नष्ट लड़कीः नष्ट गद्य - तसलीमा नसरीन Nast Ladki Nast Gadya - Hindi book by - Taslima Nasrin
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नष्ट लड़कीः नष्ट गद्य

तसलीमा नसरीन

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :205
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2880
आईएसबीएन :81-7055-381-4

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इसमें नारी व्यथा की कहानी का वर्णन है...

nasht larki nasht gady Taslima Nasrin

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

उधर आँधी-तूफान तो इधर वाद-विवाद बहस तसलीमा नसरीन अपनी जिस पुस्तक ‘औरत के हक में’ के कारण प्रशंसा और निंदा के जिस अतिरेक से गुजरीं, उसी की पूरक पुस्तक है ये ‘नष्ट लड़की : नष्ट गद्य। ‘नष्ट क्यों ? उसमें तसलीमा ने हमें दिखाया था कि अंडा-दूध और नारियल की तरह ही नष्ट शब्द को भी औरतों के क्षेत्र में इस्तेमाल करने के लिए हमारा यह समाज किस तरह कमर कसे तैयार बैठा है। इस बार अपने विशद अनुभव के आधार पर उन्होंने लिखा है-‘मैं खुद को इस समाज की नजरों में नष्ट समझा जाना पसंद करती हूँ। ‘क्योंकि, उन्होंने महसूस किया है कि यदि अपने अधिकारों के प्रति जागरुक कोई नारी अपने दुःख, दैन्य, दुर्दशा को दूर करना चाहती है तो उसके खिलाफ धर्म, समाज और राष्ट्र की जाहिल शक्तियाँ दीवार बनकर खड़ी हो जाती हैं, इसके साथ ही समाज के तथाकथित भद्रजन भी उसे नष्ट लड़की कहने लगते हैं। अपने जीवन के अनुभव से ही तसलीमा ने यह बात महसूस की है कि ‘नारी के शुद्ध होने की पहली शर्त ही यह है कि पहले वह नष्ट हो। बिना नष्ट हुए इस समाज के नागपाश से किसी भी नारी को मुक्ति नहीं मिल सकती।’

इसमें संदेह नहीं कि दुःसाहसी, स्पष्टवक्ता और विरोध में आवाज उठानेवाली तसलीमा नसरीन की यह विस्फोटक पुस्तक उस दृष्टि से, शुद्ध नारी का शुद्ध गद्य है। तसलीमा नसरीन के कलम का गद्य शुरू से ही धारदार और प्रहारक रहा है। इस पुस्तक में वह गद्य और ज्यादा पैना और सटीक है। इसमें उन्होंने पुरुष शासित समाज में स्त्री के दुर्भाग्य-दुर्दशा और अवमूल्यन का ही जिक्र नहीं किया है बल्कि इससे उबरने की दिशा में भी प्रकाश डाला है। उन्होंने विरोध में सिर्फ उँगली नहीं उठाई है, बल्कि ढेरों छद्म बुद्धजीवियों के मुखौटे भी उतारकर उनका असली चेहरा भी उजागर किया है। इस पुस्तक के गद्य में सिर्फ प्रबंधात्मकता ही नहीं है बल्कि कहीं-कहीं उनमें कथात्मकता के भी दर्शन होते हैं। अधिकतर शीर्षक भी रवीन्द्रनाथ के गीत-कविताओं की वे पंक्तियाँ हैं जिनसे वे विचारों की आंच महसूस की जा सकती है।

दो शब्द


इस पुस्तक का नाम है ‘नष्ट लड़की : नष्ट गद्य’। इस समाज में स्वयं को मैं ‘नष्ट’ कहना पसंद करती हूँ; क्योंकि यह सच है कि यदि कोई स्त्री अपने दुख, दैन्य, दुर्दशा को दूर करना चाहती है; धर्म, समाज और राष्ट्र के अभद्र नियमों के खिलाफ डटकर खड़ी होना चाहती है; हेय ठहराने वाली सभी प्रथाओं-व्यवस्थाओं का विरोध करके अपने अधिकारों के प्रति सजग होने लगती है तो समाज के ‘भद्र पुरुष’ उसे ‘नष्ट लड़की’ करार देते हैं। ठीक भी है, स्त्री के ‘मुक्त’ होने की पहली शर्त ही है-नष्ट होना है। ‘नष्ट’ हुए बिना इस समाज के नागपाश से किसी भी स्त्री को मुक्ति नहीं मिल सकती। वही स्त्री सचमुच सुखी और प्रबुद्ध इंसान है, जिसे लोग ‘नष्ट अथवा बदनाम’ कहते हैं।

-तसलीमा नसरीन

और मत रखो अँधेरे में, देखने दो मुझे


मेरी इच्छा है कि सुबह से दोपहर, दोपहर से रात तक अकेली घूमती रहूँ। नदी के किनारे, गाँव के मैदान में, रोशनी में, शहर के फुटपाथ पर, पार्क में, अकेली, सिर्फ अकेली चलती रहूँ। बहुत इच्छा होती है सीताकुंड पहाड़ पर जाऊँ। मन करता है, एक दिन अचानक बिहार के साल वन में जाकर पूरी दोपहर बिताऊँ। मन करता है कि सेंट मार्टिन के समुद्र में उतरकर गांगचील (एक समुद्री पक्षी) का खेल देखूँ। इच्छा होती है कि गहन उदासी भरे क्षणों में घास पर लेटे-लेटे आकाश देखती हूं। मन करता है कि संसद भवन की किसी सीढ़ी पर अकेली बैठी रहूँ, किसी खुशनुमा शाम में पेड़ से पीठ टिकाये यों ही अलसायी खड़ी रहूँ, क्रिसेन्ट झील के पानी में पूरी शाम पाँव डुबाये पड़ी रहूँ और फिर अचानक शीतलक्षा नदी में नौका-विहार करूँ।

मैं जानती हूँ, बहुत अच्छी तरह जानती हूँ कि यदि मैं अपनी इच्छाएँ पूरी करने लगूँ तो मुझे पर लोग पत्थर बरसाएँगे, थूकेंगे, धिक्कारेंगे। मुझे अपमानित होना पड़ेगा, बलात्कार का शिकार होना पड़ेगा। मुझे कोई ‘पागल’ कहेगा, कोई बदचलन कहेगा। यद्यपि यही सब करते हुए किसी पुरुष को किसी के व्यंग्यबाण से आहत नहीं होना पड़ता। किसी पुरुष के साथ अपहरण, धोखाधड़ी, बलात्कार हत्या जैसे हादसे नहीं गुजरते। हादसे सिर्फ स्त्री के साथ ही गुजरते हैं पूछा जाता है-स्त्री एक हमसफर पुरुष के बगैर क्यों घूमती है ? पुरुष-स्वभाव की विचित्रताएं उसे शोभा देती हैं, लेकिन एक स्त्री फुटपाथ पर क्यों टहलेगी, क्यों पेड़ की छाँव में खड़ी रहेगी, कैसे सीढ़ी पर अकेली बैठी रहेगी और क्यों घास पर लेटेगी ? स्त्री के लिए ऐसी तमाम इच्छाएँ पालना उचित नहीं है। स्त्री को तो घर पर बैठे रहना चाहिए ! उसके लिए घर में रोशनदान की व्यवस्था है ! उस रोशनदान को भेदती हुई जो रोशनी और हवा उसके शरीर में लगती है, क्या वही जिंदा रहने के लिए काफी नहीं है !

हाँ, काफी है। जिंदा रहने के लिए उतनी हवा-रोशनी काफी है। सभी पुरुष, स्त्री के सिर्फ जिंदा रहने तक को ही पसंद करते हैं, क्योंकि स्त्री की उन्हें जरूरत है-भोग के लिए, वंश-बेल को बनाये रखने के लिए। स्त्री के बगैर न तो पुरुष का भोग संभव है और न ही वंश-रक्षा। स्त्री के बिना पुरुष के लिए अधिकार जताने, ताकत आजमाने, ऊँचे स्वर में बोलने और शारीरिक बल दिखाने की कौन-सी जगह रह जाएगी ! ‘ऊपरवाले’ अपने ही बनाये नीति-नियमों के मुताबिक ‘नीचेवालों’ का शोषण करते हैं। सबल हमेशा दुर्बल पर चढ़ाई करता है। उच्चवर्ग हमेशा मौका ढूँढ़ता है-निम्नवर्ग या निर्धनों को फूँककर उड़ा देने का। इसीलिए स्त्री पर हमेशा से पुरुष का अधिकार चला आया है-उसके जी-भर उपभोग और उससे प्यास बुझाने का, उसे आहत करने का। स्त्री निम्न श्रेणी का प्राणी है, दुर्बल है; असहाय, असंगत, शरणार्थी है। इसीलिए स्त्री को जिंदा बनाये रखकर उस पर चढ़ा़ई करने की इच्छा सभी सज्जनों में रहती है।

जैसे पिंजड़े में पंछी के लिए भी रोशनी आने की व्यवस्था रहती है, उसको समय पर दाना-पानी दिया जाता है,चंद शब्द सिखाये जाते हैं, वैसे ही स्त्री के लिए भी किया जाता है। स्त्री के लिए भी एक रोशनदान का इन्तजाम रहता है, सुबह-शाम खाना दिया जाता है और कुछ तयशुदा सामाजिक व्यवहार सिखाया जाता है। स्त्री को उसकी सीमित बातचीत, सीमित राह, सीमित खान-पान, सीमित इच्छाओं और सीमित सपनों के बारे में सम्यक ज्ञान दिया जाता है। पिंजड़े में बंद पंछी की ही तरह स्त्री खुले आकाश, खुले मैदान, वन-जंगल और अनंत हरियाली के आनंद से वंचित रहती है।

स्त्री को दुर्बल कौन समझते हैं ? जो कहते हैं कि स्त्री शारीरिक रूप से दुर्बल है, वे गलत कहते हैं। वे झूठ बोलते हैं। आज भी अगर एक नर और एक नारी शिशु को भरे तालाब में छोड़ दिया जाए तो पहले जिस शिशु की मौत होगी, वह नर शिशु ही होगा। यदि नारी शिशु का फेफड़ा या हृदय नर शिशु से ज्यादा शक्तिशाली है, यदि प्रतिरक्षा या जिंदा रहने की क्षमता नारी शिशु में अधिक है, तो कैसे एक झटके में यह राय दे दी जाती है कि स्त्री दुर्बल, कोमल, भीरू और लाजवंती होती है।
दरअसल ये सब स्त्री पर आरोपित किए गए सामाजिक विशेषण हैं। स्त्री यदि विवेक-बुद्धि से परिचालित होने और ममत्व या प्यार धारण करने की अधिक क्षमता रखने के कारण हिंसक युद्ध में नहीं कूदती, तो इसका यह अर्थ नहीं है कि वह अबला है। आदिम युग में स्त्री-पुरुष दोनों नोंच-खसोटकर ही जीव-जंतुओं का मांस खाते थे। कहीं भी यह प्रमाणित नहीं हुआ कि स्त्री दुर्बल है, इसलिए वह नोंचकर नहीं खा सकती। स्त्री को गर्भवती होना पड़ता है, इसलिए गर्भरक्षा के उद्देश्य से उसे कम परिश्रम का भी अभ्यस्त होना होता है। शिकार पर कम जाना पड़ता है, छीना-झपटी कम करनी पड़ती है। देह बल की अपेक्षा वह बुद्धि के द्वारा जीवन निर्वाह करती है। संतान के प्रति उसमें ममता पनपती है। प्यार के सामने वह झुक जाती है, उसमें डूब जाती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि स्त्री दुर्बल, डरपोक और लाजवंती है।

स्त्री को डरना एवं लज्जालु होना पुरुष प्रधान समाज ने सिखाया है, क्योंकि भयभीत एवं लज्जालु रहने पर पुरुषों को उस पर अधिकार जताने में सुविधा होती है। इसलिए डर और लज्जा को स्त्री का ‘आभूषण’ कहा जाता है। समाज में कुछ ही लोग होंगे जो निर्भीक और लज्जाहीन स्त्री को बुरा नहीं कहते हों।

चूंकि डर एवं लज्जा को ही स्त्री का मुख्य गुण समझा जाता है, चूँकि स्त्री के लिए सीमित रास्ता ही निर्धारित किया जाता है, इसीलिए यदि वह रास्ते में, गलियारे में, रेस्तराँ में अकेली चलती या बैठती है, तो लोग उसकी ओर हैरत से देखेंगे, सीटी बजायेंगे, उससे सटकर खड़े होंगे और परखेंगे कि यह लड़की ‘वेश्या’ तो नहीं, क्योंकि वेश्या के अलावा कोई भी लड़की निडर होकर नहीं चलती। वेश्या के अलावा पूरे शहर में कोई भी अकेला, स्वच्छन्द, सीमा लाँघकर रास्ते में नहीं निकलता।

जो स्त्रियाँ घर पर बैठी रहती हैं, जो अभिभावक या पुरुषों के साथ निरापद घर से बाहर जाती हैं, या अकेले ही मान्य सीमा के अंदर घूम-फिर कर जरूरत पूरी करते हुए घर लौट आती हैं, समाज उन्हें भली औरत का दर्जा देता है। इस ‘भद्रता’ का अतिक्रमण करने पर स्त्री को ‘वेश्या’ कहकर गाली दी जाती है। पुरुषगण ‘वेश्या’ को गाली जरूर देते हैं, लेकिन वेश्या के बगैर उनका काम भी नहीं चलता। अपने स्वार्थ के लिए उन्होंने खुद ही अपने दायरे में वेश्यालय खोल रखे हैं।

पुरुष ‘वेश्या’ न कह दें, इसलिए स्त्री दोपहर के समय किसी खुले मैदान में अकेले नहीं घूमती। इच्छा होने पर भी वह चन्द्रनाथ पहाड़ पर नहीं जाती। चाह कर भी स्त्री नदी-तट से लगे हिजला पेड़ की छाया में बैठकर दो एक पंक्तियाँ गा नहीं सकती। इच्छा के बावजूद निर्जन फुटपाथ पर अकेले नहीं चलती है। स्त्री ‘वेश्या’ सम्बोधन से बहुत डरती है, इससे वह अपने को बहुत बचाकर चलती है। पुरुष की नजरों में खुद को आकर्षक बनाये रखने के लिए स्त्री साज-सिंगार करती है। आँखों में, गालों और होंठों पर रंग चढ़ा़ती है। पूरी दुनिया में श्रृंगार के प्रसाधन का उत्पादन जिस रफ्तार से बढ़ रहा है, मुझमें यह क्षमता नहीं कि मैं इसका अंदाजा भी लगा पाऊँ। वेश्याएँ श्रृंगार करती हैं असामाजिक ग्राहक की आशा में, और भद्र महिलाएँ सजती हैं सामाजिक ग्राहक की आशा में। उद्देश्य दोनों का ही ग्राहक पाना है। जिसे जितना अच्छा ग्राहक मिलता है, उसको इस लोक की सुविधाएँ भी उतनी ही अधिक मिलती हैं। स्त्री को वे सुविधाएँ दे रहे हैं, खाने-पीने, पहनने, ओढ़ने को दे रहे हैं, इसीलिए स्त्री के पैरों में वे जंजीरें पहनाते हैं। वैसे ही, जैसे बकरी को मैदान में चरने के लिए छोड़कर उसके गले की रस्सी को एक खूँटे से बाँध दिया जाता है। स्त्री को गाय, बकरी, भेड़ की तरह ही एक नपे-तुले दायरे में चलने-फिरने दिया जाता है। पुरुष वर्ग रस्सी से बँधी स्त्री का स्वाद भी पाना चाहता है और रस्सी तुड़ाई हुई स्त्री का भी। मुख्य रूप से पुरुष-रसना को तृप्त करने के लिए ही स्त्री को एक बार घर में बंदी होना पड़ता है, तो एक बार घर छोड़ना पड़ता है। स्त्री आखिर स्त्री ही है, चाहे वह वेश्या हो या कुलवधू। कष्ट झेलने के लिए ही उसका जन्म हुआ है।

समाज की स्त्रियाँ पुरुषों के डंक मारने के डर से, इस डर से कि लोग उसे ‘बुरा’ कहेंगे, चाहत के बावजूद एक बार महास्थानगढ़ घूमने नहीं जा सकतीं, श्रीमंगल के चाय बागान में निर्द्वंद्व होकर टहल नहीं सकतीं। ब्रह्मपुत्र के पानी में खुशी से तैर नहीं सकतीं। सुन्दरवन में पूनों की चाँदनी में नहा सकतीं। एकांतिक मानुष जीवन। यह जीवन वह मन-मर्जी नहीं जी सकती। इस जीवन को वह मनुष्य के पास, आकाश और नक्षत्रों के पास, जल और हवा के पास, हरे-भरे जंगलों के पास, निर्जन नदी के पास लाकर नहीं पहचान सकती। वह अपने सभी अरमानों, सभी चाहतों और सपनों के घर को जलाकर पुरुष के घर को आलोकित करती है।

स्त्री के इस अर्थहीन जीवन के प्रति शोक-संताप से भरी हुई मैं लज्जित हूँ। पाठकगण, आप में यदि इंसानियत नाम की कोई चीज है, तो इस सबके लिए आप भी लज्जित हों।

आस लगाये रहती हूँ


करीब तीन साल हुए हैं। एक पत्रिका में मैंने बंगला अकादमी के ‘इक्कीस फरवरी’ आयोजन के दौरान एक शाम को जुटी भीड़ के बारे में लिखा था-‘‘बदन पर साड़ी नहीं ब्लाउज फटा हुआ। ऐसी हालत में उस दिन इक्कीस-बाईस साल की एक लड़की भीड़ को चीरती हुई बाहर निकल आई। वह तत्काल बलात्कार की शिकार लड़खड़ाते कदमों से चली आ रही स्त्री की तरह लग रही थी। उसे देखकर मैं सिर से पाँव तक सिहर गई। यदि इक्कीस फरवरी की शाम को भाषा-आंदोलन के शहीदों के प्रति इसी तरह श्रद्धा-प्रदर्शन किया गया है, और फिर इस विकृत यौनानंद के अंत में भले मानुस की तरह पुस्तक मेले में जो समा जाते हैं, किताबें देखते हैं, गाना गाते हैं-‘मेरे भाई के खून से रँगा...’‘‘धिक्कार है उन बंगालियों पर ! धिक्कार है इक्कीस फरवरी के इस गीत पर !’’ आगे और भी लिखा था-‘‘ऐसी एक भी लड़की नहीं, जो भीड़ से गुजरकर मेले में गई हो और उसके स्त्री-अंगों पर किसी का हाथ न पड़ा हो। अनेक लड़कियों को मैंने भीड़ के डर से वापस लौटते हुए देखा है। वे लौट जाती हैं क्योंकि उन्हें मालूम है कि वहाँ का उत्पीड़न कैसा है। जो भीड़ का है। मानो स्त्री-जन्म का प्रायश्चित इसी तरह हो सकता है। ‘इक्कीस’ की चेतना से उद्दीप्त पुरुष इसी तरह सहयात्री स्त्री का स्वागत करता है।’’

इस वर्ष छात्राओं की ब्रिगेड, अकादमी के मैदान में उतरी है। पुस्तक मेले की सारी दुर्घटनाओं का छात्रा ब्रिगेड विरोध करेगी। रोकेगी। पुस्तक मेले के व्यवस्थापकों की इस नई व्यवस्था की मैं प्रशंसा कर रही हूँ। छात्रा ब्रिगेड की एक दो सदस्याओं को देखा है, सफेद एप्रॉन पहने वे इधर-उधर घूम रही हैं। अब तक मैदान में किस हद तक उत्पीड़न रोक सकी हैं, मुझे नहीं मालूम। स्त्रियों के प्रति उछाली गई कितनी अश्लील फब्तियों का विरोध कर पायी हैं, उनकी ओर बढ़ रही कितनी शातिर उँगलियों को हटा पायी हैं, मैं खबर नहीं ले सकी हूँ। सिर्फ छात्रा ब्रिगेड की बात आते ही वे लोग झुंड के झुंड उन्हें देखने जाते हैं, मानो मेले में कोई अद्भुत प्राणी आ गया है-दो हाथ, दो पैर, दो होंठ और एक नाक वाला बिलकुल आदमी की तरह का एक प्राणी !

पुस्तक मेले में पुस्तकों की चर्चा नहीं हो रही है, चर्चा हो रही है छात्रा ब्रिगेड की। छात्रा ब्रिगेड के चारों तरफ भीड़ लगाये हुए हैं उस पीढ़ी के उत्साही नौजवान। वे उन्हें ही देखकर सीटी बजा रहे हैं, उन्हीं को आँख मार रहे हैं। वे अश्लील हरकतें करते हुए सभ्यता का खेल दिखा रहे हैं। अब सुरक्षा-कारणों से ही तो शाम छह बजे के बाद छात्रा ब्रिगेड के चले जाने का इन्तजाम किया गया है। बहुतेरे लोगों ने कहा है कि जो खुद असुरक्षित हैं, वे दूसरों की सुरक्षा क्या करेंगी ? बहुत-से लोगों ने कहा है कि मेले में आई इन चिड़ियों को देखने के लिए ही और ज्यादा भीड़ जुट रही है। लोग तो बहुत कुछ कहते हैं, कहते रहें। इस समाज की सब स्त्रियाँ चिड़िया ही तो हैं। जिस स्त्री को लोगों ने अपमानित किया, वह भी चिड़िया है और जो स्त्री, स्त्री को तमाम अपमानों से सुरक्षित रखना चाहती है, वह भी चिड़िया है। इन चिड़ियों की ओर, इन स्त्रियों की ओर पुरुष थूक रहा है, कंकड़ फेंक रहा है और फेंक रहा है यौनगंधी शब्दोच्चार।

ऐसे विपरीत वातावरण में छात्रा ब्रिगेड के मैदान में निकलने, इस तरह बेरोक-टोक चलने-फिरने ने मुझे बहुत प्रभावित किया। उनके लिए शायद किसी अश्लीलता को जड़ से उखाड़ फेंकना संभव नहीं, उनके लिए शायद किसी असभ्य पुरुष की जीभ काट देना संभव नहीं। फिर भी यह अवश्य है कि वे खूबसूरती के बगीचे में कुरूपता के अत्याचार के विरुद्ध डटी हुई है। यही क्या कम है। यह कोई कम उपलब्धि नहीं यदि विरोध के स्वर को तीव्र करने के लिए एक-एक कर सभी जुलूस में शामिल हो जायें। हालांकि इस देश के लिए, पाल-पोसकर तैयार की गई एक संस्कृति के लिए यह बात बड़ी शर्मनाक है कि जब बंगाली एक बड़ा उत्सव करके अपनी भाषा के आनंद और गौरव में, अपनी परंपरा और संस्कृति के उजाले में खुद को आलोकित करने के पथ पर अग्रसर हो रहे हैं, तब उस महत् उत्सव के समय अश्लीलता रोकने के लिए छात्राओं को ब्रिगेड में उतरना पड़ता है। इतनी सृजनशीलता और श्लीलता के बीच कुछ असभ्य बंगाली समूची व्यवस्था को गंदा करने के लिए आते हैं। छात्रा ब्रिगेड उनकी असभ्यता को रोकने के लिए खड़ी हुई है। बंगाली जितना सभ्य हुआ है, उससे असभ्यता कुछ कम नहीं हुई है। यह भी कुछ कम शर्मनाक बात नहीं है।

फिर भी अभिनंदन छात्रा ब्रिगेड का, अभिनंदन मेले की संचालन कमेटी का कि स्त्री आज स्त्री के भले के लिए घर से निकली है। सिर्फ मेला ही क्यों, मेले के अलावा और भी जहाँ जितना उत्पीड़न होता है, जितना दमन स्त्री पर चलता है, उसे कौन दूर करेगा ? उसे दूर करने के लिए राष्ट्र क्या कोई ब्रिगेड आगे नहीं आयेगी-घर हो या बाहर ?
कौन दूर करेगा तमाम अत्याचारों को ? कौन दूर करेगा अनगिनत बलात्कारों को ? कौन दूर करेगा अपहरण, अश्लीलता को ? कौन वापस लेगा स्त्री-दमन की असंख्य जंजीरों को ? इस मेले के शिक्षित और सचेतन लोगों की भीड़ में भी यदि स्त्री के लिए सुरक्षा की जरूरत पड़ती है, तो फिर पूरे देश में मूर्ख, धर्मांध और अशिक्षितों की भीड में स्त्री क्या थोड़ी भी सुरक्षित है, या रह सकती है ?

नहीं ! जन्म के बाद से ही स्त्री, पुरुष निर्मित विभिन्न नियमों और नीतियों के प्रहार झेलते हुए जिंदा रहती है। स्त्री का शरीर लहूलुहान है, स्त्री का हृदय लहूलुहान है। वह जिस रास्ते से होकर चलती है, उस पर काँटे बिछे हुए हैं। स्त्री अपनी रफ्तार जितनी दीर्घ और तेज करती है, उतना ही उसके अतीत में जख्म जन्म लेते हैं, उतना ही वह चोट से पीड़ित होती है।
सुरक्षा की जरूरत पड़ती है दुर्बल व्यक्ति के लिए। शिशु के लिए, विकलांग के लिए और स्त्री के लिए। मेले में उतरकर स्त्री अपनी दुर्बलता कुछ कम कर रही है या नहीं। या फिर स्त्री दुर्बल है, इस बात को प्रमाणित करने के लिए ही यह छात्रा ब्रिगेड की व्यवस्था की गई है। मैं नहीं जानती। मैं सिर्फ यह सोचकर रोमांचित हो रही हूं कि असत्य के खिलाफ प्रतिरोध चाहे कितना ही कम क्यों न हो, कितना ही हलका क्यों न हो, फिर भी उसका एक अंश मेले के इस जुलूस-मार्ग से आगे बढ़ते हुए राजपथ पर जरूर जा पहुँचेगा।

हमारे बुद्धिजीवी
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दो सप्ताह पहले ‘विचिन्ता’ पत्रिका में छपे एक साक्षात्कार में जाने-माने लेखक हुमायूँ आजाद ने अपनी स्तुति और दूसरों की निंदा करके सबका ध्यान आकर्षित किया है। कवियों की विस्तृत निंदा करते हुए उन्होंने मेरे नाम को भी अपनी सूची से बाहर नहीं रखा। उन्होंने बिना किसी दुविधा के लिखा है कि मैं तो अब तक कवि ही नहीं हो पायी हूँ। वैसे इस बात से मुझे जरा भी दुख नहीं हुआ, क्योंकि निर्मलेन्दु गुण जैसे कवि की प्रेम-कविताओं तक को उन्होंने ‘व्यक्तिगत कामना-वासना से पनपी’ हुई कहा है। दूसरे उन्होंने सिर्फ खुद को ही कवि के रूप में स्वीकृति दी है। साथ ही अपने एक-दो प्यारे कवियों को भी। कौन कवि है और कौन नहीं, यदि यह जाँचने की स्पर्द्धा में मेरा नाम आता है, ‘जो अब तक कवि ही नहीं हो सकी’ तो यह भी मेरा सौभाग्य है।

और, यही हुमायूँ आज़ाद अभी कल पुस्तक मेले में एक स्टॉल पर खड़े होकर मेरी अंग्रेजी में अनूदित एक कविता की पुस्तक पलटते हुए पूछ रहे थे-इसमें उस कविता का अनुवाद नहीं है : ‘बड़ी भोर में गयी घासपात चुनने/मेरी टोकरी लबरेज़ हो गई फूलों से/इतनी तो मेरी कामना नहीं थी।’ अनुवादक पास ही खड़ा था। उसने कहा, ‘‘नहीं।’’ हुमायूँ आज़ाद बोले, ‘‘वह क्यों होगी, अच्छी कविताओं का अनुवाद कोई करता ही नहीं !’’
हुमायूं आज़ाद की इस बात से हैरान होकर मैंने कहा, ‘‘मेरी कविता को आप अच्छा कह रहे हैं ?’’ आज़ाद बोले, ‘‘आपकी बहुत सारी कविताएँ मुझे बहुत अच्छी लगती हैं।’’

इस बार मैं हँस पड़ी। पूछा, ‘‘तो फिर एक साक्षात्कार में आपने कैसे कहा है कि तसलीमा अभी तक कवि नहीं हो सकी !’’
इसके बाद भाषाविद् हुमायूँ आज़ाद के कंठ से भाषा ही उड़न-छू हो गई। वे प्रस्थान की मुद्रा में आ गये। जल्दी न जाते तो इस प्रौढ़ का ‘बालक’ कहकर मजाक उड़ाया जाता, क्योंकि मैं और हुमायूँ आज़ाद दोनों जब एक पत्रिका में ‘कॉलम’ लिख रहे थे, तो हमारी एक-दो दिनों की बातचीत में मुझे उन्होंने बताया था कि वे नियमित मेरा ‘कॉलम’ पढ़ते हैं। बीच में कुछ महीने मैंने लिखना बंद रखा तो एक दिन उन्होंने उपदेश भी दिया था-‘‘लिखना बंद मत कीजिएगा, लिखती जाइए, लिखती जाइए।’’ और यही हुमायूँ आज़ाद जब अपने साक्षात्कार में कहते हैं कि तसलीमा नसरीन का ‘कॉलम’ बालक बालिकाएँ ही पढ़ सकते हैं, मेरे लिए वह ‘कॉलम’ नहीं है, तो क्या मुझे कहने की इच्छा नहीं होगी कि आप भी सचमुच ‘बालक’ ही हैं !




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