त्याग का भोग - इलाचन्द्र जोशी Tyag Ka Bhog - Hindi book by - Ila Chandra Joshi
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त्याग का भोग

इलाचन्द्र जोशी

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 1996
पृष्ठ :411
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2354
आईएसबीएन :00000

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इसमें एक अनाथ लड़की के जीवन पर प्रकाश डाला गया है...

Tyag Ka Bhog



 ‘त्याग का भोग’ उपन्यास के नायक नृपेन्द्ररंजन द्वारा मनिया नाम का एक जिप्सी लकड़ी के विलक्षण जीवन की कहानी सुनायी गयी है। यायावर जाति की एक अनाथ लड़की के जीवन में घटनाओं के घात-प्रतिघात से कितना परिवर्तन हो सकता है, यह इस उपन्यास से जाना जा सकता है। अंतश्चेतना का विश्लेषण इसमें पग-पग पर पाया जाता है।

उपन्यास जीवन का एक वृहत्तर चित्र प्रस्तुत करता है; अतः यह बहुत स्वाभाविक है कि उसमें जीवन की मार्मिक घटनाओं के साथ धर्म, दर्शन, राजनीति, कला और मनोविज्ञान की चर्चा पायी जाय। श्रेष्ठ साहित्यकार को जीवन के गंभीर अनुभव के आधार पर, मानव-मन की सच्ची परख होनी चाहिए। यह तो हुई एक बात। और मनोविज्ञान पर लिखे गए ग्रन्थों में वर्णित घटनाओं के आधार पर निर्मित सिद्धान्तों की जानकारी का परिचय देने के लिए कथा-साहित्य की सृष्टि, एक बिल्कुल ही दूसरी बात। इलाचंद्र जोशी दूसरी कोटि के साहित्यकारों में से हैं। पश्चिम में फ्रायड, एडलर और जुंग द्वारा प्रचारित सिद्धातों से वे इतने अभिभूत हुए कि उन्हें प्रतिष्ठित करने के लिए इन्होंने अनेक उपन्यासों की रचना की। इनकी कृतियों में अंतर्मुखी स्वभाव के पात्रों की अधिकता, मानसिक कुंठाओं के सूक्ष्म विश्लेषण तथा मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों पर लंबे भाषणों के साथ विस्तृत वाद-विवाद के कारण, किसी अन्य तत्त्व की अपेक्षा मनोवैज्ञानिक शैली ही प्रमुख हो उठी और इसी से इनकी ख्याति मनोविश्लेषण-प्रणाली के प्रमुख प्रचारक के रूप में हो गयी।

पूर्वकथा


उस वर्ष मैं गरमियों में मसूरी गया हुआ था-अकेला। जिस होटल में मैं ठहरा हुआ था वहाँ से देहरादून की तरफ का विस्तृत दृश्य स्पष्ट दिखायी देता था। एक दिन मैं दोपहर का खाना खाने के बाद कुछ देर धूप खाने के इरादे से बाहर बरामदानुमा आँगन में एक आराम-कुर्सी पर बैठा हुआ देहरादून की ओर मुँह किये हुए नीचे दूर तक फैले हुए ढालुवाँ विस्तार का दृश्य देखने में तल्लीन था। देहरादून से मसूरी तक मोटर की जो सड़क सर्पगति से चक्कर खाती हुई नीचे से ऊपर को चली जाती थी उस पर चलने वाली मोटरें बच्चों के खिलौनों की तरह दिखाई दे रही थीं। दूर, राजपुर के पास, छोटे-छोटे पहाड़ी खेत सीढ़ियों की तरह नीचे से ऊपर को कतार बाँधे हुए थे। कुरर पक्षियों का अविराम क्रंदन-स्वर चारों ओर के एकांत पहाड़ी वातावरण को एक निराली, मोहक वेदना में मग्न कर रहा था। सहसा पीछे से किसी ने मेरा ध्यान भंग करते हुए कहा-‘‘नमस्कार।’’

मैंने घूमकर देखा तो एक सज्जन, जिनकी आयु प्रायः तीस और पैंतीस के बीच की होगी, और जो नीचे लंकलाट का चूड़ीदार पायजामा और ऊपर सफेद कमीज के ऊपर कत्थई रंग की गरम बनियाइन पहने थे, प्रेमपूर्वक मुस्करा रहे थे। उनसे मेरा कोई पूर्व परिचय न होने से उनका वह प्रेमभाव मुझे कुछ विचित्र-सा लगा। मैंने शिष्टापूर्वक उनकी ओर हाथ जोड़ दिये और विनम्रता के साथ कहा-
‘‘क्षमा कीजियेगा, मैंने आपको नहीं पहचाना। आपका शुभनाम ?’’
‘‘मेरा नाम नृपेन्द्ररंजन है। बुलन्दशहर जिले में रहता हूँ। हवा बदली के इरादे से आज ही यहाँ आया हूँ।’’
‘‘बड़ी प्रसन्नता हुई आपका परिचय पाकर। पर क्या आपने मुझे पहचान कर नमस्कार किया था...?’’
‘‘मैंने पहचान कर ही आपको नमस्कार किया है’’, एक अजीब-सी मुसकान मुख पर झलकाते हुए मेरे नव-परिचित मित्र बोले।

‘‘पर यह संभव कैसे हो सकता है ?’’
 ‘‘होटल के दफ्तर में होटल के निवासियों की जो सूची टँगी रहती है उसमें सब नाम कल शाम मैंने कौतूहलवश पढ़ डाले थे। उनमें एक नाम के सम्बन्ध में मेरी दिलचस्पी जगी। मैनेजर से पूछा। उसने कमरे का नम्बर और हुलिया बता दिया। आपको ठीक उसी नम्बर के कमरे के आगे बैठा देखकर और आपके बड़े-बड़े बाल....’’
‘‘ठीक है, ठीक है, बिराजिये। पास वाली कुर्सी ले लीजिये।’’
आगंतुक सज्जन-उर्फ श्री रंजन-ने कुर्सी खींच ली और मेरी बगल में बैठ गये।
‘‘कहिये, मसूरी का पहाड़ी वातावरण आपको कैसा पसंद आया ?’’
‘‘मुझे यह स्थान बहुत प्रिय है’’, श्रीयुत रंजन बोले-‘‘पिछले कुछ वर्षों से मैं गरमियों में कम से कम एक महीने के लिये यहाँ अवश्य चला आता हूँ...’’

और धीरे-धीरे हम दोनों के बीच काफी घनिष्ठता हो गयी। साहित्य के प्रति रंजनजी की विशेष रुचि का परिचय मुझे मिला। मैंने देखा कि वह केवल एक साधारण रसग्राही नहीं, बल्कि कलामर्मज्ञ भी हैं, हालाँकि उन्होंने कभी एक शब्द भी लिखकर किसी पत्र में नहीं छपाया था। लिखने के प्रति उनकी वह विरक्ति मुझे और अधिक आकर्षक लगी। मेरी जो-जो कहानियाँ या उपन्यास उन्होंने पढ़े थे उनके नायकों के चारित्रिक विश्लेषण सम्बन्धी बातों में वह काफी देर तक मुझे उलझाये रहे। जब साहित्य-चर्चा कुछ ढीली पड़ने लगी तब वह बोले-‘‘चलिये कहीं टहला जाय। यहाँ बैठे-बैठे क्या कीजियेगा ?’’

मैं दोपहर में घूमने का आदी नहीं था। केवल शाम को एक बार अकेले हवाखोरी के लिये निकल पड़ता था। होटल के निवासियों से मेरी घनिष्ठता केवल बाहरी बोलचाल तक ही सीमित थी। उस दिन पहली बार मुझे एक साथी मिला जिसने मुझे इस हद तक अपनी ओर खींच लिया कि दोपहर को टहलने का प्रस्ताव भी मैं टाल न सका।

अपने-अपने कमरे में जाकर कपड़े पहन कर हम दोनों निरुद्देश्य भ्रमण के इरादे से बाहर निकल पड़े। जब हम लोग ऊपर बड़ी सड़क पर पहुँचे तब दोनों ने मिलकर इस बात पर विचार किया कि किस ओर निकला जाय। अन्त में यह तय हुआ कि इस समय लंधौर बाजार की सैर की जाय, शाम को माल की ओर चलेंगे। प्रायः दो फर्लांग तक की चढ़ाई तय करने पर सड़क के बायें किनारे पर बिसाती की कुछ खुली दुकानें पास पास सजायी हुई दिखाई दीं, कुछ जिप्सी लड़कियाँ उन दुकानों का संचालन कर रही थीं। मेरे मित्र एक दुकान के पास खड़े हो गये और बड़े गौर से वहाँ सजायी गयी प्रत्येक छोटी से छोटी चीज का निरीक्षण करने लगे। सस्ते किस्म की छुरियाँ, कैंचियाँ, सुई-तागा सिन्दूर की पुड़ियाँ छोटी-छोटी चम्मचें अलुमिनियम की बनी हुई चाय की छलनियाँ, बच्चों को खेलाने के लिये बने हुए लकड़ी के रंगीन लट्टू आदि ऐसी चीजें वहाँ सजायी हुई थीं जो स्पष्ट ही मेरे मित्र के किसी विशेष काम की नहीं थीं। जिस दुकान के पास हम लोग खड़े थे, वहाँ पर बैठी हुई लड़की सूरत शक्ल से कुछ-कुछ ईरानी सी लगती थी। उसकी उम्र बीस-बाईस वर्ष से अधिक न होगी। उसकी आँखें बड़ी चंचल लगती थीं और वह बड़ी उत्सुकता से रंजनजी की ओर देख रही थी। रंजनजी ने नीचे झुक कर एक छोटी सी कैंची उठा ली और उसका दाम पूछने लगे। लड़की ने अत्यन्त उत्साहित होकर जो दाम बताया वह स्पष्ट ही बाजार की दर से दुगना था। पर रंजनजी ने बिना मोल-तोल किये ही उसे मुँह माँगा दाम दे दिया और कैंची जेब में डालकर उन्होंने मुझसे आगे बढ़ने का संकेत किया। लड़की पीछे से बोली-‘‘बाबू जी, यह बढ़ियावाला चाकू भी खरीद लीजिये !’’
‘‘कल खरीदेंगे’’, पीछे की ओर न देखकर रंजनजी बोले।

जब हम लोग कुछ आगे बढ़े तो मैंने कहा-‘‘आपने कैंची यहाँ खरीद कर बड़ी भूल की। आगे चलकर किसी बड़ी दुकान में आपको इससे कई गुना अच्छी कैंची इतने ही दामों में मिल जाती। और यह कैंची आपके किस काम आयगी, मैं नहीं समझा। नाखून तक इससे नहीं कटेगा।’’
‘‘आप ठीक कहते हैं, पर चूँकि मैं दुकान पर खड़ा हो गया था, इसलिये कुछ न कुछ खरीदना लाजमी था।’’
मैं फिर इस सम्बन्ध में कुछ न बोला।

दूसरे दिन फिर रंजनजी ने दोपहर को टहलने का प्रस्ताव किया उस दिन भी हम लोग लंधौर की ओर निकल पड़े। रंजनजी ठीक उसी दुकान पर खड़े हो गये जहाँ वह पिछले दिन खड़े हुए थे। उनके खड़े होते ही वही चंचल-स्वभाव ईरानी लड़की बड़ी फुरती से एक चाकू हाथ में उठाकर बोल उठी-‘बाबूजी, यह लीजिये चाकू जिसे आपने खरीदने को कहा था।’’
रंजनजी उसकी वह हड़बड़ी देखकर कुछ क्षणों तक मंद-मंद मुस्कराते रहे। मैंने देखा, उनकी उस सुगंभीर मुस्कान में एक अर्द्धस्फुट करुणा और मार्मिकता छिपी हुई थी। बिना किसी बहस के उन्होंने वह चाकू ले लिया और मुँहमाँगा दाम दे दिया। इसके बाद वह मेरा हाथ पकड़ कर आगे बढ़ गये। वह चाकू स्पष्ट ही उनके किसी भी काम का न था। उसका हत्था लकड़ी का बना था और फल एकदम कुन्द था। छोटे-छोटे बच्चों के खेलने के काम का था। पर आज मैंने उस सम्बन्ध में कोई प्रश्न उनसे नहीं किया। तब तक मेरे आगे यह बात बिलकुल साफ हो गयी थी कि वह उस दुकान से कोई चीज किसी उपयोगिता की दृष्टि से नहीं खरीदते हैं, बल्कि कोई विशेष मनोभाव ही उन्हें उस दुकान पर ठहर जाने के लिये प्रेरित करता है। पर वह मनोभाव क्या हो सकता है ? क्या उस खानाबदोश ईरानी लड़की की शारीरिक सुन्दरता का उससे कोई सम्बन्ध है ? क्या उनके समान साहित्य-कला मर्मज्ञ और जीवन के गहरे अनुभवों से शिक्षा-प्राप्त (जैसा कि उनकी बातों से पता चलता था) व्यक्ति भी इस तरह के थोथे मनोभावों से परिचालित हो सकता है ?

उसी रात को डाइनिंग रूम में रंजनजी के साथ ही भोजन करने के बाद जब मैं अपने कमरे में जाकर आराम करने का विचार कर रहा था तब भी उन्होंने मुझे नहीं छोड़ा और बोले-‘‘आपके कमरे में कुछ देर गपशप की जाय। अभी जल्दी है। अभी से सोकर क्या कीजियेगा !’’
मैं केवल शिष्टतावश उनके प्रस्ताव का विरोध न कर सका, अन्यथा उस दिन मैं बहुत थका हुआ था और गपशप करने की न तो मुझमें शक्ति ही रह गयी थी न प्रवृत्ति ही।
कमरे में पहुँच कर ठंडी हवा से बचने के लिये भीतर से किवाड़ फेरकर मैं अपने बिस्तर पर लिहाफ के भीतर दुबक गया-केवल मुँह खोले रहा। रंजनजी पास ही एक सोफा पर आराम से बैठकर सिगरेट फूँकने लगे।
मेरा ‘मूड’ खराब हो गया था और उसी खीज की मन:स्थिति में मेरे भीतर दबा हुआ व्यंग बरबस उभर उठा। सहसा मैंने ईरानी लड़की की दुकान की चर्चा छेड़ते हुए कहा-‘‘जो चाकू आज आपने खरीदा था उससे आप क्या काम ले सकेंगे मैं समझा नहीं!’’

रंजनजी ने केवल मन्द-मन्द मुस्कराते हुए सिगरेट से एक कश ली। उस प्रश्न का कोई प्रभाव उन पर न पड़ते देखकर मैंने अपनी जबान को और अधिक सान पर चढ़ाते हुए कहा-‘‘उस ईरानी लड़की के प्रति आप बड़े सदय मालूम होते हैं। कल कौन-सी चीज खरीदने का विचार है-चाय की छलनी ?’’
रंजनजी ठठाकर हँस पड़े। जब उनका वह हास्यभाव ठंडा पड़ा तब मैंने व्यंग्य और परिहास का भान त्यागकर सहज भाव से कहा-‘‘मैं बहुत उत्सुक हूँ यह जानने के लिये-’’

‘‘कि मैं उस ईरानी लड़की से चाकू और कैंची क्यों खरीदता हूँ ? यही बात है न ? यदि आप का कुतूहल इस सम्बन्ध में सचमुच इस कदर बढ़ गया है तो मैं उसका निवारण करने को तैयार हूँ। किस्सा लम्बा है, मुझे सुनाने में कोई आपत्ति नहीं है। पर एक शर्त है-आप चुपचाप सुनते जायँ, बीच में कोई प्रश्न करके मुझे टोकें नहीं।’’
मैंने सूचित किया कि मुझे उनकी शर्त मंजूर है। उसके बाद रंजनजी ने अपना किस्सा सुनाना आरम्भ किया। किस्सा बड़ा दिलचस्प था। सारी रात बीत गयी, पर वह समाप्त न हुआ। उसके बाद कई दिनों तक वह किस्सा चला। जब भी हम दोनों अवकाश पाते मैं उनसे उनकी जीवन-कथा को आगे बढ़ाने का अनुरोध करता रहता। उनके उस लम्बे दास्तान को मैं भरसक उन्हीं के शब्दों में अगले परिच्छेदों में लिपिबद्ध कर रहा हूँ।

1


मसूरी में उस दिन जिस ईरानी जिप्सी लड़की की दुकान में मैंने चाकू खरीदा उसमें मेरी कोई खास दिलचस्पी नहीं थी। पर वह एक ऐसी लड़की की याद मुझे अक्सर दिलाती रहती है जो कुछ ही वर्ष पहले तक उसी स्थान पर उसी की तरह बिसाती की दुकान खोले रहती थी और वैसी ही चंचल और फिर भी दोनों की आकृति-प्रकृति में बहुत अंतर था। ईरानी लड़की के मुख पर एक ऐसा रूखापन छाया हुआ है जो मेरे मन को बरबस पीछे को ढकेलता है, पर उस लड़की के मुख से एक ऐसी स्निग्ध, सरस और सरल सहृदयता का भाव टपका पड़ता था जो किसी भी पथ भूले हुए पथिक को अपनी ओर खींचता था और बिना कुछ बोले ही उसे सांत्वना देता था। विशुद्ध शारीरिक दृष्टि से भी दोनों में बहुत अंतर था। ईरानी लड़की का चेहरा कुछ लंबा है, पर जिस लड़की की बात मैं कहने जा रहा हूँ, उसका मुँह कुछ गोल था। उसकी आँखें कुछ छोटी थीं और अपनी सरलता के भीतर ही किसी अजानित रहस्यलोक का आभास छिपाये हुए थीं। ईरानी लड़की की नाक लंबी है और उसका सिरा एकदम तीखा है। पर उस लड़की की नाक अपेक्षाकृत छोटी और सिरे पर गोलाई लिये हुए थी। ईरानी लड़की के मुख की अभिव्यक्ति से मेरे मन में यह विश्वास जगने लगता है कि वह जन्म-जात अपराधिनी और क्रूर-कर्मिणी है। पर जिस लड़की का किस्सा मैं कहने जा रहा हूँ उसकी और एक झलक देखने से ऐसा बोध होने लगता था कि उपनिषत्कार ने शुद्धं अपापबिद्धम की कल्पना उसी के समान किसी लड़की का चेहरा देखकर ही की होगी। ईसा की माता मेरी के संबंध में ईसाई कवियों ने जिस ‘इम्मेक्युलेट कन्सेप्शन’ की बात कही है उससा पहला अनुभव मुझे उसी लड़की को देखने पर हुआ।

वह लामा स्त्रियों का सा लहँगा पहने रहती थी और उन्हीं की तरह सिर पर एक विशेष ढंग का कपड़ा बाँधे रहती थी। पर उसकी आकृति से यह विश्वास नहीं होता था कि वह लामा जाति की हो सकती है। उसकी आँखें छोटी अवश्य थीं, और नाक भी किस कदर छोटी और गोल थी, पर हद तक नहीं कि उसे मंगोल जातीय कहा जा सके। मुझे पूरा विश्वास है कि यदि वह साड़ी पहने होती तो उसके पूर्णतः भारतीय होने में किसी को रंचमात्र भी संदेह न होता।
मैं उस साल पहली बार मसूरी आया हुआ था। एक दिन यों ही टहलते हुए जब मैं ठीक उसी स्थान पर पहुँचा जहाँ वह ईरानी लड़की बैठी तब सहसा मेरी दृष्टि उस लामा भेषधारिणी लड़की पर जाकर ठहर गयी। उसके असाधारण रूप रंग ने मुझे इस कदर आकर्षित किया कि मैं उसकी दुकान के पास जाकर ठहर गया। लड़की ने तीतर की तरह तीखे किन्तु स्निग्ध और मधुर स्वर में कहा-
‘‘बाबूजी, क्या चाहिये ?’’

मेरा हाथ बरबस एक चाकू पर चला गया। यह ‘‘छः आने का चाकू है, ले लीजिये, बाबूजी ! इससे कम पर आपको इस लाइन की किसी भी दुकान पर नहीं मिलेगा।’’ विशुद्ध हिंदी में बिना किसी विदेशी उच्चारण के लड़की ने कहा। उस लाइन में जिप्सी (खाना-बदोश) लड़कियों की चार-पाँच दुकानें और लगी हुई थीं। मैंने वह चाकू ले लिया और उसके बाद दूसरी चीजें देखने लगा। जिस तरह की चीजें वहाँ थीं उनमें से किसी भी खास चीज में मेरी कोई विशेष दिलचस्पी नहीं हो सकती थी। पर मुझे लड़की से बातें करने का बहाना ढूँढ़ना था। दूसरी बार सिंदूर की एक बंद पुड़िया पर मेरा हाथ रुक गया। तत्काल लड़की बोल उठी-‘‘यह बहुत मशहूर सिंदूर है, बाबूजी, ले लीजिये। बीबीजी को यह बहुत पसंद आयेगा। यहाँ की सब औरतें यही सिंदूर खरीदती हैं।’’

मैं लड़की से कैसे कहता कि मेरे घर में कोई ‘बीबीजी’ नहीं हैं, मेरा विवाह ही नहीं हुआ है।
वह कहती चली गयी-‘‘दूसरी तरह के सिंदूर माँग में भरे जाते हैं तो उनसे सिर में दर्द होने लगता है, ऐसा मैंने सुना है। पर इस सिंदूर के बारे में अभी तक कोई शिकायत सुनने में नहीं आयी है।’’
मैंने मौका पाकर कहा-‘‘तुम्हें कैसे मालूम कि सिंदूर माँग में भरी जाती है ? हिंदू औरतों के यहाँ के रीति-रस्मों की जानकारी तुम्हें कैसे हो गयी ? तुम तो तिब्बती हो न ?’’
लड़की मुस्करायी। उस निश्छल मुसकान की मोहकता का वर्णन करने में मैं असमर्थ हूँ, क्योंकि मैं कोई कवि नहीं हूँ। वह बोली-‘‘मैं तिब्बती नहीं हूँ। मेरा जन्म यहीं हुआ है और हिन्दू घरों में ही बड़ी हुई हूँ।’’

मैंने पूछा-
‘‘पर तुम यह तिब्बती पोशाक क्यों पहनती हो ?’’
‘‘इसलिये कि मेरा बाप तिब्बती था।’’
‘‘और माँ ?’’
‘‘माँ यहीं की थी। राजपुर में उसका जन्म हुआ था।’’
राजपुर मसूरी के नीचे एक छोटा सा पहाड़ी स्थान है। मेरा कौतूहल उसके संबंध में घटने के बजाय बढ़ गया। मैं और भी बहुत सी बातें पूछना और जानना चाहता था, पर बीच सड़क में दुकान खोलकर बैठने वाली लड़की से उसके जन्म, कुल और जीवन के संबंध में अधिक बातें करना अशोभन जान-कर मैं अनिच्छापूर्वक वहाँ से उठकर जाने लगा। दो कदम आगे बढ़ा हूँगा कि लड़की पीछे से दौड़ी आयी और मुझे याद दिलाती हुई बोली-‘‘आप यह सिंदूर नहीं ले गये, बाबूजी।’’ ससंकोच मैंने सिंदूर की पुड़िया उसके हाथ से ले ली और जो दाम उसने माँगा वह देकर मैं चला गया। एक बार इच्छा हुई कि सिंदूर की उस पुड़िया को कोट की जेब में डाल कर अनमने भाव से लंधौर बाजार की ओर बढ़ा मन में एक अजीब सी बेचैनी समा गयी थी-ऐसी बेचैनी जैसी जीवन में दो-ही-एक बार अत्यंत असाधारण परिस्थितियों में ही संभव होती है।
घटना केवल चार ही वर्ष पूर्व की है। पर चार वर्ष पूर्व मेरे मन में और शरीर में जो स्फूर्ति थी वह आज कल्पनातीत सी हो गयी है।

तब मैं अपने को पूर्ण युवा अनुभव करता था। मैं समस्त सांसारिक उत्तर दायित्वों से रहित था, मेरा स्वास्थ भी अच्छा था। पहाड़ पहली बार आया हुआ था। पहाड़ का शुभ्र समुज्ज्वल प्राकृतिक वातावरण और साथ ही आनन्दान्वेषी नर-नारियों से घिरा हुआ और रंगमय वातावरण मिलकर मेरे मन में जीवन के एक नये ही रस की धारा तंरगित कर रहे थे। अपनी ऐसी मनःस्थिति में जब उस लड़की को मैंने पहली बार देखा तब उस नये रस में भी एक अनोखी मंथन क्रिया आरंभ हो गयी और मैं समझ ही न पाया कि मेरे भीतर की कौन रहस्यमयी प्रवृत्ति इतने दिनों तक निष्क्रिय अवस्था में निश्चल पड़ी रहने के बाद आज सहसा किस असाधारण सी प्रेरणा से परिपूर्ण विस्फोट  के साथ उभर उठी है। न जाने वह विस्फोट मुझे कहाँ लाकर पटकेगा।

दूसरे दिन ठीक उसी समय उस लड़की की दुकान पर पहुँचा जिस समय पिछले दिन पहुँचा था। मुझे देखते ही उल्लास से उसका सुन्दर पीला सा चेहरा तमतमा उठा-कम से कम मेरी आँखों को ऐसा ही लगा। ‘‘आइये बाबूजी, आइये ! बीबीजी को सिन्दूर पसंद आया या नहीं ?’’ उसने कहा।
मैं उसके उस प्रश्न का क्या उत्तर देता ! पर कुछ तो कहना ही था। बोला-‘‘सिन्दूर अच्छा था।’’ और फिर छड़ी के सहारे नीचे झुककर दुकान पर सजी हुई चीजों को देखने लगा।
मेरे उत्तर से लड़की का उत्साह स्वभावतः दुगना बढ़ गया। उसने उल्लास भरे स्वर में कहा-‘‘और क्या चाहिये, बाबूजी ?’’
अनमने भाव से मेरा हाथ एक छोटी सी पुस्तिका पर गया। किसी रास्ते प्रेम में छपी हुई उस पुस्तिका के आवरण पृष्ठ पर बड़े-बड़े अक्षरों में छपा हुआ था-‘‘डाकुओं का सरदार।’’

लड़की झट बोल उठी-‘‘बड़ी अच्छी किताब है, बाबूजी, इसे खरीद लीजिये। इसमें डाकुओं के एक बड़े बहादुर सरदार की कहानी है जो गरीबों की मदद किया करता था।’’
मैंने उस पुस्तिका को खरीदने के उद्देश्य से बाएं हाथ में रख लिया। उसके बाद एक दूसरी पुस्तिका पर हाथ लगाया। वह भी उसी प्रेस में छपी हुई मालूम होती थी। ऊपर बड़े बड़े अक्षरों में नाम छपा था-‘‘नौलखा हार।’’

लड़की पहले की ही तरह सहज भाव से बोली-‘इसमें बहुत अच्छी कहानी है। एक राजा एक गरीब किसान की खूबसूरत लड़की को प्यार करने लगा था। उस लड़की से शादी करके उसने उसे अपनी पटरानी बना दिया और नौ लाख अशर्फियों की कीमत का एक जड़ाऊ हार उसे भेंट किया-’’
इस बार मैंने उत्सुक दृष्टि से उसकी ओर देखा-यह जानने के लिये कि प्यार की बात करते हुए उसके मुँह पर कोई नया रंग आता है या नहीं। एक विशेष प्रकार की चमक का एक विशेष प्रकार की चमक का एक बहुत ही हलका-प्रायः अव्यक्त सा-आभास मुझे उसकी आँखों के कोने में झलकता दिखायी दिया। मैं कह नहीं सकता कि वह चमक उसकी बात से किसी भी अंश में सम्बन्धित थी या नहीं।

मैंने पूछा-‘‘क्या तुम पढ़ना जानती हो ?’’
उत्साहित होकर उसने कहा-‘‘हाँ, बाबूजी, मैंने छठे दर्जे तक आर्य कन्या पाठशाला में पढ़ा है।’’
मेरे भीतर जो तूफानी भाव रह-रहकर हिलकोर उठे थे, उन्हें बाहर तनिक भी प्रकट न होने देने के लिए मैं पूरा प्रयत्न कर रहा था। आम सड़क पर उसके पास अधिक देर तक बैठे रहना भी शोभा नहीं था, विशेषकर जब दूसरे कुतूहली ग्राहण मेरे पीछे और अगर बगल में खड़े थे। इसलिये उस दिन भी उससे अधिक बातें न करके में उन दो पुस्तिकाओं के दाम उसे देकर उठ खड़ा हुआ और चल दिया।
उस दिन-भर और रात-भर मैं अशांत हृदय से यह सोचता रहा कि किस उपाय से उसे अपने निकट संपर्क में लाया जाय। समस्त सांसारिक बंधनों से रहित मेरे युवा प्राणों में जो रोमानी रंग पूरे प्रवेश से चढ़ा हुआ था उसने एक विचित्र सूझ मेरे मस्तिष्क को दे दी।

 
 




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