सूरजमुखी अँधेरे के - कृष्णा सोबती Surajmukhi Andhere ke - Hindi book by - Krishna Sobti
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सूरजमुखी अँधेरे के

कृष्णा सोबती

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :141
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2701
आईएसबीएन :9788126716395

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डार से बिछुड़ी और यारों के यार से अलग और आगे इस उपन्यास में कृष्णा सोबती ने गहन संवेदना के स्तर पर कलाकार की तीसरी आँख से पर्त-दर-पर्त तन-मन की साँवली प्यास को उकेरा है...

Surajmukhi Andhere Ke

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

रेशम की-सी नरम ठंडी मगर ऊष्म शैली में प्रस्तुत इस उपन्यास में एक ऐसी लड़की की कहानी है जिसके फटे बचपन ने उसके सहज भोलेपन को असमय चाक कर दिया और उसके तन-मन के गिर्द दुश्मनी की कँटीली बाड़ खींच दी।

अन्दर और बाहर की दोहरी दुश्मनी में जकड़ती रत्ती की लड़ाई मानवीय-मन के नितान्त उलझी हुई चाहत और जीवन भरे संघर्ष का दस्तावेज है।
मित्रो मरजानी, डार से बिछुड़ी और यारों के यार से अलग और आगे इस उपन्यास में कृष्णा सोबती ने गहन संवेदना के स्तर पर कलाकार की तीसरी आँख से पर्त-दर-पर्त तन-मन की साँवली प्यास को उकेरा है।
आधुनिक भाव-बोध की पीठिका पर मनोविज्ञान की गूढ़तम पहेलियों को सादगी से आँक कर सोबती ने एक ऐसे वयस्क माध्यम और शिल्प की स्थापना की है जो एक साथ परम्परागत शिल्प और मूल्यों की चुनौती है।

आदर्शों की भव्यता से अलग हटकर सूरजमुखी अँधेरे के याथर्थ और सत्य के निरूपण की वह असाधारण सत्य-कथा है जिसका सत्य कभी मरता नहीं।

 

पुल

आसपास चलते लोगों से बेख़बर रत्ती बर्फ कौ रौंदती आगे बढ़ती चली। चाल में अजीब बहशीपन था। तेज़ी थी। दस्ताने वाले हाथ कभी कोट की जेब से बाहर आते और बालों को सख्ती से तरेरकर वापस पॉकेट में चले जाते।

बर्फ के जूते पाँव-तले बिछी सफेदी पर ब्लाक के ठप्पे की तरह पक्के निशान ठोकते चले—छप्प...छप्प...छप्प। सड़क के साथ-साथ ठंडी मरी लकड़ी के जंगले को बर्फ की तह ने ढाँप रखा था।

अचानक मोड़ पर ठिठक कर रत्ती ने घड़ी देखी। छः। आँखें में खूँखार बेबसी की लपक कौंधी, पर पाँव रुके नहीं।
सालों पुराना दिन सालों पुरानी शाम। वही बर्फीली सरदी।
गले में उठता धुआँ लम्बी साँस से रत्ती ने अन्दर खींच लिया कि किसी काली परछाईं ने झपट चेहरे को काला कर दिया।

रत्ती ने ओंठों को मरोर दे मानो अपने से वायदा किया हो कि वह रोएगी नहीं।
दूरी को फलाँगती रत्ती हवाघर के पास जा पहुँची। गुम्बद की गोलाई और गोलाई से अटा रेलिंग। फिर एक छोटी-सी सीढ़ी। वही सीढ़ी। रत्ती ने ऊपर कदम रखा और हाथ फैला रेलिंग को भींच लिया।

झपटता। पटकता। वही हाथ !
नहीं...नहीं..यह जगह वह नहीं। नहीं हो सकती। नहीं...
साहसा एक तीखी सहम ने रत्ती की देह को ऐंठ दिया। दोनों ओर के उभार ऐसे तन गए कि किसी ने पंजों से जकड़ लिया हो।

रत्ती ने बेबसी से रेलिंग पर माथा झुका लिया। इस  लड़की को, इस लड़की को एक बार भी समूची औरत बनने क्यों नहीं दिया ? क्यों....
रत्ती ने सिर पर स्कार्फ बांध लिया और बदहवासी में उतराई पर से नीचे उतरने लगी।
‘स्कैंडल पॉइंट’ पर लोगों को घूरते पाया तो अपने को समेटा। पुराने अँधड़ को दिल के अँधियारे में डाल रेस्तराँ की सीढ़ियाँ चढ़ने लगी।

हर बार की तरह यह उसकी बेमंज़िल मंज़िल है। गरमाते, सहलाते आब के सगे घूँट, और कुछ नहीं। बड़े हॉल को रौंद कोने में जा बैठी। ऑर्डर दिया, ‘‘तेज़ : जिन।’’
इस पर तबाह वे सब उनके लिए भटकती यह एक !
पुराने खिलाड़ियों की तरह खुद ही ओठों को शह दी।
मात दी और बड़े घूँटों में गिलास खाली कर दिया।
‘‘एक बड़ा और !’’
काँच में से बाहर झाँका। गर्म कपड़े में लिपटे लोग ज़िन्दगी के टुकड़े मालूम देते थे।
एक तीखी मुस्कान ओठों पर फैल गई। एक वह है जो सिर्फ़ चिथड़ा है।

अपने आगे फिर गिलास खाली पाया तो बैरा को इशारा किया, ‘एक और !’
इस बार की ‘जिन’ तीखी नहीं थी। फीकी भी नहीं। सिर्फ थी। वह खुद सिर्फ है। उसका तीखापन, कड़ुवापन सब मर गए हैं। वह फीकी है। एक फीकी औरत। जो कभी औरत नहीं थी।
एकाएक पाया कि तीसरी पारी ने झँझोर दिया है।  कमर की सरसराहट में तूफान-सा मचला और छाती पर काँटों की बाढ़ उग आई।
हर बार कहीं पहुँच सकने की न मरनेवाली चाह और हर बार वीरान वापसी अपनी ओर। हर बार।
सामने बैठे तीन ओवरकोटों पर नज़र डाली और पाया कि अब भी इस मुखौटे पर कुछ ऐसा है कि आँखें उठें और रुकें।

खाली गिलास मेज़ पर रखते-रखते निगाह से तीनों चेहरों के आकार पोंछ दिए बिल लाने को संकेत दे दिया।
उठी तो बदन में थरथराहट थी। चाल में सरूर-भरा अनोखापन और माथे पर उभर रहा अपनी मालकिन होने का तेवर।

सीढ़ियाँ उतर नीचे आयीं तो तार-घर की ‘नियोन-साइन’ में अपनी ही इबारत कौंध गई।
 वह जिसने कभी किसी को नहीं पाया और जिसको कभी किसी ने नहीं।

रुलाई से रत्ती की आँखें डबडबा आईं। चाल धीमी हो गई। जिस सड़क का कोई किनारा नहीं—रत्ती वही है।
वह आप ही अपनी सड़क का ‘डैड-हैंड’ है। आखिरी छोर है।
चौड़ा मैदान सुनसान था। दुकानों के बल्ले बन्द थे। पोस्ट-आफिस के आगे खड़े इक्के-दुक्के लोग धुँध में खड़े पेड़ों के साये-से लगते थे।
बहुत बार रौंदे हैं रास्ते, पर पहुंचने की मंजिल न थी। फिर भी इन राहों पर चलना अच्छा है। रातों में किसी के पास न सोकर भी जीना अच्छा है। और भी अच्छा है इन पाँवों से चलना–उतरना।

समर-हिल के पास पहुँची तो धुँध में लटके काले पेड़ों की कतार में सहसा एक रोशनी झिलमिला गई ! हाथ में टार्च लिये केशी को पहचाना तो हौले से कहा, ‘‘लौटने में देर हो गई !’’
केशी ने देखा-भर और रत्ती के पिछले घंटों को सूंघ लिया।
‘‘बर्फ गिरने को है।’’
‘‘है तो !’’
घर के फाटक पर पहुँचे तो जाने क्यों रत्ती को किसी कटती सड़क का एहसास हुआ। जी हुआ, बाँह छुड़ाकर वह उसी राह पर बढ़ती जाए जो इस फाटक के बाहर है और उसकी है।
पाया, केशी ने थाम नहीं रखा है, बाँह पर एहतियात की एक छुअन-भर।
‘बज़र’ देने पर दरवाज़ा खुला कि कोई अँधेरी गुफा जगमगा उठी।

लाल पैंट पर हरी जर्सी और तरेर-भरे चेहरे पर गर्म सोतो-सी दो आँखें। ओठों पर छेड़ती-सी मुस्कराहट।
‘‘ए—अपनी दोस्त को लिवा लाए हो न !’’
केशी ने एक सहलाती नज़र रीमा तक पहुँचा दी, जहाँ से कोई जवाब नहीं दिया जाता।
ओवरकोट खूँटी पर टाँगते रत्ती ने उन चार आँखों को एक प्यासी निगाह दी। जहाँ कोई बैरियर नहीं—वहीं थे वे।
इसी एक लमहे में केशी ने किसी किताब का ‘टाइटल’ देख लिया। बुखारी के पास कुर्सी खींची और बैठने का संकेत दिया।
रत्ती ने खुली आँखों से केशी को देखा कि केशी ने देख लिया है और अनजानी ज़िद में मोज़े उतार एक ओर रख दिए हैं।
रीमा अन्दर आई। रत्ती के उघड़े पाँव देखे और ट्रे मेज़ पर रख दी।
रत्ती ने काँच के गिलास देखे तो आँखें मूँद अपने अन्दर हो गई। कैबिनेट का खुलना, फिर वह सगी आवाज़ जो सिर्फ ढालने से आती है।
आँखें उठाईं तो केशी गिलास थामते थे।
रत्ती ने केशी के हाथ नहीं, स्वेड में लिपटे पाँव देखे, फिर चेहरा, और ओंठों से उठाकर एक लम्बा घूँट अन्दर खींच लिया।


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