कुछ पल साथ रहो - तसलीमा नसरीन Kuch Pal Sath Raho - Hindi book by - Taslima Nasrin
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कुछ पल साथ रहो

तसलीमा नसरीन

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :115
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2911
आईएसबीएन :81-8143-306-8

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तसलीमा नसरीन के हार्वर्ड विश्वविद्यालय में निवास के दौरान, केम्ब्रिज, मैसाचुसेट्स में बैठकर लिखी गई कवितायें।

Kuchh Pal Satha Raho

प्रस्तुत है पुस्तक के कुछ अंश

प्रेम, मृत्यु, कलकत्ता, निःसंगता-मेरे प्रिय विषय इस संग्रह में शामिल हैं। सब कुछ की तरह, अब प्रेम भी कहीं और ज्यादा घरेलू हो गया है। ये कविताएँ मैंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय में पूरे साल भर रहने के दौरान, केम्ब्रिज, मैसाचुसेट्स में बैठकर लिखी हैं। कविता लिखने में, मैंने साल भर नहीं लगाया, जाड़े का मौसम ही काफी था। इन्हें कविता भी कैसे कहूँ इनमें ढेर सारे तो सिर्फ खत हैं। सुदूर किसी को लिखे गये, रोज-रोज सीधे सरल खत ! चार्ल्स नदी के पार, केम्ब्रिज के चारों तरफ जब बर्फ ही बर्फ बिछी होती है और मेरी शीतार्तदेह जमकर, लगभग पथराई होती है, मैं आधे सच और आधे सपने से, कोई प्रेमी निकाल लेती हूँ अपने को प्यार की तपिश देती हूँ, अपने को जिन्दा रखती हूँ। इस तरह समूचे मौसम की निःसंगता में, मैं अपने को फिर जिन्दा कर लेती हूँ।
और रही मृत्यु ! और है कलकत्ता ! निःसंगता ! मृत्यु तो खैर, मेरे साथ चलती ही रहती है, अपने किसी बेहद अपने का ‘न-होना’ भी साथ-साथ चलता रहता है ! हर पल साथ होता है ! उसके लिए शीत, ग्रीष्म की जरूरत नहीं होती। ये सब क्या मुझे छोड़कर जाना चाहते हैं ? वैसे मैं भी कहाँ चाहती हूँ कि ये सब मुझसे दूर हो जाएँ। कौन कहता है कि निःसंगता हमेशा तकलीफ ही देती है, सुख भी तो देती है।
उन दिनों माँ कितनी तकलीफ पाती थी ! कितना-कितना रोती थी माँ ! वह मुझसे कहती थी कि मेरे वापस लौटते ही, उसके सारे दु:ख दूर हो जाएँगे। मैं अब किसी दिन भी वापस नहीं लौटूँगी, माँ क्या जानती थी ? मन ही मन सही, तुझे भी क्या यह पता था ?
तुझे मुझको बताना चाहिए था ! सब कुछ ! जैसे माँ को छू-छूकर, तू उन्हें तसल्ली देती थी- किसी दिन मैं ज़रूर लौट आऊँगी। जैसे तू माँ के आँसू पोंछ देती थी, उनकी तरफ हाथ बढ़ा देती थी ! तुझे सब बताना चाहिए था न ! मुझे भी छू लेना था, तुम्हारे हाथ, जिसे थामकर मुझे लगता- मैं माँ को छू रही हूँ ! जिन हाथों की खुशबू में मिलेगी मुझे माँ की खुशबू ! तेरे वे हाथ, अब कहाँ हैं, शेफाली !
मुझे माँ को पाने दे !

मुझे कुछ कहना है...

 

 

मन में चन्द शब्द, चन्द आवाज़ें उभरती रहीं। मैंने उन्हें नाम दिया है-कविता। ये आवाज़ें मेरे मन के भीतर से उभरती रहीं। ये मेरे मन के शब्द हैं, मन से उभरे हैं। चूँकि मैं मन की क़द्र करती हूँ, इसलिए शब्दों की भी क़द्र करती हूँ।
प्रेम, मृत्यु, कलकत्ता, नि:संगता-मेरे प्रिय विषय भी इनमें शामिल हैं। सब कुछ की तरह, अब प्रेम भी कहीं और ज़्यादा घरेलू हो गया है। ये कविताएँ मैंने हार्वडे विश्वविद्यालय में पूरे साल भर रहने के दौरान, केम्ब्रिज, मैसाचुसेट्स में बैठकर लिखी हैं। कविता लिखने में, मैंने साल भर नहीं लगाया, जाड़े का मौसम ही काफ़ी था। इन्हें कविता भी कैसे कहूँ ? इनमें ढेर सारे तो सिर्फ ख़त हैं। सुदूर किसी को लिखे गए, रोज़-रोज़ के सीधे-सरल ख़त ! चार्ल्स नदी के पार, केम्ब्रिज के चारों तरफ़ जब बर्फ़ ही बर्फ़ बिछी होती है और मेरी शीतार्त देह जमकर, लगभग पथराई होती है, मैं आधे सच और आधे सपने से, कोई प्रेमी निकाल लेती हूँ और अपने को प्यार की तपिश देती हूँ, अपने को ज़िन्दा रखती हूँ। इस तरह समूचे मौसम की नि:संगता में, मैं अपने को फिर ज़िन्दा कर लेती हूँ।

और रही मृत्यु ! और है कलकत्ता ! नि:संगता ! मृत्यु तो ख़ैर, मेरे साथ चलती ही रहती है, अपने किसी बेहद अपने का ‘न होना’ भी साथ-साथ चलता रहता है ! हर पल साथ होता है ! उसके लिए शीत, ग्रीष्म की ज़रूरत नहीं होती। कलकत्ते के लिए भी नहीं होती। नि:संगता के लिए तो बिल्कुल नहीं होती। ये सब क्या मुझे छोड़कर जाना चाहते हैं ? वैसे मैं भी भला कहाँ चाहती हूँ कि ये सब मुझसे दूर जाएँ। कौन कहता है कि नि:संगता हमेशा तकलीफ ही देती है, सुख भी तो देती है।
इस काव्य-संग्रह में मानवता की भी बातें हैं; औरत की भी बातें हैं। सभी मौसम मौजूद हैं ! हमेशा रहती हैं !
-तसलीमा नसरीन, 2004

 

 

कलकत्ता इस बार...

 


इस बार कलकत्ता ने मुझे काफ़ी कुछ दिया,
लानत-मलामत; ताने-फिकरे,
छि: छि:, धिक्कार,
निषेधाज्ञा
चूना-कालिख, जूतम्-पजार

लेकिन कलकत्ते ने दिया है मुझे गुपचुप और भी बहुत कुछ,
जयिता की छलछलायी-पनीली आँखें
रीता-पारमीता की मुग्धता
विराट एक आसमान, सौंपा विराटी ने
2 नवम्बर, रवीन्द्र-पथ के घर का खुला बरामदा,
आसमान नहीं तो और क्या है ?

कलकत्ते ने भर दी हैं मेरी सुबहें, लाल-सुर्ख गुलाबों से,
मेरी शामों की उन्मुक्त वेणी, छितरा दी हवा में।
हौले से छू लिया मेरी शामों का चिबुक,
इस बार कलकत्ते ने मुझे प्यार किया खूब-खबू।
सबको दिखा-दिखाकर, चार ही दिनों में चुम्बन लिए चार करोड़।
कभी-कभी कलकत्ता बन जाता है, बिल्कुल सगी माँ जैसा,
प्यार करता है, लेकिन नहीं कहता, एक भी बार,
कि वह प्यार करता है।

चूँकि करता है प्यार, शायद इसीलिए रटती रहती हूँ-कलकत्ता ! कलकत्ता !
अब अगर न भी करे प्यार, भले दुरदुराकर भगा दे
तब भी कलकत्ता का आँचल थामे, खड़ी रहूँगी, बेअदब लड़की की तरह।
अगर धकियाकर हटा भी दे, तो भी मेरे क़दम नहीं होंगे टस से मस।
क्यों ?
प्यार करना क्या अकेले वही जानता है, मैं नहीं ?

कलकत्ता का प्रेम

 


तुम सिर्फ़ तीस के लगते हो, वैसे तुम हो तिरसठ के !
बहरहाल, तिरसठ के हो या तीस के, किसी को क्या फ़र्क़ पड़ता है ?
तुम, तुम हो; तुम जैसे; ठीक वैसे, जैसा तुम्हें फबता है।

जब-जब झाँकती हूँ, तुम्हारी युगल आँखों में
लगता है, पहचानती हूँ उन आँखों को दो हज़ार वर्षों से !
होठ या चिबुक, हाथ या उँगलियाँ,
जिस पर भी पड़ती है निगाह, लगता है पहचानती हूँ इन्हें।
हो हज़ार क्यों, इससे भी काफ़ी पहले से पहचान है मेरी,
इतनी गहरी है पहचान कि लगता है, जब चाहूँ छू सकती हूँ उन्हें,
किसी भी वक़्त,
रात या दोपहर, यहाँ तक कि आधी-आधी रात को भी !
यह भी लगता है जैसे चाहूँ, उनमें पुलक जगा सकती हूँ,
रात जगा सकती हूँ,
चिमटी काट सकती हूँ, चूम सकती हूँ, मानो वे सब मेरे कुछ लगते हैं।
तीस-तीस साल के लगनेवाले मेरे अहसासों की तरफ तुमने,
देखा है कई-कई बार,
लेकिन कुछ कहा नहीं !
जब मैं फुर्र हो रही थी, सिर्फ़ तभी
तुमने मेरे दोनों हाथों में भर दिए गुलाब ही गुलाब !
अब कैसे लगाऊँ गुलाबों का कोई अलग अर्थ ?
गुलाब तो आजकल, महज रस्म के तौर पर नज़र करता है,
हर कोई किसी को भी !
लेकिन मुझे तो तुम्हारे कुछ कहने का इन्तज़ार था,
लेकिन कुछ नहीं कहा तुमने,
मैं परखती रही, शायद मन ही मन कुछ कहो,
लेकिन नहीं, तुमने कुछ भी नहीं कहा !

क्यों ?
उम्र गुज़र जाए, तो क्या प्यार नहीं किया जाता ?

मन

 


दरख़्तों को काटकर, नक़्क़ाशीदार घर-मकान ढहाकर,
माचिस की डिबियानुमा, ऐसे अज़ीबोगरीब घर-मकान क्यों उठा रहा है, रे ?
तुझे हो क्या गया है ?
तू क्या स्थापत्य में, सृजन में, श्री में अब ख़ास भरोसा नहीं करता ?
शायद तुझे ढेर-ढेर रुपये चाहिए !
इतने-इतने रुपयों का तू करेगा क्या, कलकत्ता ?
न्यूयॉर्क बनेगा ?

आजकल तेरी चाहिए-चाहिए की ललक काफ़ी बढ़ गई है,
किसे ठगकर शोहरत कमाए, किसी भुनाकर क्या बने-इसी चक्कर में पड़ा है न ?
शामों की तेरी अड्डेबाज़ी
उस वक़्त मुर्दा इन्सानों जैसे ठहाके लगाती है,
जब बोतल तोड़कर निकले हुए जिन को धर दबोचने को तू उमड़ा पड़ता है,
और इस-उसके नाम आधी रात तक गन्दे-गन्दे फिकरे कसते हुए,
जैसे-तैसे दो-एक रवीन्द्र मारकर, लड़खड़ाते हुए घर लौटता है,
उकडूँ होकर उगलने के लिए !
तू क्या कुशल-मंगल है, कलकत्ता ?
धत्त् फिजूल की बकवास मत कर !
कुशल-मंगल होता, तो कोई यूँ रुपये-रुपये की रट लगाता ?
इतने-इतने गहने गढ़ाता ?

अच्छा, अब कभी तुझे फुर्सत होती है, शिशिर के परस के लिए ?
इन्द्रधनुष पर निगाह पड़ते ही, सब कुछ छोड़-छाड़कर,
क्या तू ठिठक नहीं जाता ?
कभी बैठता है कहीं, किसी के करीब ? कभी दु:ख से नज़र मिलाता है ?
अच्छा तेरा वह मन क्या, अब बूँदभर भी नहीं बचा ?
जेब में फूटी कौड़ी भी न हो, फिर भी खुद को राजा-राजा
समझने वाला मन ?

वह लड़की

 


वह लड़की अकेली है
असहनीय तरीके से अकेली है वह लड़की ! बस, ऐसे ही अकेली है वह !
इसी तरह निर्लिप्त और दुनिया के सभी कुछ के प्रति,
अपनी तटस्थता समेत, निचाट अकेली !
इसी तरह वह ज़िन्दा है, दीर्घ-दीर्घ काल निर्वासन में।
एकमात्र कलकत्ता ही उठाता है लहरें, उस लड़की के शान्त-थिर जल में,
एकमात्र कलकत्ता ही उसे नदी कर देता है।
कलकत्ता ही फूँकता है, उसके कानों में सकुशल रहने का मन्त्र !
एकमात्र कलकत्ता ही।

कलकत्ते की धूल-मिट्टी में सियाह पड़ गयी उस लड़की की देह !
उधर जितनी भी लिपटी थी कालिमा
उसके मन में, आँखों तले ! सोखकर तमाम कालिमा,
इसी कलकत्ते ने कैसा उजला रखा है सभी कुछ !
अब दोनों जन मिलकर निहारते रहते हैं, जगत् के अदेखे रूप,
पा लेते हैं अनुपलब्ध चेहरे !
कितनी-कितनी तरह के रोग से ग्रस्त है कलकत्ता !
जाने कितनी ही तरह के-नहीं ! नहीं !
अभाव ! मोहताजी !
फिर भी जादू की तरह जाने कहाँ से निकाल लाता है,
हीरे-माणिक !
कई-कई सालों से नितान्त प्रेमहीन वह लड़की,
बिन माँगे ही उसे ढेर-ढेर प्यार दे डाला कलकत्ता ने !

आयी हूँ अस्त होने...

 


पूरब में तो जन्मी ही थी, पूरब में ही तो नाची थी, दिया था यौवन,
जो भी था उँड़ेलना, उँड़ेल दिया पूरब में !
अब, जब कुछ भी नहीं रहा, जब बाल हुए कच्चे-पक्के,
जब आँखों में मोतियाबिन्द, धूसर-धूसर नज़र;
जब सब कुछ खाली-खूली, चहुँओर भाँय-भाँय-
आयी हूँ ढलने को पश्चिम में।

अस्त होने दो ! अस्त होने दो ! होने दो अस्त !
अगर न होने दो, तो करो स्पर्श,
हौले से स्पर्श करो, स्पर्श करो ज़रा-सा,
रोम-रोम में, छाती पर,
स्पर्श करो पोर-पोर, झाड़कर जंग, चूम लो त्वचा को,
कसकर दबोच लो कंठदेश, मार डालो मृत्यु की चाह को,
उछालकर फेंक दो, सतमंज़िले से ! मुझे सपने दो ! मुझे बचा लो !

पूरब की साड़ी का आँचल बाँध रखो पश्चिम की धोती की चुन्नट से,
रंग लाने चली हूँ, आकाश पार,
चलेगा कोई ? पश्चिम से पूरब तक
दक्षिण से उत्तर तक करते हुए सैर !
लो, मैं तो चली, उत्सव का रंग लाने,
और कोई चाहे, तो चले मेरे साथ !
अगर कोई मिलाना चाहे दोनों आकाश, तो चले,
अगर हो गया मेल, तो मैं नहीं होऊँगी अस्त !
हरगिज नहीं होऊँगी अस्त, उस अखण्ड आकाश में !
सारे चोर-काँटे चुनकर, मैं सजाऊँगी गुलाबों का बाग़,
अस्त नहीं होऊँगी मैं !
लहलहाएँगे खेत-फ़सल इस पार से उस पार ! दिगन्तपार !
तैरते-तैरते मैं एकमेक कर दूँगी, गंगा, पद्मा, ब्रह्मपुत्र !
अस्त नहीं होऊँगी।

प्रिय चेहरा

 


जब भी देखती हूँ आपका चेहरा, आप मुझे कलकत्ता लगते हैं !
आपको क्या पता है कि मुझे बिल्कुल यही लगता है ?
आप क्या जानते हैं, आप अति असम्भव तरीके से
समूचे के समूचे कलकत्ता ही हैं ?
नहीं जानते न ? अगर जानते तो बार-बार अपना मुँह नहीं फेरते।
सुनें मेरी एक बात-
आपके चेहरे की ओर देखते हुए, आपको नहीं,
मैं देखती हूँ कलकत्ता को,
धूप ने डाल दी है माथे पर सलवटें, आँखों की कोरों में
चिन्ता की झुर्रियाँ,
गालों पर कालिख
होठों पर रेत
आप बेतहाशा दौड़े चले जाते हैं
और फूहड़ तरीके से हो रहे हैं पसीने-पसीने,
अर्से से नहीं कोई खुशख़बरी, अर्से से जी भर नहाए नहीं,
नींद नहीं आती।

आप क्या यह सोच बैठे हैं कि चूँकि मैं पड़ी हूँ, आपके घर में
आपको करीब खींच लेती हूँ, सामने बिठाती हूँ,
चिबुक थामकर चेहरा उठाती हूँ, तन्मय निहारती रहती हूँ
और मेरी पलकों की कोरों में जमा होते जा रहे हैं बूँद-बूँद सपने ?
आपके होठों तक, जब बढ़ाती हूँ अपने भीगे युगल होंठ,
आप सुख से सिहर उठते हैं।

आपको ख़बर नहीं, क्यों मेरे होठ बढ़ जाते हैं,
आपके होठों तक,
गालों
आपके माथे
और आँखों की कोरों तक।
क्यों मेरी उँगलियाँ छूती हैं, आपका चेहरा ?
धीरे-धीरे समेट देती हैं आपके बाल,
सहलाकर मिटा देती हैं माथे की सलवटें,
तनी हुई झुर्रियों को सपाट कर देती हैं,
पोंछ देती हैं पसीना, कालिख-रेत सारा कुछ मेट देती हैं।
क्यों ? मैं क्यों चूमती हूँ आपका चेहरा, आप नहीं जानते।
आपको तो अन्दाज़ा भी नहीं, जब मैं आप से कहती हूँ-
मैं आपसे प्यार करती हूँ,
दरअसल मैं किसे प्यार करती हूँ,
आप नहीं जानते, इसलिए अब भी उम्मीद लगाए हैं !

उफ ! तुम किसी उम्मीद में मत रहो।
किसी को यूँ कंगले की तरह टकटोरते हुए देखना,
कतई भला नहीं लगता मुझे।
तुम इतने बुद्धू क्यों हो ? क्यों नहीं देखते ?
मेरा हाथ जितनी भी बार, कहीं और रखने की कोशिश करते हो,
मैं नहीं रखती,
तुम फेरना चाहते हो मेरी निगाह, फिर भी मेरी आँखें थिर रहती हैं
तुम्हारे चेहरे पर ! सिर्फ़ चेहरे पर ही !
मैं तो सिर्फ़ जगे-जगे, गुज़ार देती हूँ सा-री रात,
गुज़ार सकती हूँ पूरी ज़िन्दगी, तुम्हारा चेहरा निहारते हुए !
हाँ, निहारते हुए सिर्फ़ तुम्हारा चेहरा !


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