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आचार्य श्रीराम शर्मा >> महाकाल का सन्देश

महाकाल का सन्देश

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2000
पृष्ठ :60
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 16271
आईएसबीएन :000000000

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Mahakal Ka Sandesh - Jagrut Atmaon Ke Naam - a Hindi Book by Sriram Sharma Acharya

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अब शिथिलता, उपेक्षा, आलस्य और अवसाद का दौर हमें समाप्त कर देना चाहिए।जिन्हें जागना है, उन्हें जग ही जाना चाहिए। जिन्हें आत्म-विस्मरण ने आ घेरा है, उन्हें अपना स्वरूप, लक्ष्य एवं कर्त्तव्य समझने के लिए अपने कोझकझोरना चाहिए और दर्पण में देखना चाहिए कि आखिर हम क्या हैं? आये किसलिए हैं? परिवर्तन की वेला आ पहुँची है। युग परिवर्तन का महान् प्रयोजनप्रबुद्ध आत्माओं के आत्मपरिवर्तन से आरंभ होगा। हम बदलेंगे तो जमाना बदलेगा।

(अखंड ज्योति-१९६८, नवं० ६४)

 

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समय की कसौटी इन्हीं दिनों खरे-खोटे की परीक्षा करने के लिए हठपूर्वक आ खड़ीहुई है। इसे झुठलाया नहीं जा सकता। देखना यह है कि इस आड़े समय में हनुमान् का पौरुष कहीं से हुंकार भरता है या नहीं? यहाँ यह नहीं कहा जारहा है कि सभी निष्क्रिय हो गये हैं। सक्रियता पर्याप्त मात्रा में अभी भी है। कार्य की व्यापकता को देखते हुए अब सक्रियता का अनुपात एवं स्तरबढ़ाने के लिए कहा जा रहा है। विशेष रूप से यह उद्बोधन हर उस व्यक्ति के लिए है, जो स्वयं को हनुमान् के रूप में लाना चाहे।

(वाङ्मय-२८, पृ० ६.२९)

 

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उपदेश इन दिनों प्रायः सर्वथा असफल इसी कारण हो रहे हैं कि उपदेशक जो दूसरे सेकराना चाहते हैं, उसे निजी जीवन में समाविष्ट करके यह सिद्ध नहीं कर पाते कि जो कहा गया है, वह व्यावहारिक भी है। यदि उचित, व्यावहारिक और लाभप्रदरहा होता तो उपदेशों के अनुरूप प्रवक्ता ने सर्वप्रथम उस विधा को अपनाकर अपने को लाभान्वित किया होता। इस संदेह, असमंजस का निराकरण न कर पाने परही उपदेशकों के द्वारा बार-बार दिये जाने वाले भाषण भी जाग्रत् आत्माओं के नाम विडम्बना बनकर रह जाते हैं, श्रवणकर्ताओं के गले नहीं उतरते। वस्तुत:आचारनिष्ठ उपदेशक ही परिवर्तन लाने में सफल हो सकते हैं।

(वाङ्मय-२८, पृ० ८.९)

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