मणिमाला - इलाचन्द्र जोशी Manimala - Hindi book by - Ila Chandra Joshi
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विविध उपन्यास >> मणिमाला

मणिमाला

इलाचन्द्र जोशी

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 1985
पृष्ठ :314
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3232
आईएसबीएन :00000

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एक जिप्सी लड़की को उपन्यास का मुख्य पात्र बना कर लिखा गया जोशी जी का एक महत्त्वपूर्ण उपन्यास...

Manimala

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

पं. इलाचन्द्र जोशी की रचनात्मक प्रतिभा से परिचित लोग यह भलीभाँति जानते है कि पाठ-सम्मोहन को वे उपन्यास का सर्वश्रेष्ण गुण मानते हैं। सिर्फ मनोरंजन ही नहीं वरन् उत्सुकता, चमत्कार और कहानी कहने की मनोरंजक प्रक्रिया पर वे विशेष ध्यान देती हैं।

‘मणिमाला’ नामक इस उपन्यास में उनकी रचना प्रकृति के सारे गुण एक साथ विद्यमान हैं। अपने आस-पास के जीवन से बिल्कुल अलग, दूर मसूरी के एक होटल में वे एक-दूसरे आदमी द्वारा सुनी हुई कहानी को लिपिबद्ध करके पाठक की उत्सुकता को जागृत करते है और एक जिप्सी लड़की को उपन्यास का मुख्य पात्र बना कर उपन्यास को एक ऐसा आयाम देते हैं कि पाठक साँस बाँध कर ‘आगे क्या हुआ’ सोचता हुआ उपन्यास समाप्त कर देता है।

हिन्दी उपन्यास को लोकप्रिय बनाने में जिन उपन्यासकारों की मुख्य भूमिका है उसमें जोशी जी का नाम सर्वप्रथम ही लेना पड़ेगा और उनके अनेक महत्त्वपूर्ण उपन्यासों में ‘मणिमाला’ उनकी रचनाशीलता के समस्त गुणों का आइना है।

यह उपन्यास


उस वर्ष मैं गरमियों में मसूरी गया हुआ था-अकेला जिस होटल में मैं ठहरा हुआ था वहाँ से देहरादून की तरफ का विस्तृत दृश्य स्पष्ट दिखाई देता था। एक दिन मैं दोपहर का खाना खाने के बाद कुछ देर धूप खाने के इरादे से बाहर बरामदानुमा आँगन में एक आराम-कुर्सी पर बैठा हुआ देहरादून की ओर मुँह किये हुए नीचे दूर तक फैले हुए ढालुवाँ बिस्तार का दृश्य  देखने में तल्लीन था सहसा पीछे से किसी ने मेरा ध्यान भंग करते हुए कहा-‘‘नमस्कार !’’

मैंने घूमकर देखा तो एक सज्जन, जिनकी आयु  प्रायः तीस और पैंतीस के बीच की होगी, और जो नीचे लंकलाट का चूड़ी़दार पाजामा और ऊपर सफेद कमीज के ऊपर कत्थई रंग की गरम बनियान पहने थे, प्रेमपूर्वक मुस्करा रहे थे। उनसे मेरा कोई पूर्व परिचय न होने से उनका प्रेमभाव मुझे कुछ विचित्र-सा लगा। मैंने शिष्टाचार्य पूर्वक उनकी ओर हाथ जोड़ दिये और विनम्रता के साथ कहा-‘‘क्षमा कीजियेगा, मैंने आपको नहीं पहचाना। आपका शुभनाम ?’’
‘‘मेरा नाम नृपेन्द्ररंजन है। बुलन्दशहर जिले में मेरी जमींदारी है। हवाबदली के इरादे से आज ही यहां आया हूँ।’’
‘‘बड़ी प्रसन्नता हुई आप का परिचय पाकर। पर क्या आपने मुझे पहचान कर नमस्कार किया था....?’’
‘‘मैंने पहचान कर ही आपको नमस्कार किया है,’’ एक अजीब सी मुसकान मुख पर झलकते हुए मेरे नव-परिचित मित्र बोले।

‘‘पर यह संभव कैसे हो सकता है ?’’
‘‘होटल के दफ्तर में होटल के निवासियों की जो सूची टंगी रहती है उसमें सब नाम कल शाम मैंने कौतुहल पूर्वक पढ़ डाले थे। उसमें एक नाम के सम्बन्ध में मेरी दिलचस्पी जगी। मैंनेजर ने पूछा। उसने कमरे  का नम्बर और हुलिया बता दिया। आपको ठीक उसी कमरे के आगे बैठा देखकर और आपके बड़े-बड़े बाल.....’’
‘‘ठीक है, ठीक है, बिराजिये। पास वाली कुर्सी ले लीजिए !’’
आगंतुक  सज्जन-उर्फ श्री रज्जन-ने कुर्सी खींच ली और मेरी बगल में बैठ गये।
‘‘कहिए, मसूरी का पहाड़ी वातावरण आपको कैसा पसंद आया ?’’
‘‘मुझे यह स्थान बहुत प्रिय है,’ श्रीयुत बोले-‘‘पिछले कुछ वर्षों से मैं गरमियों में कम से कम एक महीने के लिए यहाँ अवश्य आता हूँ......’’

 और धीरे-धीरे हम दोनों के बीच काफी घनिष्ठता हो गई। साहित्य के प्रति रज्जन जी की विशेष रुचि का  परिचय मुझे मिला। मैंने देखा कि वह केवल एक साधारण रसग्राही नहीं बल्कि कला मर्मज्ञ भी हैं, हालाँकि उन्होंने कभी एक शब्द लिखकर किसी पत्र में नहीं छपाया था। लिखने के प्रति उनकी वह विरक्ति मुझे और अधिक आकर्षण लगी। मेरी जो-जो कहानियाँ या उपन्यास उन्होंने पढ़े थे उनके नायकों के चारित्रिक विश्लेषण सम्बन्धी बातों में वह काफी देर तक मुझे उलझाते रहे। जब साहित्य-चर्चा कुछ ढीली पड़ने लगी तब वह बोले-‘‘चलिए कहीं टहला जाए। यहाँ बैठे-बैठे क्या कीजिएगा ?’’

मैं दोपहर में घूमने का आदी नहीं था। केवल शाम को एक बार अकेले हवाखोरी के लिए निकल पड़ता था। होटल के निवासियों से मेरी घनिष्ठता केवल बाहरी बोलचाल तक ही सीमित थी। उस दिन पहली बार मुझे साथी मिला जिसने मुझे इस हद तक अपनी ओर खींच लिया कि दोपहर को टहलने का प्रस्ताव भी मैं टाल न सका।  

अपने-अपने कमरे में जाकर कपडे़ पहन कर हम दोनों निरुद्देश्य भ्रमण के इरादे से बाहर निकल पड़े़। हम लोग ऊपर बड़ी सड़क पर पहुँचे तब दोनों ने मिलकर इस बात पर विचार किया कि किस ओर निकला जाए। अन्त में यह तय हुआ कि इस समय लंधौर बाजार की सैर की जाए, शाम को माल की ओर चलेगे। प्रायः दो फर्लाग तक की चढ़ाई तय करने पर सड़क के बायें किनारे पर बिसाद खाने की कुछ खुली दुकानें पास-पास सजायी पुई दिखायी दीं,कुख जिप्सी लड़कियाँ उन दुकानों का संचालन कर रही थीं।, मेरे मित्र एक ‘दुकान’ के पास खड़े हो गये और बड़े गौर से वहाँ सजायी गयी प्रत्येक छोटी से छोटी चीज का निरीक्षण करने लगे। सस्ते किस्म की छुरियाँ, कैचियाँ, सुई-तागा, सिन्दूर की पुड़ियां, छोटी से छोटी चम्मचें, अलुमिनियम की बनी हुई चाय की छलनियां, बच्चों को खेलने के लिए बने हुए लकड़ी के रंगीन लट्टू, आदि ऐसी चीजें वहाँ सजायी हुई थीं जो स्पष्ट ही मेरे मित्र के किसी विशेष काम की नहीं थी। जिस दुकान के पास हम लोग खडे़ थे वहाँ बैठी हुई लड़की सूरत शक्ल से कुछ-कुछ ईरानी सी लगती थी। उसकी उम्र बीस-बाईस वर्ष से अधिक न होगी। उसकी आँखें बडी चंचल लगती थीं और वह बड़ी उत्सुकता में रज्जन जी की ओर देख रही थी। रज्जन जी ने नीचे झुक कर एक छोटी-सी कैंची उठा ली और उसका दाम पूछने लगे। लड़की अत्यन्त उत्साहित होकर जो दाम बताया वह स्पष्ट ही बाजार की दर से दुगुना था। पर रज्जन जी ने बिना मोल-तोल किये ही उसे मुँहमाँगा दाम दे दिया और कैंची जेब में रख कर उन्होंने मुझसे आगे बढ़ने का संकेत किया। लड़की पीछे से बोली-

‘‘बाबू जी यह बढ़िया वाला चाकू भी खरीद लीजिए !’’ ‘‘कल खरीदेंगे,’’ पीछे की ओर न देखकर रज्जन जी बोले।
दूसरे दिन फिर रंजन जी ने दोपहर को टहलने का प्रस्ताव किया, उस दिन भी हम लोग लंधौर की ओर  निकल पड़े। राधामोहन जी ठीक उसी दुकान पर खड़े हो गये जहाँ वह पिछले दिन खड़े हुए थे। उनके खड़े होते ही वहीं चंचल-स्वभाव ईरानी लड़की बड़ी फुरती से एक चाकू हाथ में उठाकर बोल उठी-‘‘बाबूजी, यह लीजिए वह चाकू जिसे आपने खरीदने को कहा   था।’’

रंजन जी ने उसकी हड़बड़ी देखकर कुछ क्षणों तक  मंद-मंद मुस्कराते रहे। मैंने देखा, उनकी उस सुगंभीर मुस्कान में एक अर्द्धस्फुट करुणा और मार्मिकता छिपी हुई थी। बिना किसी बहस के उन्होंने वह चाकू भी खरीद लिया और मुँहमागा दाम दे दिया। इसके बाद वह मेरा हाथ पकड़ कर आगे को बढ़ गये। वह चाकू स्पष्ट ही उनके किसी भी काम का न था। उसका हत्था लकड़ी का बना था और फल एकदम कुन्द था। छोटे-छोटे बच्चों के खेलने के काम का था। पर आज मैंने उस सम्बन्ध में कोई प्रश्न नहीं किया। तब तक मेरे आगे यह बात बिलकुल साफ हो गयी थी कि वह उस दुकान से कोई चीज किसी उपयोगिता के लिए नहीं खरीदते हैं बल्कि कोई विशेष मनोभाव ही उन्हें उस दुकान पर ठहर जाने के लिए प्रेरित करता है। पर वह मनोभाव क्या हो सकता है ? क्या उस खानाबदोश ईरानी लड़की की शारीरिक सुन्दरता का उससे कोई सम्बन्ध है ? क्या उनके समान साहित्य-कला-मर्मज्ञ और जीवन के गहरे अनुभवों से शिक्षा प्राप्त (जैसा कि उनकी बातों से पता चलता था) व्यक्ति भी इस तरह के थोथे मनोभावों से परिचालित हो सकता है ?

उसी रात को डाइंनिग रूम में सज्जन जी के साथ ही भोजन करने के बाद जब मैं अपने कमरे में जाकर आराम करने का विचार कर रहा था तब भी उन्होंने मुझे नहीं छोड़ा और बोले-‘‘आपके कमरे में कुछ देर गपशप की जाए। अभी जल्दी है अभी से सोकर क्या कीजिएगा !’’
मैं केवल शिष्टातावश उनके प्रस्ताव का विरोध न कर सका, अन्यथा उस दिन मैं बहुत थका हुआ था और गपशप करने की न तो मुझमें शक्ति ही रह गयी थी न प्रवृत्ति ही।

कमरे में पहुँच कर ठण्डी हवा से बचने के लिए भीतर से किवाड़ फेरकर मैं अपने बिस्तर पर लिहाफ के भीतर दुबक गया-केवल मुँह खोले रहा। रज्जन जी पास ही एक सोफे पर आराम से बैठकर सिगरेट फूँकने लगे।
मेरा ‘मूड’ खराब हो गया था और उसी खीझ की मनः स्थिति में मेरे भीतर दबा हुआ व्यंग्य बरबस उभर उठा। सहसा मैंने ईरानी लड़की की दुकान की चर्चा छेड़ते हुए कहा-‘‘जो चाकू आपने आज खरीदा था उससे आप क्या काम ले सकेंगे मैं समझा नहीं !’’

रज्जन जी ने केवल मन्द-मन्द मुस्कराते हुए सिगरेट से एक कश ली। उस प्रश्न का कोई प्रभाव उन पर न पड़ते देखकर मैंने अपनी जबान को और अधिक सान पर चढ़ाते हुए कहा-‘‘उस, ईरानी लड़की के प्रति आप बड़े सदय मालूम होते हैं। कल कौन-सी चीज खरीदने का विचार है-चाय की छलनी ?’’
रज्जन जी ठठाकर हँस पड़े। जब उनका वह हास्यभाव ठंडा पड़ा मैंने व्यंग्य और परिहास का भाव त्यागकर सहज भाव से कहा-‘‘मैं बहुत उत्सुक हूँ यह जानने के लिए-’’

‘‘कि मैं उस ईरानी लड़की से चाकू और कैंची क्यों खरीदता हूँ ? यही बात है न ? यदि आपका कौतूहल इस सम्बन्ध में सचमुच इस कदर बढ़ गया है तो मैं उसका निवारण करने को तैयार हूँ। किस्सा लम्बा है, मुझे सुनाने में कोई आपत्ति नहीं है। पर एक शर्त है- चुपचाप सुनते जायें, बीच में कोई प्रश्न करके मुझे टोंके नहीं !’’
मैंने  सूचित किया है कि मुझे उनकी शर्त मंजूर है। उसके बाद रज्जन जी ने अपना किस्सा सुनाया आरम्भ किया। किस्सा बड़ा दिलचस्प था। सारी रात बीत गयी। पर वह समाप्त न हुआ। उसके बाद कई दिन तक वह किस्सा चला। जब भी हम मिलते दोनों अवकाश पाते मैं उनसे उनकी जीवन कथा को आगे बढाने का अनुरोध करता रहता। उनके उस लम्बें दास्तान को मैं भरकस उन्हीं के शब्दों में परिच्छेदों में लिपिबद्ध कर रहा हूँ।

1


मसूरी में उस दिन जिस ईरानी जिप्सी लड़की की  दुकान में मैंने चाकू खरीदा उसमें मेरी कोई खास दिलचस्पी नहीं थी। पर वह एक ऐसी लड़की की याद मुझे अक्सर दिलाती रहती है जो कुछ ही वर्ष पहले तक उसी स्थान पर उसी की तरह बिसाती की दुकान खोले रहती थी और वैसी ही चंचल और ढ़ीठ थी। उम्र भी उसकी प्रायः उतनी ही थी जितनी ईरानी लड़की की। फिर भी दोनों की आकृति-प्रकृति में बहुत अंतर था। ईरानी लड़की के मुख की अभिव्यक्ति से मेरे मन में यह विश्वास, जगने लगता है कि वह जन्मजात अपराधिनी और क्रूर कर्मिणी है। पर जिस लड़की का किस्सा मैं कहने जा रहा हूँ उसकी ओर झलक देखने में ऐसा बोध होने लगता था कि उपानिषत्कार ने शुद्धं अपापबिद्धम् की कल्पना उसी के समान किसी लड़की का चेहरा देखकर ही की होगी। ईसा की माता मेरी के संबंध में ईसाई कवियों ने जिस ‘इम्मेक्युलेट कन्सेप्शन’ की बात कही है उसका पहला अनुभव मुझे उस लड़की को देखने पर हुआ।

वह लामा स्त्रियों का सा लंहगा पहने रहती थी और उन्हीं की तरह सिर पर एक विशेष ढंग का कपड़ा बाँधे रहती थी। पर उसकी आकृति से यह विश्वास, नहीं होता था वह लामा जाति की हो सकती है। उसकी आँखें छोटी अवश्य थीं और नाक भी किसी कदर छोटी और गोल थी, पर इस हद तक नहीं कि उसे मंगोल जातीय कहा जा सके। मुझे पूरा विश्वास है कि यदि वह साड़ी पहने होती तो उसके पूर्णतः भारतीय होने में किसी को रंचमात्र भी संदेह न होता।
मैं उस साल पहली बार मसूरी आया था। एक दिन यों ही टहलते हुए सहसा मेरी दृष्टि उस लामा वेषधारिणी लड़की पर जाकर ठहर गयी। उसके असाधारण रूप-रंग ने मुझे इस कदर आकर्षित किया कि मैं उसकी दुकान के पास जाकर ठहर गया। लड़की ने तीतर की तरह तीखे किन्तु स्निग्ध और मधुर स्वर में कहा-


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