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ष  : नागरी वर्णमाला का इकतीसवाँ व्यंजन जो भाषा-विज्ञान तथा व्याकरण के अनुसार ऊष्म, मूर्धन्य, अघोष, महाप्राण तथा ईषद्विवृत्त है। अवधी में इसका उच्चारण ‘ख’ की तरह होता है।
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षंजन  : पुं० [सं०] १. आलिंगन। २. मिलन।
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षंड  : पुं० [सं०√ सन्+ड, पृषो, षत्व] १. साँड़। बैल। २. नपुंसक। ३. ढेर। राशि। ४. भेड़ों आदि का झुंड। ५. पद्यों का समूह।
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षंडक  : पुं० [सं० षण्ड+कन्] नपुंसक।
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षंडता  : स्त्री० [सं० षंड+तल्+टाप्] नपुंसकता।
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षंडत्व  : पुं० [सं० षण्ड+त्व०] नपुंसकता।
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षंडयोनि  : स्त्री० [सं०]=षंडी।
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षंडाली  : स्त्री० [सं०] १. तालाब। २. व्याभिचारिणी स्त्री।
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षंडी  : स्त्री० [सं०] ऐसी स्त्री जिसमें स्त्री के मुख्य लक्षणों का अभाव हो, अर्थात् न तो जिसके स्तनों का विकास हुआ हो और न रजस्वलता होती हो (ऐसी स्त्री पुरुष समागम के अयोग्य होती है)।
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षंढ  : पुं० [सं०√ सन्+ड] १. नपुंसक। २. क्लीव। ३. शिव।
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षंढा  : स्त्री० [सं० षंढ-टाप्] मरदानी औरत (शरीर और स्वभाव के विचार से)।
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षंढिता  : स्त्री० [सं०]=षंडयोनि।
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ष  : पुं० [सं०] १. केश । बाल। २. स्वर्ग। ३. बुद्धिमन। ४. विद्वान आदमी। ५. निद्रा। ६. अंत। ७. बची हुई वस्तु। ८. हानि। ९. ज्ञान-हानि। १॰. चूचुक। ११. मोक्ष। १२. गर्भ-स्राव। १३. भ्रूण। १४. सहिष्णुता। वि० १. विद्वान। विज्ञ। २. बुद्धिमान्। ३. उत्तम। श्रेष्ठ।
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षट्  : वि० [सं०√ सो+क्विप्+सु] जो गिनती में पाँच से एक अधिक हो। छः। पुं० १. छः का सूचक अंक या संख्या। २. संगीत में षाड़व जाति का एक राग जो सबेरे के समय गाया जाता है। ३. कुछ लोगों के मत से यह असावरी, टोड़ी, भैरवी आदि छः रागिनियों के योग से बना हुआ संकर राग है।
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षट्क  : वि० [सं०] १. छः गना। २. छठी बार होनेवाला या किया जानेवाला। पुं० १. छः का अंक या संख्या। २. एक ही प्रकार की वस्तुओं का वर्ग या समूह। ३. दर्शन-शास्त्रों के अनुसार, इच्छा द्वैष प्रयत्न सुख दुःख और ज्ञान का वर्ग या समूह।
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षट्-कर्म  : पुं० [सं० द्वि० स०] १. शास्त्रों के अनुसार ब्राह्मणों के ये छः कर्म-यजन, याजन, अध्ययन, अध्यापन, दान और प्रतिग्रह। २. स्मृतियों के अनुसार ये छः कर्म जिनके द्वारा आपातकाल में ब्राह्मण अपना निर्वाह कर सकते हैं-उछवृत्ति, दान लेका, भिक्षा, कृषि, वाणिज्य और महाजनी (लेन-देन)। ३. तंत्र-शास्त्र के अनुसार मारण, मोहन (या वशीकरण) उच्चारण, स्तंभन, विदूषण और शांति के छः कर्म। ४. योगशास्त्र में, धौति, वस्ति, नेती, नौलिक, त्राटक और कपाल भाती ये छः कर्म। ५. साधारण लोगों के लिए विहित ये छः काम जो उन्हें नित्य करने चाहिए-स्नान, संध्या, तर्पण, पूजन जप और होम। ६. लोक व्यवहार और बोल-चाल में व्यर्थ के झगड़े-बखेड़े या प्रपंच।
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षट्-कर्मा  : पुं० [सं० ब० स०] षट्-कर्म करनेवाला ब्राह्मण, तांत्रिक, योगी और गृहस्थ।
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षट्-कला  : स्त्री० [सं० ब० स०] संगीत में ब्रह्मताल के चार मुख्य भेदों में से एक।
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षट्कोण  : वि० [सं० ब० स०] छः कोणोंवाला (हेक्सेंगुलर)। पुं० ज्यामिति में छः कोणोंवाली आकृति।
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षट्-चक्र  : पुं० [सं० द्वि० स०] १. योग में ये छः चक्र-मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध और आज्ञा। २. झगड़े-बखेड़े या झंझट के काम।
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षट्-चरण  : वि० [सं० ब० स०] छः पैरोंवाला। पुं० १. भौंरा। २. जूँ। ३. टिड्डी।
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षट्-तिल  : स्त्री० [सं०] संगीत में मृदंग का एक प्रकार का ताल।
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षट्-तिला  : स्त्री० [सं०] माघ के कृष्ण पक्ष की एकादशी जिस दिन तिलदान करने का माहात्म्य है।
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षट्-दर्शन  : पुं० [सं० द्वि० स०] हिन्दुओं के तत्त्व-ज्ञान सम्बन्धी ये छः दर्शन या शास्त्र-सांख्य योग, न्याय, वैशेषिक पूर्व-मीमांसा और उत्तर-मीमांसा।
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षट्-दर्शनी  : पुं० [सं० द्वि० स०] वह जो हिन्दुओं के दर्शनों का अच्छा ज्ञाता या पंडित हो।
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षट्-पद  : वि० [सं० ब० स०] [स्त्री० षट्पदी] छः पैरोंवाला।
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षट्पदी  : स्त्री० [सं० ब० स०] छप्पय छंद जिसमें छः पद या चरण होते हैं।
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षट्-प्रज्ञ  : वि० [सं० ब० स०] चारों पुरुषार्थ अर्थात् लोकार्थ और तत्त्वार्थ का ज्ञाता।
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षट्-भुज  : पुं० [सं० ब० स०] ज्यामिति में वह क्षेत्र या आकृति जिसकी छः भुजाएँ हों। (हेक्सागन)
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षट्-रस  : पुं० [सं० द्वि० स०] खाने-पीने की चीजों के ये छः रस या स्वाद-मधुर, लवण, तिक्त, कटु, कषाय और अम्ल।
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षट्-राग  : पुं० [सं० द्वि० स०] १. संगीत के ये छः मुख्य राग-भैरव, मला, श्री, हिंडोल, मालकोश और दीपक। २. व्यर्थ का झगड़ा या बखेड़ा।
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षट्-रिपु  : पुं० [सं० द्वि० स०] धर्मशास्त्र के अनुसार ये छः मनोविकार जो मनुष्य के शत्रु माने गये हैं—काम, क्रोध, भय, मोह, लोभ और अहंकार या (किसी किसी के मत से) मत्सर।
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षट्-वर्ग  : पुं० [सं० द्वि० स०] १. एक ही तरह की छः चीजों का वर्ग या समूह। २. फलित ज्योतिष में क्षेत्र, प्रेष्काण, नवमांश, द्वादशांश और त्रिशांश का वर्ग या समूह। ३. दे० ‘षट्-रिपु’।
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षट्वांग  : पुं० [सं०] एक प्राचीन राजर्षि जिन्हें केवल दो घड़ी की साधना से मुक्ति प्राप्त हुई थी।
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षट्-विकार  : पुं० [सं० द्वि० स०] १. दार्शनिक क्षेत्र में प्राणियों के ये छः विकार या परिणाम-जन्म,शरीर-वृद्धि, बाल्यावस्था, प्रौढ़ता वार्द्धक्य और मृत्यु। २. =षट्-रिपु।
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षट्-शास्त्र  : पुं० [सं०]=षट्-दर्शन।
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षडंग  : पुं० [सं० द्वि० स०] १. वेदों के ये छः अंग-शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष। २. शरीर के ये छः अंग दो पैर, दो हाथ,सिर और धड़।
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षडक्षरी  : पुं० [सं० द्वि० स०] रामानुज के श्री—वैष्णव सम्प्रदाय का दीक्षामंत्र जो छः अक्षरों का है।
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षडग्नि  : स्त्री० [सं०] कर्मकांड के अनुसार ये छः प्रकार की अग्नियां-गार्हपत्य, आहवनीय, दक्षिणाग्नि, सम्णाग्नि, आवसथ्य और औपासनाग्नि।
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षडज  : पुं०=षडज् (स्वर)।
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षड़ानन  : वि० [सं० ब० स०] छः मुखोंवाला। जिसके छः मुँह हों। पुं० १. कार्तिकेय जिनके छः मुँह कहे गये हैं। २. संगीत में स्वर साधना की एक प्रणाली जो आरोही में इस प्रकार है-सा रे गम प ध रे ग म प ध नि, ग म प ध नि सा और अवरोही में इसके विपरीत है।
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षड्-अक्षरी  : स्त्री०=षड्क्षरी।
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षड्गुण  : पुं० [सं० द्वि० स०] १. छः गुणों का समूह। २. प्राचीन भारतीय राजनीति में राज्य के ये छः गुण या कार्य-सन्धि, विग्रह, यान (चढ़ाई) आसन (विराम) द्वैधीभाव और संशय।
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षड्ज  : पुं० [सं० षड√ जन] संगीत के सात स्वरों में से पहला स्वर जो साधारणतः ‘सा’ कहलाता है। विशेष—संगीत शास्त्र के अनुसार इस स्वर का उच्चारण नासा, कण्ठ, उर, तालु जीभ और दाँतों के सम्मिलित प्रयत्न से होता है इसलिए इसका नाम षडज् पड़ा है।
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षड्-दर्शन  : पुं०=षट्-दर्शन।
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षड्-भाग  : पुं० [सं०] भूमि की उपज का वह छठा अंश जो भूमि-कर के रूप में लिया जाता था।
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षड्भाषा  : स्त्री० [सं० ब० स०] संस्कृत, प्राकृत अपभ्रंश शौरसेनी, मागधी और पैशाची शब्दों के योग से बनी हुई एक प्राचीन मिश्र भाषा जिसका रूप चन्द्रवरदाई कृत पृथ्वीराज रासों में देखने को मिलता है।
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षड्यंत्र  : पुं० [सं०] १. वह योजना जो कुछ लोग सामूहिक रूप से कोई अनुचित तथा अपराधपूर्ण काम करने के लिए बनाते हैं। २. कोई बडा परिवर्तन करने के लिए गुप्त रूप से की जानेवाली कार्रवाई (कान्सपिरेसी) क्रि० प्र०—रचना।
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षड्रस  : पुं० [सं०] षट्-रस।
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षड्रिपु  : पुं० [सं०]=षट्-रिपु।
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षड्वर्ग  : पुं० [सं०] षट्-वर्ग।
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षड्विंदु  : पुं० [सं० ब० स०] १. विष्णु। २. गुबरैले की तरह का एक प्रकार का कीड़ा जिसकी पीठ पर बुँदकियाँ होती है।
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षड्विकार  : पुं० =षड्-विकार।
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षण्मुख  : वि० [सं०]=षडानन।
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षष्टि  : वि० [सं० षट्+दशति, नि० सिद्धि] जो गिनती में पचास से दस अधिक हो। साठ। स्त्री० साठ की सूचक संख्या जो इस प्रकार लिखी जाती है।—६॰।
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षष्टिक  : पुं० [सं०] साठी नामक धान।
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षष्टिका  : स्त्री० [सं०] साठी धान।
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षष्ठ  : वि० [सं० षष्+डट्—थुक्] गिनती में छः के स्थान पर पड़नेवाला। छठा।
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षष्ठान्न  : पुं० [सं०] वह अन्न जो तीन दिन का व्रत रखकर इन तीन दिनों में केवल एक बार खाया जाय।
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षष्ठी  : स्त्री० [सं० षष्ठ+डीप्] १. चांद्र मास के शुक्ल या कृष्ण पक्ष की छठी तिथि। छठ। २. संस्क-त व्याकरण में संबंध सूचक विभक्ति। ३. बच्चे के जन्म के छठे दिन होनेवाला कृत्य। छठी। ४. सोलह मातृकाओं में एक मातृका। ५. दुर्गा का एक नाम।
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षांड  : पुं० [सं०] शिव।
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षांड्य  : पुं० [सं०]=षंडता।
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षाड़व  : पुं० [सं० षष्√ अज्+अच्+अण्] संगीत में ऐसा राग जिसमें केवल छः स्वर लगते हों और कोई एक स्वर न लगता हो।
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षाड़व-ओड़व  : पुं० [सं०] संगीत में ऐसा राग जो आरोही में षाड़व और अवरोही में ओडव हो।
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षाड़व-संपूर्ण  : पुं० [सं०] संगीत में ऐसा राग जो आरोही में षाड़व और अवरोही में संपूर्ण हो।
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षाडग्डुण्य  : पुं० [सं०] १. किसी संख्या को छः से गुणा करने पर प्राप्त होनेवाला गुणनफल। २. षड्गुण (देखें) होने की अवस्था या भाव।
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षाण्मातुर  : वि० [सं० षण्मात्+अण्, उत्व] जिसकी छः मात्राएँ हों। पुं० कार्तिकेय।
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षाण्मासिक  : वि० [सं० षण्मास+ठक्] १. अवस्था में छः महीनेवाला २. जिसकी अवधि छः मास की हो। जैसा—षाण्मासिक चंदा। पुं० मृतक का होनेवाला वह श्राद्ध जो उसकी मृत्यु के छः महीने बाद किया जाता है। छ-माही।
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षाण्मुख  : वि० [सं०] छः मुखोंवाला। पुं० कार्तिकेय।
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षाष्टिक  : वि० [सं०] षष्ठी-संबंधी।
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षोडश  : वि० [सं० षोडशन्+डट्] जो गिनती में दस से छः अधिक हो। सोलह। पुं० सोलह की संख्या।
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षोडशक  : पुं० [सं० षोडश+कन्] सोलह।
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षोडश कला  : स्त्री० [सं० द्वि० स०] चन्द्रमा की सोलहों कलाएँ (दे० ‘कला’)।
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षोडश-गण  : पुं० [सं० द्वि० स०] दार्शनिक क्षेत्र में पाँचों ज्ञानेन्द्रियों, पाँचों कर्मेन्द्रियों पाँचों भूतों और मन का वर्ग या समूह।
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षोडश-दान  : पुं० [सं० द्वि० स०] धार्मिक क्षेत्र में नीचे लिखी १६ चीजों का एक साथ किया जानेवाला दान-भूमि, आसन, जल, वस्त्र, फल, शास्त्र, दीपक, पान, छत्र, सुगंधित द्रव्य, पुष्प माला, फल शास्त्र खडाऊँ गौ सोना और चाँदी।
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षोडज पूजन  : पुं० [सं०]=षोडशोपचार।
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षोडश-मातृका  : स्त्री० [सं० द्वि० स०] इन सोलह मातृकाओं (एक प्रकार की देवियों) का वर्ग या समूह-गौरी, पद्या, शछी, मेघा, सावित्री, विजया, जया, देवसेना, स्वधा, स्वाहा, शालि, पुष्टि, धृति, तुष्टि मातृ और आत्म-देवता।
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षोडश-श्रृंगार  : पुं० [सं०] संपूर्ण श्रृंगार जिसमें सोलह बातें होती हैं—उबटन, लगाना, स्नान करना, वस्त्र धारण करना, बाल सँवारना, अंजन लगाना, सिंदूर भरना, महावर लगाना, भाल पर तिलक बनाना, ठोढ़ी पर तिल बनाना, मेंहदी रचाना, सुगन्धित द्रव्यों का प्रयोग करना, अलंकार धारण करना, पुष्पहार पहनना, पान खाना, होठ रँगना और मिस्सी लगाना
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षोडश-संस्कार  : पुं० [सं०] गर्भाधान से लेकर मृत्यु तक के सोलह संस्कार। विशेष दे० ‘संस्कार’।
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षोडशांग  : वि० [सं०] जिसके १६ अंग या अवयव हों। पुं० सोलह गंध-द्रव्यों से तैयार किया हुआ धूप।
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षोडशांशु  : पुं० [सं० ब० स०] शुक्र ग्रह।
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षोडशाह  : पुं० [सं० ब० स०] १. सोलह दिन तक किया जानेवाला एक प्रकार का उपवास। २. मृतक की षोडशी (देखें) नामक कृत्य।
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षोडशिक  : वि० [सं० षोडश+ठक्] १. सोलह से संबंध रखनेवाला। २. सोलहवाँ।
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षोडशी  : वि० [सं०] सोलह वर्षों की (युवती) स्त्री० १. सोलह वर्षों की युवती स्त्री। २. वह कृत्य जो किसी के मरने के दसवें या ग्यारहवें दिन होता है (हिन्दू) ३. दस महाविद्याओं में से एक महाविद्या। ४. नीचे लिखी १६ वस्तुओं का वर्ग या समूह-ईक्षण, प्राण, श्रद्धा, आकाश, वायु, जल, अग्नि, पृथ्वी, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीर्य, तप, मंत्र, कर्म और नाम।
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षोडशोपचार  : पुं० [सं० कर्म० स०] पूजन के सोलह अंगा या कृत्य-आसन, स्वागत, अर्ध्य, आचमन, मधुपर्क, स्नान, वस्त्राभरण, यज्ञोपवीत, चंदन, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, तांबूल,परिक्रमा और वंदना।
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ष्ठीवन  : पुं० [सं०√ ष्ठिव+ल्युट] [भू० कृ० ष्ठयूत] १. थूकने की क्रिया या भाव। २. थूक।
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ष्ठीवी  : स्त्री० [सं०]=ष्ठीवन।
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ष्ठयूत  : भू० कृ० [सं०√ ष्ठिव+क्त, ऊठ्] थूका हुआ।
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ष्ठ्यूति  : स्त्री० [सं०√ ष्ठिव्+क्तिन्, ऊठ्] थूकने की क्रिया या भाव।
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