गोद से...’। लेकिन इस समय, दिन के तीसरे पहर झील की ओर टकटकी लगाये उसे अचानक अहसास हुआ कि प्रकृति और इंसान में कहीं, कोई विनिमय नहीं होता। प्यास से बदहाल पलामू में इतना-इतना पानी ! उस पानी से सिंचाई होती है या नहीं, अटाई ताल भला यह क्यों सोचे ? ताल तो जड़ होता है, वर्ना इतने सालों में भी उसके मन की बात इंसान नहीं समझ पाया ? प्रकृति और इंसान के बीच कोई आपसी संवाद नहीं होता। नवीन और रघुबर में भी कोई आपसी संलाप नहीं था। रघुबर मध्य युग से बीसवीं सदी में शामिल होने की राह ढूँढ़ रहा था, लेकिन उसे कोई छोर नहीं मिल रहा था। कैसी भयानक गुत्थी थी !
नवीन ने लंबी उसाँस भरी और रघुबर की झोंपड़ी की ओर चल पड़ा। रघुबर अब नहीं बचेगा। लेकिन क्यों नहीं बचेगा ? वह कहाँ जा रहा है ? सब कुछ के बावजूद नवीन को रघुबर में जीने की तीखी चाह लगातार नज़र आई है।

उस शख़्स के दिल में-‘मुझे जीना है। मैं जीना चाहता हूँ। मुझे बचा लें....’
यह जिद घर कर गई थी, तभी तो वह उसे बार-बार बचा सका।
‘‘चलो, मान लिया कि तुम्हें साँप ने डँस लिया है, लेकिन मैं हूँ न ! मैं करूँगा न तुम्हारा इलाज ! तुम बस, डरना मत।’’
‘‘अच्छा, तो लगाएँ, डांग्दर बाबू, लगाएँ सूआ !’’
‘‘देखो, सो मत जाना-’’
‘‘ओ किसना, डाक बाबू कहत हैं, तोरा बाप बच जावेगा। सुन, अगर हमका नींद आवे लगे, तो मेरी आँखी में नून-मिरचा रगड़ देना, समझा ?’’
उसे गेहुँअन साँप ने डँस लिया, वह नहीं मरा ! उसने ढेरों ज़हरीली ताड़ी पी ली, वह नहीं मरा !! उसके पैर पर कुल्हाड़ी गिर पड़ी, वह नहीं मरा !!! हर बार वह खटोले पर सवार होकर ‘रामांदा स्वास्थ्य केंद्र में आ धमकता। अस्पताल में पड़ा रहता और ठीक होकर वापस लौट जाता।
‘‘मुझे जीना है ! मुझे बचा लो ?-’ हर बार उसकी यही जिद, यही गुहार ! उम्र ? इसका कोई लेखा-जोखा नहीं था। खाता क्या था ? मड़वा के उबले हुए बीज ! नमक ! मिर्च ! परिचित लता-पत्ते और कंद-मूल ! खरगोश, शाही या चिड़िया मिल गई तो उनका गोश्त ! अगर कहीं भोज वगैरह का आयोजन हुआ, तो भात !
पानी ? पानी कहाँ का पीता है ? अटाई नदी के झील से पहले, यहाँ एक अदद आधे-अधूरे खुदे हुए, अधबने प्रकृत कुएँ में थोड़ा-बहुत पानी बच रहा था। अन्य लोगों की तरह वह भी उस कुएँ का बचा-खुचा पानी पीता था।

जाने कैसे तो ज़िंदा था, रघुबर ! जाने कैसे तो जीते थे, ये तमाम लोग ! डाल्टेनगंज से अटाई, कुल चार घंटों में पहुँचा जा सकता है, लेकिन बाईं तरफ मुड़ते ही, कहीं कुछ नहीं ! पिछले चालीस सालों में किसी सरकारी आदमी ने शायद दस बार भी जहाँ क़दम नहीं रखा, वहाँ ये आदिम लोग, भला ज़िंदा कैसे थे ?
रोशनी के नाम पर किरासिन तेल की ढिबरी या लालटेन ! अटाई गाँव के अगर सारे टोले-मोहल्ले मिला दिए जाएँ, बूढ़े-बूढ़ी, अधेड़ और जवान औरत-मर्द, बाल-बच्चे, शिशु समेत कुल मिलाकर तीन सौ के लगभग बाशिंदे, गाय एक भी नहीं। बकरी सौ के क़रीब ! मुर्गी, बस, गिनती की ! पूरे गाँव में सिर्फ तीन लोगों के पास टॉर्चलाइट ! कुल्लमकुल एक आदमी के घर में प्लास्टिक का हाथ-पंखा ! ले-देकर चार अदद पतलूनधारी नौजवान !
दरअसल हाट में जो चीजें निशाना लगाकर गुब्बारे फोड़ने या जुड़वाँ चकरी घुमाने या नीलामी में अविश्वसनीय सस्ते दामों में सुलभ होतीं, वही चीजें अटाई गाँव का मुँह देख पाती थीं। अधेड़ से लेकर जवान मर्द-औरत-बच्चे ‘रामांदा ब्लॉक’ या जंगल की तरफ जाते थे। शेष आदिवासी कंकड़-पत्थर चुनते, मुर्गी-बकरी पालते। उनका दिन सूर्योदय से पहले शुरू होकर सूर्यास्त के बाद ही ख़त्म होता।
ऐसा विस्मृत और उपेक्षित गाँव अटाई ! जहाँ चोर, डाकू या नसबंदी टीम भी कभी रुख नहीं करती थी। ‘रामांदा स्कूल’ में कुल तीन अदद छात्र और बच्चों ने कभी भूले से भी वहाँ क़दम नहीं रखा। रघुबर खरवार तो अटाई गाँव और बीसवीं सदी को आपस में जोड़ने के लिए एक सड़क भी तैयार करना चाहता था।

रघुबर का डेरा आ गया था।
वहाँ किसी को न देखकर, नवीन ने आवाज़ लगाई, ‘‘ए हो, रघुबर, कहाँ हो, भई ?’’
‘‘आय गए, डांग्दर साब ! आय गए !’’ रघुबर ने ही उसकी अगवानी की। लेकिन अपने डेरे में नहीं, आसमान के बदन पर अंकित, बूढ़ा, बाउल फकीर-सा रघुबर, महुआ के बाँझ पेड़ तले, पत्थर के टुकड़े पर बैठा था।
‘‘यह क्या ? लोटा, चटाई, लाठी, थाली....? तुम क्या संन्यासी हो गए हो ?’’
‘‘बइठो, डांग्दर साब, जाओ बइठो ! मगर ज़रा दूर...उस पत्थर पर ! अरी ओ किसना की माँ, डांग्दर बाबू आय गए। पानी लै आ और तनिक मड़वा, सत्तू-गुड़ भी...’’
नवीन बेतरह घबड़ा गया, ‘‘क्यों ? घरवालों से झगड़ा कर लिया है ?’’
‘‘अरे, डाक बाबू, जब पुरनिया जिउबाबा रघुबर का फूल सवीकार नाही किहेन, तब हम झगड़े की दुहाई काहे दें ? तुम बस, ई समझ लो, डांग्दर साहब, कि किसना की माय, ई छोटकी है। बड़की के जीते जी ही हम एका बियाह लाये और हम तीनों मिलकर, लड़ाई-झगड़ा करत रहे। बड़की जब मर गई, तब भी हम दूनों में रार-तकरार होता रहा। लेकिन अब तो मरण-सेज पर हैं। डांग्दर बाबू हम मरने जाय रहे हैं। ऐसे बखत में भला कोई झगड़ा करत है ?’’

‘‘मरने जा रहे हो, मतलब ?’’
‘‘पहिले तुम नास्ता-पानी कर लो।’’
किसना की माँ, भावहीन मुद्रा में नवीन के लिए सतुआ, गुड़ और पानी ले आई।
उसने भी कहा, ‘‘खाओ डांग्दर बाबू, तुमरी बहुत-बहुत मेहरबानी कि तुम आय गए।’’
‘‘बात क्या है ?’’ नवीन ने फिर अपना सवाल दोहराया।
‘‘किसना का बप्पा जाय रहा है।’’ जवाब छोटकी ने दिया।
‘‘क्यों ?’’
‘‘मरने जाय रहा है।’’
‘‘लेकिन, क्यों ?’’
‘‘बस, जा रहा है मरने।’’
‘‘भई, इसका मतलब क्या है ? क्यों मरने जा रहा है ?’’
‘‘पहिले एक ठो सिगरेट फेंको, डांग्दर !’’ सिगरेट सुलगाकर रघुबर ने माचिस पेड़ के खोखर में रख दी, ‘‘अब, ई माचिस कोई नाहीं छुएगा।’’
‘‘यह अचानक....तुम अछूत कैसे हो गए ?’’
बुद्धिमान रघुबर के होठों पर उदास हँसी बिखर गई, ‘‘डांग्दर बाबू, ‘अचानक’ भला कुछ होत है ? अटाई ताल भी अचानक नहीं भया। ई महुआ का पेड़ भी तभी खड़ा हुआ, जब एक बीज परा। स्वास्थ्य केंद्र बना, तभी न आए तुम ! तुम ही कहो, दुनिया में कहीं कुछ अचानक होत है भला ? बड़की की टाँग टूट गई। मेहनत-मजूरी से लाचार हो गई। लाठी लेकर चलती थी। इसी वास्ते तो हम छोटकी को बियाह लाये। बहुत पुरानी बात है। तब ई महुआ पेड़ में फूल खिलत रहे, फल गदराते रहे अउर भालू भी आवत रहे।’’
किसन की माँ की निगाहें, कहीं और तरफ टिकी हुई थीं, ‘‘हाँऽऽ, एक बकरी लंगड़ हो गई, तो नयी बकरी लै आई....’’
‘‘छिः छिः...किसना की माँ, तू हमरे...’’
‘‘जाय रहे हो, तो बकरी, घर-दुआर-ई सबका इंतिजाम तो कर दिया। एक
हमका ही...बहाय दिया...’’
रघुबर ने झिड़क दिया, ‘‘अरे अभी तू हमरे संग का जा सकत हो ? यह भी कोई बात भई ?’’
‘‘संग लै चलो, हम तैयार हैं।’’

शुकरा केरकेटा, विछन मुंडा, तिलक, कुजरू, बड़ा तिरके, गोविन खरवार....धीरे-धीरे सभी लोग आ जुटे। रघुबर से काफी फासला रखते हुए, वे लोग गोल घेरा बनाकर बैठ गए। मामला गम्भीर है, अन्यथा गाँव के बड़े-बूढ़े इस वक्त नहीं आते। जब तक सूरज का उजाला रहता है, वे लोग जंगल में चुनते-बीनते रहते हैं या हरिया घास भी यहाँ के इंसानों के बारे में उदासीन अपने धर्म के मुताबिक बनैली और हिंस्र ! ऐसी पथरीली चट्टानों की दरारों में इसी क़िस्म की घास उगती है, जो कास झोंप-झाड़ियों जैसी ऊँची-ऊँची और लंबी-लंबी होती हैं। ‘घास’ नाम दिए जाने के बावजूद इसके पत्ते चौड़े, मोटे और रेशेयुक्त होते हैं। पत्तों के दोनों किनारे धारदार ? शायद यह हरिया घास ही पुराणों में चर्चित ‘असीपत्र’ और यह स्थान ‘असीपत्रवन’ है, जो अनगिनत नर्को में एक नर्क है। पापी आत्माएँ बेहद डरी-सहमी हुई, इन असीपत्रवन की बीच-पगडंडियों पर चलती हैं, क्योंकि धारदार पत्ते उन पर हमलावर होते रहते हैं।
हरिया घास के रेशे बेहद सख़्त और खुरदुरे होते हैं। बकरियाँ भी इन्हें चबा नहीं पातीं। बड़े-बूढ़े अपनी हँसिया से इसके किनारे छील डालते हैं और पत्तों को चीरकर, चट्टी बुनते हैं। पुराने जमाने में हाट-बाज़ार में भी इन्हें कोई नहीं ख़रीदता था। पिछले साल से आदिवासी कुटीर शिल्प सहकारी संस्था, हाट से ये चट्टियाँ चार-पाँच टके में ख़रीदने लगी है। लेकिन अटाई के बाशिंदों को इस बात की जानकारी नहीं थी कि इस संस्था में इस ख़रीदारी को तीन लाख रुपए सालाना योजना के रूप में दिखाया जाता है। संस्था के अफसर इस रकम को आपस में बाँट लेते हैं। हर अफसर को पूरे पच्चीस हजार रुपये महीने की आमदनी होती है।

बहरहाल, सारा कामकाज छोड़कर सारे आदिवासी वहीं बैठे थे। उनके लिए तो आकाश की तरफ महुआ की उठी हुई दो डालें, यह पत्थर, झील के पानी की ठंडक में लिपटी हवा, ‘मरने चला’-रघुबर का ऐलान, घर त्यागकर उसका आकाश तले आश्रय लेना ही बेहद चिंताजनक था और नवीन डॉक्टर के लिए पहेली। इस वक्त ये दोनों ही बातें मिलकर एक हो गई थीं। नवीन दर्शक के आसन पर था, वे लोग मंच पर। यह नाटक ऐसा नहीं था, जो दर्शक और मंच के लोगों को एक सूत्र में बाँध देता।
सबके सब ख़ामोश निस्तब्धता की मूरत ! यह सन्नाटा समूचे परिवेश को बेहद रहस्यमय बना गया। नवीन को लगा, इस निस्तब्धता में कोई बेचैन-सी गुहार है। यह नीरवता हमारी भाषा समझती है। हम जो कहते हैं, वह सुनती है। नवीन से यह सब सहा नहीं जा रहा था। कभी-कभार उसने उन आदिम लोगों के पेट भी वाश किए हैं। साँप काटने पर इंजेक्शन लगाया है। ज़हरीले खाने के असर से बचाया है। इनके तन-बदन को उसने बार-बार छुआ है, लेकिन सब कुछ काँच की दीवार के पार से !
दोपहर ढलनेवाली थी ! आकाश रंग बदलने लगा था। झील का पानी धीरे-धीरे रक्ताभ होने लगा था। थोड़ी देर बाद वह सियाह पड़ने लगेगा। उसके बाद, पानी की काली बुनावट में सितारे चमकने लगेंगे। निद्राहीन प्रहरी कालपुरुष ! इस वक्त मंद-मंद बहती हुई हवा। काँपते हुए महुआ के पत्ते, बकरियों के झुंड समेत घर लौटते किशोरों का गूँजता हुआ, मिनमि नाता गीत-स्वर ! दिन अस्त हो गया। नवीन ने जो भाषा युग-युगांतरों में भी नहीं सीखी, इस समय एकदम से वह कैसे समझ सकता है ? इन लोगों को जानने-समझने के लिए तो कई-कई युगों पहले से ही, उसे पढ़ना शुरू कर देना चाहिए था। यह बहुत ही ज़रूरी काम तो उसने अभी तक शुरू ही नहीं किया था। सिर्फ आवेदनों में लिपटे, लंबे-लंबे लिफाफों पर लिखा जाता रहा-‘अति आवश्यक।’

शुकरा केरकेटा ने गला खँखारकर कहना शुरू किया, ‘‘मामिला तो काफी गहिन-गंभीर है, डांग्दर बाबू ! अब तो बाकी रह गए हम दो ही मानस-मुंडा बिरादरी के हम अउर ओरांव बिरादरी का बड़ा तिरका। रघुबर तो अब चला। इसलिए अब से खरवार बिरादरी का मुंडा, गोविन होवेगा।’’
‘मुंडा’ शब्द जैसे बिरादरी का प्रतीक था, वैसे ही गाँव और समाज के सिरमौर का भी ! नवीन यह बात बखूबी जानता था।
शुकरा उसी तरह धीमी आवाज़ में कहता रहा, ‘‘रघुबर को कोढ़ हुई गवा है, डांग्दर बाबू ! अब वह अटाई ताल के पच्छिम तरफ चला जाएगा। वहाँ अपना घर बाँधेगा और मरने तक वहीं रहेगा।’’
‘‘कोढ़ ? किसने कहा ? अस्पताल तो आया नहीं ?’’
रघुबर ने बच्चे को बहलाने जैसी गहरी संवेदना के लहजे में कहा, ‘‘जित्तनी भी बार, हम अस्पताल गए, डांग्दर बाबू, खुद न सही, अपना कोई सग्गा, बूढ़े-हुजुरुग जिउबाबा को फूल चढ़ाने पहुँच गया...मगर का फैदा भया ?’’
इस दौरान, अपनी तलाश करते हुए नवीन को कैसे अपना सुराग मिल गया। उसे एकदम से गुस्सा आने लगा। देवी-देवता, फूल चढ़ाना, प्रसाद खाना-इन संस्कारों में वह भी पला-बढ़ा है। लेकिन उनमें तो साहचर्य की स्थिति होती है। शायद ये सारे विश्वास आज भी मौजूद हों। लेकिन नवीन यह भी तो जानता है कि ऐंटी-वेनम इंजेक्शन के जरिए सर्प-दंश के शिकार, रघुबर जैसे लोगों को उसने बचा भी तो लिया है !

रघुबर एकाएक मुस्करा उठा, ‘‘जिउबाबा फूल नाहीं लिहिन, डांग्दर बाबू !’’
‘‘देखूँ, कैसा कोढ़ है ? कहाँ हुआ है कोढ़ ?’’
‘‘हम देख लिए हैं, डांग्दर साब !’’ रघुबर के होठों पर गर्व भरी हँसी उमड़ आई, ‘‘भूल मत जइयो, डाक बाबू, हमहूँ वैद् हैं। चूरन मलहम हम ही बनाते थे न !’’
चिंतित नवीन एकदम सहज और सजग हो आया, ‘‘रघुबर !’’
‘‘बोलो, साब !’’
‘‘मैंने तुम्हें तीन-तीन बार बचाया है या नहीं ?’’
‘‘ज...रूर !’’
‘‘यानी मैं तुम्हारा दुश्मन तो नहीं हूँ ?’’
‘‘ई का कहत हौ, साब ? दुस्समन को भला कोई चिट्ठी लिखत है ? या चिट्ठी पाकर कोई आवत है ?’’
रघुबर का पत्र नवीन के लिए क्रमशः अनमोल हो उठा। यानी उसका हर पत्र बेशकीमती था ! नवीन को इस सच्चाई का पहले अहसास क्यों नहीं हुआ ?
‘‘तुमसे पहिले अउर कोई डांग्दर अटाई गाँव में आया था ?’’
शुकरा ने भी रघुबर की बातों में सहमति जताई, ‘‘ई शुकरा ने अपनी बिटिया के बियाह में और किसी को खिलाया था ?’’
बड़े तिरका ने भी उनका साथ दिया, ‘‘ताज्जुब तो यह है, डांग्दर बाबू कि तुम हमसे कबहूँ टका-पइसा भी नाहीं लेते।’’
‘‘मानता हूँ कि बूढ़े जिउबाबा बहुत बड़े देवता हैं। लेकिन फिर भी एक बार मुझे देखने दो-’’
‘‘हमका छुओगे तुम ?’’
‘‘हाँ, डॉक्टर छू सकता है। क्यों भाई, तुम लोग क्या कहते हो ?’’
‘‘लो, देखो, भला मैं झूठ बकता हूँ ?’’

नवीन, रघुबर के करीब चला आया। रघुबर ने अपना बदन उघाड़ दिया। अगर कोढ़ भी हुआ तो वह ठीक हो जाएगा। कोढ़ से छुटकारा मिल सकता है। लेकिन....आज से पहले नवीन डॉक्टर ने कभी किसी कुष्ठ सरोगी को निरोग नहीं किया, लेकिन रघुबर ? जो जीना चाहता था जिसे नवीन ने हर बार बचा लिया था, जिसे इंसानियत के तकाजे पर भी अटाई के दूसरे बाशिंदों की तरह सरकार, प्रशासन, स्वास्थ्य, शिक्षा, भूमि-संस्कार, अरण्य, पूर्त, कृषि, आदिवासी-किसी भी विभाग से, कभी, कुछ नहीं मिला। फिर भी उसके दिल में जीने की ललक थी। ‘बकरी ठो पर गइल...’ फिर भी वह जीना चाहता था। ‘बरखा न भइल, साब ! भडवा का सगरा खेत जल गवा-’ फिर भी वह जीने को आतुर ! उसी रघुबर ने पक्का इरादा कर लिया कि वह मर जाएगा ? मृत्यु-इच्छा उसकी अपनी गढ़ी हुई ! इस इच्छा ने उसके बूढ़े, गाँठदार, पुख़्ता शरीर पर कब्जा जमा लिया है ?
भय ! डर ! जन्म-जन्मांतरों से सर्वविदित हक़ीक़त ! कोढ़ का मतलब है-मौत ! कोढ़ का मतलब है-समाज-बिरादरी-निकाला !! कोढ़ माने-भिखारी जैसी ज़िंदगी !!!


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