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रुकतापुर

पुष्यमित्र

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :240
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 15544
आईएसबीएन :9789389598674

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भूमिका

अपने राज्य के मौजूदा हालात को 'रुकतापुर' का नाम देना अच्छा नहीं लगता। मगर आजादी के पहले इसे अंग्रेजों ने लूटा और तबाह किया। आजादी के बाद हमारे अपने राजनेताओं ने इसे अपनी व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं के दोहन का जरिया बना लिया। आजादी के बाद पिछले 73 सालों में देश के ज्यादातर राज्यों ने धीरे-धीरे अपनी परिस्थितियों को सँवारा और विकसित हुए, जबकि बिहार एक लेबर सप्लायर राज्य बनकर रह गया । यहाँ की सरकारें डबल डिजिट विकास का दावा करती रहीं और यहाँ के लोग कभी बाढ़ में बहते रहे तो कभी चमकी बुखार से मरते रहे। कोरोना ने इस राज्य की कंगाल स्थिति को एक झटके में उस वक्त सामने ला दिया, जब देश के सभी राज्यों से बिहार के मजदूरों का काफिला पैदल ही निकल पड़ा। अब ऐसे में कब तक शर्म का पर्दा डालकर इसकी विसंगतियों को झुठलाया जाए, इसलिए बिहार की जगह रुकतापुर लिखना पड़ा।

बिहार में 2005 में जब सरकार बदली तो नई सरकार ने सन्देश दिया था कि अब विकास होगा और विकास के साथ सामाजिक न्याय होगा। दरअसल 1990 से 2005 के दौर में लालू प्रसाद यादव ने मनमौजी तरीके से बिहार में सामाजिक न्याय लाने की भरपूर कोशिश की । सदियों से जातिवाद में जकड़े राज्य की सामाजिक संरचना को वे पलट देना चाहते थे। उन्हें लगता था कि अगर यह काम नरममिजाजी से किया गया तो इसमें काफी वक्त लगेगा। इसलिए उन्होंने उच्छृंखलता को खूब बढ़ावा दिया। राज्य में बदलाव का हिंसक दौर शुरू हुआ। सवर्ण बनाम पिछड़े को लेकर खूब झगड़े हुए। इसका नतीजा भी निकला। सदियों से चुपचाप अगड़ों का जुल्म सहने, उनके दरवाजे पर कभी तनकर खड़े होने की हिम्मत नहीं कर पाने, कभी मतदान की कतार में भी खड़े नहीं होने वाले दलित और पिछड़े अपना हक माँगने लगे और सवर्णों की गलत अपेक्षाओं को अस्वीकार करने लगे। तभी लालू जी अक्सर कहा करते हैं कि हमने भले कुछ नहीं किया, मगर बेजुबानों को आवाज दी। इससे इनकार भी नहीं किया जा सकता ।

मगर यह भी सच है कि लालू जी ने सामाजिक बदलाव के नाम पर शुरू हुई उच्छृंखलता और राजनीतिक हिंसा को अपनी सत्ता को स्थायी रखने का जरिया बना लिया। इस अराजक माहौल को शान्त करने की उन्होंने कभी कोशिश नहीं की, लिहाजा बिहार आगे बढ़ने के बदले पिछड़ने लगा। इसका नुकसान सिर्फ सवर्णों को नहीं, बल्कि हर किसी को हुआ । राज्य में न शिक्षा का माहौल रहा, न रोजगार का और न ही उद्योग विकसित हो पाए। यह वही दौर था, जब बाजार के खुलने के बाद देश के दूसरे हिस्सों में नए तरह के आर्थिक बदलाव हो रहे थे। मगर हिंसक और अराजक माहौल के कारण बदनाम बिहार में कोई उद्योगपति आना नहीं चाह रहा था ।

वक्त आगे बढ़ता रहा। अपनी अराजकता की वजह से लगातार पिछड़ रहे बिहार के निवासियों के मन में बदलाव की आकांक्षा बलवती होने लगी। नीतीश कुमार उस वक्त भाजपा के साथ मिलकर विकल्प के रूप में सामने आए और उन्होंने इस आकांक्षा को स्वर दिया। बीते 15 साल को जंगलराज का नाम देकर सत्ता में आए और खुद के लिए सुशासन बाबू का तमगा लिया। दिलचस्प बात यह है कि यह सब जब लिखा जा रहा है, तब नीतीश जी और उनकी पार्टी के भी सत्ता में रहते हुए 15 साल पूरे हो रहे हैं। इस दौरान भाजपा भी अमूमन 13 साल तक सहयोगी की भूमिका में बिहार की सत्ता की भागीदार रही है ।
 
ऐसे में इस बात का आकलन होना ही चाहिए कि 15 साल के 'जंगलराज' को खारिज कर सत्ता में आए और अपने 'सुशासन' के मंत्र से बिहार में बदलाव की बात कहने वाले नीतीश के दावे हकीकत में कहाँ तक पहुँचे । हालाँकि यह किताब नीतीश राज के 15 साल की समीक्षा नहीं है। यह एक रिपोर्टर की डायरी भर है जो बिहार में यहाँ-वहाँ भटकते हुए उन चेहरों से टकराता है, जिनका कहना है— चमकीली सड़कों और बिजली के चमकते बल्बों के पीछे अँधेरों की एक बड़ी दुनिया है। यही नीतीश जी के 15 साल के शासन का सच है।

यह सच है कि पिछले 15 सालों में बिहार की सड़कों को दुरुस्त करने की ईमानदार कोशिश हुई, अपराध काबू में आया और बिजली भी गाँव-गाँव तक पहुँची। पटना में सभ्यता द्वार से लेकर पटेल भवन तक, ज्ञान भवन से लेकर बिहार म्यूजियम तक कई अत्याधुनिक और आलीशान इमारतें बनीं। कई दफा डबल डिजिट ग्रोथ के नारे भी हमने सुने । यह दावा भी किया गया कि पलायन के लिए बदनाम बिहार में अब रिवर्स माइग्रेशन हो रहा है।

मगर इन सबके बीच हर साल बाढ़ के आने से लाखों लोग सड़कों पर आने के लिए मजबूर होते रहे, हर साल मुजफ्फरपुर और गया में बच्चे मरते रहे। शेल्टर होम में लड़कियों का यौन शोषण, मिल-डे मील खाकर बच्चों की मौत, स्टेट टॉपरों का अज्ञानी साबित होना और तमाम कोशिशों के बावजूद इन 15 सालों में राज्य में रोजगार और उद्योग का माहौल विकसित नहीं होना भी कड़वी सचाइयाँ हैं, जिन्हें सरकार गाहे-बगाहे विज्ञापनों से मीडिया का मुँह बन्द करके छिपाने की कोशिश करती है।

दरअसल इसी बिहार का प्रतीक है - रुकतापुर । जहाँ आगे बढ़ती बदलाव की गाड़ी का पहिया बार-बार थम जाता है। काश, इन 15 सालों में बिहार सरकार ने इन अवरोधों को हटाने में दिलचस्पी दिखाई होती और ईमानदारी से इस दिशा में काम किया होता तो आज बिहार की स्थिति दूसरी होती। मगर अफसोस, बदलाव के ये 15 साल भी नाकाफी साबित हुए। यह किताब बिहार के इसी स्याह पक्ष को सामने लाने की कोशिश है। चमकती दमकती कहानियाँ सरकारी विज्ञापनों से फल-फूल रहे मीडिया में तो हर जगह बिखरी हैं।

पटना
7 सितम्बर, 2020
पुष्यमित्र

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