यहाँ से देखो - केदारनाथ सिंह Yahan Se Dekho - Hindi book by - Kedarnath Singh
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यहाँ से देखो

केदारनाथ सिंह

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 1999
पृष्ठ :88
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2756
आईएसबीएन :81-7119-506-7

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केदारनाथ सिंह की कविताओं का संसार करीब-करीब समूचा भारतीय संसार है

Yahaan se dekho

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

केदारनाथ सिंह की कविताओं का संसार करीब-करीब समूचा भारतीय संसार है-वह इस अर्थ में कि उन्होंने तमाम स्रोतों का पता है जहाँ से जीवन मिलता है-भले ही आज की सर्वव्यापी मानव विरोधी मुहिम में वह जीवन कुछ कम हो चला हो और कभी-कभी उसके लुप्त हो जाने का भी खतरा हो-और केदारनाथ सिंह की इस आस्था को उनसे छीन लेना सम्भव है कि मानवीय अस्तित्व को आज के भारत में आदमी बनकर रहने की इच्छा को, अर्थ तक बल देने के लिए उन्हीं स्रोतों पर पहुँचना होगा और जिस जमीन से वे निकल रहे हैं उसे ही और गहरा देखना होगा।....इस प्रक्रिया में केदारनाथ सिंह की भाषा और नम्य और पारदर्शक हुई है उसमें एक नई ऋजता और बेलौसी दिखायी पड़ती है।
विष्णु खरे

जीवन तो हर अच्छे कवि की कविताओं में होता है। लेकिन जीवन की स्थापना बहुत कम कवि कर पाते हैं। टूटा हुआ ट्रक भी पूरी तरह निराश नहीं है। बिल्कुल मशीनी चीज टूटने के बाद भी यात्रा पर चल देने को तैयार है। वनस्पति इसकी मरम्मत कर रही है...जो क्षुद्र है, नष्टप्राय है उसे देखकर भी केदार जी को लगता है कि जीवन रहेगा, पृथ्वी रहेगी-‘‘सिर्फ़ इस धूल का लगातार उड़ना है जो मेरे यक़ीन को अब भी बचाये हुए है-नमक में, और पानी में और पृथ्वी के भविष्य में।’’ उन्हें दुखी करता है (कीड़े की मृत्यु)। जीवन के प्रति यह सम्मान ही केदारजी के इस संग्रह की मुख्य अन्तर्वस्तु है।

अरुण कमल


विज्ञप्ति



‘यहाँ से देखो’ के इस संस्करण में में तीन कविताएं (‘झरबेर’ ‘बुद्ध के बारे में सोचना’ और संयोग) और जोड़ दी गयी हैं, जो किन्हीं कारणों से पहले संस्करण में नहीं दी जा सकीं थीं।


-केदार नाथ सिंह


तीसरे संस्करण के बारे में


‘यहाँ से देखो’ का तीसरा संस्करण प्रकाशित हो रहा है, जो दूसरे संस्करण का ही अविकल रूप में पुनर्मुद्रण है। इस समय इतना ही।


-केदारनाथ सिंह


कविता  क्या है


कविता क्या है
हाथ की तरफ
उठा हुआ हाथ
देह की तरफ झुकी हुई आत्मा
मृत्यु की तरफ़
घूरती हुई आँखें
क्या है कविता
कोई हमला
हमले के बाद पैरों को खोजते
लहूलुहान जूते
नायक की चुप्पी
विदूषक की चीख़
बालों के गिरने पर
नाई की चिन्ता
एक पत्ता टूटने पर
राष्ट्र का शोक
आख़िर क्या है
क्या है कविता ?
मैंने जब भी सोचा
मुझे रामचन्द्र शुक्ल की मूछें याद आयीं
मूंछों में दबी बारीक-सी हँसी
हँसी के पीछे कविता का राज़
कविता के राज पर
हँसती हुई मूँछें !

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एक ठेठ देहाती कार्यकर्ता के प्रति



वक़्त-बेवक्त
वह साइकिल दनदनाता हुआ चला आता है
कई बार मैं झुँझला उठता हूँ
उसके इस, तरह आने पर
उसके सवालों और उसके तम्बाकू पर
तिलमिला उठता हूँ मैं
मैं बेहद परेशान हो जाता हूँ
उसकी ग़लत-सलत भाषा
उसके शब्दों से गिरती धूल
और उसके उन बालों पर
जो उसके माथे से पूरी तरह उड़ गये हैं।

कई बार
उसकी भूकम्प-सी चुप्पी
मुझे अस्तव्यस्त कर देती है

उसकी साइकिल में हवा
हमेशा कम होती है
हमेशा उसकी बग़ल में होता है
एक और कोई चेहरा
जिस थाने पर बुलाया गया है
मुझे थाने से चिढ़ है
मैं थाने की धज्जियाँ उड़ाता हूं
मैं उस तरफ़ इशारा करता हूँ
जिधर थाना नहीं है
जिधर पुलिस कभी नहीं जाती
मैं उस तरफ़ इशारा करता हूँ

वह धीरे से हँसता है
और मेरी मेज़ हिलने लगती है
मेरी मेज़ पर रखी किताबें
हिलने लगती हैं
मेरे सारे शब्द और अक्षर
हिलने लगते हैं

मैं उसे रोकता नहीं
न कहता हूं कल परसों
दोपहर
शाम

वह उठता है
और दरवाज़ो को ठेलकर
चला जाता है बाहर

मेरी उम्मीद
उसका पीछा नहीं करती
सिर्फ़ कुछ देर तक  
चील की तरह हवा में मँडराती है
और झपट्टा मारकर
ठीक उसी जगह बैठ जाती है
जहाँ से वह चला गया था
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