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छाँद  : स्त्री० [सं० छंद-बंधन] १. चौपायों के पैंरों में बाँधी जानेवाली रस्सी। २. छाँदने की क्रिया या भाव।
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छाँदना  : स० [हिं० छाँद+ना (प्रत्यय)] १. रस्सी से बाँधना। जैसे–असबाब बाँधना-छाँदना। २. चौपायों के पिछले दोनों पैरों को सटाकर रस्सी से बाँधना जिससे वह दूर जाने या भागने न पावें।
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छाँदसीय  : वि० [सं० छन्दस्+अण्+छ-ईय](वह) जो छंदशास्त्र का ज्ञाता हो।
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छाँदा  : पुं० [हिं० छाँदना] वह भोजन जो ज्योनार, भंडारे आदि से कपड़े आदि में बाँधकर लाया जाय। परोसा। जैसे–ब्राह्मणों को भोजन कराने के बाद एक-एक छाँदा भी दिया गया था।
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छांदोग्य  : पुं० [सं० छन्दोग+ञ्य] एक प्रसिद्ध उपनिषद् जो सामवेद का अंग है और जिसमें दृष्टि की उत्पत्ति,यज्ञों के विधान तथा अनेक प्रकार के उपदेश हैं।
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