द्विखंडित - तसलीमा नसरीन Dwikhandit - Hindi book by - Taslima Nasrin
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द्विखंडित

तसलीमा नसरीन

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2005
आईएसबीएन : 81-8143-163-4 मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पृष्ठ :534 पुस्तक क्रमांक : 2888

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तसलीमा नसरीन की आत्मकथा पर आधारित सम्पूर्ण प्रतिबन्ध मुक्त संस्करण...

dwikhandit-

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘‘तसलीमा नसरीन को लोग अक्सर महिला भेष में सलमान रुश्दी कहते हैं। वह विवाद और भावना की ऐसी प्रतीक बन गई हैं जो किसी भी किस्म की शारीरिक और सामाजिक बुराई को दूर करने की कोशिश कर रही है।’’

यासमीन बहरानी, यू.एस.ए.टुडे


‘‘तसलीमा नसरीन ने अपने इन संस्मरणों में यह दिखाने की कोशिश कि है युक्त महिलाएं पुरुषों और परंपराओं से बंधे समाज से मिलने वाले दर्द के बावजूद अपनी आत्मिक जिंदगी में उतरकर उसे किस तरह सहेज सकतीं हैं।’’


नीरा बूस्टैंग, वाशिंगटन पोस्ट की राजनयिक संवाददाता


‘‘उनकी लड़ाई जारी है, और उनके शब्दों को दबाया नहीं जा सकेगा।’’


लिली टैन

बामुलाहिजा होशियार, दिल्ली आ रही है तसलीमा...


हिन्दुस्तान 19 फरवरी 2004


कोलकाता पुस्तक मेले में लोग मेरे कान में फुसफुसाकर ‘द्विखंडित’ मांगते थे। मुझे बहुत दुःख होता है कि लोग जोर से आवाज बुलंद करके मेरी किताब क्यों नहीं मांगते। जबकि यह उनका हक है।


नवभारत टाइम्स 19 फरवरी, 2004




इस्लाम धर्म में महिलाओं के शोषण और दमन की बात कहनी चाही है। इसकी जरूरत भी थी। पाश्चात्य देशों में ऐसे बहुत भाषण वीर हैं जो अब तक यही कहते आये हैं कि मुसलिम देशों में औरतों का शोषण होता ही नहीं-अगर होता भी हो तो उसमें धर्म का हाथ नहीं होता। उनकी बात मान लेने पर यकीन करना होगा कि औरतों के यौन शोषण से इस्लाम का कोई सम्पर्क नहीं है। किताबों में शायद ऐसा ही होगा, लेकिन इसमें मुल्लाओं का हाथ होने से इंकार नहीं किया जा सकता। इसके अलावा हर घर में औरतों के दमन के असंख्य उदाहरण मिलेंगे। कई देशों में कानून भी स्त्री-पुरुषों के बीच बराबरी का व्यवहार नहीं करता। वहाँ किसी पुरुष की गवाही औरत की गवाही से ज्यादा विश्वसनीय समझी जाती है। मुस्लिम देशों में नौकरियों में भी औरतों को कई प्रकार के शोषण का शिकार होना पड़ता है। इससे ज्यादा क्या कहूँ।

हिंदू धार्मिक कट्टरपंथियों द्वारा आयोध्या में एक मस्जिद गिराये जाने पर हिंदुओं पर (बांग्लादेश में) जो अत्याचार हुआ था, आपने उसका विरोध किया था। इसलिए आपके उपन्यास ‘लज्जा’ को कट्टरपंथियों ने अपना निशाना बनाया और आपका जीवन भी खतरे में पड़ गया। कोई भी समझदार व्यक्ति स्वीकार करेगा कि असहाय अल्पसंख्यक हिंदुओं पर ऐसा धर्मांध आक्रमण निंदनीय है उतना ही निंदनीय अल्पसंख्यक मुसलमानों पर हिंदुओं का अत्याचार था। समानता के नजरिये को धार्मिक कट्टरपंथी अपना निशाना बनाते हैं। आपका समर्थन करते हुए हम सभी लोग इस समानता के नजरिये का भी समर्थन कर रहे हैं। ‘कुरान’ में संशोधन की जरूरत है। यह कहने के लिए आपको दोषी ठहराया गया है (जबकि आपने सिर्फ शरीयत को बात बदलने की ही बात की है।) शायद आपकी नजर पड़ी होगी, पिछले सप्ताह तुर्की में सरकार ने शरीयत बदलने का निश्चय किया है। इसलिए कहता हूँ, यह माँग आपके अकेले की नहीं है।

एक और बात कहने की जरूरत है-स्त्रियों के अधिकारों की रक्षा के लिए अगर सम्पूर्ण कुरान बदलने की माँग आप करतीं और आपकी इस बात का विरोध अगर हर मुसलमान करता, तब भी यह माँग विधिसम्मत होती, न्याय की माँग होती। यह मानना पड़ेगा कि आप की इस माँग के लिए जो समाज आपको जेल में बंद करना चाहता है, वह समाज भी अभी तक स्वतंत्र नहीं हो पाया है। धार्मिक कट्टरपंथी हर बात का कुरान के दायरे में समाधान चाहते हैं। इसके अलावा वे अंधविश्वासी भी हैं। सीधी बात है, अगर कोई कहता है कि ‘ईश्वर या खुदा है’ तो दूसरा भी यह बात कह सकता है। कि ‘ईश्वर या खुदा नहीं है’ अगर कोई यह कहे कि ‘मैं इस पुस्तक से घृणा करता हूँ तो कोई यह भी कह सकता है ‘मैं इस पुस्तक को बहुत पसंद करता हूँ।’ किसी को एक ही सत्य में विश्वास करने के लिए विवश करने से उलझनें बढ़ती हैं। उस सत्य तक पहुँचने के एकमात्र मार्ग पर यकीन करना उलझनों को जन्म देता है। जो लोग इस एक ही मार्ग की बात स्वीकार नहीं कर पाते, उनकी हत्या करना इस चरमतम उलझन भरी मानसिकता की ही देन है।


द्विखंडित

...लेकिन, क्या कर सकती हूँ मैं ? अपनी जिंदगी ही, अचानक अपने हाथों से फिसल गई। मेरी अपनी अक्षमताएँ, कमजोरियाँ, तोड़-मरोड़कर लगातार मुझे छोटा, और छोटा करती रही हैं। मारे दुःख और रुलाई के मेरा अंतस् बेहद भारी हो आया है। मैं बात करना चाहती हूँ...कुछ कहना चाहती हूँ..रोना चाहती हूँ, लेकिन मुझसे कुछ नहीं होता। दिन-रात सिर्फ रोती-कलपती रहती हूँ। अपना आपा बकुली जैसा लगता है। वही बकुली ! गूँगी। वाक्यहीन बकुली।
अनगिनत मरीजों की भीड़ ! लेकिन बकुली नहीं है ! बकुली की माँ भी नहीं है। अगले दिन भी उसे खोजा। न, बकुली नहीं है। मुमकिन है, वह आयी हो, डॉक्टर को दिखाया हो। डॉक्टर ने कह दिया हो, बकुली के गले में कोई रोग नहीं है। तब बकुली की माँ ने जरूर बार-बार बकुली को आवाज दे-देकर कहा होगा-‘‘बकुली, बात कर ! बात कर बकुली !’’ उस दिन से मैं बकुली को मन ही मन खोजती रहती हूँ। अस्पताल में कदम रखते ही, इंतजार करते हुए मरीजों में मैं बकुली का चेहरा खोजती हूँ। हाँ, मेरा यह जानने को बहुत मन करता है कि आखिरकार बकुली बात कर पाई या नहीं....उसकी जुबान खुली या नहीं...


बंधन मुक्त ‘द्विखंडित’



वाणी प्रकाशन के लिए यह गर्व और आनंद का विषय है कि हमने प्रारंभ से ही हिंदी के जागरुक पाठकों को तसलीमा नसरीन का विचारोत्तेजक साहित्य उपलब्ध कराया है। उनकी महत्त्वपूर्ण कृति ‘लज्जा’ ने हिंदी में लोकप्रियता का नया रिकार्ड बनाया। उनकी अन्य पुस्तकें भी हिंदी जगत में व्यापक रूप से पढ़ी और सराही गई हैं। उनके पाठकों की संख्या लाखों में है। इसी प्रक्रिया में उनकी बहुचर्चित आत्मकथा ‘मेरे बचपन के दिन’ के तीसरे खंड ‘द्विखंडित’ का बांग्ला में प्रकाशन होने के समानांतर ही हम हिंदी पाठकों को यह साहित्यिक उपहार दे रहे हैं। तसलीमा ने प्रकाशन की सहर्ष अनुमति दे दी थी, अनुवाद भी पूरा हो चुका था और पुस्तक प्रेस में जाने ही वाली थी कि तसलीमा के साहसिक और दो टूक लेखन से उपजे बवंडर ने इस सुंदर कृति की उपलब्धता के सामने समस्याएं पैदा कर दीं।

‘द्विखंडित’ खण्डित हो कर पाठकों के हाथों में (वाणी के प्रथम संस्करण के रूप में) थी। पूर्व संस्करण के पन्ने पलटते हुए आप ने देखा होगा कि पुस्तक थोड़ी-सी खंडित थी। पुस्तक में कुछ स्थानों पर(***) चिह्नित थे। दरअसल यह वह स्थान था, जहाँ पर पश्चिम बंगाल सरकार की अधिसूचना और कलकत्ता उच्च न्यायालय का अंतरिम आदेश था कि ‘द्विखंडित’ के कुछ विवादग्रस्त अंश देश में कहीं भी प्रकाशित न किये जायें।

हिन्दी पाठकों का दबाव और साहित्यिक दबावों की मजबूरी के कारण पुस्तक प्रकाशित हुई, परन्तु कट्टरपंथियों की जनमानस व न्यायलय में हुई हार, न्यायालय द्वारा पुस्तक की प्रतिबंध मुक्ति की गयी और अब ‘द्विखंडित’ बिना किन्ही खण्डों में विभक्त हुए अविकल रूप से पाठकों के सम्मुख है। यह पुस्तक अनुपम कृति है। इस उपमहादेश में स्त्री की स्थिति को यह पुस्तक बहुत ही बेबाकी से हमारे सामने रखती है। साथ ही एक युवा लेखिका के रूप में तसलीमा नसरीन के संघर्ष का यह एक अंतरंग दस्तावेज भी है।

तसलीमा नसरीन की यह आत्मकथा कई दृष्टियों से अनोखी और ऐतिहासिक महत्त्व की है। इस आत्मकथा के सात खंड हैं। पहले दो खंड-मेरे बचपन के दिन और उत्ताल हवा’ हम पहले ही प्रकाशित कर चुके हैं। यह तीसरा खंड व चौथा खण्ड आपके हाथों में है। यह पहली बार है, जब किसी लेखिका ने अपनी जीवन कथा इतनी अंतरंगता और सूक्ष्म ब्यौरों के साथ लिखी है। पूरी हो जाने के बाद यह विश्व की सभी भाषाओं में संभवत् सबसे लंबी आत्मकथा होगी-पुरुषवादी पूर्वाग्रहों, धार्मिक कट्टरतावाद तथा सामाजिक जड़ता के खिलाफ एक अकेली स्त्री का जिहाद।

-अरुण माहेश्वरी


ब्रह्मपुत्र के किनारे



गाँव छोड़कर हैजा महामारी शहर में दाखिल हो चुकी थी। लोग पानी उबालकर पीने लगे थे। अस्पताल की तरफ से, यहाँ तक कि कार्पोरेशन की तरफ से पानी शुद्ध करने के टैब्लैट्स दवाएँ बाँटी जा रही थीं। माइक पर, पानी में टैब्लेट घोलकर पीने की सलाह दी जाने लगी। कार्पोरेशन कर्मचारी घर-घर जाकर टैब्लेट्स देते रहे। इसके बावजूद महामारी फैल गई। घर-घर में हैजे के शिकार, रोगी। रास्ते-घाट पर रोगी दम तोड़ते हुए। तमाम अस्पताल रोगियों से ठसाठस भरे हुए पर्याप्त बिस्तरों की कमी पड़ गई थी; मरीजों को फर्श पर ही लिटा दिया जाता था और हर मरीज की बांह में इंजेक्शन चुभोकर, सेलाइन चढ़ाया जाने लगा। डॉक्टर, नर्स, सभी व्यस्त ! सूर्यकांत अस्पताल में, मैं भी व्यस्त। हाथ में सेलाइन लिए, मैं रोगियों के पास दौड़ती रही ! बाढ़ के पानी की तरह रोगी आते जा रहे थे। वार्ड में जगह नहीं थी, बरामदे में लिटाया जाने लगा। रात-दिन सेलाइन चढ़ाया जाता रहा, इसके बावजूद बहुत कम मरीज स्वस्थ हो सके। अस्पताल के सामने ही मुर्दे लादकर ले जाने के लिए खटियों का ढेर ! कब्रगाहों में भीड़ ! गुदाराघाट में लोगों की भीड़। आसमान में गिद्ध-चील उड़ते हुए !

अस्पताल में हैजे का इलाज करते-करते, मेरी सुबह कब शाम में ढल जाती; शाम कब रात में ढल जाती, मुझे पता ही नहीं चलता था। काफी रात गए, घर लौटती थी। किसी–किसी दिन अगर ज्यादा थक गई, तो शाम को ही लौट आती थी। ‘अवकाश’ के सामने की नाली में, अब्बू ने ब्लीचिंग पाउडर का छिड़काव कर दिया था। पानी शुद्ध करने की टैब्लेट, सिर्फ पीने के पानी में ही नहीं, बर्तन धोने, गुसल करने, कपड़े धोने के पानी में भी घोल दी गई थी। जैसे ही मैं अस्पताल से लौटती, अम्मी मेरा एप्रन उतारकर धोने के लिए ले जातीं।

लेकिन उस शाम मुझे एप्रन उतारने की फुर्सत ही नहीं मिली। क्योंकि घर लौटते ही अब्बू ने खबर दी, मुझे कॉल पर जाना है। वहाँ वे खुद जानेवाले थे, मगर मरण-सेज पर पड़े, किसी और मरीज की हालत ज्यादा गंभीर है। वे वहीं जा रहे थे। इससे पहले, मैं कभी कॉल पर नहीं गई थी। कॉल कहाँ से आया है। यह पूछने पर, अब्बू ने पता-ठिकाना बता दिया। नवमहल जाते हु्ए, रास्ते में मेहतरपट्टी की रेल लाइन पार करते ही, तीन मकान के बाद, बाईं तरफ एक सफेद मकान ! वह रेहाना परिवार का मकान था। रेहाना, यास्मीन की सहेली थी ! यास्मीन को साथ लेकर, मैं कॉल पर रवाना हो गई। डॉक्टरी जीवन में यह पहली कॉल ! मैंने एप्रेन की जेब में स्टेथेस्कोप, ब्लड-प्रेशर नापने का यन्त्र और कुछेक जीवन-रक्षावाले इंजेक्शन रख लिए। रेहाना के यहाँ, सभी लोग अब्बू की राह देख रहे थे। लेकिन उनकी जगह मैं पहुँची और चूँकि मैं भी डॉक्टर थी, इसलिए मुझे ही रोगी तक ले जाया गया। मरीज था, रेहाना का छोटा भाई। उसकी आँखें गड्ढे में धँस चुकी थीं; होंठ और जुबान सूखकर पड़पड़ा आई थी। उसके डीहाइड्रेशन की जाँच करने के बाद मैंने जरा भी देर किए बिना, उसे फौरन अस्पताल में दाखिल करने की सलाह दी। करीब खड़े, मरीज के स्वस्थ भाई ने छूटते ही एतराज जताया कि जगह की कमी के कारण रोगियों की अस्पताल से लौटा दिया जाता है।

यानी बच्चे को अस्पताल ले जाने के लिए घरवाले बिल्कुल राजी नहीं थे। आखिरकार एक कागज पर पाँच पैकेट कॉलेरा सेलाइन, सेलाइन सेट, बटरफ्लाई नीड्ल और कुछेक दवाओं के नाम लिख दिये। रेहाना ने अपने उस स्वस्थ भाई को रुपए थमाए और जल्द से जल्द ये सामान खरीद लाने की हिदायत दी। उस घर की दूसरी मंजिल पर दो छोटे-छोटे कमरे ! घर का सामान सरंजाम इधर-उधर बिखरा हुआ, रेहाना के अब्बा, अपने पैर समेटे उद्भ्रान्त की तरह एक कुर्सी पर बैठे हुए ! रेहाना की अम्मी बुझा-बुझा सा चेहरा लिए दरवाजे पर खड़ी थीं। गोद में बैरिस्टर ! बैरिस्टर रेहाना के तीन भाइयों में सबसे छोटा ! इस दौरान बैरिस्टर भी दो-दो बार उल्टी-टट्टी कर चुका था। रेहाना को समझ में नहीं आ रहा था कि बैरिस्टर भी कहीं इस रोग का शिकार न हो गया हो। स्वस्थ भाई सेलाइन वगैरह ले आया। मैने सेलाइन रनिंग, चालू कर दिया और रेहाना को भी अच्छी तरह समझा दिया कि सेलाइन का एक बैग खत्म हो जाए, तो दूसरा बैग कैसे लगाना होगा। सोफा के भाई और बैरिस्टर को बिना देर किए फौरन अस्पताल ले जाने की सलाह झाड़कर, जब मैं सीढ़ियों से नीचे उतरी, रेहाना भी मेरे पीछे-पीछे चली आई।

यास्मीन मुझसे पहले ही बाहर निकल गई और एकरिक्शेवाले को आवाज देकर, रिक्शे में जा बैठी। यास्मीन से रेहाना का ‘तू-तुकारी’ का रिश्ता था। उन दोनों ने स्कूल में साथ-साथ पढ़ाई की थी, चंद लड़कियाँ, जब स्कूल में ही पढ़ रही होती हैं, तो उनका ब्याह हो जाता है। रेहाना भी उनमें से एक थी। अब, उसकी गोद में डेढ़ साल की एक बच्ची है। अपनी गृहस्थी छोड़कर वह भाइयों की सेवा करने के लिए मायके चली आई थी। अब इधर पिछले दो दिनों से बेटी को एक नजर देखने के लिए, न जा पाई, न बेटी को यहाँ बुला पाई, क्योंकि यहाँ बुलाना सुरक्षित नहीं था। सीढ़ी के आखिरी पायदान तक उतरकर, रेहाना ने मुझे कुछ रुपए थमा दिए। साठ रूपए ! डॉक्टर की फीस ! किसी कॉल पर जाकर, यह मेरी पहली कमाई थी। कमाई करके, जब मैं रिक्शे में सवार हुई, मैंने खुश-खुश आवाज में यह खुशखबरी, यास्मीन को भी दे डाली। यास्मीन का मुँह, अचरज से खुला रह गया; भौंहें सिकुड़ आईं।

वह हतबुद्ध मुद्रा में कुछेकपल मेरा खुशी से जगमगाता चेहरा देखती रही।
अगले ही पल उसकी जुबान खुली, ‘‘तुमने रेहाना से रुपय्ये लिए ?’’
मैंने हँसते-हँसते ही जवाब दिया, ‘‘हाँ, लिए ! क्यों न लूँ ? उसने खुद हाथ बढ़ा कर दिए। मैंने मरीज देखा, उसने फीस दी। मैं रुपए क्यों न लेती !’’
रेहाना ने जब मेरी तरफ रुपए बढ़ाए थे चूँकि मुझे रुपए लेने की आदत नहीं थी, इसलिए मैं जरा सकुचा गई थी। लेकिन, रेहाना, यास्मीन की सहेली भले हो, मेरी तो कोई नहीं लगती थी। शहर में खोजने निकलो, तो लगभग हर घर में, इसी तरह, मेरी या यास्मीन की सहेली, भाईजान और छोटे भइया के यार दोस्त अम्मी-अब्बू के परिचित या लता-पत्तों की तरह फलते-फूलते नाते-रिश्तेदार मिल जाएँगे। तब तो डॉक्टरी करके दौलत कमाना भी संभव नहीं होगा। कॉल पर आई, रिक्शा-किराया खर्च किया, दिमाग लगाया, मेहनत की फीस तो लेनी ही चाहिए। सभी डॉक्टर लेते हैं। यही सब सोचते हुए, दिल कड़ा करके मैंने रेहाना के दिए हुए रुपए, आखिरकार कबूल कर लिए। वैसे रुपए लेने के बाद भी मुझे सकुचाहट होती रही, आँखें-चेहरा-सिर अपने आप ही झुक गया। मेरी छाती कहीं से बर्फ हो आई, फिर भी मैंने फीस ले ली। समूची राह, यास्मीन की भौंहें चढ़ी रहीं। उसने मुझसे एक भी बात नहीं की।

‘चल, श्रीकृष्ण तक जाकर मिठाई खाते हैं।’
‘न्ना !’’
‘अच्छा चल, कोई फिल्म देखते हैं।’
‘न्ना !’
मेरा ख्याल था, घर पहुँचकर जब मैं अपनी पहली कॉल की कमाई की खबर दूँगी, घरवाले खुश होंगे। लेकिन किसी के चेहरे पर भी खुशी नहीं झलकी, यहाँ तक कि अब्बू के चेहरे पर भी नहीं !
अब्बू ने कहा, ‘‘मैं उनसे फीस नहीं लेता। फ्री देखता हूँ।’
वैसे अब्बू शहर में ऐसे कई घरों में, फीस लिए बिना ही, रोगियों का इलाज करते थे। लेकिन अब्बू मुफ्त इलाज करते हैं, इसलिए मैं भी दानशाला खोलकर बैठ जाऊँ, यह जरूरी नहीं।
अगले दिन अब्बू ने खबर दी कि रेहाना का छोटा भाई, बैरिस्टर भी हैजा रोग का शिकार हो गया है। उस स्वस्थ भाई को भी हैजे ने धर दबोचा है। तीनों भाइयों को अस्पताल में भर्ती करा दिया गया है। रेहाना और उसके अब्बा ने भाग-दौड़कर सारा इंतजाम किया। लेकिन उसके अगले दिन अब्बू ने जो खबर सुनाई उस पर हममें से किसी को भी यकीन नहीं आया कि वे सच कह रहे हैं।

अब्बू ने बताया, ‘‘रेहाना के तीनों भाई स्वस्थ होकर, अस्पताल से घर लौट आए, मगर रेहाना और उसके अब्बा खत्म हो गए। रात के आखिरी पहर में दोनों को ही तुरत-फुरत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। अस्पताल ले जाते हुए, रास्ते में ही रेहाना के अब्बा ने दम तोड़ दिया। अस्पताल पहुँचकर, रेहाना ने भी आधे घंटे के अंदर आँखें उलट दीं। रेहाना जब अपने भाइयों की सेवा में लगी थी, उसने बताया नहीं कि उसे भी उलटी-टट्टी हो रही है। वह खुद बीमार पड़ गई, तो भाइयों की सेवा कौन करेगा ? उन लोगों को अस्पताल कौन ले जाएगा ? इसलिए उसने कुछ नहीं बताया। रेहाना नहीं चाहती थी कि उसके बारे में कोई परेशान हो। अपनी उलटी-टट्टी की बात उसके बाप ने भी छिपाए रखी। उन्होंने भी किसी को खबर नहीं लगने दी। उन्होंने सोचा था, पहले बेटे स्वस्थ हो जाएँ। उसके बाद, वे अपने बारे में सोचेंगे।

रेहाना के अब्बा ही, अपनी गृहस्थी में एकमात्र कमाऊ व्यक्ति थे। चूँकि वे आदर्शवादी थे इसलिए वकालत का पेशा करते हुए भी, अपनी गृहस्थी का अभाव दूर नहीं कर पाए। रेहाना से जब, जितना हो सका। अपने शौहर की कमाई से रुपए बचाकर बाप की गृहस्थी में देती रहती थी। अब उस परिवार के लोगों का क्या होगा ? ‘अवकाश’ में बाकी सभी लोग इसी बारे में बातचीत करते रहे, लेकिन मैं बैठी-बैठी निःस्पंद हो आई। मेरे ख्यालों में रेहाना का गोरा-चिट्टा गोलमटोल चेहरा, परेशान लेकिन उजली-धुली आँखें, बुझी-बुझी लेकिन ममतालु आकृति एकदम से स्थिर हो रही। मेरा मन बार-बार मुझसे सवाल करता रहा-रेहाना से मैंने रुपए क्यों लिए ? मुझे फीस लेने की क्या जरूरत थी ? अभाव की गृहस्थी में साठ रुपए भी बहुत होते हैं। रेहाना को वाकई उन रुपयों की सख्त जरूरत होगी। उसे जरूर यह उम्मीद थी कि मैं वे रुपए नहीं लूँगी। आखिर मैं उसकी सहेली की बहन थी। मेरे अब्बू, उस घर के लोगों का मुफ्त इलाज करते थे। जब मैंने लोभी विवेकहीन की तरह, हैजे से आक्रांत एक घर के चरम दुःसमय में, बेहद डांवाडोल अस्थिर समय में, हाथ बढ़ाकर रुपए ले लिए, तो रेहाना जरूर अवाक् हुई होगी ! जरूर उसे तकलीफ हुई होगी।

दो दिनों बाद जो औरत मरने वाली थी, उसे मैंने इतनी तकलीफ क्यों और कैसे दे डाली ? उसे दुःख देने की क्या जरूरत थी ? वे साठ रुपए, उसने बेहद मुश्किल से जमा किए हुए रुपयों में से दिए होंगे। कितने ही रुपए मैं इधर-उधर फिजूल ही खर्च कर देती थी। मैंने किसी दिन भी रुपयों का हिसाब नहीं किया। उस अभाव की गृहस्थी मैं वे थोड़े से रुपए, न लेती, तो ऐसा क्या हो जाता ? मैं क्या मर जाती ? या मुझे फाके करने होते ? नहीं, ऐसा कुछ नहीं होता। न मैं मर जाती, न मुझे रुपयों की खास जरूरत थी। मैंने तो शौक से और सुख से लिये थे। डॉक्टरी के अहंकार में फीस कबूल की। डॉक्टर कॉल पर जाए और फीस न ले, तो मन में डॉक्टर-डॉक्टर जैसा अहसास नहीं जागता, इसलिए मैंने वह फीस कबूल की थी। मैं अपने को माफ नहीं कर सकती। आइने में अपना चेहरा बेहद कुत्सित लगा। मैं इस वीभत्स चेहरे की तरफ नफरत उछालती रही। मुझे अपनी कुत्सित, क्रूर हथेलियों के प्रति हिकारत होने लगी जिनसे मैंने उन रुपयों को हाथ लगाया था। अपने इस कुकर्म के प्रति बार बार मेरी भौंहे तन गईं।

अपने चेहरे की तरफ देखते हुए, मैंने बार-बार धिक्कार भेजा, ‘तू....? तूने वे रुपए ले लिए ? ले कैसे पाई ? छिः छिः तुझमें इतना लोभ भरा है ? छिः !’’
अम्मी रेहाना से कभी नहीं मिली थी। उसे कभी देखा तक नहीं था। लेकिन फिर भी यास्मीन के साथ, वे उनके यहाँ मातमपुर्सी के लिए गईं। मैं नहीं गई। इसलिए नहीं गई क्योंकि वहाँ किस मुँह से जाती ? अम्मी रेहाना के यहाँ रो धोकर आँखें सुजाकर घर लौंटी।
इसके बाद पानी देखते ही यास्मीन डर के मारे दो हाथ दूर छिटक जाती थी। उसे जलतरंग रोग ने धर दबोचा था। प्यास लगने पर भी वह पानी नहीं पीती थी; पसीने और गर्मी से हाल-बेहाल होते रहने के बावूजद वह गुसल करने नहीं जाती थी। मैं चाहे जितना भी चाहूँ, जिंदगी को अतीत में लौटाकर नहीं ले जा सकती। अपराधबोध ने मुझे कसकर जकड़ लिया था। मैं जहाँ कहीं भी जाती, गुनाह का अहसास मेरे साथ होता था। जब मैं स्थिर-निस्पंद बैठी होती, अपराधबोध भी चुपचाप मेरे साथ बैठा होता। यह अपराध किसी दिन भी मेरी जिंदगी से नहीं जाने वाला, मुझे मालूम है।

बहरहाल, कुछ दिनों बाद, इस शहर से हैजा का प्रकोप दूर हो गया। लेकिन बीस साला वह लड़की रेहाना अब इस शहर में नहीं थी। अब कोई किसी दिन उसे इस शहर में नहीं देख पाएगा। इस शहर में अब वह किसी को नहीं मिलेगी। अपनी भूल सुधारने के लिए, मुझे भी कभी किसी एक दिन यह मौका नहीं मिलेगा। दिन गुजरते रहे। मैं किसी बेसुधी में डूबी रही। हालाँकि अम्मी के हाथ, मैंने रेहाना की माँ को दो सौ रुपए भिजवा दिए थे, मगर मेरी ग्लानि बूँदभर भी कम नहीं हुई। रेहाना तो नहीं जान पाई कि मैंने रुपए वापस कर दिए हैं। उसे तो किसी दिन भी खबर नहीं होगी। कभी-कभी मैं अपने को यह भी समझाने की कोशिश करती कि रेहाना से रुपए लेने का वाकया सचमुच नहीं घटा, वह मेरा दुःस्वप्न है।

रेहाना के घर की सीढ़ियों का एक दृश्य मेरे ख्यालों में लहराता रहता था...रेहाना मुझसे चिरोरी कर रही है, रुपए लेने की जिद कर रही है। मैं उसके कंधे पर हाथ रखकर कहती हूँ, ‘तुम क्या पागल हुई हो ? मैं रुपए क्यों लेने लगी ? ये रुपए तुम अपने ही पास रखो, जरूरत के वक्त काम आएँगे।’ रेहाना एकदम से हँस पड़ती है, ‘‘बहुत बहुत शुक्रिया नसरीन आपा, आपने हम पर बहुत बड़ी मेहरबानी की। भाई का इलाज कर दिया। आपका यह अहसान, मैं किसी दिन भी नहीं चुका पाऊँगी।’ रेहाना की युगल आँखें कृतज्ञता से छलछला आई हैं...मेरी आँखों के आगे और एक दृश्य तैर जाता था...रेहाना के दोनों भाई स्वस्थ हो उठे हैं। रेहाना अपने भाइयों के साथ लूडो खेलने बैठी है। रेहाना की बेटी भी बगल में बैठी-बैठी खेल देख रही है। रेहाना के गोरे-चिट्टे, चंचल चेहरे से उदासी की रेखाएँ विलीन हो चुकी हैं। उसका चेहरा हँसता हुआ...उसकी काली-कजरारी युगल आँखें भी हँसती हुईं...



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