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दीक्षा

नरेन्द्र कोहली

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :192
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2878
आईएसबीएन :81-8143-190-1

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राम कथा पर आधारित उपन्यास...

आचार्य अमितलाभ ने अपनी भुजा उठाकर उच्च स्वर में कहा, ''यह आश्रम पूर्णतः नष्ट हो चुका है। जिस आश्रम के कुलपति की धर्मपत्नी का चरित्र ऐसा हो, वहां अध्ययन-अध्यापन, ज्ञानार्जन-तपस्या, कुछ भी नहीं हो सकता।...''

तभी आचार्य अमितलाभ की दृष्टि, लोगों के रेले में, जैसे ठेले जाते हुए, आते आचार्य ज्ञानप्रिय पर पड़ी। अमितलाभ विचलित हो गए; यह ज्ञानप्रिय अवश्य ही उनका विरोध करेगा।...

आचार्य ज्ञानप्रिय ने, आश्रम के भ्रष्ट हो जाने के संबंध में ऊंचे स्वर में की जाने वाली घोषणा सुन ली थी। यह घोषणा सुनकर उन्हें कहीं बहुत आश्चर्य भी नहीं हुआ था। अमितलाभ से इस प्रकार के किसी कांड की अपेक्षा तो नित्य ही बनी रहती थी। अब तक उसने कुछ नहीं किया, यही बड़े आश्चर्य की बात थी। वे अमितलाभ को अच्छी तरह जानते थे। अपने नाम के अनुकूल स्वभाव वाला यह व्यक्ति अपने लाभ के लिए विकट महत्वाकांक्षी था। अपने विषय का उद्भट विद्वान् होते हुए भी उसकी आत्मा ज्ञान-गरिमा से सर्वथा शून्य थी। उसका चरित्र ज्ञान-व्यवसायी अधिक था। ऋषि-तत्व का उसमें सर्वथा अभाव था। ऐसा व्यक्ति क्या आश्रमों के उपयुक्त होता है? कैसे-कैसे वह आचार्य, और फिर उपकुलपति के पद पर पहुंचा था, यह किसी से छिपा नहीं था।...और अब यह व्यक्ति कुलपति और उसकी धर्मपत्नी को लांछित कर, आश्रम के भ्रष्ट होने की घोषणा कर रहा है...।

आचार्य ज्ञानप्रिय का आक्रोश उमड़ पड़ा, ''किसी पापी द्वारा एक निर्बल नारी के प्रति अत्याचार से आश्रम कैसे भ्रष्ट हो गया, आचार्य अमितलाभ? अनेक आश्रमों में विभिन्न प्रकार के दुष्टों ने ऋषियों के अंग-भंग ही नहीं, हत्याएं भी कर दी हैं। उनमें से तो कोई आश्रम भ्रष्ट नहीं हुआ। गौतम का आश्रम ही क्यों भ्रष्ट हो गया, केवल इसलिए कि जिसके प्रति अत्याचार किया गया, वह एक स्त्री है?''

अमितलाभ ऐसी सभी परिस्थितियों के लिए, स्वयं को प्रस्तुत कर चुके थे। यह न शिथिल होने का समय था, न चूकने का अवसर। मुस्करा कर बोले, ''आचार्य ज्ञानप्रिय! ऋषि गौतम से मेरी कोई शत्रुता नहीं। न इसमें मेरा कोई स्वार्थ है। मैं जो कुछ कह रहा हूं ब्रह्मचारियों, संन्यासियों, तपस्वियों के लाभ तथा आश्रम के सम्मान के लिए कह रहा हूं। स्वयं देवराज इन्द्र ने कुलपति की पत्नी के विषय में कहा है, कि उसने स्वयं उनका काम-आह्वान किया था। क्या देवराज की बात को हम झूठ मान लें? वर्तमान स्थिति में कोई निर्णय लेना ही होगा। स्वयं कुलपति की पत्नी के विरुद्ध आरोप है। कुलपति इस समय अपना मानसिक संतुलन खो बैठे हैं, तो निर्णय का उत्तरदायित्व किस पर है?'' अमितलाभ ने मौन होकर उपस्थित जन-समुदाय पर एक सिंह-दृष्टि डाली, किंतु उनके विरुद्ध कोई नहीं बोला। अमितलाभ ने बात आगे बढ़ाई, ''इस आश्रम के उपकुलपति-स्वरूप प्रदत्त अधिकार के आधार पर मैं यह घोषणा कर रहा हूं कि यह आश्रम भ्रष्ट हो चुका है। मेरा विचार है कि हमें अन्यत्र एक नया आश्रम स्थापित करना चाहिए, और उसके लिए मिथिला-नरेश से मान्यता की याचना करनी चाहिए। क्या आप लोग मुझसे सहमत हैं?''

कोई कुछ नहीं बोला। सब ओर के मौन का एक ही अर्थ था कि अमितलाभ से सहमत कोई हो न हो, उपस्थित जन-समुदाय अमितलाभ का विरोध नहीं कर रहा था।

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    अनुक्रम

  1. प्रधम खण्ड - एक
  2. दो
  3. तीन
  4. चार
  5. पांच
  6. छः
  7. सात
  8. आठ
  9. नौ
  10. दस
  11. ग्यारह
  12. द्वितीय खण्ड - एक
  13. दो
  14. तीन
  15. चार
  16. पांच
  17. छः
  18. सात
  19. आठ
  20. नौ
  21. दस
  22. ग्यारह
  23. वारह
  24. तेरह

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