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ऐ  : नागरी वर्ण-माला का नवाँ स्वर वर्ण। भाषा-विज्ञान और व्याकरण की दृष्टि से यह अर्द्ध संवृत दीर्घ पश्च स्वर है। अव्यय के रूप में इसका व्यवहार संबोधन के लिए ‘हे’ के अर्थ में होता है। जैसे—ऐ लड़के। कविता में यह ‘इतना’ के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है। जैसे—ऐ परिइतने पर भी। अवधी में यह शब्दों के अंत में लगकर ‘को’ विभक्ति का अर्थ देता है। जैसे—बाबै नासै दासी।
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ऐ  : अव्य० [अनु०] १. कोई बात अच्छी तरह से न सुनने पर उसे फिर से सुनने की उत्सुकता का सूचक एक अव्यय। जैसे—ऐं ! क्या कहा ? २. एक आश्चर्यसूचक अव्यय। जैसे—ऐं !! वह भी चला गया ?
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ऐंगुद  : वि० [सं० इंगुदी+अण्] इंगुदी संबंधी। पुं० इंगुदी की गिरी।
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ऐंच  : वि० [हिं० ऐंचना] ऐंचने या खींचने की क्रिया या भाव।
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ऐंचना  : स० [हिं० खींचना] १. जोर से या बलपूर्वक कोई चीज अपनी ओर खींचना या लाना। २. लाक्षणिक अर्थ में, किसी का ऋण या जिम्मेदारी अपने ऊपर लेना। ३. भूसी अलग करने के लिए अनाज फटकना।
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ऐंचा-ताना  : वि० [हिं० ऐंचना+तानना] (व्यक्ति) जिसकी आँख की पुतली का रूख तो एक ओर होता हो, परंतु जो देखता किसी दूसरी ओर हो। भेंगा।
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ऐंचातानी  : स्त्री० खींच-तान (दे०)।
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ऐंची  : स्त्री० [हिं० ऐंचना] चंडू या मदक पीने की नली। बंबू।
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ऐंचीला  : वि० [हिं० ऐंच+इला (प्रत्यय)] जो खींचा या ताना जा सकता हो। लचीला।
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ऐंछना  : स० [सं० उञ्छनचुनना] १. झाड़ना। साफ करना। २. (बालों में) कंघी करना। ३. पोंछना।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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ऐंठ  : स्त्री० [हिं० ऐंठना] १. ऐंठने की क्रिया या भाव। २. बल। मरोड़। ३. प्रकृति का स्वभाव, व्यवहार आदि में, दिखाई देनेवाला दुराग्रह या हठ। अकड़। ४. अपनी बात पर अड़े रहने की प्रवृत्ति। ५. घमंड। शेखी। ६. दे० ‘ऐंठन’।
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ऐंठन  : स्त्री० [हिं० ऐंठना] १. ऐंठने की अवस्था या भाव। २. ऐंठने के कारण पड़ा हुआ बल। मरोड़। ३. वात आदि के प्रकोप के कारण शरीर के किसी अंग में रह-रहकर पड़नेवाला बल या होनेवाला मरोड़ जिसमें वह अंग पीड़ादायक रूप में ऐंठता या ऐंठता हुआ जान पड़ता है। (स्पाज्म) जैसे—पेट, पैर या हाथ में होनेवाली ऐंठन।
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ऐंठना  : अ० [सं० आवर्त्तन, प्रा० आवहन] १. किसी वस्तु में बल पड़ने के कारण उसका किसी ओर मुड़ना या संकुचित होना। २. संकुचित होना। खिंचना। तनना। ३. अकड़, दुराग्रह या शेखी दिखलाना। इतराना। मुहावरा—ऐंठी वैंठी करना (क) अकड़ दिखलाना। (ख) बहाना करना। ४. वात-विकार आदि के कारण शरीर के किसी अंग में रह-रहकर पीड़ा-कारक रूप में बल पड़ना या मरोड़ होना। जैसे—पेट या हाथ पैर ऐंठना। मुहावरा—(किसी की) ऐंठ जाना या ऐंठकर रह जानाबहुत ही विवशता की दशा में और चटपट मर जाना। जैसे—एक कै आते ही वह ऐंठ गया। स० १. किसी चीज में बल डालना। कोई चीज बलपूर्वक दबाते हुए घुमाना। मरोड़ना। (टिवस्ट) जैसे—कान ऐंठना। २. धूर्त्तता या धोखे से किसी से कोई चीज लेना या धन वसूल करना। झँसना। जैसे—वह इसी तरह सबसे रूपए ऐंठकर ले जाता है।
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ऐंठवाना  : स० हिं० ऐंठना का प्रे०रूप] ऐंठने का काम दूसरे से कराना। किसी को कुछ ऐंठने में प्रवृत्त करना।
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ऐंठा  : पुं० [हिं० ऐंठना] १. एक उपकरण जिससे रस्सी-रस्से आदि बटते हैं। २. घोंघा। वि० प्रायः ऐंठ या शेखी दिखानेवाला।
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ऐंठाना  : स० [ऐंठना का प्रे० रूप] ऐंठवाना। अ०=ऐंठना।
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ऐंठू  : वि० [हिं० ऐंठना] १. बहुत ऐंठ (घमंड) दिखानेवाला। २. दूसरों का माल ऐंठनेवाला।
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ऐंड़  : पुं० [हिं० ऐंठ] १. ऐंड़ने की क्रिया या भाव। २. घमंड। शेखी। ३. पानी की भवँर। वि० निकम्मा या व्यर्थ।
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ऐंड़दार  : वि० [हिं० ऐंड़+फा० दार] १. ऐंठ या अकड़ दिखलानेवाला। २. छैला। बाँका। ३. घुमावदार। ४. तिरछा।
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ऐंड़ना  : अ० [हिं० ऐंठना] १. ऐंठना। बल खाना। २. ऐंठ दिखलाना। इतराना। ३. अँगड़ाई लेना। स० उमेठना या घुमाना। बल देना।
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ऐंड़-बैंड़  : वि०=अंड-बंड।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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ऐंड़ा  : वि० [हिं० ऐंड़ना] [स्त्री० ऐंड़ी] १. अकड़ा या ऐंठा हुआ। मुहावरा—अंग ऐंड़ा करना=ऐंठ दिखलाना। २. टेढ़ा या तिरछा। ३. घमंड करनेवाला। पुं० [?] १. बटखरा। २. सेंध।
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ऐंड़ाना  : अ० [हिं० ऐंड़ना] १. अकड़ दिखलाना। इतराना। २. अंगड़ाई लेना। अँगड़ाना।
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ऐंड़ा-बैंड़ा  : वि० [सं० अकांड-विकांड] १. बेढंगे या विकृत आकारवाला। २. टेढ़ा-तिरछा। ३. अंड-बंड। ऊट-पटाँग।
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ऐंदव  : वि० [सं० इन्दु+अण्] इंदु या चंद्रमा संबंधी। पुं० मृगशिरा नक्षत्र। (जिसके देवता चंद्रमा माने जाते हैं)।
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ऐंदवी  : स्त्री० [सं० ऐंदव-ङीप्] सोमराजी लता।
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ऐंद्र  : वि० [सं० इंदु+अण्] इंद्र-संबंधी। इंद्र का। पुं० १. इंद्र का पुत्र। २. ज्येष्ठा नक्षत्र।
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ऐंद्रजाल  : पुं० [सं० इंद्रजाल+अण्]=इंद्रजाल।
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ऐंद्रजालिक  : वि० [सं० इद्रजाल+ठक्-इक] इंद्रजाल के खेल करनेवाला। जादूगर।
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ऐंद्रशिर  : पुं० [सं० इंद्रशिर+अण्] एक प्रकार का हाथी।
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ऐंद्रि  : पुं० [सं० इंद्र+इञ्] १. इंद्र का पुत्र। २. जयंत।
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ऐंद्रिय  : वि० [सं० इंद्रिय+अण्] १. जिसका संबंध इंद्रियों से हो। २. जो इंद्रियों का विषय हो। जो इंद्रियों के द्वारा जाना या ग्रहण किया जा सके।
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ऐंद्रियक  : वि० [सं० इंद्रिय+वुञ्-अक] १. इंद्रिय-संबंधी। २. जिसका ज्ञान इंद्रियों से हो।
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ऐंद्रियता  : स्त्री० [सं० इंद्रिय+तल्-टाप्] १. ऐंद्रिय होने की अवस्था या भाव। २. इंद्रियों द्वारा किया जानेवाला भोग। ३. इंद्रियों से प्राप्त होनेवाला सुख। ४. इंद्रियों की वासना की पूर्ति।
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ऐंद्री  : स्त्री० [सं० इंद्र+अण्-ङीष्] १. इंद्र की पत्नी। इंद्राणी। शची। २. दुर्गा। ३. इंद्र वारूणी लता। ४. एला। इलायची।
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ऐंधन  : वि० [सं० इंधन +अण्] १. ईंधन संबंधी। २. ईंधन से उत्पन्न (अग्नि)। पुं० सूर्य।
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ऐ  : पुं० [सं० आइ (गति)+विच्] शिव। अव्य० [सं० अयि] पुकारने या बुलाने का एक संबोधन सूचक अव्यय जैसे—ऐ दोस्त।
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ऐक  : पुं० [?] गहराई की थाह। उदाहरण—सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा।—तुलसी।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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ऐकपत्य  : पुं० [सं० एकपति+ष्यञ्] १. एक पति होने की अवस्था या भाव। पूरा स्वामित्व। २. एक तंत्री शासन।
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ऐकभाव्य  : पुं० [सं० एकभाव+ष्यञ्] १. एक-भाव होने की अवस्था या भाव। २. विचार, स्वभाव आदि की एकता।
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ऐकमत्य  : पुं० [सं० एकमत+ष्यञ्] किसी विचार या विषय के संबंध में सब लोगों का एक मत या एक राय होना। मत या विचारों की एकता।
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ऐकांतिक  : वि० [सं० एकांत+ठञ्-इक] १. एकांत में होने या उससे संबंध रखनेवाला। २. विशेष रूप से किसी एक ही विषय, व्यक्ति आदि से संबंध रखनेवाला। (एक्सक्लूसिव) ३. अलग और निराला। (क्व०) ४. दे० ‘एकदेशीय’।
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ऐकांतिक-धर्म  : पुं० [सं० कर्म० स०] प्राचीन भारत का एक धार्मिक संप्रदाय जो मोक्ष प्राप्ति के लिए ईश्वर को प्रार्थना द्वारा प्रसन्न या संतुष्ट करना आवश्यक समझता था। वासुदेव धर्म इसी का विकसित रूप था।
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ऐकाग्र  : वि० [सं० एकाग्र+अण्]=एकाग्र।
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ऐकात्म्य  : पुं० [सं० एकात्मन्+ष्यञ्]=एकात्मता।
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ऐकाधिकरण्य  : पुं० [सं० एकाधिकरण+ष्यञ्] एक ही विषय से संबद्ध होने की अवस्था या भाव।
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ऐकार  : पुं० [सं० एकार+अण्] १. ‘ऐ’ स्वर या उसकी ध्वनि। २. ‘ऐ’ की सूचक मात्रा।
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ऐकार्थ्य  : पुं० [सं० एकार्थ+ष्यञ्] १. एक ही अर्थ होने की अवस्था या भाव। २. उद्देश्य, प्रयोजन आदि का एक ही समान होने की अवस्था या भाव।
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ऐकाहिक  : वि० [सं० एकाह+ठक्-इक] १. एक दिन में होनेवाला। २. जिसका जीवन केवल एक दिन का हो। एक ही दिन तक जीवित रहनेवाला।
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ऐक्षव  : वि० [सं० इक्षु+अण्] १. ईख या ईख के रस से बना हुआ। २. ईख संबंधी। पुं० १. ईख से बनी हुई चीज। जैसे—गुड़० चीनी, मिसरी आदि। २. ईख के रस से बनी हुई शराब।
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ऐक्ष्वाक  : वि० [सं० इक्ष्वाकु+अण्] इक्ष्वाकु संबंधी। पुं० १. इक्ष्वाकु का वंशज। २. इक्ष्वाकुओं द्वारा शासित एक प्राचीन देश।
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ऐक्ष्वाकु  : पुं०=इक्ष्वाकु।
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ऐक्य  : पुं० [सं० एक+ष्यञ्] एक होने की अवस्था या भाव। एकता।
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ऐगुन  : पुं०=अवगुण।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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ऐच्छिक  : वि० [सं० इच्छा+ठक्-इक] १. (कार्य) जिसका करना अपनी इच्छा पर निर्भर हो। स्वेच्छा से किया जानेवाला। २. वैकल्पिक। ३. मनमाना।
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ऐंठा  : वि० [सं० उच्छिष्ट] १. खाकर छोड़ा हुआ। जूठा। २. जिसका उपभोग किया जा चुका हो। उदाहरण—ऐठौ आतम सम अधम।—प्रिथीराज।
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ऐठित  : वि०=ऐठा।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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ऐड़  : वि० [सं० एड वा इडा+अण्] १. भेड़ संबंधी। २. स्फूर्तिदायक। पुं० पुरुखा।
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ऐडक  : वि० [सं० एडक+अण्] भेड़-संबंधी। पुं० भेड़ की एक जाति।
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ऐडविल  : पुं० [सं० इडविला+अण्] कुबेर।
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ऐण  : पुं० [सं० अयन] घर। उदाहरण—भोला की डर भागियौ, अंत न पहुड़ै ऐण।—कविराजा सूर्यमल।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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ऐणिक  : पुं० [सं० एण+ठक्-इक] १. हिरन संबंधी। २. हिरन से उत्पन्न होनेवाला। जैसे—ऊन खाल आदि। पुं० हिरन का शिकार करनेवाला शिकारी।
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ऐत  : वि०=इतना।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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ऐतरेय  : पुं० [सं० इतरा+ढक्-एय] १. ऋग्वेद का एक ब्राह्मण ग्रंथ। २. एक आरण्यक ग्रंथ ७ जिसमें वानप्रस्थों के लिए नियम आदि लिखे हुए हैं।
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ऐतरेयी (यिन्)  : वि० [सं० ऐतरेय+इनि] ऐतरेय ब्राह्मण का अध्ययन करनेवाला।
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ऐतिहासिक  : वि० [सं० इतिहास+ठक्-इक] १. इतिहास संबधी। जैसे—ऐतिहासिक दृष्टिकोण। २. (घटना या व्यक्ति) जिसका वर्णन इतिहास में हुआ हो। (हिस्टारिकल) पुं०=इतिहासज्ञ।
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ऐतिह्य  : वि० [सं० इतिह+ञ्य] १. जो परंपरा से चला आ रहा है। २. जिसे बहुत दिनों से सुनते चले आ रहे हों। अनुश्रुत।
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ऐतिह्य-प्रमाण  : पुं० [सं० कर्म० स०] ऐसा प्रमाण जो इसी आधार पर प्रामाणिक माना जाता हो कि वह लोक में बहुत दिनों से अनुश्रुति के रूप में इसी प्रकार चला आ रहा है।
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ऐन  : वि० [अ०] १. जैसा होना चाहिए, ठीक वैसा ही। बिलकुल ठीक। सटीक। जैसे—आप ऐन मौके पर आये। २. पूरा पूरा और यथेष्ट। जैसे—यह आप की ऐन मेहरबानी है। स्त्री० [अ० मि० सं० अयन] आँख। नेत्र। पुं०=अयन।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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ऐनक  : स्त्री० [अ० ऐन=आँख] चश्मा (आँखों पर लगाने का)।
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ऐनस  : पुं० [सं० एनस्+अण्] पाप।
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ऐना  : पुं०=आइना (दर्पण)।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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ऐनि  : पुं० [सं० इन+इञ्] सूर्य के पुत्र का नाम।
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ऐन्य  : वि० [सं० इन+ण्य] सूर्य-संबंधी। सूर्य का।
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ऐपन  : पुं० [सं० लेपन] चावल और हल्दी को एक साथ पीसकर बनाया हुआ गीला लेप जो देव-पूजा के समय मांगलिक द्रव्य के रूप में घड़े आदि पर थापा या लगाया जाता है।
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ऐब  : पुं० [अ०] [वि० ऐबी] १. दोष। मुहावरा—ऐब निकालना (क) यह कहना कि इसमें अमुक दोष है। (ख) दोष दूर करना। ऐब लगाना=कलंक लगाना। लांछित करना। २. अवगुण। बुराई। ३. निंदनीय और बुरा काम।
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ऐंबारा  : पुं० [हिं० वार (द्वार) दरवाजा] १. भेड़-बकरियों को रखने का बाड़ा। २. जंगल में पशुओं को घेर कर रखने के लिए बनाया हुआ बाड़ा।
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ऐबी  : वि० [अ०] १. जिसमें किसी प्रकार का ऐब अर्थात् अवगुण या दोष हो। २. जिसमें कई ऐब हों। ऐबों से युक्त। ३. विकलांग विशेषतः काना। ४. नटखट। दुष्ट।
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ऐभ  : वि० [सं० इभ-अण्] इभ अर्थात् हाथी-संबंधी।
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ऐया  : स्त्री० [सं० आर्या० प्रा० अज्जा] १. बड़ी-बूढ़ी स्त्री के लिए संबोधन। २. दादी। ३. माँ। प्रत्यय० [देश] एक प्रत्यय जो कुछ क्रियाओं के अंत में लगकर उनके कर्त्ता का भाव प्रकट करता है। जैसे—कहना से कहवैया, नाचना से नचवैया आदि।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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ऐयार  : पुं० [अ०] [स्त्री० ऐयारा, भाव० ऐयारी] १. सब कामों और बातों में बहुत ही कुशल तथा चतुर व्यक्ति। २. तिलस्मी कथा-कहानियों में उक्त गुणों से युक्त ऐसा व्यक्ति जो अनेक प्रकार के वेश बदलकर बड़े-बड़े दुष्कर कार्य कर सकता हो।
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ऐयारी  : स्त्री० [अ०] १. ऐयार होने की अवस्था या भाव। चालाकी। २. ऐयार का कार्य अथवा उसका पेशा। वि० ऐयारों या उनके कामों से संबंध रखनेवाला। जैसे—ऐयारी उपन्यास।
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ऐयाश  : पुं० [अ०] १. ऐसा व्यक्ति जो प्रायः ऐश-मौज या सुख-भोग में लिप्त रहता हो। २. बहुत बड़ा विषयी या वेश्यागामी।
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ऐयाशी  : स्त्री० [अ०] १. ऐयाश होने की अवस्था या भाव। २. सदा भोग-विलास में लिप्त रहना। बहुत अधिक विषयासक्ति।
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ऐराक  : पं०=इराक।
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ऐराकी  : वि०=इराकी।
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ऐरा-ग़ैरा  : वि० [अ० ग़ैर] १. जिससे किसी प्रकार का परिचय, मेल-जोल या संबंध न हो। २. इधर-उधर का और तुच्छ या निकृष्ट।
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ऐरापति  : पुं०=ऐरावत (हाथी)।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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ऐराब  : पुं० [अ०] १. शतरंज के खेल में वह स्थिति जब बादशाह को किश्त से बचाने के लिए उसके आगे कोई मोहरा रखा जाता है। अरदब। २. इस प्रकार रखा जानेवाला मोहरा।
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ऐरालू  : पुं० [सं० इराजल+आलु] एक प्रकार की पहाड़ी ककड़ी।
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ऐरावण  : पुं० [सं० इरा-वन, ब० स०+अण्] ऐरावत।
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ऐरावत  : पुं० [सं० इरा+मतुप्, इरावत्+अण्] [स्त्री०ऐरावती] १. बिजली से चमकता हुआ बादल। २. इंद्र-धनुष। ३. इंद्र का हाथी जो पूर्व दिशा में स्थित माना गया है। ४. वज्र। ५. नारंगी। ६. संपूर्ण जाति का एक राग।
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ऐरावती  : स्त्री० [सं० ऐरावत्+ङीष्] १. ऐरावत की हथिनी। २. बिजली। ३. रावी नदी का पुराना नाम। ४. ब्रह्म देश या बरमा की एक प्रसिद्ध नदी। ५. वटपत्री नाम का पौधा। ६. चंद्रवीथी का एक भाग जिसमें श्लेषा, पुष्प और पुनर्वसु नक्षत्र पड़ते हैं।
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ऐरेय  : पुं० [सं० इरा+ढक्-एय] एक प्रकार की पुरानी मदिरा।
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ऐल  : पुं० [सं० इला+अण्] इला का पुत्र, पुरुरवा। पुं० [?] १. अहिला (बाढ़) २. अधिकता। प्रचुरता। ३. कोलाहल। हो-हल्ला। ४. आंदोलन। खलबली। उदाहरण—अब कहा सोचति सखी सुनि आरति-ऐल।—आनंदघन। ५. अलई नाम की कँटीली लता।
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ऐलक  : स्त्री०=एलक (चलनी)।
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ऐलवालुक  : पुं० [सं० एलवालुक+अण्] एक गंध द्रव्य।
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ऐलविल  : पुं० [सं० इलविला+अण्] १. कुबेर। २. मंगल ग्रह।
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ऐलान  : पुं० [अं०] घोषणा।
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ऐश  : पुं० [अ०] १. आराम। चैन। २. भोग-विलास।
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ऐशान  : वि० [सं० ईशान+अण्] १. शिव संबंधी। २. ईशान कोण-संबंधी।
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ऐशानी  : वि० [सं० ऐशान+ङीष्] ईशान कोण संबंधी।
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ऐश्य  : वि० [सं० ईश+ष्यञ्] १. ईशता। ईशत्व। २. प्रभुत्व। ३. शक्ति। सामर्ध्य।
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ऐश्वर  : वि० [सं० ईश्वर+अण्] १. ईश्वरीय। २. राजकीय। ३. शक्तिशाली। ४. शिव संबंधी।
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ऐश्वर्यवान  : वि० [सं० ऐश्वर्य+मतुप्] [स्त्री० ऐश्वर्यवती] वैभवशाली। संपन्न।
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ऐषीक  : पुं० [सं० इषीक+अण्] त्वष्टा देवता का मंत्र पढ़कर चलाया जानेवाला एक प्राचीन शस्त्र।
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ऐष्टक  : वि० [सं० इष्टक+अण्] १. इष्ट या ईटों से संबंध रखनेवाला। २. ईटों से बना हुआ (घर या मकान)।
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ऐष्टिक  : वि० [सं० इष्टि+ठक्-इक] इष्टि-यज्ञ से संबंध रखनेवाला।
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ऐस  : वि०=ऐसा।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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ऐसन  : वि०=ऐसा (अवधी)।
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ऐसा  : वि० [सं० सदृश्] [स्त्री० ऐसी] इस प्रकार का। पद—ऐसा-वैसा=(क) साधारण। (ख) तुच्छ या हीन। ऐसी की तैसी=जैसी की तैसी (दे०)।
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ऐसे  : क्रि० वि० [हिं० ऐसा] इस ढंग, प्रकार या रूप से। पद—ऐसे में (क) ऐसी अवस्था में। (ख) ऐसे समय में।
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ऐसो  : वि०=ऐसा। (व्रज)।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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ऐहलौकिक  : वि० [सं० इहलोक+ठक्-इक]=ऐहिक।
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ऐहिक  : वि० [सं० इह+ठक्-इक] इस लोक में होनेवाला या उससे संबंध रखनेवाला।
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