दुखियारी लड़की - तसलीमा नसरीन Dukhiyari Ladki - Hindi book by - Taslima Nasrin
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दुखियारी लड़की

तसलीमा नसरीन

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :112
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2127
आईएसबीएन :81-8143-320-3

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तसलीमा नसरीन का एक और रोचक कहानी संग्रह

Dukhiyari Laraki

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘‘नहीं, मैं कोई धर्म नहीं मानती। मैं तथाकथित ऊँचे तबकों को भी नहीं मानती। मेरा धर्म मानवता है। मैं न नारीवादी हूँ, न बौद्धिक ! समाज की नाइंसाफी, औरत मर्द में विसमता, पुरुष-शासित समाज में औरत को दूसरे दर्जे से भी बदतर नागरिक बनाए जाने से मेरा जी दुखता है। ‘‘ऐसे भी लोग हैं, जो यह मानते हैं कि हिन्दु लोग सभ्य हैं, पढ़े-लिखे सहनशील हैं, अपने धर्म की आलोचना सह लेते हैं, मुसलमान नहीं सह पाते, क्योंकि वे लोग मूरख और अनपढ़ हैं, असहनशील हैं। दुनिया में सभी धर्मों की आलोचना संभव है, सिर्फ इस्लाम धर्म की आलोचना असंभव है-जिन लोगों ने भी यह नियम बनाया है, उन लोगों ने और कुछ भले किया हो, मुसलमानों का भला नहीं कर रहे हैं।

मुस्लिम औरतों की मुक्ति की राह में भी लोग काँटे बिछा रहे हैं। जिस अँधेरे की तरफ उन्हें रोशनी डालनी चाहिए, वहाँ तक रोशनी पहुँचने ही नहीं देते। अगर कोई और उस पर रोशनी डाले, तो वे ही लोग, साम-दाम-दंड-भेद से उसे बुझा देते हैं। ‘‘मैंने मुल्ला-मौलवियों के पांखड पर वार किया था, उनकी पोल-पट्टी खोली थी। बाबरी मस्जिद के ध्वंस की प्रतिक्रिया में बंलादेश में जो दंगे भड़के, उस पर मैंने ‘लज्जा’ लिखी, उसे ही मेरा गुनाह मान लिया गया। राजनीतिक सत्ता और धार्मिक कट्टरता से बगावत के जुर्म में, मुझ पर फतवा लटका दिया गया, मेरी फाँसी की माँग की गई, यहाँ तक की मुझे देश-निकाला दे दिया।’’

‘‘बंग्लादेश से प्रकाशित, तुम्हारा ‘क’ आत्मकथा का तीसरा खंड ज़ब्त कर लिया गया। उसमें ऐसा क्या है, जो लोग भड़क गए ?’’
तसलीमाँ हँस पड़ी, ‘‘उसमें मैंने उन साहित्यकारों, पत्रकारों, अफसरों और समाजसेवकों के बखिए उधेड़े हैं, जिन्होंने मुझ पर घिरे संकट का फायदा उठाते हुए, मुझसे सेक्स-संबंध स्थापित किए।’’

 

दुखियारी लड़की

जन्म का पाप

मेरे जन्म के समय, मेरी मां के गले में चार-चार ताबीज़ थे। उस ताबीज़ में बेटा होने की दुआ थी। वह ताबीज़ बेशारतुल्लाह पीर ने दिया था।
पीर साहब के पाँवों पर लोटकर मेरी माँ ने मिन्नतें की थीं, ‘बेटा ना भया तो मोरा पति हमका तलाक दै देगा, हजूर।’’
पीर साहब भड़भड़ाकर बोलते रहते थे और जब बोलते थे, तो अपनी पाँचों उंगलियों से अपनी दाढ़ी भी सँवारते रहते थे।
छत की सीलिंग की तरफ, अपनी अपार ममतालु आँखें गड़ाकर, उन्होंने फरमाया, ‘‘अल्लाह का नाम लो। अल्लाह के अलावा देनहार मालिक और कोई नहीं है। मैं तो जरिया भर हूँ। आधी रात को अल्लाह का ज़िक्र किया करो। पवरदिगार दो जहां के मालिक हैं। तुम उनके सामने रोओ, आलेया ! अगर तू रोएगी नहीं, तो उनका दिल नरम कैसे होगा ? बताओ ? बंदा अगर हाथ फैलाता है, तो अल्लाह उसे कभी खाली हाथ नहीं लौटाता। वे बेहद मेहरबान हैं।’’
आलेया पीर साहब के सामने ही उकड़ूँ होकर ज़ोर-ज़ोर से विलाप कर उठी। बेटा होने की शर्त पर वह आधी रात को ही क्यों, सारी रात अल्लाह का ज़िक्र करेगी।

बेशारतुल्लाह ने अपना हाथ दाढ़ी से हटाकर, आलेया की पीठ पर रखा। उनक निगाहें कमरे की सीलिंग से फिसलकर, आलेया के घने-काले बालों पर जम गयीं।
‘‘अल्लाह, अद्वितीय निराकार सर्वशक्तिमान हैं। उनका न आदि हैं, न अंत है। उनका कोई पिता-माता, पुत्र-कन्या नहीं है। वे सब कुछ देखते हैं, मगर हम इंसानों की तरह आँखें नहीं है। वे सब कुछ सुनते हैं, मगर उनके कान नहीं है। वे सब कुछ कर सकते हैं फिर हमारे जैसे हाथ, उनके पास नहीं हैं। वे सर्वत्र, सर्वदा विराजमान हैं। वे न तो आहार करते हैं, न निद्रा-शयन करते हैं। उनका कोई आकार नहीं है।

ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जिससे उनकी तुलना की जा सके। वे सदा विद्यमान थे; सदा विद्यमान रहेंगे। वे लोगों की मोहताजी मिटा देते हैं। उन्हें कहीं, कोई अभाव नहीं है। वे अजर-अमर हैं। उनकी न मृत्यु है, न ध्वंस ! वे परम दाता, असीम दयालु हैं। वे सर्वश्रेष्ठ सम्मान के मालिक हैं, अपने बंदे को वे प्रतिष्ठा प्रदान करते हैं। तुम उनके दरबार में हाथ उठाकर दुआ करो। तुम्हें बेटा जरूर होगा। दुनिया-जहान में तुम्हारी इज़्ज़त की हिफ़ाज़त होगी।’’

मेरी माँ पूरे नौ महीने जाए-नमाज़ पढ़ती रही। अल्लाह के हुजूर में रोती रही। रोते-रोते उनकी आँखें फूल गयीं। आँखों के नीचे सियाही उभर आयी। रात भर रोने-धोने के बाद, सुबह सादिक की भोर के वक्त, वे नल के नीचे वजू करती थीं। उसके बाद, फज का नमाज़ अदा करने के बाद, वे बदने में पानी भरकर, तीनों घरों के तीनों बरामदें में रख आती थीं, ताकि सास-ससुर, पति-जेठ वगैरह जब नींद से जगें, तो वजू के लिए पानी, उन लोगों को हाथ के करीब ही मिल जाए। उसके बाद, बावर्चीखाने में जाकर रोटियाँ बेलना, चूल्हे पर तवा बिठाकर रोटियाँ सेंकना। सबको खिला-पिलाकर, थाली में जो जूठा-कूठा बच रहा हो, वही मुँह में डालकर, वे फिर जाए-नमाज़ की मुद्रा में, अल्लाह के ज़िक्र में जुट जाती थीं, ताकि उन्हें बेटा ही हो। सूरत-शक्ल से चाहे जैसा भी हो, मगर वह बेटा ही हो। ना, चांद जैसा रूप नहीं चाहिए, हँसते हुए मोती झरें, ऐसे दाँत नहीं चाहिए। भले घने-काले बाल न हों, भले बड़ी-बड़ी आँखें न हों, चाहे काला-कलूटा बदसूरत ही हो, मगर बेटा ही हो। बेटे के लिए क्या रूप की जरूरत होती है ? बेटा तो खुद ही रोशन चिराग होता है।

मेरे जन्म से पहले, माँ और भी दो बेटियों को जन्म दे चुकी थीं। दो-दो बेटियों की माँ होने की वजह से, उन्हें दुनिया-समाज, गृहस्थी में ढेरों लानत-मलामत झेलना पड़ती थी।
सास अफसोस की लंबी उसाँस छोड़ते हुए कहती थीं, ‘‘खानदान में दीया जलाने वाला कोऊ नाहीं है।’’
ससुर हाथ में हुक्का थामे हुए, दरवाज़े पर ही बैठे-बैठे फुसफुसा उठते थे, ‘‘ना नहीं चलेगा ! काम बिल्कुल नहीं चलेगा। यह बहुरिया हरगिज काम की नहीं है। लल्ला की दूसरी शादी करना पड़ेगी।’’
ससुर भी मुंह बिचकाकर कहते थे, ‘‘दूसरी शादी के अलावा अतहर की और कोई गति नहीं है। बेटियों को पार करने में ख़ामख़ाह ढेरों खर्च हो जाएगा।’’

पड़ोसी कहते थे, ‘‘लड़की की जात पराये घर चली जाएँगी। दामाद मर जाए, तो आखिर बेटा ही तो खिलाएगा। बेटा छाती का धन-रतन होता है, अपना सगा होता है।’’
मां के पास, एक आँख की कानी, गेदू की माँ आती-जाती थी। वह गंडा-ताबीज़, कवच, जंतर-मंतर की काफी खोज-ख़बर रखती थी। वह माँ को इकन्नी-दुअन्नी में ताबीज़ बेच जाती थी।
माँ उसे लिए-लिए घर के बेड़े की आड़ में चली जाती थी। ‘‘ए हो, गेदू की मइया, अल्लाह की कसम खाकर कहो तो, इस बार लड़का ही होगा न ?’’

गेदू की माँ की आँखें चमक उठती थीं, होगा, मतलब ? खानाबदोश बेदिनी अउरतें भूल-भाल बूटी नाहीं देतीं। तुम बूटी पीसकर, भर गिलास पानी में घोलकर, पी गयी थीं न ?’’
पिछले दिनों, बबूल के पत्तों जैसे चंद मुड़े-तुड़े हरे पत्ते, कागज में लपेटकर, गेदू की माँ ने माँ को थमाते हुए कहा, ‘‘बेदिनी अउरत ने दिया है। सोने जाने से पहले, इसको पानी में घोलकर पीना पड़ेगा। जब सब लोग सो जाएं, तो सुनसान रात में, एक ही घूँट में पी जाना।’’

पत्तियों का रस माँ के पेट में जाकर, गुड़-गुड़ शोर मचाता रहता था। जुबान की नोक पर कुछ खट्टा-खट्टा सा लगता था।
एक दिन माँ को बेड़े की आड़ में ले जाकर, गेदू की माँ ने कमर में खोंसी हुई शीशी निकाली। नीले रंग की शीशी ! उसे हाथ में लेकर माँ की आँखों की पुतलियों में झुंड-झुंड नाच उठे। माथे पर नजरबट्टू लगाने लायक। उजली-धुली चाँदनी जैसा शुभ्र-सौम्य बेटा !
गेदू की माँ ने माँ का गाल मसलते हुए कहा, ‘‘अबकी बार बेटा बियाए बिना कहां जाओगी बन्नो ? शर्षीना के पीर ने पानी फूँककर दिया है। मियाँ जी के साथ सोने से पहले, इसे पी लेना।

माँ फ़िक्र में पड़ गयी। आजकल मियाँ साहब उसे अपने क़रीब ज़्यादा नहीं बुलाते। अपना बेढब-बेडौल पेट लिए, माँ फर्श पर बिछी चटाई पर लेटी-लेटी हाँफती रहती थीं। पति, ईशा का नमाज़ पढ़ने के बाद, आँगन में टहलते रहते थे। उसके बाद, कमरे में आकर दाहिनी करवट लेटकर, गहरी नींद सो जाते थे। वे बहुत कम बोलते थे। अब पति ही उन्हें करीब न बुलाएँ, तो वे अपनी इच्छा से तो उनके बिस्तर पर जाकर, उनकी अंकशायिनी नहीं बन सकती थीं न !

उस दिन जब वे कमरे में लौटकर आए, तो माँ ने उनसे बात करने की कोशिश की, ‘‘गेदू की माँ, शर्षीना के पीर के पढ़ा हुआ पानी दे गयी है। वह पानी पीकर बहुतो को बेटा भया है। उसने कहा है कि रात को सोने से पहिले, यह पानी जरूर पी लूँ।’’
उस वक्त, पति के हाथ में, उस वक्त भी मोती के सौ दानों वाली तस्वीह फिर रही थी।
मछली का कांटा चुनने की तरह, मियाँ की दो उँगलियाँ, एक के बाद एक, मोतियों के दानों पर फिसलती रहीं।
‘‘सोने से पहले पीने को कहा है, तो पी लो-’’

माँ इस ‘सोने’ का अर्थ साफ़-साफ़ समझा नहीं पायी। वे बेचैन हो उठीं। पति दाहिनी करवट सो गए। सोने के बाद वे दीन-दुनिया भूल जाते थे। उनके हाथ की तस्वीह फर्श पर गिरकर लोटती रहती थी, उन्हें ख़बर भी नहीं होती थी।
दो-दो बेटियाँ पैदा करने के बाद, घर में बीवी को तलाक देने की बात उठने लगी नौबत यहाँ तक आ पहुंची कि आज तलाक हो जाए या कल ! हर सुबह नींद से जागते ही माँ की छाती धक्-धक् करती रहती कि पति के घर में आहार पाने का आज ही शायद आखिरी दिन है। शायद आज ही फूलदार ट्रंक हाथ में झुलाए, उन्हें असहाय-निरूपाय मुद्रा में पीहर के दरवाज़े जाकर खड़ी होना होगा। इसी दौरान माँ फिर गर्भवती हो गयीं। गर्भावस्था में तलाक नहीं होता, इसलिए उस बार वे बच गयी। उसके बाद उन्होंने पीहर में गेदू की माँ को बुलाया और टोना-टोटका करनेवाली, किसी टोनहिन की दवा लीं; शर्षीना के पीर का फूँका हुआ पानी मंगाकर पीया’ गले में बेशरतुल्लाह का दिया हुआ ताबीज़ पहना। माँ को पक्का विश्वास था कि इस बार उन्हें बेटा ही होगा।

रसूनी रिश्ते में उनकी देवरानी लगती थी।
उसने कहा, ‘‘तुम्हारी गर्दन, पीठ पर काले-काले चकत्ते पड़ गए हैं। कोख में बेटा हो, तो इसी तरह के काले-काले दाग उभर आते हैं तुम्हारी नाभि भी जरा उचक आयी है। पेट में लड़का हो, तो नाभि इसी तरह बाहर निकल आती है।’’
उसकी राय सुनकर माँ खुश हो गयीं। उन्होंने अपनी देवरानी को फटाफट पान लगाकर खिलाया।
‘‘धल्ला टोनहिन ने दवा दी है। उस दवा का स्वाद, चिरैता से भी ज़्यादा तीता है।’’
माँ के सजाए हुए पान का बीड़ा गाल के अंदर दबाकर, देवरानी हँस-हँसकर लोटपोट हो गयीं, ‘‘इस बार छोटे मियाँ कहाँ जाएँगे ? अगर बेटा हुआ, तो लल्ला और किसे ब्याहकर ले आएँगे, मैं भी देखूँगी। वह बाजीपुर गाँव की बिटिया है न, उसे तो आज लाकर बिठाने की तैयारी है या कल !’’

माँ ने राहत की सांस ली। उन्होंने अगर बेटा जना, तभी इस गृहस्थी में टिक पाएँगी। घर की गइया अगर बछेड़ी बियाती थी तो सास के चेहरे पर खिलखिल हँसी फूटने लगती थी। लेकिन माँ की कोश से जिस दिन पहली बेटी पैदा हुई, सास फनफनाती हुई आँगन में चहलकदमी करती रही और गुस्से से फुँफकारते हुए बड़बड़ा उठी, ‘‘हमरे घर पर शनि सवार हो गया है।’’
चौधरी बहू ने कहा, ‘‘आपकी पोती जैसी सेहतमंद..गोल-मटोल है..वैसा ही सलोना, उसका रंग ! पोती काफी मोहक और फूल जैसी खिली-खिली है। पहलौंठी की संतान है, कबूल कर लें दीदी !’’

लेकिन सास जी भला यह कैसे कबूल करतीं ? ख़ानदान में अगर कोई चिराग जलाने वाला ही नहीं हुआ, तो सलोनी और खिली-खिली लड़की लेकर, वे क्या करेंगी ? रंग धो-धोकर क्या कोई पानी पीएगा ? आखिर तो लड़की है, पराए घर विदा हो जाएगी। माँ सपना देखती रहीं, इस बार उन्हें बेटा ही होगा। प्रसूति घर में जिस बच्चे की रुलाई सुनायी देगी, अल्लाह, करे वह बेटा ही हो। बेटे की चाह में मां आकुल-व्याकुल हो उठीं।
जिस दिन वे प्रसूतिघर में गयीं, दर्द से छटपटा रही थीं। पुत्र-पिपासा के दर्द से या प्रसव के दर्द से वे छटपटा रही थीं, यह दाई की समझ में नहीं आया। दाई तो ऊँघते-ऊँघते माँ के पेट पर ही ढलक पड़ी। माँ दर्द से चीख उठी।
दाई ने डपट दिया, ‘‘यह कइसी मउगी है ? कउन ढंग की ? दो-दो बार बियाकर ही छुट्टी पा ली। अब काहे चिंचिया रही हो ? चुपाय मारो, दुलहिन ! उस टोनहिन मुंहझौंसी को का कहें ? तनिको लाज-सरम नाहीं है।’’

बोरसी की आँच मेरी माँ को झुलसती रही।
दर्द और प्यास से तड़पती हुई मेरी माँ ने अपनी दोनों बाँहों से दाई का कंधा झकझोरते हुए पूछा, ‘‘बेटा ही होगा न, सरोजिनी दीदी ? कहो न एक बार कहो, दीदी, बेटा ही होगा। इस बार अल्लाह बेटा ही दें। तुम भी, बस, एक बार मुझे बेटे का मुखड़ा दिखा दो। तुम तो माँगोगी, हम तुमका दूँगी। बूढ़े पीर की मजार पर। हम खस्सी बलि दूंगी। हम मनौती मानी हैं।’’

सरोजिनी दाई ने माँ के बालों में उँगलियाँ फिराते हुए तसल्ली दी, ‘‘शांत हो ! शांत हो जाओ। धीरज धर री, अभागी, धीरज धर। तुझे बेटा ही होगा। हम तो पेट की साइज बूझती हैं न। हम तोरा तरद देखकर ही पहचान गयी हैं...’’
मुझे यह तो ख़बर नहीं कि धाय की तसल्ली सुनकर माँ शांत हुई भी या नहीं हां, यह जरूर सुना है कि जब भोर के उजाले ने आकर, प्रसूतिघर के बेड़े की दरारों को चूम लिया, उस वक्त रात भर की जागी, जट पड़े बालों वाली मेरी माँ ने समूची रात की यंत्रणा और क्लांति के बाद, जिस शिशु को जन्म दिया, वह मैं थी। मेरे जन्म पर, प्रसूतिघर में दो प्राणी बेभाव रो पड़े थे-एक मैं और दूसरी मेरी माँ। आँगन में मेरे अब्बू खडे़ थे। बावर्चीखाने से पहसुल उठाकर, वे प्रसूतिघर की तरफ दौड़ आए। वे किसे मारना चाहते थे, मैं नहीं जानती। माँ कहती थीं, वे उन्हें ही मारने आए थे। मैं कहती हूँ, शायद मुझे ! उस सुबह मेरे बड़े चाचा और दद्दा, अपने बदन की समूची ताकत लगाकर, मेरे अब्बू को लौटा नहीं ले जाते, तो चाहे कितनी भी तुच्छ सही, एक न एक मौत ज़रूर होती। या तो मेरी मौत होती या मेरी माँ की मौत !

तलाक ! तलाक !! तलाक !!!
मेरी माँ की आर्त-चीत्कार तब भी नहीं थमी थी। उस वक्त भी, अब्बू हाथ में पहसुल उठाए, पैर पटक-पटककर, समूचे आँगन में चक्कर लगाते फिरे। बड़े चाचा, अब्बू के हाथ में तने हुए पहसुल का सिरा पकड़कर खींचने लगे।
ऐन उसी वक्त अब्बू की दहाड़ गूँज उठीं, ‘‘सुन, छिनाल, मैंने तुझे तलाक दिया ! एक तलाक ! दो तलाक !! तीन तलाक !!!
उस वक्त भी मैं रोए जा रही थी। उस वक्त तक सरोजिनी दाई ने मुझे गुनगुने पानी में धोकर, कथरी में नहीं लपेटा था। उस वक्त उसने घोघें की खोल से मेरी नाभि भर काटकर अलग की थी। उस वक्त भी मेरी माँ की कोख से फूल नहीं झरा था और मेरी माँ उस प्रसूतिघर में लेटे-लेटे ही सुनती रही कि उनके शौहर, उन्हें तलाक दे रहे हैं। अंगारे जैसा शब्द ‘तलाक’ की गूंज के बाद ही, माँ की रुलाई अचानक थम गयी। सरोजिनी दाई मुझे बोरसी की हांडी के करीब रखकर, माँ के चेहरे पर पानी का छींटा मारने लगी। उनके माथे पर हाथ-पंखे से हवा करने लगी।

माँ को होश आते-आते सूरज दुकानदारों की चाँद पर उतर आया ! उस दिन सुबह-सुबह जो लोग मुझे देखने आए, उन लोगों में से किसी ने भी मेरा हाथ-पाँव-चेहरा-माथा नहीं देखा ! सबने सिर्फ मेरा यौनांग ही देखा और बेहद अफसोस जाहिर किया।
अब्बू गुमसुम-से आँगन में बैठे रहे। बड़े चाचा ने उनके हाथ से पहसुल लेकर, बावर्चीखाने के बेड़े में खोंस दिया।
अब्बू को समझाया गया, ‘‘तलाक दे रहे हो, दे दो, इसमें किसी को, कोई एतराज नहीं है। लेकिन उसकी जान क्यों लेना चाहते हो ? जान से मार दोगे, तो फिजूल ही थाना-पुलिस का झमेला होगा। जेल-जुलुम झेलना पड़ेगा। अरे, भई, छंउड़ी बियानेवाली छिनाल को तलाक दोगे, दे दो ! हम कुछ नहीं कहेंगे। क्यों कहेंगे। भई ?’’
अब्बू ने हाथ का पहसुल फेंक ज़रूर दिया, लेकिन उनके मन में आग धधकती रही। किसी भी वक्त, माँ के सिर पर कोप बिठाने की चाह, उनके मन से मिटी नहीं थी। माँ के नसीब में तलाक आ जुटा, लेकिन उनके तन-बदन में उठकर खड़े होने की ताकत नहीं आयी थी।

सरोजिनी दाई मुझे कथरी में लपेटते हुए बुदबुदा उठी, ‘‘कइस पत्थर मरद है ! बेटी अभी जच्चा खाने से बाहर भी नहीं निकली मेहरिया का अभी फूल भी नहीं झरा और ई मरद ओका तलाक दे रहा है; पैंतरा भाँज रहा है; खून करने पर उतारु है। बिचारी मेहरिया, अइसन देही लेकर, कहाँ जाए ?’’

जट-पड़े माँ के बालों में कहाँ तेल चुपड़ना चाहिए था; उनके बालों में कंघी फेरना चाहिए था; मेरे समूचे बदन में सरसो के तेल की मालिश होनी चाहिए थी। यह सब कुछ भी न करके, सरोजिनी दाई विदा हो गयी। उन्हें विदा कर दिया गया। अब उन्हें मेहनत करने की ज़रूरत नहीं थी। उस दोपहर, जच्चाखाने में माँ ! उनकी बगल में बोरसी और मैं। वहाँ और कोई नहीं था। माँ का मन हुआ, वे मुझे बोरसी में झोंक दें, ताकि मैं जलकर खाक हो जाऊँ बोरसी माँ के पैताने ही पड़ी थी।
उन्होंने मुझे उसी तरफ धकेल दिया। मैं चिंचिया उठी, जब बोरसी की आँच मुझे झुलसाने लगी। माँ की निगाहें साफ़-साफ़ मुझे जलते-झुलसते देखती रहीं, लेकिन मेरे प्रति उन्हें बूँद भर भी ममता नहीं उमड़ी। उन्होंने मुझे आग से परे नहीं खींचा।

मैं तो शायद जलकर खाक़ ही हो जाती। अचानक नजरूल की माँ कमरे में हाजिर हुई। नजरूल की माँ घरेलू काम करनेवाली महरी थी, बोरसी उठाने आयी थी। कमरे में दाखिल होते ही उसकी मुझ पर नज़र पड़ी। मैं जल रही थी। इस घर की सद्य: जन्मी शिशु जल रही है, यह देखकर वह चीख उठी। उसकी चीख सबने सुनी, लेकिन किसी को खास विस्मय नहीं हुआ।
सबने यही कहा, ‘‘सामने कोई था क्यों नहीं ? और कोई न सही, उसकी माँ तो मौजूद थी, उसने क्यों नहीं ख़्याल किया ?’’

बड़ी चाची ने कच्चा अंडा फोड़कर, मेरे पाँवों के फफोलों पर लगा दिया। अब्बू ने चोर-निगाहों से मेरी तरफ देखा, गला फाड़-फाड़कर मुझे चीत्कार करते हुए सुना, लेकिन जुबान से उन्होंने कुछ नहीं कहा। अगर मैं जलकर खाक़ हो जाती, तो वे शायद एक क़िस्म की राहत महसूस करते। मैं मर जाती, तो वे बच जाते। वाकई उनकी जान बच जाती। तलाकयाफ्ता औरत उस वक्त भी फफक-फफककर रो रही थी। उन्होंने मुझे जच्चाखाने में ही आग में झोंक दिया था, ताकि मैं ख़त्म हो जाऊँ। जिसके जन्म की वजह से उनका तलाक हो जाए, उसे अगर आग की तरफ धकेल दिया; अगर वे उस नवजात को उछालकर कूडे़ के ढेर में फेंक दे, तो इसमें उनका कोई दोष नहीं था। उन्हें क्यो दोष लगता ? अपनी कोख पर उनका तो कोई वश नहीं था। अगर वश होता, वे किसी लड़की जात को जन्म देतीं ? अब अगर लड़की पैदा हो ही गयी, तो उसे नमक चटाकर मार डालतीं !

शाम को तलाकशुदा माँ ने नजरूल की माँ को बुलाकर, उसके कान में फुसफुसाकर कहा, ‘‘बावर्चीखाने से तुम मुट्ठी भर नमक ला दोगी ?’’
‘‘क्यों नमक क्यों ?’’
‘‘जापाघर में निमक का करोगी , भउजी ?’’
‘‘ओ नजरूल की मइयो, तुमने मुझे भउजी कहा ? हमका भउजी बुलाया ? अब क्या हमको कोई भउजी पुकारेगा, जी..’’ माँ फफक-फफककर रो पड़ीं।
माँ अभी भी जापेखाने में थी। उसमें चलने-फिरने की ताकत नहीं थी, शायद इसीलिए उन्हें, उसी दिन गर्दनिया देकर निकाल बाहर नहीं किया गया।

‘‘किसी आदमी को अकुआ भेज दो। खालिदा के मामा लोग आएँ और अपनी बहन को लिवा ले जाएँ-’’ यह हुक्म सुनाया गया।
मां जान गयीं कि उन्हें लिवा ले जाने वाला आदमी, कल सुबह आएगा। कल वे इस घर से चली जाएँगी, बिल्कुल वैसे ही, जैसे फातिमा आपा गयी थीं। जाते-जाते वे मुड़-मुड़कर देखती रहीं। पीछे हतवात् सी माँ खड़ी थीं। वे इस घर में नयी-नयी आयी थीं। उनकी आँखों में भरपूर बेभाव विस्मय ! अभी पिछली ही रात सामने पनडब्बा रखकर फातिमा बूबू ने कितनी गपशप की थी ! अपनी ससुराल के किस्से सुनाए थे।

...जिस दिन उसके शौहर उससे शादी करके, उसे दुलहन बनाकर उस घर में लाए थे, चारों तरफ सुनसान रात उतर आयी थी ! गहरी रात ! चारों तरफ झींगुर की झिनझिनाहट !
अतहर ने कहा, ‘‘ओ दुलहनिया, रात हो गयी, सोना नहीं है ? समूचा घर गहरी नींद में बेसुध हो गया, तुम नहीं सोओगी ?’’
अतहर ने उस वक्त भी, अपनी शेरवानी नहीं उतारी थी; हाथ में थामी हुई रूमाल हाथ में ही थी; उँगलियों में मेहँदी का लाल निशान !

फातिमा बेगम ने कहा, ‘‘चलें, आज की रात बिना सोए, रतजगा में ही गुजार दें।’’
‘‘रतजगा में ? बिना सोए ?’’
‘‘ऐसी चाँदनी रात में भला नींद आती है।’’
‘‘तो चलो, आँगन में बैठते हैं।’’
दोनों प्राणी काफी रात तक आँगन में बैठे-बैठे, गपशप में डूबे रहे।
माँ जब इस घर में दुलहन बनकर दाखिल हुईं, इसी फातिमा बेगम ने ही उनका परछन-द्वारचार किया। खुद अपने ही हाथों, पति के विवाह के उपलक्ष्य में पकवान बनाया।

माँ उनकी जुबानी कहानी-किस्से सुना करती थीं।
उन्होंने फातिमा बेगम से पूछा, ‘‘अच्छा, बूबू, उस दिन...चाँदनी रात में, आप लोग क्या बातें करते रहे, हमें बताइए न हम भी सुनें।’
फातिमा बेगम वे बातें टाल गयीं, सिर्फ मंद-मंद मुस्कराती रहीं।
उनका लजाया-शर्माया चेहरा देखकर, मेरी माँ के मन में कहीं ईर्ष्या भी हुई थी। उनका भी मन होता था कि किसी दूधिया चाँदनी रात के वक्त पति के साथ आँगन में बैठे, दोनों प्राणी आपस में बोले-बतियाएँ। उनका भी दिल चाहता था कि वे भर-भर कलाई रेशमी चूँड़ियाँ पहनें।
वही फातिमा बेगम ने एक सुबह नींद से जगाने के बाद, वजू के लिए बदना में पानी भरकर रख दिया और नाश्ता बनाने चली गयीं। रोटियाँ बेलते हुए, वे पाटे पर ही सो गयीं रोटी तवे पर ही पड़ी रही। सूप में पड़ा आटा उड़-उड़कर, उनके काले बालों को बुर्राक सफेद बनाता रहा।
सुबह के नौ बज गए। नाश्ता अभी तक तैयार नहीं हुआ।

नाश्ता करने के लिए अतहर जब बावर्चीखाने में दाखिल हुआ, उसने देखा बड़ी बहू पड़ी-पड़ी सो रही है। सिर से आँचल खिसका हुआ ! नवाबज़ादी हाथ-पाँव पसारे, आराम से सो रही थीं।
अतहर गुसल करके, नाश्ता करने आया था। नाश्ता करके, उसे दुकान जाना था। बावर्चीखाने में आकर उसे यह देखना पड़ा कि उसकी बीवी पड़ी-पड़ी सो रही है।
बस अगले ही पल उसके सिर पर खून सवार हो गया।
आँगन में खड़े होकर, उसने घरवालों को सुना-सुनाकर ऐलान किया, ‘‘बड़ी बहू ! तुझे एक तलाक ! दो तलाक !! तीन तलाक !!!
फातिमा यह कैसे सुन पातीं ? वे तो नींद में बेसुध थीं। नींद टूटने पर उन्हें पता चला, उनका तलाक हो गया है। रोटी बेलते हुए, वह सो गयी, इसलिए उनके ख़ाविन्द ने उन्हें तलाक दे दिया।

आँगन में शोरगुल सुनकर, उनकी नींद टूट गयी और उन्होंने पूछा, ‘‘क्या हुआ ? इतनी चीख-चिल्लाहट क्यों ? क्या बात है ?’’
बावर्चीखाने से निकलकर फातिमा बेगम ने देखा, सबकी निगाहें उन्हीं पर गड़ी हैं। विवाह के इतने सालों बाद, सभी लोग उसे ऐसी अवाक् निगाहों से देखें, ऐसी क्या बात हो गयी ? वे इधर-उधर निगाहें दौड़ाती रहीं, घरवालों को हो क्या गया है ?
उन्हें यह ख़बर उनकी सास ने दी, ‘‘अतहर ने तो तुम्हें तलाक दे दिया, बहू !’’
‘‘तलाक क्यों दिया ? मुझे तो कुछ भी नहीं मालूम ! उन्होंने मुझे तलाक क्यों दिया ? मैंने क्या गुनाह किया ?’’

उन्होंने यह सवाल किससे किया था, समझ में नहीं आया। वे आँगन में चली आयीं। उस वक्त भी उनके बाल आटे में सने हुए थे।
वे पूरे आँगन का चक्कर लगाते हुए पूछती फिरीं, ‘‘कोई मुझे बताता क्यों नहीं कि मोरे पति ने मुझे तलाक क्यों दिया ?’’
उनकी जेठानी उन्हें अपने कमरे में बुला ले गयी।
‘‘तो रोटी बनाते हुए पाटे पर ही सो क्यों गयीं ज़रा बताओ ?’’
यह पूछते हुए, रसूनी खुद ही ज़ोर-ज़ोर से रो पड़ी। यूँ उनके रोने की कोई वजह नहीं थी क्योंकि यह मुसीबत उन पर नहीं टूटी थी। फिर भी उन्हें लगा कि किसी दिन वह भी इसी तरह रोटी बेलते-बेलते सो जाएगी। और उसका पति उसके मुंह पर यही जुमला दे मारेगा-तलाक ! तलाक !! तीन तलाक !!! और बस, उसे भी इसी तरह अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर, इस घर से निकल जाना होगा। उसे चले जाना होगा। जैसे फातिमा बेगम को जाना पड़ रहा है। रसूनी को अपने और फातिमा के बीच कोई फर्क़ नजर नहीं आया।

मेरी माँ भी उस घर में नयी-नयी थीं। उनकी भौचक्की निगाहें, फातिमा बेगम के आँसुओं पर अटकी रहीं।
फातिमा बेगम जब सच ही चली गयीं; रसूनी ने मेरी मां से कहा, ‘‘चलो, सौतन दूर चली गयी। तुम्हें तो राज पाट मिल गया न ?’’
उन्हें यह कभी समझ में नहीं आया कि सौत का तलाक हो जाने के बाद, मां के लिए कोई अतिरिक्त सुविधा हुई या नहीं, क्योंकि उन्होंने दरवाज़े पर खड़े-खड़े देखा था, फातिमा बेगम जब रुख़्सत हो रही थी, मेरी माँ ज़ार-ज़ार रो रही थीं !
ठीक उसी तरह, मेरी माँ भी सोच रही थीं कि उन्हें चले जाना होगा ! जच्चाखाने से निकलकर, न तो वे हाल-कमरे में जाएँगी, न बावर्चीखाने में। उन्हें सीधे पीहर की तरफ रुख करना होगा। पीहर में उन्हें कौन रखेगा ? वहाँ वे कितने दिन रह सकेंगी ?

मेरी माँ असहनीय तकलीफ में थी। मैं वह तकलीफ समझते हुए या न समझते हुए, फर्श पर पड़ी-पड़ी रोए जा रही थी। फर्श से उठाकर, मुझे गोद में उठाने वाला, वहाँ कोई नहीं था। वहाँ ऐसा कोई नहीं था जो नवजात शिशु को उठाकर, उसके मुँह में दो बूँद पानी या थोड़ा सा दूध टपका देता। मां मेरी गर्दन दबोच देना चाहती थीं, मगर वे मुझे नहीं मार पायीं। पता नहीं, उनके हाथों में जोर नहीं था या वे मेरे मोह में पड़ गयी थीं। अचानक-अचानक मुझे पक्का विश्वास होने लगता है कि उस दिन अगर हाथों में ताकत होती, तो मेरी माँ, मुझे तभी मार डालती।














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