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रहस्य-रोमांच >> घर का भेदी

घर का भेदी

सुरेन्द्र मोहन पाठक

प्रकाशक : रवि पाकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :280
मुखपृष्ठ : पेपर बैक
पुस्तक क्रमांक : 12544
आईएसबीएन :1234567890123

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अखबार वाला या ब्लैकमेलर?


"इंजन बन्द करो और बाहर निकलकर मेरी बात सुनो।" उसने आदेश का पालन किया।
"मुझे जानते हो?" -सुनील ने पूछा।
"सूरत से वाकिफ हूं। पिछले दो-तीन दिनों में आपको कोठी में एक दो बार आते जाते देखा था।"
"मेरा नाम सुनील है। सुनील चक्रवर्ती। अखबारनवीस हूं।" उसका सिर सहमति में हिला।
"तुम साहब के ड्राइवर हो, फिर भी बतरा साहब गाड़ी खुद चलाते थे?"
"हमेशा नहीं। जब उनका मन आता था, तब चलाते थे या तब जब कि मजबूरन चलानी पड़ती थी।"
"मजबूरन?"
“मैं सिर्फ साहब का ड्राइवर नहीं, फैमिली का ड्राइवर हूं। कई बार साहब को गाड़ी इसलिये भी चलानी पड़ती थी क्योंकि मैं भावना मेमसाहब की ड्यूटी भर रहा होता था।"
“कत्ल वाले रोज क्या वजह थी उनके खुद गाड़ी चलाने के पीछे?"
"उस रोज वो अपनी मर्जी से खुद गाड़ी चला रहे थे, वरना मैं तो फारिग था।" .
"कौन-सी गाड़ी चला रहे थे वो उस रोज?"
"यही एस्टीम।"
“सुना है उनके लौटने पर तुम गाड़ी को गैरेज में बंद करने गये थे?
"जी हां।"
"लौटने की खबर कैसे लगी थी?"
"मैं गाड़ी की आवाज पहचानता हूं। ये साहब की हमेशा की रुटीन थी कि जब वो गाड़ी खुद चलाते लौटते थे तो उसे बाहर पोर्टिको में छोड़ने से पहले एक बार हार्न बजा देते थे। मैं तब किचन में था। किचन से भी बाहर को रास्ता है जिससे निकल कर मैं बाहर पहुंचा था, कोठी के पहलू से घूमकर सामने पोर्टिको में पहुंचा था और फिर गाड़ी में सवार होकर उसे गैराज की तरफ ले चला था जो कि कोठी के पिछवाड़े में है।"
"तब कार की हैडलाइट्स संजीव सूरी पर पड़ी थीं जो कि पिछवाड़े के रास्ते वहां से कूच कर रहा था?"
“जी हां।"
“सूरी को अच्छी तरह से पहचानते हो?"
“जी हां। खूब अच्छी तरह से पहचानता हूं। साहब की गैरहाजिरी में उनका कोठी में आना जाना होता रहता था।"
"गैरहाजिरी में?"
“जी हां।"
"साहब की हाजिरी में सूरी कोठी में कभी नहीं आता था?"
"ऐसा तो मैंने नहीं कहा।" "यानी कि वो साहब की हाजिरी में भी आता था।"
“जी हां।" "तो फिर गैरहाजिरी पर खास जोर किसलिये?"
"वो....वो क्या है कि...."
"तुम्हारी सूरी से कोई अदावत है?"
“खामखाह!"
"किसी ने तुमसे कहा कि तुम सूरी के संदर्भ में साहब की गैरहाजिरी में ही उसकी कोठी में आमद पर जोर दो?"
“जी नहीं। मुझे ऐसा किसी ने नहीं कहा।"
"तो फिर ऐसा क्यों कहा?"
"मैंने कुछ नहीं कहा, साहब। आप ही बात को खामखाह पता नहीं कहां का कहां घसीट रहे हैं।"
"चलो ऐसा ही सही। तो कार की हैडलाइट्स की रोशनी में तुमने सूरी को अच्छी तरह से पहचाना था?"
“जी हां।" "रोशनी ऊपर पड़ने पर उसने क्या किया था?" "उन्होंने एक बार घूमकर पीछे देखा था और फिर तेजी से वहां से भाग निकले थे।"
"तुम्हें ये बात अजीब नहीं लगी थी?"
“लगी थी लेकिन ज्यादा अजीब तब लगी थी जबकि कत्ल की खबर लगी थी।"
“सूरी तुम्हारे साहब का कातिल हो सकता है?"
"मुझे नहीं मालूम?" "मैं तुम्हारी राय पूछ रहा हूं।"
"मैं कौन होता हूं इस बावत कोई राय पेश करने वाला? मैं एक मामूली ड्राइवर हूं।"

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