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प्रतिशोध

दुर्गा प्रसाद खत्री

प्रकाशक : लहरी बुक डिपो प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :88
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 15396
आईएसबीएन :0

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अंग्रेजों के क्रूर शासन से दुःखी होकर आखिर कुछ नवयुवकों ने सशस्त्र विद्रोह कर दिया और देश-द्रोहियों तथा अंग्रेजों के खुशामदी लोगों को भी दण्ड देना प्रारम्भ किया। परन्तु अंग्रेजों ने इस विद्रोह का प्रतिशोध लिया मक्कारी तथा नृशंस दमन से...

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दुर्गा प्रसाद खत्री का क्रान्तिकारी उपन्यास

।। श्रीः।।
प्रतिशोध
पहिला बयान

घोर जंगल के बीच एक प्राचीन शिवालय है, जिसे प्राचीनतर पीपल ने अपनी गम्भीर छाया में छिपाया हुआ है। मन्दिर बहुत छोटा ईंट चूने का बना हुआ है, और जमाने ने उसे एकदम काला कर दिया है, साथ ही साथ उस पीपल तथा चारों तरफ के अन्य ऊंचे पेड़ों की घनी छाया में वह कुछ इस तरह छिपा हुआ है कि दूर से अचानक दिखाई पड़ना भी कठिन है, हाँ उसकी ऊँची पताका जो कई बाँसों को एक में जोड़कर पीपल की डालियों को फोड़ती हुई आकाश में खूब ऊपर उठा दी गई है, बहुत दूर-दूर से दिखाई पड़ती है और उस जङ्गल से आने जाने वालों के लिए पथ-प्रदर्शक का काम करती है।
इस समय दोपहर का वक्त है फिर भी मन्दिर के अन्दर की प्रस्तरमयी शिव-मूर्ति के सामने मोटी बत्ती का घी का एक दिया जल रहा है। इस शिव-मूर्ति का भाव कुछ अद्भुत सा है। यद्यपि काल ने इस महाकाल की आकृति को मिटाने की भी कुछ कम चेष्टा नहीं की है, फिर भी इसको देखने से अनायास ही समझ में आ जाता है कि सती-दाह का समाचार सुन क्रोधित शिव दक्ष-यज्ञ विध्वंस करने को उद्यत हुए हैं। मूर्ति काले पत्थर की है और उसके चेहरे से क्रोध का कुछ ऐसा भीषण भाव प्रकट हो रहा है कि देख कर भय लगता है।
"मूर्ति के सामने पद्मासन मारे एक योगी बैठा है। आँखें बन्द हैं, शरीर अचल है, स्वाँस का आवागमन तक बन्द सा है। प्राण मन और चित्त की गति को वश में किए योगी ध्यान-मग्न है। ...
उससे कुछ हट कर पीछे की ओर दो तेजस्वी नवयुवा बैठे हुए हैं। बलिष्ठ शरीर, चमकदार आँखें, घनी-घनी परन्तु छोटी दाढ़ी और सामने रक्खा कटार देख अचानक यह कहना कठिन है कि डाकू हैं या भक्त, फिर भी इनके चेहरे से श्रद्धा और विश्वास मानों टपक सा रहा है और ये दोनों ही हाथ जोड़े एकटक उस योगी की ओर देख रहे हैं।
अचानक योगी का ध्यान भंग हुआ, शरीर में एक कम्प सा हुआ, और रोमांच होकर मुँह से कुछ अस्पष्ट शब्द निकले जिसके साथ ही उसने 'महाकालय नमः' कह कर आँखें खोल दी और जरा घूम गया। पीछे बैठे दोनों युवकों ने सामने होकर श्रद्धा के साथ जमीन पर लोट साष्टांग दण्डवत की और आशीर्वाद के साथ योगी ने उन्हें उठने का संकेत किया, दोनों हाथ जोड़े हुए उसके सामने बैठ गये।
एक क्षण तक सन्नाटा रहा, इसके बाद बहुत ही धीरे-धीरे योगी कहने लगा-
“महावीर, रघुनाथ ! तुम दोनों ठीक समय पर आये और इससे मुझे अत्यन्त प्रसन्नता हुई। भगवान शिव की कृपा से आज मैं इस देश का भविष्य देखने में समर्थ हुआ हूं। मैंने देखा कि यह अब अपनी दुर्दशा के कोर पर आ गया है और इसके पापों का अन्त होने वाला है। गुरुजनों की शिक्षा न मानने का फल इतने दिनों तक भोग कर अब यह आँखें खोल रहा है। समय से दूर रहकर, काल की गति को न देख कर, इसने जो भूल की थी उसका फल इसे काफी मिल चुका। अब इसके दुर्दिन का चक्र घूम गया है और शीघ्र ही वह अपना पूर्व स्थान ग्रहण करेगा, परन्तु......
नवयुवक : परन्तु क्या गुरुदेव ?
योगी : इसके लिए इसे बलि देनी होगी, सुख की बलि, स्वार्थ की बलि, शान्ति की बलि, शरीरों की बलि-देकर ही इस देश के निवासी अपनी अभिलाषा परी कर सकेंगे।
नवयुवा : (उत्साह के साथ) ओह, इसके लिए तो हम लोग पूरी तरह से तैयार ही हैं ! आपकी आज्ञा पाते ही सैकड़ों नहीं हजारों देशवासी अपना सिर अर्पण कर देंगे। इस समय हजारों दिल उछल रहे  हैं पर अपने उद्धार का कोई मार्ग न पाने के कारण तड़प कर रह जाते हैं, उन्हें कोई रास्ता दिखा देने भर का बस काम है।
योगी : महाकाल ने वह रास्ता दिखा दिया है। युवा : हम लोगों को उपदेश दीजिए कि वह क्या है ?
योगी : पुत्रों, वह है शक्ति-स्थापन ! शक्ति की सहायता के बिना भगवान भतनाथ स्वयं भी कछ नहीं कर सकते। इस देश के निवासी इस समय शक्ति-हीन हो रहे हैं। सब से पहिले उन्हें शक्ति प्राप्त करनी होगी। अगर वे चाहते हैं कि अपनी पराधीनता को दूर कर स्वाधीन बनें या अपने देश में अपना राज्य स्थापित करें तो उन्हें सब से पहिले शक्तिशाली बनाना पड़ेगा।
युवा : सो तो ठीक ही है, पर उसका कोई उपाय ?
योगी : उपाय ! उपाय बहुत सहज है, जिस प्रकार बिना मृत्यु के जीवन नहीं उसी प्रकार बिना संघर्ष के शक्ति नहीं।
युवक : इसका क्या मतलब ? स्वाधीनता प्राप्त करने के लिए हम लोग अपनी वर्तमान अंगरेज सरकार से संघर्ष करने के लिए तो तैयार ही हैं.......
योगी : नहीं नहीं, उस संघर्ष से मेरा मतलब नहीं। युवक : तब किस संघर्ष से आपका मतलब है?
योगी : आपस में, प्रजा और प्रजा के बीच में, संघर्ष पैदा करना होगा !
युवक : आपस में संघर्ष ! प्रजा में संघर्ष ! पर उससे तो उलटा शक्ति -क्षय होगा !!
योगी : कदापि नहीं ! क्या तुम जानते नहीं कि प्रकृति और पुरुष के संघर्ष से ही यह विश्व-ब्रह्माण्ड चल रहा है? जीवन और मृत्यु का संघर्ष, स्थिति और विलय का संघर्ष, भूत और भविष्य का संघर्ष, बचपन और बार्धक्य का संघर्ष, सभी ओर संघर्ष ही संघर्ष तो है ! जिस दिन यह संघर्ष बन्द हो जायेगा उसी दिन इस सृष्टि का अन्त भी हो जायेगा, क्या यह तुम नहीं जानते? संघर्ष ही जीवन-शक्ति है....

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