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बगल  : स्त्री० [फा० बगल] १. बाहु-मूल के नीचे का गड्ढा। काँख। पद—बगल-गंध। (देखें)। मुहावरा—बगलें बजाना=बहुत प्रसन्नता प्रकट करना। खूब खुशी मनाना। विशेष—प्रायः लड़के बहुत प्रसन्न होने पर बगल में हथेली रखकर उसे जोर से बाँह से दबाते हैं जिससे विलक्षण शब्द होता है। उसी के आधार पर यह मुहावरा बना है। २. छाती के दोनों किनारों का वह भाग जो बाँह गिराने पर उसके नीचे पड़ता है। पार्श्व। पद—बगल-बंदी। (देखें)। मुहावरा—(किसी की) बगल गरम करना-सहवास या सम्भोग करना। बगल में दाबना या लेना-(क) कोई चीज उठाकर ले चलने के लिए उसे बगल में रखना तथा भुजा से अच्छी तरह दबाकर थामे रखना। जैसे—गठरी बगल में दबाकर चल पड़ना। (ख) अपने अधिकार में करना। उदाहरण—लै गै अनूप रूप सम्पत्ति बगल में दाबि उचिके अचान कुच कंचन पहार से।—देव। बगलें झाँकना-निरूतर या लज्जित होने पर यह समझने के लिए इधर-उधर देखना कि अब क्या करना या कहना चाहिए। ३. कपड़े का वह टुकड़ा जो अँगऱखे कुरते आदि की आस्तीन में बगल के नीचे पड़नेवाले अंश में लगाया जाता है। ४. वह जो किसी की दाहिनी या बायी ओर स्थित या प्रतिष्ठित हो। जैसे—(क) सभापति की बगल में अतिथि विराजमान थे। (ख) उनकी दुकान की बगल में पान की एक दुकान है। ५. समीप का स्थान। पास की जगह। पद—बगल में-(क) पास में। (ख) एकओर। जैसे—बगल में हो जाओ।
समानार्थी शब्द-  उपलब्ध नहीं
बगल-गंध  : स्त्री० [हिं० बगल+गंध] १. बगल या काँख में होनेवाला एक प्रकार का फोड़ा। कँखवार। कँखौरी। २. एक प्रकार का रोग जिसमें बगल में काँख में से बहुत बदबूदार पसीना निकलता है।
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बगलगीर  : वि० [अं० बगल+फा० गीर०] [भाव० बगलगीरी] १. जोबगल या पास में स्थित हो। जिसे बगल में सटाकर बैठाया गया हो। पार्श्ववर्ती। २. जो गले मिला हो अथवा जिसे गले से लगाया गया हो। आलिंगित। मुहावरा—बगलगीर होना-आलिंगन करना।
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बगलबंदी  : स्त्री० [हिं० बगल+बंद] एक प्रकार की मिरजई जिसमें बगल में बन्द बाँधे जाते हैं।
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बगला  : पुं० [हिं० बक+ला (प्रत्यय)] [स्त्री० बगली] १. सारस की जाति का सफेद रंग का एक पक्षी जिसकी टाँगे, चोंच और गला लम्बा और पूँछ बहुत छोटी होती है। पद—बगला-भगत (देखें)। २. रहस्य सम्प्रदाय में, मन। पुं० [हिं० बगल] थाली की बाढ़। अँवठ। पुं० [देश] एक प्रकार का झाड़ीदार पौधा।
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बगला-भगत  : पुं० [हिं० ] वह जो देखने में बहुत धार्मिक तथा सीधा-सादा जान पड़ता हो, पर वास्तव में बहुत बड़ा कपटी या धूर्त हो।
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बगलामुखी  : स्त्री० [सं० ] तंत्र के अनुसार एक देवी। कहते हैं कि इसकी आराधना करने से शत्रु की वाणी कुंठित एवं शेष इंद्रियाँ स्तम्भित हो जाती हैं।
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बगलियाना  : अ० [हिं० बगल+इयाना (प्रत्यय)] बात-चीत या सामना न करते हुए बगल से होकर निकल जाना। कतारकर निकल जाना। स० १. बगल में करना या ले जाना। २. बगल में दबाना। ३. अलग करना या हटाना।
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बगली  : वि० [हिं० बगल+ई (प्रत्यय)] १. बगल से संबंध रखनेवाला। बगल का। पद—बगली घूँसा (देखें)। २. एक ओर का। स्त्री० १. ऊँटों का एक दोष जिसमें चलते समय उनकी जाँघ की रगपेट में लगती है। २. मुग्दर चलाने का एक ढंग। ३. वह थैली जिसमें दरजी सूई-तागा आदि रखते हैं। तिलेदानी। ४. दरवाजे की बगल में लगायी जानेवाली सेंध। क्रि० प्र०—काटना।—मारना। ५. अँगरखे की आस्तीन में लगाया जानेवाला कपड़े का वह टुकड़ा जो बगल के नीचे पड़ता है। बगल। स्त्री० [हिं० बगला] १. मादा बगुला। २. बगुले की जाति की एक छोटी चिड़िया जो ढीठ होने के कारण मनुष्यों के इतने पास आ जाती है कि लोग इसे ‘अंधी बगली’ भी कहते हैं।
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बगली घूँसा  : पुं० [हिं०] १. वह घूँसा जो किसी की बगल में अथवा किसी की बगल छिपकर किया जाय। २. वह वार जो आड़ में रहकर अथवा छिपकर किया जाय। ३. वह वार जो साथी बनकर या साथी होने का ढोंग रचकर किया जाय। ४. वह व्यक्ति जो धोखे से उक्त प्रकार का वार करता हो।
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बगली टाँग  : स्त्री० [हिं० बगली+टाँग] कुश्ती का एक पेंच।
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बगली बाँह  : स्त्री० [हिं० बगली+बाँह] एक प्रकार की कसरत जिसमें दो आदमी बराबर खड़े होकर अपनी बाँह से एक-दूसरे की बाँह में धक्का देते हैं।
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बगलेंदी  : स्त्री० [?] एक प्रकार की चिड़िया।
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बगलौहाँ  : वि० [हिं० बगल+औहाँ] [स्त्री० बगलौहीं] बगल की ओर झुका हुआ। तिरछा। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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