विपथगामी - मस्तराम कपूर Vipathgami - Hindi book by - Mastram Kapoor
लोगों की राय

विविध उपन्यास >> विपथगामी

विपथगामी

मस्तराम कपूर

प्रकाशक : परमेश्वरी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 1997
आईएसबीएन : 00-0000-00-0 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :128 पुस्तक क्रमांक : 3519

Like this Hindi book 6 पाठकों को प्रिय

149 पाठक हैं

‘विपथगामी’ उस युवा पीढ़ी की कहानी है जिसे डॉ. राममनोहर लोहिया कुजात पीढ़ी कहते थे। यह ऐसी पीढ़ी है जो अतीत की जकड़नों से मुक्त होकर भविष्य की तलाश करना चाहती है।

Vipathgami

‘विपथगामी’ उस युवा पीढ़ी की कहानी है जिसे डॉ. राममनोहर लोहिया कुजात पीढ़ी कहते थे। यह ऐसी पीढ़ी है जो अतीत की जकड़नों से मुक्त होकर भविष्य की तलाश करना चाहती है। जो समाज की वर्तमान नैतिकता को संदेह की नजर से देखती है और उस नैतिकता की खोज में भटकती है जो मानव की जन्मजात आकांक्षाओं-स्वतन्त्रता, समता और बन्धुता-को न कुचले।

पचास के दशक के प्रारम्भिक वर्षों में महानगर बंबई के क्रूर वातावरण में अपने लिये जमीन तलाशती यह पीढ़ी सद्यःप्राप्त स्वतंत्रता से मोह भंग की स्थिति से गुजरती है जब वह यह देखती है कि कहीं कुछ नहीं बदला है। वह पाती है कि कानून की नजर में हर आदमी अपराधी है जब तक वह अपने को र्निदोष सिद्ध नहीं करता (जैसा कि कानून दावा करता है) हर आदमी र्निदोष है जब तक की वह अपराधी सिद्ध नहीं होता।

दो शब्द


इस उपन्यास की स्थितियां पचास के दशक के प्रारंभिक वर्षों के बंबई शहर की हैं। विषय हैं स्वाधीन भारत की अतीत के कटी विद्रोही युवा पीढ़ी।
पचास के दशक में उत्तरार्ध में शाहिद लतीफ़ ने कृश्न चंदर जी के परामर्श से मेरी दो कहानियों को फिल्माने के लिए चुना। गोरेगाँव के एक स्टूडियो में बैठकर हम लोगों ने तय किया कि पहली कहानी खुद शाहिद शाहब निर्माता को सुनाएँगे। शाहित साहब कहानी सुनाने गए और मैं और कृश्न चंदर जी कमरे में बैठकर उनकी प्रतीक्षा करने लगे। बीस मिनट में ही वे मुंह लटकाए वापस आ गए। दूसरी कहानी सुनाने के लिए मुझे भेजा गया और मैं भी पंद्रह मिनट में लौट आया। हम दोनों सिने जगत में प्रचलित कहानी सुनाने की कला से अनभिज्ञ थे। इसलिए हम निर्माता के मूड को देखकर आधी कहानी ही सुना पाए। फिल्म निर्माता एक फिल्म-तारिका के बगल में सटाए कहानी सुन रहा थे। एक कहानी को आधार बनाकर प्रस्तुत उपन्यास लिखा गया है। दूसरी कहानी ने कलांतर में एक नाटक का रूप लिया जिसका शीर्षक है ‘सांप आदमी नहीं होता’।
परिवर्द्धित संस्करण इस अर्थ में परिवर्द्धित है कि अंत में एक नया अध्याय जोड़ा गया है। मूल अंश कुछ शाब्दिक परिवर्तनों के अलावा ज्यों का त्यों है।


मस्तराम कपूर

विपथगामी


यदुनाथ

गाड़ी अंधेरे को चीरती हुई बड़े वेग से आगे बढ़ रही थी। यात्री नींद के नशे में एक-दूसरे पर लुढ़कने लगे थे। कंधो के बीच घड़ी के पैंडुलम की तरह लटकने वाली गर्दन को जहाँ भी जरा-सा आश्रय मिल जाता था वहीं अटक जाती थी।
सहसा इंजिन के पहियों के साथ गाड़ी की गति धीमी हो गयी। उनींदे यात्री चौंक पड़े। यात्रियों ने खिड़की से बाहर झांक कर देखा। गाड़ी जैसे सुनसान जंगल में रुकी थी।
सुरेंद्र ने उपर वाली सीट से नीचे झुककर देखा, फिर एक वृद्ध यात्री से पूछा ‘दादा, कौन-सा स्टेशन है ?’’

बूढ़े ने एक बार खिड़की से बाहर की तरफ नजर डाली और बोला लगता है गाड़ी जंगल में रुक गयी है।’ सुरेंद्र ने सीट पर चित लेटकर आँखें मूँद लीं।

तभी गाड़ी के पास आती हुई एक मद्धिम-सी रोशनी दिखाई दी। एक रेलवे कर्मचारी लाल और हरी रोशनी वाली लालटेन लिए चला आ रहा था। उसके पीछे दो सवारियां थीं और उनका सामान उठाए हुए एक कुली। कुली ने बड़ी फुरती से सामान अंदर फेंक दिया। सवारियां चढ़ गयीं तो गाड़ी ने सीटी बजा दी।

डिब्बे के अर्द्धनिद्रित यात्रियों की आँखे भीतर आने वाले दो यात्रियों पर जम गईं। एक लड़की थी जिसकी उम्र सत्रह-अठारह साल के लगभग होगी। बड़ा मासूम चेहरा था। गांव का भोलापन और मुक्त वातावरण में खिलने वाले फूलों का माधुर्य उसमें सिमटा हुआ था। सादे कपड़े का ब्लाउज, नीले पतले वायल की साड़ी और पैरों में देहाती कारीगर के हाथ की बनी हुई सादा चप्पल यही उसकी वेश-भूषा थी। आते ही डिब्बे में यात्रियों का दृष्ट-बिन्दु बन गई।
उस लड़की के कंधे पर हाथ रखे खड़ा था एक वृद्ध पुरुष जिसकी उम्र पचास के करीब होगी। मोटे खद्दर का कमीज-पायजामा और सिर पर बेतरतीबी से लपेटी हुई पगड़ी थी। अपने बाएं हाथ से उसने गाड़ी की सीटों को टटोलाना शुरू किया

 तो लोगों को पताचला कि वह अंधा है।
‘बेटी बैठने की जगह नहीं मिलेगी ?’
उसने अपनी बेटी को संबोधित करते हुए कहा और फिर पास की सीट पर हाथ फिराकर यह जानने की कोशिश करने लगा कि सीट खाली है या नहीं। उस सीट पर एक नौजवान सोया था और इस समय वह खर्राटे भर रहा था। लड़की ने सूटकेस उतार कर फर्श पर रख दिया और फिर बूढ़े का हाथ पकड़कर बोली, ‘यही सूटकेस पर बैठ जाओ बापू जगह नहीं है।’
‘अच्छा....’ कहकर वह बूढ़ा सूटकेस पर बैठने के लिए आगे बढ़ा। इतने में सामने की सीट पर बैठे हुए लाला जी अपनी पत्नी की ओर खिसक कर बोले ‘बाबा, यहां आ जाओ, बड़ी जगह है।’

बेटी का हाथ थामकर बूढ़ा उस सीट पर जा बैठा। लड़की अभी तक खड़ी थी। पास वाली सीट पर एक नवयुवक उसे घूर-घूर कर देख रहा था।’’ उसने अपनी सीट पर एक ओर सिमटते हुए कहा, ‘आप भी बैठ जाइए।’
लड़की ने उस युवक की ओर देखा और साधारण भाव से मुस्करा कर कहा मैं यहीं सूटकेस में पर बैठ जाऊँगी।’
युवक ने कुछ एक्टरों जैसे ढंग से कंधे उचकाए जिसका अभिप्रायः शायद यह भी था कि आपकी मर्जी, हमारा क्या बनता-बिगड़ता है। इतने में लाला जी की पत्नी खिड़की के पास सिमट कर अपने पति से बोली, ‘आप जरा और पास आ जाइए यह बेचारी भी वहाँ बैठ जाएगी।’ गाड़ी की रफ्तार तेज हो चुकी थी। यात्री टूटी नींद को जोड़ने का प्रयत्न करने लगे। उधर सामने की सीट वाला युवक लड़की को घूरे जा रहा था। सुरेंद्र ऊपर की सीट पर लेटा हुआ था। उसकी आँखों पर बिजली की बत्ती का प्रकाश पड़ रहा था। उसने अखबार के पन्नों से मुंह ढक लिया। ललाइन ने सीट से आगे झुककर उस लड़की की ओर देखा-‘बेटी क्या नाम है तुम्हारा ?’

लड़की जरा-सा मुस्कराकर बोली सुधा !
अब लाला ने बूढे से बातचीत शुरू कर दी, ‘कहां जाओगे बाबा ?
‘‘बहुत दूर जाना है भाई !’
‘तो भी कौन सी जगह ?’
‘बंबई।’
‘कल नौ बजे पहुँचेगी गाड़ी वहां। वहां आपका कौन है ?
इस प्रश्न पर बूढ़ा कुछ गम्भीर हो गया। उसने कोई उत्तर नहीं दिया। अपनी बेटी की ओर मुड़कर उसने बात बदलने की कोशिश की ‘बेटी तू मेरे कंधे से लगकर सो जा। तुझे नींद आ रही होगी।’
‘सुधा बोली’ न बापू मुझे नींद नहीं है। आएगी तो सो जाऊंगी।’
बूढ़ा चुप हो गया और जैसे अपने सामने देखने का प्रयत्न करने लगा, किन्तु उसके सामने, आगे-पीछे चारों ओर अंधकार ही अंधकार था, एक क्षणभर के लिए उसने होंठ दबाए और फिर गंभीर हो गया। लाला जी तो आगे प्रश्न करने से हिचक रहे थे किंतु ललाइन को इतनी चुप्पी पसंद नहीं थी। नींद तो उसे आ नहीं रही थी अतः बातचीत में ही इस कठिन यात्रा को काट लेना चाहती थी। वह  बोली- ‘बंबई तो, सुना है बहुत बड़ा शहर है।

जब उसकी बात का कोई उत्तर नहीं मिला तो उसने सुधा की ओर देखा। सुधा बोली-‘माँ जी मैं तो उस शहर के बारे में कुछ नहीं जानती। पहले-पहल जा रही हूँ।’
‘आपके कोई रिश्तेदार तो होंगे वहाँ ?’
इसके पहले कि सुधा उत्तर दे, बूढ़ा (यदुनाथ) बोला- ‘कहने को तो मेरा लड़का वहाँ है लेकिन उसका होना-न-होना एक बराबर है।’
‘क्यों ? घर नहीं आता होगा। आजकल के लड़कों को न जाने क्या हो जाता है। पर लगते ही मां-बाप को घर-बार सबको भूल जाते हैं। मेरी बहन का लड़का घर से भागकर कलकत्ते जा पहुंचा और दस साल तक उसने चिट्ठी भी नहीं लिखी। पिछले साल वह बीमार पड़ा तो उसके दोस्तों ने खबर दी। उसका बड़ा भाई कलकत्ता गया और अधमरी-सी हालत में उसे घर ले आया।’
बूढ़े यदुनाथ के चेहरे पर एक फीकी-सी मुस्कराहट दिखाई दी-‘सुंदर का तो कुछ पता-ठिकाना ही नहीं है। पता नहीं वह इस दुनिया में है भी या ....’
सुधा के मुंह से जैसे हलकी-सी चीख निकल गई।

यदुनाथ ने अपनी घुटी हुई पीड़ा को व्यक्त करना शुरू किया-‘क्या कहूं जी ! मैंने ही पिछले जन्म में कुछ खोटे कर्म किये थे जिनकी सजा आज भुगत रहा हूँ। मेरा वह एकलौता लड़का था और एक यह बेटी है। मां ने इन दोनों को बड़े प्यार से पाला था। इन दोनों की जरा-जरा-सी बात पर लड़ाई हो जाती थी। वह बड़ा ठहरा इसे अक्सर पीट दिया करता था और यह मां के पास जाकर शिकायत कर देती थी। इसकी माँ बड़े भोले स्वभाव की औरत थी लड़की छोटी थी इसलिए इस पर कुछ ज्यादा स्नेह था अक्सर वह सुधा का पक्ष लेकर सुंदर को डाट दिया करती थी। एकदिन सुन्दर ने इसे पीट दिया तो इसकी माँ ने उसे दो-चार तमाचे जड़ दिए। उस रात उसने कुछ खाया पिया नहीं। मां ने बहुत मनाया लेकिन उसका क्रोध नहीं उतरा। दूसरे दिन वह बिना किसी को बताए घर से भाग निकला। उसकी माँ चार दिन तक बिना कुछ खाए पीए रोती रही। उसकी आँखें रो-रोकर सूज गईं। मैंने उसका पता लगाने के लिए बहुत कोशिश की पुलिस में खबर दी, अखबार में इश्तिहार दिया, जहाँ जिसने जरा-सा पता बताया, वहाँ मैं पहुँच गया। लेकिन उसका कहीं पता नहीं चला। इस बात को आज पन्द्रह साल हो गए। उसका न तो कोई पत्र आया, न पता लगा।

जिस समय वह घर से भागा था, यह लड़की चार साल की थी। अब तो इसे याद भी नहीं है कि इसका भाई कैसा था। पंद्रह साल का अरसा कम नहीं होता। इसमें दुनिया बदल जाती है। मेरी भी दुनिया बदल गयी इस अरसे में। उस वक्त मैं हर तरह से सुखी था। गाँव के डाकखाने में नौकरी थी मेरी। अपना खेत था जिसे मैंने जुताई पर दे रखा था। उससे साल भर के लिए दाने आ जाते थे। बड़े आराम से खर्च निकल जाता था। कोई तकलीफ नहीं थी, कोई संकट नहीं था। हमारे आँगन में आम का एक बड़ा पेड़ था। वह हर साल फलता था। न जाने क्या दया थी भगवान की कि वह साल फलों से लद जाता था। सारा गाँव उस पेड़ के आम खाता था। मेरी पत्नी बड़ी धर्म भीरू थी।

 वह उस आम के पेड़ को देवता का वास मानती थी। रोज सुबह उठकर वह उस पेड़ को पानी देती थी। आज मैं सोचता हूँ, वह आम का पेड़ सचमुच देवता था। अपनी छाया से उसने हमें हर तरह से अभय रखा। लेकिन जब सुन्दर भाग गया और छः महीने तक उसका कोई पता न लगा तो उसकी माँ की उम्र जैसे बड़ी तेजी से घटने लगी। एक दिन बड़ी जोर की आँधी चली और वह आम का पेड़ जड़ से उखड़ गया। उसके साथ-साथ सुंदर की माँ की जिंदगी भी उखड़ गयी। वह बीमार पड़ गई। जीवन से वह बिलकुल निराश हो गई। डॉक्टर वैद्य आए। लेकिन उसपर किसी दवाई का असर नहीं किया। उसे पूरा विश्वास हो चुका था कि आम कि पेड़ का उखड़ना इस बात का लक्षण है कि इस घर पर कोई विपत्ति आने वाली है। मैंने उसके अंधविश्वास को दूर करने के लिए बहुत प्रयत्न किए किंतु कोई लाभ नहीं हुआ। मरने से पहले वह एक बार सुंदर को देखना चाहती थी। मैंने अखबारों में इश्तिहार किए कि बेटा सुंदर, माँ का जीवन खतरे में है। वह मरने से पहले एक बार तुम्हारी शक्ल देखना चाहती है। तुम जहाँ भी, जिस हालत में भी हो, तुरंत घर आ जाओ। लेकिन वह नहीं आया और उसकी माँ बेटे को देखने की अभिलाषा मन में लिए चली गई’।

सुधा की आँखों में अश्रुधारा बह रही थी। नींद का बहाना करके उसने पल्लू से चेहरे को ढांप रखा था किंतु साड़ी का पल्लू भीगकर भारी हो गया था। ललाइन भी बार-बार अपनी साड़ी से आँसू पोंछ रही थीं। लालाजी निर्विकार भाव से सब कुछ सुने जा रहे थे। दुःखपूर्ण जीवन के लम्बे अनुभवों ने उन्हें वीतराग-सा बना दिया था।

अन्य पुस्तकें

To give your reviews on this book, Please Login