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रोमावली  : स्त्री० [सं० लोमन-आवली, ष० त०]=छाती से नाभि तक उगे हुए बालों की पंक्ति।
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र  : हिन्दी वर्णमाला का सत्ताईसवाँ व्यंजन जो व्याकरण और भाषा-विज्ञान की दृष्टि से अंतस्थ, मूर्धन्य, घोष, अल्पप्राण तथा ईषत्सपृष्ट है। पुं० [सं० रा+ड] १. अग्नि। आग। २. काम वासना का ताप। कामाग्नि। ३. जलना, झुलसना या तपना। ४. आँच। गरमी। ताप। ५. सोना। स्वर्ण। ६. पिंगल में रगण का संक्षिप्त रूप। ७. सितार का एक बोल। वि० तीव्र। प्रखर।
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रंक  : वि० [सं०√रम् (तुष्ट होना)+कु] १. गरीब। दरिद्र। कंगाल। २. कंजूस। कृपण। ३. आलसी। ४. मट्ठर। सुस्त।
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रंकु  : पुं० [सं०√रम्+कु] १. हिरनों की एक जाति। २. उक्त जाति का हिरन जिसके पृष्ठभाग पर सफेद चित्तियाँ होती हैं।
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रंग  : पुं० [सं०√रंग् (गति)+अच्, वा√रञ्ज् (राग)+घञ्] १. किसी दृश्य पदार्थ का वह गुण जो उसके आकार या रूप से भिन्न होता है और जिसका अनुभव केवल आँखों से होता है। वर्ण। जैसे—नीला, पीला, लाल, सफेद या हरा रंग। विशेष—वैज्ञानिक दृष्टि से प्रकाश की भिन्न-भिन्न प्रकार की और अलग अलग लंबाइयों वाली किरणों के कारण हमें रंग की अनुभूति या ज्ञान होता है। जिन पदार्थों पर ऐसी किरणें पड़ती हैं, उनके रासायनिक गुण या तत्त्व भी हमें रंगों का बोध कराने में सहायक होते हैं। जब किसी वस्तु पर प्रकाश की किरणें पडती है, तब तीन प्रकार की क्रियाएँ होती हैं। एक तो उनका परावर्तन या पीछे की ओर लौटना, दूसरे उनका वर्तन या किसी ओर मुड़ना और तीसरे उस पदार्थ के द्वारा होनेवाला शोषण जिस पर प्रकाश की किरणें पड़ती हैं। जिन पदार्थों पर से प्रकाश किरणों का पूरा परावर्तन होता है, वे सफेद दिखाई देती हैं। जिन पदार्थों पर से प्रकाश परावर्तित नहीं होता, केवल वर्तित तथा शोषित होता है, वे बिना रंग के दिखाई देते हैं। जैसे—शुद्ध जल। और जो पदार्थ सारा प्रकाश सोख लेते हैं, वे काले दिखाई देते हैं, । प्रकाश की किरणें मुख्यतः सात रंगों की होती है। यथा—बैंगनी, नीली, काली या आसमानी, हरी, पीली, नारंगी के रंग की और लाल। इन सातों रंगों का मिश्रित रूप सफेद होता है, और रंग मात्र का अभाव काला दिखाई देता है। अलग-अलग प्रकार के पदार्थ अलग-अलग प्रकार के रंग सोखते और इसलिए अलग-अलग रंगों के दिखाई देते हैं। २. कुछ विशिष्ट रासायनिक क्रियाओं से बनाया हुआ वह पदार्थ जिसका व्यवहार किसी चीज को रँगने या रंगीन बनाने के लिए होता है। जैसे—जल-रंग, तैल-रंग। क्रि० प्र०—आना।—उड़ना।—उतरना।—करना।—चढ़ाना।—पोतना।—लगाना। पद—रंग-बिरंग। मुहावरा—रंग खेलना=होली के दिन में पानी में रंग घोलकर एक-दूसरे पर डालना। (किसी पर) रंग डालना= (होली में) पानी में रंग घोलकर किसी पर डालना। रंग निखरना=रंग का चमकीला या तेज होना और फलतः सुंदर जान पड़ना। ३. किसी पदार्थ के ऊपरी तल या शरीर का ऊपरी वर्ण। वक्ष और चेहरे की रंगत। वर्ण। क्रि० प्र०—उड़ना।—उतरना। मुहावरा—रंग निकलना या निखरना=चेहरे के रंग का साफ होना। चेहरे पर रौनक आना। ४. चौपट की गोटियों के खेल के काम के लिए किये हुए दो काल्पनिक विभागों में से हर एक। मुहावरा—रंग जमना=चौपड़ में रंग की गोटी का किसी अच्छे और उपयुक्त घर में जा बैठना, जिसके कारण खेलाड़ी की जीत अधिक निश्चित होती है। रंग मारना= (क) चौपड़ के खेल में किसी रंग की गोटी मारना। (ख) लाक्षणिक रूप में बाजी जीतना। प्रतियोगिता आदि में विजय। प्राप्त करना। ५. रूप, रंग आदि की सुंदरता के कारण दिखाई देनेवाली शोभा। छवि। रौनक। जैसे—आज तो इस पर रंग है। क्रि० प्र०—आना।—उतरना।—चढ़ना।—पकड़ना।—होना। पद—रंग है=वाह क्या बात है। बहुत अच्छे। मुहावरा—रंग पर आना=ऐसी स्थिति में आना कि यथेष्ट शोभा या सौदर्य दिखाई पड़े। रंग बरसना=शोभा या सौन्दर्य का इतना आधिक्य होना कि चारों ओर यथेष्ट प्रभाव पड़ रहा हो। ६. श्रृंगारिक क्षेत्र में होनेवाला अनुराग या प्रेम। मुहब्बत। मुहावरा—(किसी पर) रंग देना=किसी को अपने प्रेम पाश में फँसाने के उद्देश्य से उसके प्रति उत्कट प्रेम प्रकट करना। (बाजारू)। (किसी पर) रंग डालना=अपनी ओर अनुरक्त करना। उदाहरण—सतगुरु हो महाराज मोपै साई रंग डारा०।—कबीर। (किसी के) रंग में बींधना=किसी पर पूर्णरूपेण अनुरक्त होना। ७. किसी पर अनुरक्त होने के कारण उसके प्रति की जानेवाली कृपा या प्रकट की जानेवाली प्रसन्नता। ८. मनोविनोद के लिए की जानेवाली कीड़ा, और उससे प्राप्त होनेवाला आनंद या मजा। उदाहरण—मोकों व्याकुल छाँड़ि कै आपुन करै जु रंग।—सूर। क्रि० प्र०—आना।—उख़ड़ना।—जमना।—मचाना।—रचाना। पद—रंगरली या रंगरलियाँ। मुहावरा—रंग में भंग करना=आनंद में बाधा डालना। होते हुए आमोद-प्रमोद को ठप करना। रंग में होना=मन की यथेष्ट उमंग या प्रसन्नता की दशा में होना। जैसे—आज तो यह रंग में है। रंग में भंग पड़ना या होना=आनंद और हर्ष के समय कोई दुःखद घटना घटित होना या कोई बाधक बात होना। रंग रलना=आमोद-प्रमोद करना। क्रीड़ा या भोग-विलास करना। ९. यौवन। जवानी। युवावस्था। क्रि० प्र०—आना।—उतरना।—चढ़ना। मुहावरा—रंग चूना या टपकना=पूर्ण यौवन की अवस्था में रूप या सौदर्य का इतना आधिक्य होना कि औरों पर उसका पूरा-पूरा प्रभाव पड़ता हो। १॰. गुण, महत्त्व, योग्यता, शक्ति आदि का दूसरों के हृदय पर पडनेवाला आतंक या प्रभाव। धाक। रोब। क्रि० प्र०—उखड़ना।—जमना। मुहावरा—रंग बाँधना= (क) धाक या रोब जमाने के उद्देश्य से लंबी-चौड़ी हाँकना। (ख) प्रभावित करने के लिए व्यर्थ का आडम्बर खड़ा करना या ढोंग रचना। (किसी का) रंग बिगाड़ना= (क) प्रभाव या महत्व कम होना या न रह जाना। (ख) अभिमान चूर्ण करना। शेखी किरकिरी करना। रंग लाना=अपना गुण या प्रभाव दिखाना। उदाहरण—रंग लाएगी हमारी फाका मस्ती एक दिन।—गालिब। ११. किसी प्रकार का अद्भुत दृश्य। विलक्षण कार्य या व्यापार। जैसे—आज तो तुमने वहाँ एक रंग खड़ा कर दिया। १२. नृत्य, गीत आदि का उत्सव। पद—नाच-रंग। १३. वह स्थान जहाँ नृत्य या अभिनय होता हो। नाचने, गाने आदि के लिए बना हुआ स्थान। पद—रंग-देवता, रंगभूमि, रंगमंच, रंगशाला। १४. अवस्था। दशा। हालत। जैसे—कहो आज-कल उनका क्या रंग है १५. ढंग। ढब। पद—रंग-ढंग। मुहावरा—रंग काछना=कोई नई चाल या नया ढंग अख्तियार करना। (किसी को अपने) रंग में ढालना या रंगना=किसी को अपने ही विचारों का अनुयायी बना लेना। प्रभाव डालकर अपना सा कर लेना। १६. भाँति। प्रकार। तरह। पद—रंग-बिरंग। १७. युद्ध। लड़ाई। समर। क्रि० प्र०—ठानना।—मचाना। १८. लड़ाई का मैदान। युद्ध क्षेत्र। रणभूमि। पुं० [सं०+अच्] १. राँगा नामक धातु। २. खदिर सार।
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रंगई  : पुं० [सं० रंग+ई (प्रत्यय)] १. धोबियों की एक जाति जो विशेष रूप से रंगीन या छापे के कपड़े धोती है। २. उक्त जाति का व्यक्ति। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रंग-काष्ठ  : पुं० [सं० ब० स०] पतंग नामक वृक्ष की लकड़ी। बक्कम।
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रंग-क्षेत्र  : पुं० [सं० ष० त०] १. अभिनय करने का स्थान। रंग-स्थल। २. उत्सव आदि के लिए सजाया हुआ स्थान। रंगभूमि।
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रंग-गृह  : पुं० [सं० ष० त०] रंगशाला। (दे०)
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रंग-चर  : पुं० [सं० रंग√चर् (गति)+ट, उप० स०] अभिनेता। नट।
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रंग-चित्र  : पुं० [सं० मध्य० स०] विशेष प्रकार के रंगों के घोल से कूँची या तूलिका की सहायता से बनाया हुआ चित्र। (पेन्टिंग)
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रंग-चित्रक  : पुं० [सं० रंगचित्र+णिच्+ण्वुल्—अक] रंगचित्र बनानेवाला चित्रकार (पेन्टर)।
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रंग-चित्रण  : पुं० [सं० रंगचित्र+णिच्+ल्युट—अन] रंगचित्र बनाने की कला, क्रिया या भाव। (पेन्टिंग)।
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रंगज  : पुं० [सं० रंग√जन् (उत्पत्ति+ड] सिंदूर। वि० रंग से उत्पन्न निकला या बना हुआ।
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रंग-जननी  : स्त्री० [सं० ष० त०] लाख। लाक्षा।
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रंग-जीवक  : पुं० [सं० रंग√जीव (जीना)+ण्वुल्-अक, उप० स०] १. चित्रकार। २. अभिनेता। नट।
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रंग-ढंग  : पुं० [सं० +हिं] १. गति-विधि आदि की प्रवृत्ति या स्वरूप। जैसे—इसका रंग-ढंग ठीक नहीं दिखाई देता। २. आचरण, व्यवहार आदि का प्रकार का रूप। तौर-तरीका। जैसे—अब वह धीरे-धीरे अपना रंग-ढंग बदल रहा है। ३. ऐसी दशा बात या लक्षण जो किसी भावी व्यापार या स्थिति का सूचक हो। आसार। जैसे—आज तो आकाश में वर्षा का रंग-ढंग है।
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रंगत  : स्त्री० [सं० रंग+हिं० त (प्रत्यय)] १. रंग से युक्त होने की अवस्था या भाव। २. किसी रंगीन पदार्थ की दिखाई पड़नेवाली रंग की झलक। ३. किसी विलक्षण काम या बात में आनेवाला आनंद या मजा। ४. अवस्था। दशा। हालत। ५. वे कपड़े जो रँगने के लिए आये हों या रंगे जाने को हो। (रंगरेज) ६.छाप। प्रभाव। मुहावरा—(किसी की किसी पर) रंगत चढ़ना=किसी के विचारों या रहन-सहन का प्रभाव किसी दूसरे पर लक्षित होना।
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रंगतरा  : पुं० [हिं० रंग] एक प्रकार की बड़ा और मीठी नारंगी। संगरा।
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रंगद  : पुं० [सं० रंग√दा (काटना)+क] १. सोहागा। २. खदिर सार।
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रंगदा  : स्त्री० [सं० रंगद+टाप्०] फिटकरी, जिससे रंग पक्का होता है।
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रंगदानी  : स्त्री० [हिं० रंग+फा० दानी] वह प्याली जिसमें चित्रकार आदि किसी चीज पर लगाने के लिए अपने सामने रंग रखते हैं।
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रंगदुनी  : पुं० [?] खरगोश की तरह का एक प्रकार का पहाड़ी जन्तु जो हिमालय के ऊँचे पर्वतों पर रहता है। रँगरूट।
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रंगदृढ़ा  : स्त्री० [सं० उपमि० स०] फिटकरी, जिससे रंग पक्का होता है। रंगदा।
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रंग-देवता  : पुं० [सं० ष० त०] रंग-भूमि के अधिष्ठाता।
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रंग-द्वार  : पुं० [सं० ष० त०] १. रंगमंच का प्रवेश-द्वार। २. नाटक की प्रस्तावना।
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रंगन  : पुं० [देश] एक प्रकार का मझोले आकार का वृक्ष जिसके हीर की लकड़ी कड़ी, चिकनी और मजबूत होती है। कोटा गंधल।
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रंगना  : स० [सं० रंग+हिं० ना (प्रत्यय)] १. ऐसी क्रिया करना जिससे कोई चीज किसी एक या अनेक रंगों से युक्त हो जाय। जैसे—(क) धोती या साड़ी रँगना। (ख) दीवार या छत रँगना। (ग) चित्र रँगना। मुहावरा—रँगे हाथ या रँगे हाथों पकड़ा जाना=अपराधी या दोषी का ठीक अपराध करते समय पकड़ा जाना। २. लेखन में, बहुत अधिक लिखना विशेषतः लीपा-पोती करना। जैसे—कापी या किताब रँगना। ३. किसी को अपने प्रेम में फँसाना। अनुरक्त करना। ४. किसी को अपने अनुकूल बनाने के लिए अपने मतलब की बातें बतलाना या समझाना अथवा और किसी प्रकार अपने अनुकूल बनाना। ५. किसी के शरीर, विशेषतः सिर पर ऐसा भीषण आघात करना कि उसमें से रक्त की धार बहने लगे (गुण्डे) ६. किसी को अपने प्रभाव से युक्त करना। अ०१. रंग से युक्त होना। २. किसी के प्रेम में लिप्त होना। किसी पर आसक्ति होना। संयो० क्रि०—जाना।
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रंगपत्री  : स्त्री० [सं० ब० स० ङीष्] नीली (वृक्ष)।
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रंग-पीठ  : पुं० [सं० ष० त०] रंगशाला।
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रंग-पुरी  : स्त्री० [रंगपुर=बंगाल का एक नगर] एक तरह की छोटी नाव, जिसके दोनों ओर की गलही एक-सी होती है।
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रंगपुष्पी  : स्त्री० [सं० ब० स० ङीष्] रंगपत्री। (दे०)
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रंग-प्रवेश  : पुं० [सं० स० त०] अभिनय के निमित्त रंगमंच पर अभिनेता या नट का आना।
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रंग-बदल  : पुं० [हिं० रंग+बदलना] हल्दी। (साधू)
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रंगबाज  : वि० [सं०+फा० ] १. दूसरों पर अपना आतंक जमानेवाला। रंग बाँधनेवाला। २. मौज-मस्ती करनेवाला। आनंद मनानेवाला।
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रंगबाजी  : स्त्री० [हिं० +फा० ] १. रंगबाज होने की अवस्था या भाव। २. चौसर का एक विशेष प्रकार का खेल जो स्त्री और पुरुष मिलकर खेलते हैं, और जो विशेष नियमों या प्रतिबंधों के कारण अपेक्षाकृत अधिक कठिन होता है। ३. ताश का एक प्रकार का खेल।
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रंग-बाती  : स्त्री० [हिं० रंग+बत्ती] शरीर में लगाई जानेवाली सुगंधित वस्तुओं की बत्ती।
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रंग-बिरंग (ा)  : वि० [हिं० रंग+बिंरगा (अनु)०] १. कई रंगों का। २. कई तरह या प्रकार का। भांति-भांति का। जैसे—रंग-बिरंगे कपड़े।
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रंग-भरिया  : पुं० [हिं०] दीवारों, छतों आदि पर रंग पोतने का काम करनेवाला कारीगर।
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रंगभवन  : पुं० [सं० ष० त०] रंगमहल।
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रंग-भूति  : स्त्री० [सं० ब० स०] आश्विन की पूर्णिमा।
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रंग-भूमि  : स्त्री० [सं० ष० त०] १. वह स्थान जहाँ पर आमोद-प्रमोद के उद्देश्य से उत्सव समारोह आदि किये जाते हैं। २. खेल-कूद तमाशे आदि का स्थान। क्रीड़ास्थल। ३. नाटक खेलने का स्थान। रंगमंच। ४. कुश्ती लड़ने का अखाड़ा। ५. युद्ध क्षेत्र। लड़ाई का मैदान।
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रंग-भौन  : पुं० =रंग-भवन (रंगमहल)।
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रंग-मंच  : पुं० [सं० ष० त०] १. वह ऊँचा उठा हुआ स्थान जहाँ पर पात्र अभिनय करते हैं। २. लाक्षणिक अर्थ में कोई ऐसा स्थान जिसे आधार बनाकर कोई काम किया जाय।
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रंग-मंडप  : पुं० [सं० ष० त०] नृत्यशाला।
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रंग-मल्ली  : स्त्री० [सं० च० त०] वीणा। बीन।
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रंग-महल  : पुं० [हिं० +अ०] १. भोग-विलास करने का महल। २. अंतःपुर।
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रंगमाता (तृ)  : स्त्री० [सं० ष० त०] १. कुटनी। २. लाक्षा। लाख।
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रंग-मातृका  : स्त्री० [सं० रंगमातृ+कन्-टाप्]=रंगमाता।
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रंग-मार  : पुं० [हिं० रंग+मारना] ताश का एक प्रकार का खेल।
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रंग-रली  : स्त्री०[हिं० रंग+रलना] आमोद-प्रमोद। आनंद। क्रीड़ा। चैन। मौज। (प्रायः बहुवचन रूप में प्रयुक्त)। क्रि० प्र०—मचना।—मनाना।
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रंग-रस  : पुं० [हिं० रंग+रस] आमोद-प्रमोद। आनंद-मंगल।
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रंग-रसिया  : पुं० [हिं०] १. वह व्यक्ति जिसकी प्रवृत्ति सदा आमोद-प्रमोद के कार्यों में रमती हो। २. विलासी पुरुष।
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रंग-राज  : पुं० [सं० ष० त०] ताल के साठ मुख्य भेदों में से एक। (संगीत)।
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रंगरूट  : पुं० [अं० रिक्रूट] १. पुलिस, सेना आदि में भर्ती हुआ नया व्यक्ति। २. नौसिखुआ।
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रंगरुडा  : वि० [सं० रंग+हिं० रूढ़ (प्रत्यय)] सुंदर। उदाहरण—नहिं भावै थाँरौं देश लड़ो रगरूड़ों।—मीराँ। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रंगरेज  : पुं० [फा० रँगरेज] [स्त्री० रँगरेजिन] वह जो कपड़े रँगने का व्यवसाय करता हो।
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रंगरैली  : स्त्री०=रंगरली। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रंगरैनी  : स्त्री० [हिं० रंग+रैनी=जुगनू] रंगी हुई लाल चुनरी।
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रंग-लासिनी  : स्त्री० [सं० रंग√लस् (शोभित होना)+णिच्+णिनि+ङीष्] शेफालिका।
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रंगवा  : पुं० [देश] चौपायों का एक रोग।
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रंगवाई  : स्त्री० [हिं० रँगवाना] रँगवाने की क्रिया, भाव या पारिश्रमिक। स्त्री०=रँगाई।
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रँगवाना  : स० [हिं० रँगना का प्रे०] रँगने का काम किसी दूसरे से कराना। किसी को रँगने में प्रवृत्त करना।
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रंग-विद्याधर  : पुं० [सं० ष० त०] १. अभिनेता। नट। २. नृत्य-कला में, कुशल नर्तक। ३. ताल के साठ मुख्य भेदों में से एक (संगीत)।
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रंगबीज  : पुं० [सं० ब० स०] चाँदी।
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रंग-शाला  : स्त्री० [सं० ष० त०] १. भोग-विलास का स्थान। २. वह स्थान जहाँ दर्शकों को अभिनेतागण या नट लोग अपना अभिनय या करतब दिखाते हों। ३. नाट्यशाला।
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रंगसाज  : पुं० [फा० हिं० रंग+फा० साज] [भाव० रंगसाजी] १. उपकरणों के योग से तरह-तरह के रंग तैयार करनेवाला कारीगर। २. मेज, कुरसी, किवाड़, आदि पर रंग चढ़ानेवाला कारीगर। (पेंटर)
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रंगसाजी  : स्त्री० [हिं० रंग+फा० साजी] १. रंगने की कला या विद्या। २. रंगसाज का काम पेशा या भाव।
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रंग स्थल  : पुं० [सं० ष० त०] १. आमोद-प्रमोद के लिए नियत स्थान। २. रंगशाला।
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रंग-स्थापक  : पुं० [सं० ष० त०] कोई ऐसी चीज जिसकी सहायता से रंग, पतले पत्तर आदि दूसरी चीजों पर चिपक या जम जाते हों। (मारडेंट)
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रंगांगण  : पुं० [सं० रंग-अंगण, ष० त०] नाट्यशाला। २. रंगभूमि।
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रंगांगा  : स्त्री० [सं० रंग-अंग, ब० स०-टाप्] फिटकरी।
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रँगाई  : स्त्री० [हिं० रंग+आई (प्रत्यय)] रँगने का काम , पेशा या भाव या मजदूरी।
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रंगाजीव  : पुं० [सं० रंग-आ√जीव् (जीना)+अण्] वह जिसकी जीविका का आधार रंग सम्बन्धी काम हो। जैसे—रंगसाज, रँगरेज आदि।
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रंगाना  : स० [हिं० रँगना का प्रे०] रँगवाना (दे०)
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रँगामेज़ी  : स्त्री० [फा०] १. किसी चीज में यथास्थान तरह-तरह के रंग भरने का काम। २. तरह-तरह की चीजें एक साथ बनाने या रखने की क्रिया या भाव। उदाहरण—रंगामेजी का खेल जब हो तो क्यों न सब सृष्टि बने अनुरागी।—बालकृष्ण शर्मा नवीन। ३. किसी बात को रोचक बनाने के लिए उसमें अपनी तरफ से भी कुछ बातें बढ़ाना।
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रंगारंग  : वि० [हिं०] १. बहुत से रंगोंवाला। २. अनेक प्रकार का। तरह-तरह का। जैसे—रंगारंग कपड़े या खिलौने। पुं० आकाश-वाणी का एक प्रकार का कार्यक्रम जिसमें अनेक प्रकार के गीत सुनाये जाते हैं।
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रंगार  : पुं० [देश] १. वैश्यों की एक जाति या वर्ग। २. राजपूतों की एक जाति या वर्ग।
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रंगारि  : पुं० [सं० रंग-अरि, ष० त०] कनेर।
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रंगालय  : पुं० [सं० रंग-आलय, ष० त०] रंगभूमि। रंगशाला।
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रंगावट  : स्त्री० [हिं० रंग+आवट (प्रत्यय)] १. रँगे हुए होने का भाव। २. वह झलक या आभा जो किसी रँगे हुए वस्त्र आदि में प्रकट होती है।
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रंगावतारक  : पुं० [सं० रंग-अवतारक, ष० त०] १. रँगरेज। २. अभिनेता। नट।
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रँगावतारी (रिन्)  : पुं० [सं० रंग-अव√तृ (पार करना)+णिनि] अभिनेता। नट।
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रंगासियार  : पुं० [हिं] ऐसा व्यक्ति जो ऊपर से तो भला लगता हो परन्तु हो बहुत बड़ा चालाक या धूर्त।
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रंगिया  : पुं० [हिं० रंग+इया (प्रत्यय)] १. कपड़ा रँगनेवाला। रंगरेज। २. रंगसाज। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रंगी  : स्त्री० [सं० रंग+अच+ङीष्] १. शतमूली। २. कैवर्तिकी लता। वि० [हिं० रंग] १. विनोदशील प्रकृति का। २. मनमौजी।
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रंगीन  : वि० [फा०] १. जिस पर कोई रंग चढ़ा हो। रँगा हुआ। रंगदार। जैसे—रंगीन साड़ी, रंगीन चित्र। २. जिसकी प्रकृति या स्वभाव में विनोद, विलास आदि तत्त्वों की प्रधानता हो। आमोदप्रिय और विलासी। ३. चमत्कारपूर्ण तथा विलासमय। जैसे—रंगीन तबीयत, रंगीन महफिल।
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रंगीनबाजी  : स्त्री०=रँगबाजी (चौसर का खेल)।
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रंगीनी  : स्त्री० [फा०] १. रंगीन होने की अवस्था या भाव। २. बनाव-सिंगार। सजावट। ३. प्रकृति या स्वभाव से रसिक और विनोदप्रिय होने की अवस्था या भाव।
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रंगीरेटा  : पुं० [देश] एक प्रकार का जंगली वृक्ष जो दारजिलिंग में अधिकता से होता है।
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रंगीला  : वि० [हिं० रंग+ईला (प्रत्यय)] [स्त्री० रँगीली] १. जिसकी प्रकृति या स्वभाव में रसिकता, विनोदशीलता आदि बातें मुख्य रूप से हों। रसिक-प्रकृति। रसिया। २. कई रंगों से युक्त होने के कारण आकर्षक और मनोहर लगनेवाला। जैसे—रँगीले छैल खेलैं होरी।
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रंगीली टोड़ी  : स्त्री० [हिं० रंगीला+टोड़ी (रागिन)] संपूर्ण जाति की एक रागिनी जिसमें सब शुद्ध स्वर लगते हैं।
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रंगैया  : पुं० [हिं० रंग+ऐला (प्रत्यय)] रँगनेवाला।
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रंगोपजीवी (विन)  : पुं० [सं० रंग-उप√जीव् (जीना)+णिनि] अभिनय आदि के द्वारा अपनी जीविका चलानेवाला।
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रंगोली  : स्त्री० [सं० रंगवल्ली] साँझी का वह रूप जो महाराष्ट्र में प्रचलित है (देखें ‘साँझी’)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रंगौधी  : स्त्री० [हिं० रंग+औंधी (अधा से) प्रत्यय] आँखों का वह रोग जिसमें रोगी रंग या वर्ण नहीं पहचान सकता। वर्णान्धता (कलर ब्लाइन्डनेस)।
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रंगौनी  : स्त्री० [हिं० रंग] लाल रंग की एक प्रकार की चुनरी। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रंच-रंचक  : वि० [सं० न्यंच, प्रा०णच्] थोड़ा। अल्प। तनिक।
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रंज  : पुं० [फा०] [वि० रंजीदा] १. मन में होनेवाला दुःख। मानसिक दुःख। २. मृतक का शोक। ३. अप्रसन्नता। नाराजगी।
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रंजक  : वि० [सं०√रज्+णिच्+ण्वुल्-अक] १. रँगनेवाला २. प्रायः आनंद-मंगल करने और प्रसन्न रहनेवाला। पुं० [सं०] १. रँगसाज। २. रँगरेज। ३. ईगुर। ४. भिलावाँ। ५. मेंहदी। ६. सुश्रुत के अनुसार पेट की एक अग्नि जो पित्त के अन्तर्गत मानी जाती है। स्त्री० [हिं० रची=अल्प] १. वह थोड़ी सी बारुद जो बत्ती लगाने के वास्ते बंदूक की प्याली पर रखी जाती है। क्रि० प्र०—देना।—भरना। मुहावरा—रंजक उड़ाना=बदूक या तोप की प्याली में बत्ती लगाने के लिए बारुद रखकर जलाना। (प्याली का) रंजक चाट जाना=तोप या बंदूक की प्याली में रखी हुई बारूद का यों ही जलकर रह जाना और उससे गोला या गोली न छूटना। रंजक पिलाना=तोप या बंदूक की प्याली में रंजक रखना। २. गाँजे, तमाकू या सुलफे का दम (बाजारू)। मुहावरा—रंजक देना=गांजे आदि का दम लगाना। ३. वह बात जो किसी को भड़काने या उत्तेजित करने के लिए कही जाय। ४. किसी प्रकार का ऐसा चटपटापूर्ण या और कोई पदार्थ जिसके सेवन से शरीर में तत्काल स्फूर्ति आती हो।
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रंजन  : पुं० [सं०√रंज्+ल्युट-अन] १. रंगने की क्रिया या भाव। २. वे पदार्थ जिनसे रंग निकलते या बनते हों ३. चित्त प्रसन्न करने की क्रिया या भाव। ४. शरीर में का पित्त नामक तत्त्व। ५. लाल चन्दन। ६. मूँज। ७. सोना। ८. जायफल। ९. कभीला नामक वृक्ष। १॰. छप्पय छंद के पचासवें भेद का नाम। वि० [स्त्री० रंजना] चित्त प्रसन्न करनेवाला। जैसे—चित्त रंजन।
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रंजनक  : पुं० [सं० रंजन+कन्] कटहल।
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रंजना  : स० [सं० रंजन] १. रंजन करना। २. मन प्रसन्न करना। आनंदित करना। ३. मन लगाकर किसी को भजना या बार-बार स्मरण करना। ४. दे० ‘रँगना’। वि० स्त्री० रंजन करनेवाली। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रंजनी  : स्त्री० [सं० रंजन+ङीष्] १. ऋषभ स्वर की तीन श्रुतियों में से दूसरी श्रुति (संगीत) २. संगीत में कर्णाटकी पद्धति की एक रागिनी। ३. नीली नामक पौधा। ४. मंजीठ। ५. हलदी। ६. पर्पटी। ७. नागवल्ली। ८. जतुका लता। पहाड़ी।
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रंजनीय  : वि० [सं०√रंज्+अनीयर] १. जो रँगे जाने के योग्य हो। २. जिसका चित्त प्रसन्न किया जा सकता हो या किया जाने को हो।
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रंजा  : स्त्री० [देश] एक प्रकार की मछली जिसे उलबी भी कहते हैं।
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रंजित  : भू० कृ० [सं०√रंज्+क्त] १. जिस पर रंग चढ़ा या चढ़ाया गया हो। रंगा हुआ। २. जिसका चित्त प्रसन्न किया गया हो या हुआ हो। ३. किसी के अनुराग या प्रेम में पगा हुआ। अनुरक्त।
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रंजिश  : स्त्री० [फा०] १. किसी की ओर से मन में बैठा हुआ। रंज। २. किसी के प्रति होनेवाली अप्रन्नता या नाराजगी। ३. आपस में होनेवाला मन-मुटाव या वैमनस्य।
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रंजीदगी  : स्त्री० [फा०] रंजीदा होने की अवस्था या भाव।
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रंजीदा  : वि० [फा०] १. जिसे रंज हो। दुःखित। २. अप्रसन्न। नाराज।
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रंझना  : अ० [सं० रंजन] १. रंग से युक्त होना। रंजित होना। २. फलना-फूलना। जैसे—वृक्षों का रंझना। ३. संपन्न समृद्ध या सुखी होना। ४. स्थायी या स्थिर होना।
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रंड  : वि० [सं० रम् (क्रीड़ा)+ड] १. धूर्त। चालाक। २. विकल। बेचैन।
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रंडक  : पुं० [सं० रंड+कन्] ऐसा पेड़ जो फूलता-फलता न हो।
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रँडवा  : पुं० =रँडुआ। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रंडा  : वि० स्त्री० [सं० रंड+टाप्] राँड़। विधवा। बेवा। पुं० =रँडुआ। (पश्चिम)।
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रँडापा  : पुं० [हिं० राँड़+आपा (प्रत्यय)] १. राँड़ अर्थात् विधवा होने की दशा या भाव। २. रांड़ के रूप में बिताया जानेवाला समय।
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रंडाश्रमी (मिन्)  : पुं० [सं० रंड-आश्रम, ष० त० रंडाश्रम+इनि] ४८ वर्ष से अधिक की अवस्था में होनेवाला रँडुआ।
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रंडिया  : स्त्री०=राँड़। २. =रंडी। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रंडी  : स्त्री० [सं० रंडा] १. वह स्त्री जिसका पति मर चुका हो। राँड़। विधवा (पश्चिम) २. ऐसी स्त्री जो विधवा होने पर व्यभिचार से अपनी जीविता चलाती हो। ३. धन लेकर संभोग करानेवाली स्त्री। वेश्या। ४. युवती और सुन्दर स्त्री। (राज०)
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रंडीबाज  : पुं० [हिं० रंडी+फा० बाज] [भाव० रंडीबाजी] वह जो प्रायः रंडियों के यहाँ जाकर उनसे संभोग करता हो। वेश्यागामी।
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रंडीबाजी  : स्त्री० [हिं० रंडी+फा० बाजी] १. रंडीबाज होने की अवस्था, क्रिया या भाव। २. रंडी के साथ की जानेवाली मित्रता या संभोग। क्रि० प्र०—करना।
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रँडुआ  : पुं० [हिं० राँड़+उआ (प्रत्यय)] ऐसा व्यक्ति जिसकी पत्नी मर चुकी हो और अन्य पत्नी अभी न आई हो। विधुर।
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रँडुवा  : पुं० =रँडुआ। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रंडोरा  : पुं० =रँडुआ। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रँडोरी  : स्त्री०=राँड़।
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रंता (तृ)  : वि० [सं०√रम् (क्रीड़ा)+तृच्] रमण करनेवाला।
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रंति  : स्त्री० [सं०√रम्+क्तिन्] १. केलि। क्रीड़ा। २. विराम।
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रंतिदेव  : पुं० [सं०√रम्+तिक्, रन्तिदेव, कर्म० स०] १. पुराणानुसार एक बहुत बड़े दानी राजा जिन्होंने बहुत से यज्ञ किये थे। २. विष्णु का एक नाम। ३. कुत्ता।
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रंतिनदी  : स्त्री० [सं०] चम्बल (नदी)।
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रंतु  : स्त्री० [सं०√रम्+तुन्] १. सड़क। २. नदी।
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रंतूला  : पुं० =रणतुर्य।
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रंद  : पुं० [सं० रंघ्र] १. झरोखा। रोशनदान। २. किले की दीवार में वह मोखा या झरोखा जिसमें से बाहर गोले फेंके जाते थे। स्त्री० [हिं० रँदना या फा० ] वह छीलन जो लकड़ी को रँदने पर निकलती है।
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रँदना  : स० [हिं० रंदा+ना (प्रत्यय)] १. रंदे से छीलकर लकड़ी की सतह चिकनी और समतल करना। २. छीलना। तराशना।
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रंदा  : पुं० [सं० रंदन=काटना, चीरना मि० फा० रंद] बढ़इयों का एक औजार जिससे वे लकड़ी की सतह छीलकर चिकनी और समतल करते हैं।
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रंधक  : पुं० [सं०√रंध् (पाक-क्रिया)+ण्वुल्-अक] रसोई बनानेवाला। रसोइया। वि० नष्ट करने-वाला। नाशक।
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रंधन  : पुं० [सं०√रंध्+ल्युट-अन] १. रसोई बनाने की क्रिया। पाक करना। राँधना। २. नष्ट या बरबाद करना।
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रंधना  : अ० [सं० रंधन] भोजन पकना। राँधा जाना। स०=राँधना। पुं० पकाकर तैयार किया हुआ भोजन। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रंधित  : भू० कृ० [सं०√रंध्+क्त] १. पकाया हुआ। २. राँधा हुआ। ३. नष्ट किया हुआ।
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रंध्र  : पुं० [सं० रंध+रक्] १. छेद। सूराख। पद—ब्रह्म-रंध्र। २. स्त्री की भग। योनि ३. छिद्र। दोष। ४. लाक्षणिक अर्थ में कोई ऐसा छिद्र तत्त्व या दुर्बल स्थान जिस पर सफलतापूर्वक या सहज में आक्रमण, आक्षेप या आघात किया जा सके।
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रंबा  : पुं० [हिं० रंभा] १. जुलाहों का लोहे का एक औजार जो लगभग एक गज लंबा होता है। २. दे० ‘रंभा’।
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रंभ  : पुं० [सं०√रंभ् (शब्द)+खञ्] १. बहुत जोर का शब्द। जैसे—गौ या भैस का रंभ। २. [√रंभ्+अच्] बाँस। ३. एक प्रकार का तीर या वाण। ४. महिषासुर के पिता का नाम। पुं० +रंभा। पुं० =आरंभ। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रंभा  : स्त्री० [सं०√रंभ+अच्—टाप्] १. केला। कदली। २. गौरी। पार्वती। ३. स्वर्ग की एक प्रसिद्ध अप्सरा। ४. वेश्या। रंडी। ५. उत्तर दिशा। पुं० [सं० रंभ] लोहे का वह मोटा भारी डंडा जिसका अगला सिरा धारदार होता है और जिससे आघात करके मजदूर या दीवार में छेद करते हैं।
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रंभा-तृतीया  : स्त्री० [सं० मध्य० स०] ज्येष्ठ शुक्ला तृतीया।
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रँभाना  : अ० [सं० रंभणा] गाय का बोलना। गाय का शब्द करना। स० गौ से रंभण करना। गौ के शब्द करने में प्रवृत्त करना।
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रंभापति  : पुं० [सं० ष० त०] इंद्र।
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रंभाफल  : पुं० [सं० ष० त०] केला।
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रंभित  : भू० कृ० [सं०√रंभ्+क्त] १. जिसमें या जिससे शब्द उत्पन्न किया गया हो। २. बजाया हुआ।
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रंभी (भिन्)  : पुं० [सं०√रंभ्+णिनि] १. व्यक्ति जो हाथ में बेंत या दंड लिए हुए हो। २. द्वारपाल जो हाथ में दंड लिये रहता था। ३. वृद्ध आदमी जो प्रायः छड़ी या लकड़ी लेकर चलता है।
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रंभोरु  : वि० [सं० रंभा-उरु, ब० स०] १. (स्त्री) जिसकी केले के वृक्ष के समान उतार-चढ़ाववाली जाँघें हो। २. मनोहर। सुन्दर।
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रंह (स्)  : पुं० [सं०√रह् (गति)+असुन्] वेग। गति। तेजी।
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रंह चट (ा)  : पुं० [हिं० रस+चाट] ऐसी लालच या लोभ जो किसी प्रकार की तृप्ति पाने के उपरान्त और बढ़ गया हो। चस्का।
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रंहट  : पुं० =रहट। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रअय्यत  : स्त्री० [अ०] १. प्रजा। रिआया। २. मध्ययुग और ब्रिटिश शासन में जमींदार के अधीन रहनेवाला काश्तकार।
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रइअत  : स्त्री०=रअय्यत।
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रइकौ  : अव्य० [सं० रंच] जरा भी। तनिक भी। कुछ भी। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रइनि  : =रैन (रात)। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रइबारी  : पुं० [हिं० राह+वारी] वह जो ऊँट चराता या पालता हो।
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रई  : स्त्री० [सं० रय=हिलाना] दही मथने की लकड़ी। मथानी। खैलर। क्रि० प्र०—चलाना।—फेरना। स्त्री० [हिं० रवा] १. गेहूँ का मोटा आटा। दरदरा आटा। २. सूखी। ३. कोई महीन चूर्ण। वि० स्त्री० [हिं० रँचना=सं० रंजन] १. डूबी हुई। पगी हुई। २. अनुरक्त। ३. मिली हुई।
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रईस  : पुं० [अ०] १. रियासत का स्वामी। इलाकेदार। ताल्लुकेदार। २. बहुत बड़ा धनी या सम्पन्न और प्रतिष्ठित व्यक्ति। ३. किसी स्थान का राजा या प्रधान अधिकारी।
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रईसजादा  : पुं० [फा० रईसजादः] [स्त्री० रईसजादी] रईस या बहुत बड़े आदमी का लड़का।
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रईसी  : स्त्री० [हिं० रईस] १. रईस होने की अवस्था या भाव। २. कोई ऐसा काम या बात जिसमें केवल शौक से और रईसों की तरह बहुत अधिक व्यय किया गया हो।
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रउताई  : स्त्री० [हिं० रावत+आई (प्रत्यय)] राउत (रावत) या मालिक होने की अवस्था या भाव। प्रभुत्व। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रउरे  : सर्व० [पश्चिमी रावरे का पूर्वी रूप] मध्यम पुरुष के लिए आदरसूचक शब्द। आप। जनाब। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रऐयत  : स्त्री० [अ०] प्रजा। रिआया।
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रकछ  : पुं० [हिं० रिकवंच] कुछ विशिष्ट प्रकार के पत्तों की बनाई हुई पकौड़ी। पतौड़ी।
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रकत  : पुं० [सं० रक्त] लटू। खून। रुधिर। वि० रक्त वर्ण का। लाल। सुर्ख। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रकतकंद  : पुं० [सं० रक्त-कंद] १. मूँगा। प्रवाल। विद्रुम (डिं०) २. रताल।
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रकतांक  : पुं० [सं० रक्तांक] १. विद्रुम। प्रवाल। मूँगा। (डिं०) २. केसर ३. लाल चन्दन। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रक़बा  : पुं० [अ० रकबः] क्षेत्रफल। (दे०)
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रकबाहा  : पुं० [अ०] घोड़ों का एक भेद।
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रकम  : स्त्री० [अ० रकम] १. लिखने की क्रिया या भाव। २. छाप। मोहर। ३. रुपया-पैसा या बीघा-बिसवा आदि लिखने के फारसी के वे विशिष्ट अंक जो साधारण संख्यासूचक अंकों से भिन्न होते हैं। ४. रुपया-पैसा जिसकी संख्या नियत या सूचित की गई हो। ५. बही-खाते में लिखी जानेवाली उक्त प्रकार की संख्या या कोई ऐसा पद जो उस संख्या से संबद्ध हो। जैसे—(क) यह रकम बही में लिख दो। (ख) तुम्हारे नाम अभी दो रकमें बाकी पड़ी हैं। ६. गहना या जेवर जो मूल्यवान होता है और जिससे धन मिल सकता है। जैसे—घर की एक रकम रखकर दो सौ रूपये लाया हूँ। ७. कोई ऐसी चीज जिसका कुछ विशेष महत्त्व या मूल्य हो। ८. बहुत ही चलता-पुरजा या चालाक आदमी। ९. सुन्दर स्त्री। (बाजारू)। १॰. ब्रिटिश भारत में, लगान की दर। ११. तरह। प्रकार। भांति। जैसे—रकम-रकम की चीजें वही रखी थीं।
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रक़मी  : वि० [अ० रक़मी] १. रकम संबंधी। रकम का। २. लिखा हुआ। लिखित। ३. निशान किया हुआ। पुं० मध्ययुग और ब्रिटिश भारत में वह काश्तकार जिससे रकम या धन लेने में कोई खास रिआयत की जाती थी।
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रकान  : स्त्री० [?] १. तरीका। २. लगाम।
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रकाब  : स्त्री० [फा० रकाब] १. घोडे़ की काठी का झूलता हुआ पावदान जिस पर पैर रखकर घोड़े पर सवार होते हैं, और बैठने में जिससे सहारा लेते हैं। मुहावरा—रकाब पर पैर रखना=कहीं जाने या चलने के लिए बिल्कुल तैयार होना। २. दे० ‘रकाबी’।
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रकाबत  : स्त्री० [अ०] १. रकीब होने की अवस्था, धर्म या भाव। २. किसी प्रेमिका के सम्बन्ध में उसके प्रेमियों में होनेवाली प्रतिद्वंद्विता।
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रकाबदार  : पुं० [फा०] १. मुरब्बा, मिठाई आदि बनानेवाला कारीगर या हलवाई। २. रकाबियों में खाना चुनने और परोसनेवाला। खानसामा। ३. नवाबों, बादशाहों आदि के साथ उनका भोज लेकर चलनेवाला सेवक। खासाबरदार। ४. रकाब पकड़कर घोड़े पर सवार करनेवाला नौकर। साईस।
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रकाबा  : पुं० [फा० रकाबः] १. बड़ी रकाबी। २. परात।
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रकाबी  : स्त्री० [फा०] छिछली गोल छोटी थाली। वि० १. रकाब सम्बन्धी। २. रकाबी की तरह का। जैसे—रकाबी चेहरा।
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रकाबी-चेहरा  : पुं० [फा० हिं] गोल या चौड़ा मुँह।
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रकाबी-मजहब  : वि० [फा० +अ] खुशामदी। चाटुकार।
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रकार  : पुं० [सं० र+कार] र वर्ण का बोधक अक्षर। र।
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रक़ीक़  : वि० [अ०] १. पानी की तरह पतला। तरल द्रव। २. कोमल। नरम। मुलायम। पुं० गुलाम। दास।
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रक़ीब  : पुं० [अ०] १. वह जो किसी प्रेमिका के प्रेम के संबंध में उसके दूसरे प्रेमी से प्रतियोग करता हो। प्रेमिका का दूसरा प्रेमी। २. प्रतिद्वंद्वी। प्रतिस्पर्धा।
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रकेबी  : स्त्री=रकाबी।
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रक्कास  : पुं० [अ०] [स्त्री० रक्कासी] नाचनेवाला। नर्त्तक।
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रक्खना  : स०=रखना।
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रक्त  : वि० [सं०√रंज् (रँगना)+क्त] १. जिसका रंजन हुआ हो। २. रँगा हुआ। ३. किसी के अनुराग या प्रेम से युक्त। अनुरक्त। ४. लाल रंग का। सुर्ख। ५. आमोद-प्रमोद या विहार में लगा हुआ। ६. शुद्ध और साफ किया हुआ। पुं० १. लाल रंग का वह प्रसिद्ध तरल पदार्थ जो नसों आदि में से होकर सारे शरीर में चक्कर लगाता रहता है। लहू। खून। रुधिर। शोणित। (मुहा० के लिए दे खून के मुहा०) २. उत्साहपूर्वक अग्रसर होने या आगे बढ़ाने वालों का दल या वर्ग। जैसे—कांग्रेस को अब नये रक्त की आवश्यकता है। ३. केसर। ४. ताँबा। ५. कमल। ६. सिंदूर। ईगुर। ७. लाल चंदन। ८. लाल रंग। ९. कुसुभ। १॰. गुल। दुपारिया। बन्धूक। ११. पतंग नामक वृक्ष की लकड़ी। १२. एक प्रकार का बेंत। हिज्जल। १३. एक प्रकार की मछली। १४. एक प्रकार का जहरीला मेंढ़क। १५. एक प्रकार का बिच्छू। १६. अच्छी तरह पका हुआ आँवले का फल।
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रक्तकंठ  : पुं० [सं० ब० स०] १. कोयल। २. बैंगन। ३. भंटा। वि० जिसका कंठ या गला रक्त अर्थात् लाल हो।
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रक्तकंद  : पुं० [सं० ब० स०] १. विद्रुम। मूँगा। २. प्याज। ३. रतालू।
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रक्त-कंदल  : पुं० [सं० ब० स०] मूँगा। विद्रुम।
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रक्तक  : पुं० [सं० रक्त√कै (शब्द)+क] १. गुल दुपरिया का पौधा और उसका फूल। बंधुक। २. लाल सहिंजन का पेड़। ३. लाल रेंड़। ४. लाल कपड़ा। ५. लाल रंग का घोड़ा। ६. केसर। वि० १. रक्त वर्ण का । लाल। २. अनुरक्त। ३. विनोदप्रिय।
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रक्त-कदंब  : पुं० [सं० कर्म० स०] १. एक प्रकार का कदंब जिसके फूल गहरे लाल रंग के होते हैं। २. उक्त वृक्ष का फूल।
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रक्त-कदली  : स्त्री० [सं० कर्म० स०] चंपा केला।
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रक्त-कमल  : पुं० [सं० कर्म० स०] लाल रंग का कमल।
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रक्त-करबीर  : पुं० [सं० कर्म० स०] लाल रंग का कनेर।
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रक्त-कांचन  : पुं० [सं० कर्म० स०] कचनार का वृक्ष। कचनाल।
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रक्तकांता  : स्त्री० [सं० ब० स० टाप्] लाल पुनर्नवा। लाल गदह-पूरना।
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रक्त-काश  : पुं० [सं० मध्य० स०] एक प्रकार का काश-रोग जिसमें फेफड़े से मुँह के रास्ते खून निकलता है।
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रक्त-काष्ठ  : पुं० [सं० ब० स०] पतंग की लकड़ी।
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रक्त-कुमुद  : पुं० [सं० कर्म० स०] कूँई। नीलोफर।
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रक्त-कुरुडंक  : पुं० [सं० कर्म० स०] लाल कटलसरैया।
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रक्तकुष्ठ  : पुं० [कर्म० स०] विसर्प, नामक रोग जिसमें सारा शरीर लाल हो जाता है और इसमें बहुत जलन होती है और कुष्ठ की तरह अंग गलने लगते हैं।
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रक्त-कुसुम  : पुं० [सं० ब० स०] १. कचनार। २. आक। मदार। ३. धामिन नामक वृक्ष। ४. फरहद। पारिभद्र।
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रक्त-कुसुमा  : स्त्री० [कर्म० स० टाप्] अनार का पेड़।
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रक्त-कृमिजा  : स्त्री० [सं० कर्म० स०√जन् (उत्पत्ति)+ड, टाप्] लाख। लाह।
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रक्त-केशर  : पुं० [ब० स०] पारिभद्रक वृक्ष। फरहद का पेड़।
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रक्त-कैरव  : पुं० [कर्म० स०] लाल कुमुद।
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रक्तक्षय  : पुं० [सं० ष० त०] १. रक्त का क्षय होना। २. दे० ‘रक्त क्षीणता’।
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रक्त-क्षीणता  : स्त्री० [सं०] शरीर की वह स्थिति जिसमें रक्त या खून की बहुत कमी हो जाती है (एनीमिया)।
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रक्त-खदिर  : पुं० [कर्म० स०] एक प्रकार का खैर का वृक्ष जिसके फूल लाल रंग के होते हैं। रक्तसार।
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रक्त-गंधक  : पुं० [कर्म० स०] बोल नामक गंध-द्रव्य।
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रक्त-गत-ज्वर  : पुं० [रक्त, गत, द्वि, त० रक्त-ज्वर० कर्म० स०] वह ज्वर जिसके कीटाणु रोगी के रक्त में समा गये हों।
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रक्त-गर्भा  : स्त्री० [ब० स, टाप्] मेंहदी का पेड़।
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रक्त-गुल्म  : पुं० [मध्य० स०] स्त्रियों का एक रोग जिसमें उनके गर्भाशय में रक्त की गाँठ-सी बँध जाती है।
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रक्त-गैरिक  : पुं० [कर्म० स०] स्वर्ण गैरिक। लाल गेरू।
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रक्त-ग्रीव  : पुं० [सं० ब० स०] १. कबूतर। २. राक्षस।
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रक्तध्न  : पुं० [सं० रक्त√हन् (हिंसा)+टक्] रोहितक वृक्ष। वि० रक्त का नाश करनेवाला।
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रक्तध्नी  : स्त्री० [सं० रक्तध्न+ङीष्] एक प्रकार की दूब। गंडदूर्वा।
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रक्त-चंचु  : पुं० [ब० स०] शुक्र तोता।
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रक्त-चंदन  : पुं० [कर्म० स०] लाल रंग का चंदन। (दे० ‘चंदन’)
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रक्त-चाप  : पुं० [सं० रक्त और हिं० चाप] १. खून का जोर या दबाव। २. चिकित्सा शास्त्र में एक रोग जो उस समय माना जाता है जब अवस्था के प्रसम अनुपात से रक्त का दबाव या वेग घट या बढ़ गया होता है। (ब्लड प्रेसर)
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रक्त-चित्रक  : पुं० [कर्म० स०] लाल रंग का चित्रक या चीता वृक्ष।
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रक्तचूर्णा  : पुं० [कर्म० स०] १. सिंदूर। २. कमीला।
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रक्तच्छर्दि  : स्त्री० [ष० त०] खून की कै होना। रक्त-वमन।
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रक्तज  : वि० [सं० रक्त√जन् (उत्पत्ति)+ड] १. जो रक्त से उत्पन्न हो। २. (रोग) जो रक्त विकार के कारण उत्पन्न हो।
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रक्तजकृमि  : पुं० [कर्म० स०] वह कृमि जो रक्त-विकार के कारण उत्पन्न होता है।
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रक्तजपा  : स्त्री० [कर्म० स०] अड़हुल। जवा। देवीफूल।
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रक्तजिह्व  : पुं० [ब० स०] सिंह। शेर। वि० लाल जीभवाला।
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रक्तजूर्ण  : पुं० [कर्म० स०] ज्वार। जोन्हरी।
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रक्ततप्त  : वि० [कर्म० स०] इतना अधिक तपा या तपाया हुआ कि देखने में लाल हो गया हो। बहुत अधिक तपा हुआ। (रेड-हॉट)
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रक्ततर  : पुं० [सं० रक्त+तरप्] गेरू।
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रक्तता  : स्त्री० [सं० रक्त+तल्+टाप्] रक्त होने की अवस्था या भाव। लाली। सुर्खी।
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रक्तताप  : पुं० [कर्म० स०] उस अवस्था की ताप या गरमी जब कोई चीज तपाने से लाल हो गई हो। (रेड-हीट)।
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रक्ततुंड  : पुं० [सं० ब० स०] तोता।
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रक्ततुंडक  : पुं० [सं० रक्ततुंड+कन्] सीसा।
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रक्ततृण  : पुं० [कर्म० स०] एक प्रकार का लाल रंग का तृण।
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रक्तदंतिका  : स्त्री० [ब० स० कप्+टाप्, इत्व] दुर्गा का वह रूप जो उन्होंने शुंभ-निसुंभ को मारने के समय धारण किया था। चंडिका।
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रक्तदंती  : स्त्री० [सं० ब० स० ङीष्]=रक्तदंतिका।
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रक्तदला  : स्त्री० [ब० स० टाप्] नालिका नामक गंध-द्रव्य।
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रक्तदान-बैंक  : पुं० [सं० रक्तदान+अं० बैक] वह स्थान जहाँ स्वस्थ व्यक्तियों के शरीर से निकाला हुआ रक्त इसलिए सुरक्षित रखा जाता है कि आवश्यकता पड़ने पर ऐसे रोगियों के शरीर में प्रविष्ट किया जा सके जो रक्त की कमी के कारण मरणासन्न हो रहे हों। (ब्लड बैंक)
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रक्तदूषण  : वि० [ष० त०] जिसके रक्तदूषित हो। खून-खराब करनेवाला।
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रक्त-दृग (श्)  : पुं० [ब० स०] १. कोयल। कोकिल। २. कबूतर। ३. चकोर। वि० लाल आँखोंवाला।
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रक्त-द्रुम  : पुं० [कर्म० स०] लाल बीजासन वृक्ष।
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रक्त-धरा  : स्त्री० [ष० त०] वैद्यक के अनुसार मांस के अन्दर की दूसरी कला या झिल्ली जो रक्त को धारण किये रहती है।
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रक्त-धातु  : पुं० [कर्म० स०] १. गेरु। २. ताँबा।
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रक्त-नयन  : पुं० [ब० स०] १. कबूतर। २. चकोर।
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रक्त-नाल  : पुं० [ब० स०] सुसना नामक साग।
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रक्त-नालिक  : पुं० [ब० स०] उल्लू।
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रक्त-नील  : पुं० [कर्म० स०] सुश्रुत के अनुसार एक प्रकार का बहुत जहरीला बिच्छू।
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रक्त-नेत्र  : पुं० [ब० स०] १. कोयल। २. सारस पक्षी। ३. कबूतर। ४. चकोर। वि० लाल आँखोंवाला। जिसके नेत्र लाल हों।
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रक्तप  : वि० [सं० रक्त√पा (पान)+क] रक्त पान करने अर्थात् लहू पीनेवाला। पुं० १. राक्षस। २. खटमल।
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रक्त-पक्ष  : पुं० [ब० स०] गरुड़।
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रक्तपट  : वि० [ब० स०] लाल रंग के कपड़े पहननेवाला। पुं० बौद्ध श्रमण।
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रक्तपत्र  : पुं० [ब० स०] पिंडालू।
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रक्तपत्रा  : स्त्री० [ब० स० टाप्] १. लाल गदहपूरना। २. नाकुली।
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रक्तपर्ण  : पुं० [ब० स०] लाल गदहपूरना।
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रक्त-पलल्व  : पुं० [सं० ब० स०] अशोक का वृक्ष।
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रक्तपा  : स्त्री० [सं० रक्तप+टाप्] १. जोंक। २. डाकिनी।
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रक्त-पात  : पुं० [ष० त०] १. लहू का गिरना या बहना। रक्तस्राव। २. ऐसी मारपीट या लड़ाई-झगड़ा जिसमें अधिक मारकाट के कारण अनेक शरीरों से खून बहता है। खून-खराबी।
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रक्त-पाता  : स्त्री० [सं० रक्त√पत् (गिरना)+णिच्+अच्+टाप्] जोंक।
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रक्त-पाद  : पुं० [ब० स०] १. बरगद। २. तोता।
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रक्त-पायी (यिन्)  : वि० [सं० रक्त√पा+णिनि, युगागम] [स्त्री० रक्तपायिनी] रक्तपान करनेवाला। खून पीनेवाला। पुं० १. राक्षस। २. खटमल।
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रक्तपारद  : पुं० [कर्म० स०] हिंगुल। ईगुर।
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रक्त-पाषाण  : पुं० [कर्म० स०] १. लाल पत्थर। २. गेरू।
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रक्त-पिंड  : पुं० [उपमित० स०] जवाफूल।
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रक्त-पिंडक  : पुं० [सं० रक्तपिंड+कन्] १. रतालू। २. अड़हुल। जवा।
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रक्त-पिंडालु  : पुं० [कर्म० स०] रतालू।
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रक्त-पित्त  : पुं० [मध्य० स०] १. एक प्रकार का रोग जिसमें मुँह, नाक, कान, गुदा, योनि आदि इंद्रियों से रक्त गिरता है। २. नाक से लहू बहने का रोग। नकसीर।
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रक्तपित्तहा  : स्त्री० [सं०√रक्तपित्त√हन् (हिंसा)+ड+टाप्] रक्तध्नी नामक दूब।
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रक्तपित्ती (त्तिन्)  : पुं० [सं० रक्तपित्त+इनि] वह जो रक्तपित्त रोग से ग्रस्त हो।
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रक्त-पुनर्नवा  : स्त्री० [कर्म० स०] लाल गदहपूरना। २. वैशाखी।
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रक्त-पुष्प  : पुं० [ब० स०] १. करबीर। कनेर। २. अनार का पेड़। ३. गुलदुपहरिया। बन्धूक। ४. पुन्नाग।
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रक्त-पुष्पक  : पुं० [सं० रक्तपुष्प+कन्] सेमल (पेड़)।
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रक्तपुष्पा  : स्त्री० [सं० रक्तपुष्प+टाप्] १. शाल्मली वृक्ष। सेमल। २. पुनर्नवा। ३. सिंदूरी। ४. चंपा केला। ५. नागदौन।
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रक्त-पुष्पिका  : स्त्री० [सं० रक्तपुष्प+कन्-टाप्, इत्व] १. लाल पुनर्नवा। २. लजालू। लाजवंती।
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रक्तपुष्पी  : स्त्री० [सं० रक्तपुष्प+ङीष्] १. जवा। अड़हुल। २. नाग दौड़। घौ। घव। ४. आवर्त्तकी लता। ५. पाढर।
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रक्तपूतिका  : स्त्री० [कर्म० स०] लाल रंग की पूतिका। लाल पोई।
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रक्त-पूरक  : पुं० [ष० त०] इमली।
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रक्त-पूर्ण  : वि० [तृ० त०] खून से लथपथ।
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रक्त-प्रतिश्याय  : पुं० [मध्य० स०] प्रतिश्याय या जुकाम का एक भेद जिसमें नाक से खून भी जाने लगता है।
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रक्त-प्रदर  : पुं० [मध्य० स०] स्त्रियों के प्रदर रोग का वह भेद जिसमें उनकी योनि से रक्त बहता है।
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रक्त-प्रमेह  : पुं० [कर्म० स०] दुर्गन्धियुक्त गरम, खारा और खून के रंग का पेशाब होने का एक पुरुष रोग।
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रक्त-प्रवृत्ति  : पुं० [सं० ब० स०] पित्त के प्रकोप के फलस्वरूप होनेवाला रोग।
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रक्त-प्रसव  : पुं० [ब० स०] १. लाल कनेर। २. मुचकुंद वृक्ष।
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रक्तफल  : पुं० [ब० स०] १. शाल्मलि। सेमल। २. बड़ का पेड़। वटवृक्ष।
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रक्तफला  : स्त्री० [ब० स०+टाप्] १. कुंदरू। तुष्टी। बिंवी। २. स्वर्णवल्ली।
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रक्त-फूल  : पुं० [सं० रक्त+हिं० फूल] १. जवा फूल। अड़हुल का फूल। २. ढाक। पलास।
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रक्त-फेनज  : पुं० [सं० रक्तफेन, ष० त० रक्तफेन√जन् (उत्पन्न होना)+ड०] फुफ्फुस। फेफड़ा।
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रक्त-बीज  : पुं० =रक्त-बीज।
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रक्त-भव  : पुं० [ब० स०] गोश्त। मांस। वि० रक्त से उत्पन्न।
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रक्त-मंजरी  : स्त्री० [ब० स०] लाल कनेर।
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रक्त-मंडल  : पुं० [ब० स०] १. लाल कमल। २. सुश्रुत के अनुसार एक प्रकार का साँप। ३. एक जहरीला पशु।
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रक्त-मत्त  : वि० [तृ० त०] जो रक्त पीकर तृप्त हो। रक्त पीकर मतवाला होनेवाला। पुं० १. राक्षस। २. खटमल। ३. जोंक।
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रक्तमत्स्य  : पुं० [सं० कर्म० स०] एक प्रकार की लाल रंग की मछली जो बहुत बड़ी नहीं होती।
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रक्त-मस्तक  : पुं० [ब० स०] लाल रंग के सिरवाला सारस पक्षी।
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रक्तमातृका  : स्त्री० [सं० रक्त-मातृ, ष० त० कन्+टाप्] १. वैद्यक के अनुसार शरीर का वह रस (धातु) जिसकी उत्पत्ति पेट में पचे हुए भोजन से होती है और जिससे रक्त बनता है। २. तंत्र के अनुसार एक प्रकार का रोग।
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रक्त-मुख  : पुं० [ब० स०] १. रोहू (मछली) २. यष्टिक धान्य। वि० लाल मुँहवाला।
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रक्तमूर्द्धा (र्द्धन्)  : पुं० [ब० स०] सारस।
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रक्तमूलक  : पुं० [ब० स० कप्] देवसर्षण नामक सरसों का पौधा।
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रक्तमेह  : पुं० =रक्त-प्रमेह।
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रक्तमोक्षण  : पुं० [ष० त०] वैद्यक में एक प्रकार का उपचार या क्रिया जिससे शरीर का अथवा उसके किसी अंग का खराब खून बाहर निकाला जाता है। फसद खोलना।
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रक्त-मोचन  : पुं० [ष० त०]=रक्त-मोक्षण।
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रक्त-यष्ठि  : स्त्री० [ब० स०] मंजीठ।
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रक्तरंगा  : स्त्री० [ब० स०] मेंहदी।
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रक्त-रज (स्)  : पुं० [कर्म० स०] सिंदूर।
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रक्त-रसा  : स्त्री० [ब० स० टाप्] रास्ना (कंद)।
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रक्त-रेणु  : पुं० [ब० स०] १. सिंदूर। २. पुन्नाग।
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रक्त-रोग  : पुं० [मध्य० स०] १. ऐसा रोग जिसके फलस्वरूप शरीर का रक्त दूषित हो जाता है। २. रक्त के दूषित होने के कारण उत्पन्न होनेवाला रोग।
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रक्ततला  : स्त्री० [सं० रक्त√ला (आदान)+क+टाप्] १. काकतुंडी। कौआ-ठोंठी। २. गंजा। घुँघची।
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रक्तलोचन  : पुं० [ब० स०] १. कबूतर। २. कोयल। ३. सारस। ४. चकोर। वि० लाल आँखोंवाला।
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रक्त-वटी  : स्त्री० [कर्म० स०] शीतला रोग। चेचक। माता।
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रक्त-वर्ग  : पुं० [ब० स०] वैद्यक के अनार, ढाक, लाख, हलदी, दारुहलदी, कुसुम के फूल, मंजीठ और दुपहिया के फूल, इन सबका समूह।
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रक्त-वर्ण  : पुं० [ब० स०] १. बीरबहूटी नामक कीड़ा। २. गोमेद या लहसुनिया नामक रत्न। ३. मूँगा। ४. कभीला। वि० लाल रंग का।
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रक्त-वर्तक  : पुं० [कर्म० स०] लाल बटेर।
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रक्त-वर्द्धन  : वि० [सं० रक्त√वृध् (वृद्धि)+णिच्+ल्यु-अन] रक्त बढ़ानेवाला। रक्त वर्धक। पुं० बैंगन। भंटा।
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रक्त-वल्ली  : स्त्री० [कर्म० स०] १. मंजीठ। २. नलिका या पचारी नामक गन्ध द्रव्य। ३. दंडोत्पल ४. पित्ती नाम की लता।
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रक्त-वसन  : पुं० [ब० स०] संन्यासी।
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रक्त-वह-तंत्र  : पुं० [सं० रक्त√वह् (ले जाना)+अच्, रक्तवह्-तंत्र, ष० त०] शरीर की वे सब शिराएं और अंग जो सारे सरीर में रक्त पहुँचाने में सहायक होते हैं। (सर्क्युलेटरी सिस्टम)।
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रक्त-वात  : पुं० [मध्य० स०] वात-रक्त। (दे०)
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रक्त-वालुक  : पुं० [ब० स०] सिंदूर।
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रक्त-बिंदु  : पुं० [ष० त०] १. रुधिर या लहू की बूँद। २. [ब० स०] लाल चिचड़ा। ३. [कर्म० स०] रत्न आदि में दिखाई पड़नेवाला धब्बा जिसकी गिनती दोषों में होती है।
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रक्त-विद्रधि  : पुं० [मध्य० स०] रक्त-विकार के फलस्वरूप होनेवाला एक प्रकार का फोड़ा। इसमें किसी अंग में सूजन होती है और उसके चारों ओर काले रंग की फुँसिया हो जाती है।
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रक्त-विस्फोटक  : पुं० [ब० स०] एक प्रकार का रोग जिसमें शरीर में गुंजा के समान लाल-लाल फफोले पड़ जाते हैं।
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रक्त-वीज  : पुं० [ब० स०] १. लाल बीजोंवाला दाड़िम। अनार। २. रीठा। ३. शुंभ और निशुंभ का सेनापति एक राक्षस। जिसके सम्बन्ध में प्रसिद्ध है कि धरती पर गिरनेवाली उसके रक्त की हर एक बूँद से एक-एक राक्षस उत्पन्न होते थे।
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रक्त-वीजा  : स्त्री० [ब० स० टाप्] सिंदूर पुष्पी। सिंदूरिया।
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रक्त-वृंत्तक  : पुं० [सं० कर्म० स०] पुनर्नवा। गदहपूरना।
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रक्तवृंत्ता  : स्त्री० [सं० ब० स० टाप्] शेफालिका। निर्गुडी।
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रक्त-वृष्टि  : स्त्री० [ष० त०] आकाश से रक्त या लाल रंग के पानी की वृष्टि होना। दे० ‘रुधिर वर्षण’।
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रक्त-व्रण  : पुं० [मध्य० स०] वह फोड़ा जिसमें मवाद के स्थान पर रक्त निकलता हो।
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रक्त-शर्करा  : स्त्री० [मध्य० स०] शर्करा का वह तत्त्व जो शरीर के रक्त में रहता है। (ब्लड शूगर)
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रक्त-शालि  : पुं० [कर्म० स०] एक प्रकार का लाल रंग का चावल। दाऊदरबानी।
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रक्त-शासन  : पुं० [सं० रक्त√शास् (वश में करना)+ल्यु-अन] सिंदूर।
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रक्त-शिग्रु  : पुं० [कर्म० स०] लाल सहिंजन।
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रक्तशीर्षक  : पुं० [सं० ब० स० कप्] १. गंधा बिरोजा। २. सारस पक्षी।
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रक्त-श्रृंग  : पुं० [कर्म० स०] हिमालय की एक चोटी।
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रक्त-श्वेत  : पुं० [कर्म० स०] एक तरह का अत्यधिक जहरीला बिच्छू (सुश्रुत)।
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रक्तष्ठीवि  : पुं० [सं० रक्त√ष्ठीव् (थूकना)+णिनि, उप० स०] एक प्रकार का घातक और असाध्य सन्निपात जिसमें मुँह से लहू जाता है।
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रक्त-संज्ञक  : पुं० [ब० स० कप्] कुंकुम। केसर।
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रक्त-संबंध  : पुं० [ष० त०] कुलगत संबंध। एक ही कुल, परिवार या वंश की दृष्टि से होनेवाला सम्बन्ध।
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रक्त-संवरण  : पुं० [ष० त०] सुरमा।
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रक्त-सर्षण  : पुं० [कर्म० स०] लाल सरसों।
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रक्त-सार  : पुं० [ब० स०] १. लाल चंदन। २. पतंग। बक्कम। ३. अमलबेंत। ४. खदिर। खैर। ५. वाराही कंद। गेंठी। ६. रक्त-बीजासन।
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रक्त-स्तंभन  : पुं० [ष० त०] शरीर के किसी अंग से बहते हुए रक्त को बंद करना या रोकना।
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रक्त-स्राव  : पुं० [ष० त०] १. शरीर के किसी अंग से रक्त निकलना या बहना। २. घोड़ों का एक रोग जिसमें उनकी आँखों से रक्त या लाल रंग का पानी बहता है।
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रक्त-हर  : पुं० [ष० त०] भिलावाँ। वि० रक्त सुखाने या सोखनेवाला।
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रक्तांग  : पुं० [रक्त-अंग, ब० स०] १. मंगल ग्रह। २. कमीला। ३. मूँगा। ४. खटमल। ५. केसर। ६. लाल चंदन। वि० लाल अँगोंवाला।
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रक्तांगी  : स्त्री० [सं० रक्तांग+ङीष्] १. मंजीठ। २. जीवंती। ३. कुटकी।
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रक्तांबर  : पुं० [रक्त-अंबर, कर्म० स०] १. लाल वस्त्र। गेरुआ वस्त्र। २. [ब० स०] संन्यासी जो गेरुआ वस्त्र पहनता है।
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रक्ता  : स्त्री० [सं० रक्त+अच्+टाप्] १. संगीत में पंचम स्वर की चार श्रुतियों में से दूसरी श्रुति। २. गुंजा। घुंघची। ३. लाक्षा। लाख। ४. मंजीठ। ५. ऊँटकटारा। ६. एक प्रकार का सेम। ७. लक्ष्मण नामक कन्द। ८. वच। वचा। ९. एक प्रकार की मकड़ी। १॰. कान के पास की एक नस।
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रक्ताकार  : पुं० [रक्त-आकार, ब० स०] मूँगा।
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रक्तांक्त  : वि० [रक्त-अक्त, तृ, त०] १. लाल रंग में रँगा हुआ। २. जिसमें रक्त या खून लगा हो। पुं० लाल चंदन।
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रक्ताक्ष  : पुं० [रक्त-अक्षि, ब० स० षच्, प्रत्यय] १. कोयल। २. चकोर। ३. सारस। ४. कबूतर ५. भैंसा। ६. साठ संवत्सरों में से अट्ठानवें संवत्सर का नाम। वि० लाल आँखोंवाला।
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रक्ततिसार  : पुं० [सं० रक्त-अतिसार, मध्य० स०] एक प्रकार का अतिसार रोग जिसमें लहू के दस्त आते हैं।
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रक्ताधर  : वि० [रक्त-अधर, ब० स०] [स्त्री० रक्ताधार] लाल होंठोंवाला।
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रक्ताधरा  : स्त्री० [रक्त-अधर, ब० स० टाप्] किन्नरी।
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रक्ताधार  : पुं० [रक्त-आधार, ष० त०] चमड़ा।
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रक्तापह  : पुं० [सं० रक्त-अप√हन् (हिंसा)+ड] बोल (गंधद्रव्य)।
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रक्ताभ  : पुं० [रक्त-आभा, ब० स०] बीरबहूटी। वि० रक्त की तरह की लाल आभावाला। जो कुछ-कुछ लाली लिये हो।
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रक्ताभा  : स्त्री० [सं० रक्ताभ+टाप्] लाल जवा।
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रक्ताभ्र  : पुं० [रक्त-अभ्र, कर्म० स०] लाल अभ्रक।
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रक्तारि  : पुं० [रक्त-अरि, ष० त०] महाराष्ट्री नामक क्षुप (पौधा)।
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रक्तार्बुद  : पुं० [रक्त-अर्बुद, ब० स०] १. एक प्रकार का रोग जिसमें शरीर में पकने और बहनेवाली गाँठे निकल आती हैं। २. शुक्रदोष के कारण उत्पन्न होनेवाला एक रोग जिसमें लिंग पर, काले फोडे़ और उनके साथ लाल फुन्सियाँ निकल आती है।
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रक्तार्श (र्शस्)  : पुं० [रक्त-अर्शस्, मध्य० स०] खूनी बवासीर।
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रक्तालु  : पुं० [रक्त-आलु, कर्म० स०] रतालू (कंद)।
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रक्तावरोधक  : वि० [रक्त-अवरोधक, ष० त०] बहते हुए खून को रोकनेवाला।
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रक्तावसेचन  : पुं० [रक्त-अवसेचन, ष० त०] १. शरीर के सात आशयों में से चौथा जिसमें रक्त का रहना माना जाता है। २. रक्त मोक्षण।
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रक्ताशोक  : पुं० [रक्त-अशोक, कर्म० स०] लाल अशोक का वृक्ष।
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रक्ति  : स्त्री० [सं०√रंज् (राग+क्तिन्)] १. अनुराग। प्रेम। २. रत्ती नामक तौल या परिमाण।
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रत्तिका  : स्त्री० [सं० रक्त+ठन्—इक, टाप्] १. घुंघची। २. रत्ती नामक तौल या परिमाण।
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रक्तिमा (मन्)  : स्त्री० [सं० रक्त+इमानिच्] रक्तिम होने की अवस्था या भाव।
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रक्तेक्षु  : पुं० [रक्त-इक्षु, कर्म० स०] लाल रंग का ऊख।
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रक्तोत्पल  : पुं० [रक्त-उत्पल, कर्म० स०] १. लाल कमल। २. शाल्मलि। सेमल।
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रक्तोदर  : पुं० [रक्त-उदर, ब० स०] १. रोहू मछली। २. एक प्रकार का जहरीला बिच्छू।
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रक्तोपदंश  : पुं० [रक्त-उपदंश, मध्य० स०] आतशक (रोग)।
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रक्तोपल  : पुं० [रक्त-उपल, कर्म० स०] गेरू।
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रक्ष  : पुं० [सं०√रक्ष् (पालन)+अच्] १. रक्षक। रखवाला। २. रक्षा। रखवाली। हिफाजत। ३. लाक्षा। लाख। ४. छप्पय के साठवें भेद का नाम जिसमें ११ गुरु और १३0 लघु मात्राएं अथवा ११ गुरु और १२६ लघु मात्राएँ होती है। पुं० =राक्षस।
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रक्षक  : पुं० [सं०√रक्ष्+ण्वुल्—अक] १. रक्षा करनेवाला। बचानेवाला। हिफाजत करनेवाला। २. पहरेदार। ३. पालन-पोषण करनेवाला।
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रक्षण  : पुं० [सं०√रक्ष्+ल्युट—अन] १. रक्षा करना। हिफाजत करना। रखवाली। २. पालन-पोषण करना। ३. रक्षक।
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रक्षणकर्ता (र्तृ)  : पुं० [ष० त०] रक्षा करनेवाला। रक्षक।
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रक्षणीय  : वि० [सं०√रक्ष्+अनीयर्] [स्त्री० रक्षणीया] रक्षा किये जाने के योग्य। जिसे रक्षित रखना हो।
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रक्षन  : पुं० =रक्षण। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रक्षना  : स० [सं० रक्षण] रक्षा करना। हिफाजत करना। सँभालना। बचाना। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रक्षपाल  : पुं० [सं० रक्ष√पाल् (रक्षा)+णिच्+अण, उप० स०] वह जिसका काम रक्षा करना हो।
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रक्षमाण  : वि० =रक्ष्यमाण।
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रक्षस  : पुं० =राक्षस। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रक्षा  : स्त्री० [सं०√रक्ष्+अ-टाप्] १. ऐसा काम जो आक्रमण, आघात, आपद, नाश आदि से बचने या बचाने के लिए किया जाता हो। हिफाजत। जैसे—अपनी रक्षा, घर की रक्षा, संकट में पड़े हुए मित्र की रक्षा। २. बालकों को भूत-प्रेत नजर आदि से बचने के उद्देश्य से बाँधा जानेवाला यंत्र या सूत्र। कवच। ३. गोद। ४. भस्म।
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रक्षाइद  : स्त्री० [हिं० रक्ष+आइद (प्रत्यय)] राक्षसपन। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रक्षा-कवच  : पुं० [मध्य० स०] १. तंत्र-मंत्र की विधि से बनाया हुआ वह कवच या यंत्र जो किसी को आपत्तियों आदि से रक्षित रखने के लिए पहनाया जाता है। २. कोई ऐसी चीज या बात जो सब प्रकार से किसी की रक्षा करने के लिए यथेष्ट मानी जाती है। (सेफ-गार्ड)।
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रक्षा-गृह  : पुं० [ष० त०] १. चौकी। २. सूतिका-गृह। जच्चा-खाना।
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रक्षा-पति  : पुं० [ष० त०] नगर का शासक या रक्षा का प्रबंध करनेवाला एक प्राचीन भारतीय अधिकारी।
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रक्षा-पत्र  : पुं० [ब० स०] १. भोजपत्र। २. सफेद सरसों।
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रक्षापाल  : पुं० [सं० रक्षा√पाल् (बचाना)+णिच्+अण्] पहरेदार। प्रहरी।
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रक्षा-पुरुष  : पुं० [च० त०] पहरेदार। प्रहरी।
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रक्षापेक्षक  : पुं० [रक्षा-अपेक्षक, ष० त०] १. पहरेदार। प्रहरी। २. अंतःपुर का पहरेदार। ३. अभिनेता। नट।
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रक्षा-प्रदीप  : पुं० [च० त०] भूत-प्रेत आदि की बाधा से बचे रहने के उद्देश्य से जलाया जानेवाला दीपक। (तंत्र)
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रक्षा-बंधन  : पुं० [ष० त०] १. किसी के हाथ में रक्षासूत्र बाँधने की क्रिया या भाव। २. हिन्दुओं का एक त्यौहार जो श्रावण शुक्ला पूर्णिमा को होता है, जिसमें बहन अपने भाई तथा पुरोहित अपने यजमान की कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधता है।
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रक्षा-भूषण  : पुं० [च० त०] वह भूषण या जंतर जिसमें किसी प्रकार का कवच आदि हो और जो भूत-प्रेत या रोग आदि की बाधाओं से रक्षित रहने के लिए पहना जाय।
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रक्षा-मंगल  : पुं० [च० त०] भूत-प्रेत आदि की बाधा से रक्षित रहने के उद्देश्य से किया जानेवाला अनुष्ठान।
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रक्षामणि  : पुं० [च० त०] वह मणि या रत्न जो किसी ग्रह के प्रकोप से रक्षित रहने के लिए धारण किया जाय।
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रक्षा-रत्न  : पुं० =रक्षामणि।
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रक्षासूत्र  : पुं० [च० त०] वह मंत्रपूत सूत या डोरा जो हाथ की कलाई में रक्षा-कारक मानकर बाँधा जाता है। राखी।
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रक्षिक  : वि० [सं०√रक्ष्+णिनि+कन्] रक्षक। पुं० पहरेदार। संतरी।
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रक्षिका  : स्त्री० [सं० रक्षा, कन्-टाप्, ह्रस्व, इत्व] रक्षा। हिफाजत।
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रक्षित  : भू० कृ० [सं०√रक्ष्+क्त] [स्त्री० रक्षिता] १. जिसकी रक्षा की गई हो। हिफाजत किया हुआ। २. पाला-पोसा हुआ। ३. संभाल कर रखा हुआ। जैसे—रक्षित वन। ४. किसी विशिष्ट कार्य, व्यक्ति आदि के उपयोग के लिए निश्चित किया या ठहराया हुआ।
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रक्षित-राज्य  : पुं० [सं० कर्म० स०]=संरक्षित-राज।
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रक्षिता  : स्त्री० [सं० रक्षिन्+तल्+टाप्] १. रक्षा। हिफाजत। २. [रक्षित+टाप्] बिना विवाह किये रखी हुई स्त्री। रखेली स्त्री।
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रक्षिता (तृ)  : पुं० [सं०√रक्ष्+तृच]= रक्षक।
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रक्षी (क्षिन्)  : पुं० [सं०√रक्ष्+णिनि] १. रक्षक। २. पहरेदार। प्रहरी। पुं० [हिं० रक्षस् से] वह जो राक्षसों की उपासना करता हो।
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रक्षी-दल  : पुं० [सं० रक्षि-दल] आरक्षी (पुलिस) विभाग के साधारण सिपाहियों के वर्ग का सामूहित नाम (कान्स्टेबुलेरी)
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रक्षोध्न  : पुं० [सं० रक्षासहन् (हिंसा)+टक्] १. हींग। २. भिलावाँ। ३. सफेद सरसों। ४. चावल का वह पानी या माँड़ जो कुछ समय तक रखने से खट्टा हो गया हो।
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रक्षोध्नी  : स्त्री० [सं० रक्षोध्न+ङीष्] वचा। बच।
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रक्ष्य  : वि० [सं०√रक्ष्+ण्यत्] जिसका रक्षा करना उचित या कर्त्तव्य हो। रक्षणीय।
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रक्ष्यमाण  : वि० [सं०√रक्ष्+लट् (कर्मणि)-शानच्, यक्, मुगागम] जिसकी रक्षा की जा सके या की जाने को हो।
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रक्स  : पुं० [अ०] १. नाच। नृत्य। २. किसी चीज का इस प्रकार बार-बार इधर-उधर हिलना-डोलना या झूमना कि वह नाचती हुई जान पड़े। जैसे—शमा का रक्स=मोमबत्ती की लौ का हवा में हिलना-डोलना।
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रक्से-ताऊस  : पुं० [अ०+फा० ] =मोर-नाच (देखें)।
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रख  : स्त्री० रखा (चरी)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)]
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रखटी  : स्त्री० [देश] ईख की एक जाति।
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रखड़ा  : पुं० =रखटी।
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रखना  : स० [सं० रक्षण, प्रा० रक्खणा] १. किसी आधार, तल, वस्तु, व्यक्ति, स्थान आदि पर कोई चीज टिकाना, धरना, लादना या स्थापित करना। जैसे—(क) मेज पर गिलास रखना। (ख) मुँह पर हाथ रखना। (ग) घोड़े पर असबाब रखना। २. किसी वस्तु को दूसरे को देने, सौंपने या समर्पित करने के उद्देश्य से स्थापित करना या छोड़ देना। जैसे—किसी पर निर्णय का भार रखना। ३. किसी व्यक्ति को किसी विशिष्ट पद पर या स्थिति में नियुक्त या स्थापित करना। तैनात या मुकर्रर करना। जैसे—घर के काम के लिए नौकर तथा कोठी के काम के लिए मुनीम रखना। ४. कोई बात या विषय किसी के सामने समझाने आदि के लिए उपस्थित करना या प्रस्तुत करना। जैसे—(क) पसंद करने के लिए ग्राहक के सामने चीजें रखना। (ख) अदालत के सामने मामला या सूबत रखना। (ग) श्रोताओं के सामने उदाहरण अथवा प्रसंग रखना। ५. कोई चीज या बात इस प्रकार अपने अधिकार या वश में करना कि उसका दुरुपयोग न हो सकें, अथवा वह दूसरे के अधिकार में न जा सके। जैसे—(क) सौ रुपये हमने अपने पास रखे हैं। (ख) यह बात अपने मन में रखना, अर्थात् किसी से कहना मत। मुहावरा—(किसी का) कुछ रख लेना=इस प्रकार अपने अधिकार में कर लेना कि उसका वास्तविक स्वामी उसे पा या ले न सके। दबा लेना। जैसे—उन्होंने हमारा सारा काम भी रख लिया, और हमें रुपए भी नहीं दिये। ६. किसी प्रकार के उपयोग के लिए चीजें एकत्र करना। संग्रह या संचय करना। जैसे—(क) यह दूकानदार सब तरह की चीजें रखता है। (ख) हम हस्तलिखित ग्रन्थ और पुराने सिक्के रखते हैं। ७. पालन-पोषण, मनोविनोद, व्यवहार आदि के लिए अपने अधिकार में करना। जैसे—(क) कबूतर, कुत्ता या गौ रखना। (ख) गाड़ी, घोड़ा या मोटर रखना। (ग) रंडी रखेली रखना। ८. किसी के टिकने, ठहरने या रहने के लिए स्थान की व्यवस्था करना। टिकाना। ठहराना। जैसे—बरातियों को तो उन्होंने अपने बगीचे में रखा, और नौकर-चाकरों को धर्मशाला में। ९. किसी प्रकार का आरोप करना। जिम्मे लगाना। सिर मढ़ना। जैसे—तुम तो सदा सारा दोष मुझ पर ही रखते हो। १॰. कोई चीज गिरवी या बंधक में देना। रेहन करना। जैसे—घर के गहने रख कर ये ५००) लाया हूँ। ११. किसी का ऋणी या कर्जदार होना। जैसे—हम उनका कुछ रखते नहीं है, जो उनसे दबें। १२. किसी पुरुष का किसी स्त्री (या किसी स्त्री का पर-पुरुष को) उपपत्नी (या उपपति) के रूप में ग्रहण करके उसे अपने यहाँ स्थान देना। जैसे—विधवा होने पर उसने अपने देवर (या नौकर) को रख लिया था। १३. प्रसंग-संभोग या सहवास करना। (बाजारू) जैसे—एक दिन तो तुमने भी उसे रखा था। १४. सामाजिक व्यवहार आदि में परंपरा संबंध आदि का निर्वाह या पालन करना। बिगड़ने न देना। जैसे—(क) तुम भले ही सबसे लड़ते फिरो, पर हमें तो सबसे रखना ही पड़ता है। (ख) वह ऐसी कर्कशा और कलहनी थी, कि उसने अपने किसी रिश्तेदार से नहीं रखी। १५. किसी चीज की देख-भाल या रखवाली करना। विपत्ति, हानि आदि से रक्षा करना। १६. उक्त सुरक्षा की दृष्टि से कोई चीज किसी के पास छोड़ना। सुपुर्द करना। जैसे—अभी यह घडी़ भइया के पास रख दो, जरूरत पड़ने पर ले लेना। संयो० क्रि०—देना। १७. ऐसी स्थिति में लाना या रखना कि जाने, निकलने या भागने न पावे (प्राय० संयो० क्रि० के रूप में प्रयुक्त) जैसे—दबा रखना, भार रखना, रोक रखना। १८. कुछ विशिष्ट मनोवेगों के संबंध में, मन में दृढ़तापूर्वक धारण करना या स्थान देना। जैसे—आशा या भरोसा रखना। १९. आघात, प्रहार आदि के रूप में जमाना या लगाना। (क्व०) जैसे—उसने लाठी का एक ऐसा हाथ रखा कि लड़के का सिर फूट गया। २0०कोई काम या बात किसी और समय के लिए स्थगित करना। जैसे—अब इसका निश्चय कल पर रखो। २१. किसी रूप में किसी पर अवलंबित या आश्रित करना। जैसे—(क) किसी के कंधे पर हाथ रखना। (ख) खंभों या दीवारों पर छत रखना। मुहावरा—(कोई बात किसी पर) रखकर कहना=इस प्रकार कोई बात कहना कि उसका कुछ अंश किसी पर ठीक घटता या सार्थक होता हो। किसी को आरोप का लक्ष्य बनाकर कोई बात कहना। जैसे—मैने तो वह बात उन पर रख कर कही थी, तुम उसे व्यर्थ अपने ऊपर ले गये। २२. पक्षियों आदि के संबंध में, अंडे देना। जैसे—यह मुरगी साल में पचास अंडे रखती है। विशेष—(क) कुछ अवस्थाओं में यह क्रिया दूसरी क्रियाओं के साथ संयो० क्रि० के रूप में लगकर किसी कार्य की पूर्णता, समाप्ति आदि भी सूचित करती है। जैसे—यह रखना, बचा रखना, माँग रखना, ले रखना आदि। (ख) कुछ अवस्थाओं में संज्ञाओं के साथ लगकर यह क्रिया कुछ मुहावरे भी बनाती है। जैसे—हाथ रखना। ऐसे अर्थों के लिए संज्ञाएँ देखें। (ग) कुछ अवस्थाओं में इस क्रिया के साथ कुछ और क्रियाएँ भी संयो० क्रि० के रूप में लगती हैं। जैसे—रख छोड़ना, रख देना, रख लेना। ऐसे अवसरों पर भी प्रायः क्रिया की पूर्णता या समाप्ति ही सूचित होती है। पुं० [अ० रखनः] १. छेद। सुराख। २. ऐब। दोष। ३. बाधा। रूकावट।
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रखनी  : स्त्री० [हिं० रखना+ई (प्रत्यय)] वह स्त्री जिससे विवाह संबंध न हुआ हो और जो यों ही घर में पत्नी के रूप में रख ली गई हो। रखेली। सुरैतिन। क्रि० प्र०—बनाना।—रखना।
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रख-रखाव  : पुं० [हिं० रखना+रखाना] १. रक्षा। हिफाजत। २. मर्यादा, परंपरा, व्यवहार सम्बन्ध आदि का उचित रूप में होनेवाला निर्वाह। उदाहरण—दुनिया है रख-रखाव की, इससे सँभल के चल।—कोई सायर। ३. दोनों पक्षों की बात रखने तथा उन्हें संतुष्ट करने की क्रिया या भाव। ४. पालन-पोषण। रखल
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रखला  : पुं० =रहकला। पुं० [हिं० रहँकला] मध्य युग में तोप, आदि लाद कर ले चलने की छोटी गाड़ी। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रखवाई  : स्त्री० [हिं० रखना, या रखाना] १. खेतों की रखवाली। चौकीदारी। २. रखवाली करने का काम, भाव या मजदूरी। ३. ब्रिटिश शासन में वह कर जो गाँवों से, उनमें चौकीदार रखने के बदले में लिया जाता था।
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रखवाना  : स० [हिं० रखना का प्रेर] १. रखने की क्रिया दूसरे से कराना। २. किसी को कुछ रखने अर्थात् निकालकर दे देने या सौंपने में प्रवृत्त या विवश करना। ३. दे० ‘रखाना’।
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रखवार  : पुं० =रखवाला। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रखवारी  : स्त्री०=रखवाली। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रखवाला  : पुं० [हिं० रखना+वाला (प्रत्यय)] [भाव० रखवाली] १. वह जो किसी की या दूसरों की रक्षा करता हो। २. पहरा देनेवाला चौकीदार।
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रखवाली  : स्त्री० [हिं० रखना+वाली (प्रत्यय)] १. रखनेवाले का काम। रक्षा करने की क्रिया या भाव। हिफाजत। २. चौकीदारी। पहरेदारी।
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रखशी  : स्त्री० [देश] एक प्रकार की नेपाली शराब। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रखा  : स्त्री० [हिं० रखना] गोचर भूमि। चरी।
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रखाई  : स्त्री० [हिं० रखना+आई (प्रत्यय)] १. रक्षा करने की क्रिया या भाव। रखवाली। २. रखवाली करने के बदले में मिलनेवाला पारिश्रमिक।
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रखान  : स्त्री० [हिं० रखना] चराई की भूमि। चरी। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रखाना  : स० [हिं० रखना का प्रे०] रखने की क्रिया दूसरे से कराना। दूसरों को कुछ रखने में प्रवृत या विवश करना। अ० रखवाली या हिफाजत करना। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रखिया  : वि० [हिं० रखना+इया (प्रत्यय)] रखनेवाला। पुं० १. गाँव के समीप का वह पेड़ जो पूजनार्थ रक्षित रहता है। २. रक्षक। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रखियाना  : स० [हिं० राखी+इयाना (प्रत्यय)] १. राखी लगाना। २. बरतन आदि राखी से रगड़ कर माँजना और साफ करना।
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रखी  : पुं० =ऋषि। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रखीराज  : पुं० =ऋषिराज। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रखेड़िया  : पुं० [हिं० राख+एड़िया (प्रत्यय)] एक प्रकार के साधु जो शरीर पर भस्म लगाये रहते हैं। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रखेली  : स्त्री० [हिं० रखना+एली (प्रत्यय)] बिना विवाह किए ही घर में पत्नी के रूप में रखी हुई स्त्री। रखनी सुरैतिन।
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रखैया  : वि० [हिं० रखना+ऐया (प्रत्यय)] १. रखनेवाला। २. रक्षा करनेवाला। रक्षक। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रखैल  : स्त्री०=रखेली। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रखौड़ी  : स्त्री० [हिं० राखी=रक्षा] रक्षासूत्र। राखी।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रखौत  : गोचर भूमि। चरी।
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रखौना  : पुं० =रखौंत।
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रखौनी  : स्त्री०=राखी। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रग  : स्त्री० [फा०] १. शरीर की नस या नाड़ी। पद—रग-पट्ठा, रग-रेशा। मुहावरा—रग उतरना=(क) क्रोध, हठ आदि दूर होना। (ख) आँत उतरना (रोग)। रग चढ़ना=मन में क्रोध, हठ आदि का आवेश होना। (किसी से) रग दबना=ऐसी स्थिति में होना कि विवश होकर किसी के दबाव या प्रभाव में रहना पड़े। जैसे—हम्हीं से उसकी रग दबती है, तुम्हें तो वह कुछ समझता ही नहीं। रग फड़कना=किसी आनेवाली आपत्ति की पहले से ही आशंका होना। माथा ठनकना। रग रग फड़कना=शरीर में बहुत अधिक आवेश, उत्साह, चचंलता आदि के लक्षण प्रकट होना। रग रग में=सारे शरीर के सभी भागों में। सर्वांग में। २. जिद या हठ से जो शरीर की किसी रग के विकार का परिणाम माना जाता है। ३. पत्तों आदि में दिखाई पड़नेवाली नसें।
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रगंड  : पुं० [सं० गंड] हाथी का कपोल (डिंगल)।
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रगड़  : स्त्री० [हिं० रगड़ना] १. रगड़ने की क्रिया या भाव। २. रगड़े जाने की अवस्था या भाव। ३. वह चिन्ह जो किसी चीज से रगड़े जाने पर लक्षित होता है। ४. किसी काम के लिए की जानेवाली कड़ी मेहनत और दौड़-धूप। ५. झगड़ा। तकरार। ६. धक्का (कहार)।
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रगड़ना  : स० [सं० घर्षण] १. किसी चीज के तल पर किसी दूसरी चीज का तल बार-बार दबाते हुए चलाना। जैसे—जमीन पर एड़ी रगड़ना। २. दो तलों के बीच में रखी हुई वस्तु टुकड़े-टुकड़े या चूर-चूर करना अथवा पीसना। जैसे—सिल बट्टे से मसाला या भाँग रगड़ना। ३. निरंतर परिश्रमपूर्वक कोई काम करते रहना। जैसे—सारा दिन कलम रगड़ते बीतता है। ४. किसी काम या बात का निरंतर परिश्रम पूर्वक अभ्यास करना। जैसे—जब इसी तरह कुछ दिनों तक रगड़ते रहोगे तो इस काम में चल निकलोगे। ५. किसी को कष्ट देते हुए या दबाते हुए बहुत तंग या परेशान करना। जैसे—इस मुकदमें में तुमने उन्हें खूब रगड़ा। ६. दंड आदि के संबंध में कठोरतापूर्वक आदेश देना। जैसे—अदालत ने उन्हें दो बरस के लिए रगड़ दिया। ७. किसी के साथ काम-वासना की तृप्ति मात्र के लिए (प्रेमपूर्वक नहीं) प्रसंग या संभोग करना (बाजारू)। संयो० क्रि०—डालना-देना। अ० बहुत मेहनत करना। अत्यंत श्रम करना।
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रगड़वाना  : स० [हिं० रगड़ना का प्रेर० रूप] रगड़ने का काम दूसरे से करना। दूसरे को रगड़ने में प्रवृत्त करना।
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रगड़ा  : पुं० [हिं० रगड़ना] १. रगड़ने की क्रिया या भाव। घर्षण। रगड़। २. वह आघात जो किसी चीज पर उसे रगड़ने के उद्देश्य से किया जाता है। ३. किसी चीज की रगड़ लगने पर होनेवाला आघात। ४. एक बार में होनेवाली रगड़ाई। ५. निरन्तर किया जानेवाला बहुत अधिक परिश्रम। काफी और पूरी-मेहनत। ६. बराबर कुछ दिनों तक चलता रहनेवाला झगड़ा या वैर-विरोध। पद—रगड़ा-झगड़ा=बहुत समय तक चलनेवाला झगड़ा या लड़ाई।
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रगड़ान  : स्त्री० [हिं० रगड़ना+आन (प्रत्यय)] रगड़ने या रगड़े जाने की क्रिया या भाव। रगड़ा। क्रि० प्र०—खाना।—देना।—लगाना।
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रगड़ी  : वि० [हिं० रगड़ा+ई (प्रत्यय)] रगड़ा अर्थात् लड़ाई-झगड़ा या हुज्जत करनेवाला। झगड़ालू। हुज्जती।
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रगण  : पुं० [सं० ष० त०] छंद-शास्त्र में ऐसे तीन वर्णों का गण या समूह जिसका पहला वर्ण गुरु, दूसरा लघु और तीसरा फिर गुरु होता है (ऽ।ऽ)।
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रगत  : पुं० =रक्त। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रगदना  : स०=रगेदना (दे०)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रगदल  : वि० [हिं०] कुबड़ा। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रग-पट्ठा  : पुं० [फा० रग+पिं० पट्ठा] १. शरीर के भीतरी भिन्न-भिन्न अंग, मुख्यतः रगें और मांस-पेशियाँ। २. किसी विषय की भीतरी और सूक्ष्म बातें। मुहावरा—(किसी के) रग पट्ठे से परिचित या वाकिफ होना=किसी के रंग-ढंग, शक्ति, स्वभाव आदि से परिचित होना। खूब पहचानना।
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रगपत  : पुं० =रघुपति। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रगबत  : स्त्री० [अ० रग्बत] १. इच्छा। कामना। चाह। २. किसी काम या बात की ओर होनेवाली प्रवृत्ति या रुचि। क्रि० प्र०—आना।—रखना।—होना।
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रगर  : स्त्री०=रगड़। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रगरा  : पुं० =रगड़ा। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रग-रेशा  : पुं० [फा० रग+रेशा] १. शरीर के अन्दर के अंग। २. पत्तियों की नसें। पद—रग रेशे में=सारे शरीर में। अंग-अंग में। जैसे—शरारत तो उसके रग-रेशे में भरी है। ३. किसी काम बात या वस्तु के अन्दर की गुप्त और सूक्ष्म बातें। जैसे—वह इस काम के रग-रेशे से वाकिफ है।
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रगवाना  : स० [हिं० रगाना का प्रेर, रूप] १. चुप कराना। २. शांत कराना। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रगा  : पुं० [देश] मोर। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रगाना  : अ० [देश] १. चुप होना। २. शांत होना। स० १. चुप कराना २. शांत कराना। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रगी  : स्त्री० [देश] १. एक प्रकार का मोटा अन्न। स्त्री०=रग्गी। वि० =रगीला। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रगीला  : पुं० [हिं० रग=जिद+ईला (प्रत्यय)] [स्त्री० रगीली] १. हठी। जिद्दी। दुराग्राही। २. दुष्ट। पाजी। वि० [हिं० रग] जिसमें रगें या नसें हो। रगों से युक्त। रगोंवाला।
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रगेद  : स्त्री० [हिं० रगेदना] दौड़ने या भागने की क्रिया।
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रगेदना  : स० [सं० खेट० हिं० खेदना] किसी को ढकेलते, धक्का देते या दौड़ते हुए दूर करना या हटाना। बल-प्रयोग करते हुए भागना। खदेड़ना। संयो० क्रि०—देना।
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रग्गा  : पुं० [देश] एक प्रकार का मोटा अन्न। रगी। पुं० =रग्गी। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रग्गी  : स्त्री० [?] वह धूप विशेषतः वर्षा ऋतु की कड़ी धूप जो पानी बरस जाने और बादल छँट जाने पर निकलती है। स्त्री०=रगी। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रघु  : पुं० [सं०√लंघ् (गति)+कु, नलोप, रत्व] १. सूर्यवंशी राजा दिलीप के पुत्र जो रामचन्द्र के परदादा और प्रसिद्ध रघुवंश के मूल पुरुष तथा संस्थापक थे। २. रघु के वंश में उत्पन्न कोई व्यक्ति।
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रघु-कुल  : पुं० [ष० त०] राजा रघु का वंश।
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रघुनंद  : पुं० [सं० रघु√नन्द (हर्ष)+णिच्+अच्] श्रीरामचन्द्र।
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रघुनंदन  : पुं० [सं० रघु√नन्द+णिच्+ल्यु-अन] श्रीरामचन्द्र।
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रघु-नाथ  : पुं० [ष० त०] श्रीरामचन्द्र।
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रघु-नायक  : पुं० [ष० त०] श्रीरामचन्द्र।
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रघु-पति  : पुं० [ष० त०] श्रीरामचन्द्र।
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रघुराइ  : पुं० =रघुराज (श्रीरामचन्द्र)। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रघुराज  : पुं० [ष० त०] श्रीरामचन्द्र।
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रघुराय  : =रघुराय।
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रघुरैया  : पुं० =रघुराय। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रघु-वंश  : पुं० [ष० त०] १. महाराज रघु का वंश या खानदान जिसमें दशरथ या रामचन्द्र जी उत्पन्न हुए थे। २. महाकवि कालिदास का रचा हुआ एक प्रसिद्ध महाकाव्य जिसमें राजा दिलीप की कथा और उनके वंशजों का वर्णन है।
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रघुवंश-कुमार  : पुं० [ष० त०] श्रीरामचन्द्र।
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रघुवंशी (शिन्)  : पुं० [सं० रघुवंश+इनि] १. वह जो रघु के वंश में उत्पन्न हुआ हो। २. क्षत्रियों की एक जाति या शाखा।
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रघु-वर  : पुं० [स० त०] श्रीरामचन्द्र।
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रघु-वीर  : पुं० [स० त०] श्रीरामचन्द्र।
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रघूत्तम  : पुं० [रघु-उत्तम, स० त०] श्रीरामचन्द्र।
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रघूद्वह  : पुं० [रघु-उद्दह, ष० त०] श्रीरामचन्द्र।
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रधौती  : स्त्री० [देश०] बड़े व्यापारियों या आढ़तियों की ओर से छोटे दूकानदारों या व्यापारियों को भेजा जानेवाला वह पत्र जिसमें चीजों के भाव लिखे होते हैं। दर या भाव का परिपत्र। (रेट सर्क्यूलर)
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रघ्रन्ती  : पुं० [डिं०] संतोष। सब्र।
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रचक  : पुं० [सं०√रच् (रचना)+णिच्+युच-अक] रचयिता। वि० =रंचक। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रचना  : स्त्री० [सं०√रच्+णिच्+युच्—अन+टाप्] १. कोई चीज रचने अर्थात् बनाने की क्रिया या भाव। जैसे—फूलों से होनेवाली मालाओं की रचना। निर्माण। २. किसी चीज के बनाये जाने का ढंग या प्रकार जो उसका स्वरूप निश्चित करता है। बनावट। ३. बनाकर तैयार की हुई चीज। कृति। जैसे—किसी कवि या लेखक की नई रचना। ४. कोई चीज कौशलपूर्वक और सुन्दर रूप में बनने की क्रिया या भाव। जैसे—अनेक प्रकार की केश-रचनाएँ। ५. स्थापित करने की क्रिया। स्थापना। ६. उद्यमपूर्वक किया हुआ काम। ७. ऐसा गद्य या पद्य जिसमें कोई विशेष कौशल या चमत्कार हो। ८. पुराणानुसार विश्वकर्मा की पत्नी का नाम। सं० [सं० रचन] १. कोई चीज हाथ से बनाकर तैयार करना। बनाना। सिरजना। २. किसी बात या विधान या स्वरूप स्थिर करना। ३. किसी प्रकार की कृति प्रस्तुत करना। जैसे—कविता या पुस्तक रचना। ४. उत्पन्न करना। पैदा करना। ५. किसी काम या बात का अनुष्ठान करना। ठानना। ६. अच्छी तरह ध्यान देते हुए कोई काम या उपाय करना या युक्ति लगाना। पद—रचि रचि=बहुत ही अच्छी तरह और ध्यान तथा युक्ति-पूर्वक। ७. किसी प्रकार की काल्पनिक कृति, रूप या सृष्टि खड़ी करना। ८. अच्छी तरह संवारना-सजाना। श्रृंगार करना। ९. उचित क्रम से चीजें रखना या लगाना। अ० [सं० रंजन] १. किसी के प्रेम में फँसना। किसी पर अनुरक्त होना। २. रंगों से युक्त होना। रँगा जाना। ३. किसी चीज का अच्छी तरह और सुन्दर रूप में बनाकर प्रस्तुत होना। ४. आकर्षण और सुन्दर जान पड़ना। फबना। जैसे—उसके मुँह में पान और हाथ-पैरों में मेंहदी अच्छी रचती हैं। स०१. रँगों से युक्त करना। रँगना। २. किसी के साथ अनुराग या प्रेम का संबंध स्थापित करना। जैसे—बैरी से बच सज्जन से रच।—कहा०। वि० [स्त्री० रचनी] जो सहज में रच सकें, अर्थात् अच्छा रंग या रूप ला सके। जैसे—वाह यह कैसी अच्छी मेंहदी है।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रचना-तंत्र  : पुं० [ष० त०] १. किसी कलात्मक कृति का वह अंग या ढंग जो उसके रचना-कौशल से संबंध रखता हो और जो सूत्रों के रूप में बद्ध हो सकता हो। रचना का कलात्मक और कौशलपूर्ण प्रकार। तकनीक (टेकनिक) २. उक्त की अवस्था या भाव। प्राविधिकता (टेक्निकैलटी)।
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रचना-तंत्री  : वि० [सं० रचनातंत्रीय] रचना-तंत्र से संबंध रखनेवाला (टेक्निकल) जैसे—किसी कृति का रचनातंत्री ज्ञान।
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रचयिता (तृ)  : वि० [सं०√रच्+णिन्+तृच्] रचना करने या रचनेवाला। बनानेवाला।
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रचवाना  : स० [हिं० रचना का प्रेर० रूप] १. दूसरे को रचना करने में प्रवृत्त करना २. हाथ-पैर में मेंहदी या महावर लगवाना। ३. अनुरक्त करना। ४. सुन्दर रूपरंग दिलवाना।
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रचाना  : स० [सं० रचना] १. अनुष्ठान या आयोजन करना। जैसे—ब्याह, रचाना, यज्ञ रचाना। २. दे० रचवाना। अ० स०=रचना। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रचिक  : अव्य० [हिं० रंच] थोड़ा। अल्प। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रचित  : भू० कृ० [सं० रच्+णिच्+क्त] १. रचा अर्थात् बनाया हुआ। २. कृति आदि के रूप में प्रस्तुत किया हुआ।
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रची  : अव्य०=रचिक। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रच्छ  : पुं० =रक्ष। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रच्छक  : पुं० =रक्षक। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रच्छन  : पुं० =रक्षण। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रच्छस  : पुं० =राक्षस। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रच्छा  : स्त्री०=रक्षा। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रछया  : स्त्री०=रक्षा। उदाहरण—दान करै रछया मँझ मीराँ।—जायसी। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रज (स्)  : पुं० [सं०√रज् (राग्)+असुन्, नलोप] १. गर्द। धूल। २. गर्द या धूल के वे छोटे-छोटे कण जो धूप में इधर-उधर चलते हुए दिखाई देते हैं। ३. आठ परमाणुओं की एक पुरानी तौल या भाव। ४. फूलों का पराग। ५. जोता हुआ खेत। ६. आकाश। ७. जल। पानी। ८. भाप। वाष्प। ९. बादल। मेघ। १॰. भुवन। लोक। ११. स्वेतपापड़ा। १२. पाप। १३. अंधकार। अंधेरा। १४. मन में रहनेवाला अज्ञान, और उसके फल-स्वरूप उत्पन्न होनेवाले दूषित भाव। १५. एक प्रकार का पुराना बाजा जिसपर चमड़ा मढ़ा होता था। १६. पुराणानुसार एक ऋषि जो वशिष्ठ के पुत्र कहे गये हैं। १७. धार्मिक क्षेत्रों में प्रकृति के तीन गुणों में से दूसरा जिसके कारण जीवों में भोगविलास करने तथा बल-वैभव के प्रदर्शन की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है। रजोगुण (अन्य दो गुण सत्त्व और तम हैं। १८. वह दूषित रक्त जो युवती तथा प्रौढ़ा स्त्रियों और स्तनपायी मादा जंतुओं की योनि से प्रति मास तीन चार दिनों तक बराबर निकलता रहता है। आर्तव। ऋतु। कुसुम। १९. स्कंद की एक सेना का नाम। २॰. केसर। वि० [हिं० राजा] हिं० ‘राजा’ का वह संक्षिप्त रूप जो उसे यौगिक पदों के आरंभ में लगने पर प्राप्त होता है। जैसे—रजवाड़ा। स्त्री=रजनी (रात)। पुं० १. =रजत (चाँदी) २. रजक (धोबी)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रजअत  : स्त्री० [अ० रजअत] १. वापस जाना। लौटना। प्रत्यागमन। २. जिस स्त्री को तलाक दिया गया हो, उसे फिर से अपनी पत्नी बनाना। (मुसल०)
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रजक  : पुं० [सं०√रंज्+ष्वुन्—अक, नलोप] [स्त्री० रजकी] धोबी।
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रजगज  : पुं० [हिं० रज=राजा+गज, अनु०] राजसी ठाठ-बाट।
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रजगीर  : पुं० [देश] कूटू (अन्न) फफरा। पुं० =राजगीर। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रजगुण  : पुं० दे० ‘रजोगुण’।
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रज-तंत  : पुं० [सं० राजतत्त्व] शूरता। वीरता।
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रजत  : पुं० [सं०√रंज्+अतच्, न-लोप] १. चांदी। रूपा। २. सोना। स्वर्ण। ३. हाथी-दाँत। ४. गले में पहनने का हार। ५. रक्त। लहू। ६. पुराणानुसार शाकद्वीप के अस्ताचल का नाम। वि० १. चांदी के रंग का। उज्जवल। शुभ्र। २. चाँदी का बना हुआ।
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रजत-जयंती  : स्त्री० [मध्य० स०] किसी व्यक्ति अथवा संस्था की २५वीं वर्ष-गाँठ पर मनाई जानेवाली जयंती। (सिलवर जुबिली)
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रजत-द्युति  : पुं० [ब० स०] हनुमान।
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रजत-पट  : पुं० [उपमित स०] वह परदा जिसपर सिनेमा घर में चित्र दिखलाये जाते हैं। (सिलवर स्क्रीन)
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रजत-प्रस्थ  : पुं० [ब० स०] कैलाश पर्वत।
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रजतमान  : पुं० [ष० त०] अर्थशास्त्र में वह स्थिति जिसमें कोई देश अपनी मुद्रा की इकाई या मात्रक का अर्घ चाँदी की एक निश्चित तौल के अर्घ के बराबर रखता है। (सिलवर स्टैन्डर्ड)
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रजत-मानक  : पुं० =रजत-मान।
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रजताई  : स्त्री० [हिं० रजत+आई (प्रत्यय)] शुभ्रता। सफेदी। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रजताकर  : पुं० [रजत-आकर, ष० त०] चाँदी की खान।
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रजताचल  : पुं० [रजत-अचल, मध्य० स०] १. चाँदी का पहाड़। २. चाँदी के टुकड़ों या आभूषणों का वह ढेर या ढेरी जो दान की जाती है। महादान का भेद। ३. कैलाश पर्वत।
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रजताद्रि  : पुं० [रजत-अद्रि, मध्य० स०] रजताचल। (दे०)
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रजतोपम  : पुं० [रजत-उपमा, ब० स०] रूपामाखी। रूपा-मक्खी।
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रजधानी  : स्त्री०=राजधानी।
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रजन  : स्त्री० [अं० रेजिन] राल नामक गोंद दे० (राल)। स्त्री० [हिं० रजना] रजने की अवस्था, क्रिया या भाव।
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रजना  : अं० [सं० रजन] १. रँग से युक्त होना। रँग जाना। २. अच्छी तरह तृप्त होना। जैसे—खा-पीकर रजना। स० रंग से युक्त करना। रँगना। स्त्री० [सं० रंजन] संगीत में एक प्रकार की मूर्च्छना जिसका स्वर ग्राम इस प्रकार है-नि, स, रे, ग, म, प, ध। नि, स० रे, ग, म, प, ध, नि। स, रे, ग, म, प, ध, नि।
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रजनी  : स्त्री० [सं०√रञ्ज्+कनि+ङीष्] १. रात। रात्रि। निशा। २. हलदी। ३. जंतुका लता। ४. नीली नामक पौधा। ५. दारुहलदी। ६. लाक्षा। लाख। ७. एक नदी। (पुराण)
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रजनीकर  : पुं० [सं० रंजनी√कृ (करना)+ट] चंद्रमा।
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रजनी-गंधा  : स्त्री० [ब० स० टाप्] १. एक प्रसिद्ध पौधा जिसके फूल रात के समय फूलते हैं। २. उक्त पौधे का फूल।
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रजनीकर  : पुं० [सं० रजनी√चर् (गति)+ट] १. राक्षस। २. चंद्रमा। वि० रात के समय निकल कर घूमने-फिरने या विचरण करने वाला।
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रजनी-जल  : पुं० [सुप्सुपा० स०] १. ओस। २. कोहरा।
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रजनी-पति  : पुं० [ष० त०] चन्द्रमा।
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रजनीमुख  : पुं० [ष० त०] संध्या। रात होने से कुछ पहले का समय। सूर्यास्त के चार दंड बाद का समय। शाम।
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रजनीश  : पुं० [रजनी-ईश, ष० त०] चन्द्रमा।
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रजपूत  : पुं० =राजपूत। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रजपूती  : स्त्री० [हिं० राजपूत+ई (प्रत्यय)] १. राजपूत होने की अवस्था, धर्म या भाव। २. राजपूत का कोई कार्य अथवा उसके जैसा कार्य। ३. बहादुरी। वीरता। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रजब  : पुं० [अ०] अरबी साल का सातवाँ महीना।
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रजबली  : पुं० [सं० राजा+बली] राजा। (डि०)
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रजबहा  : पुं० [सं० राज राजा=बडा़+हिं० बहना] किसी बड़ी नदी या नहर से निकाला हुआ नाला या छोटी नगर, जिससे और भी अनेक छोटे-छोटे नाले और नालियाँ निकलती है।
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रजबार  : पुं० =राजद्वार। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रजल-बाह  : पुं० [सं० जलवाह] मेघ बादल (डि०)।
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रजवंती  : वि० [सं० रजोवती] रजस्वला।
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रजवट  : स्त्री० [हिं० राज+वट (प्रत्यय)] १. क्षत्रियत्व। २. बहादुरी। वीरता।
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रजवती  : स्त्री०=रजवंती (रजस्वली)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रजवाड़ा  : पुं० [हि० राज्य+बाड़ा] १. मध्य-युग तथा ब्रिटिश भारत में देशी रियाअत। २. रियासत का मालिक राजा।
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रजवार  : पुं० =राजद्वार। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रज़वी  : वि० [अ० रिजवी] इमाम मूसा अली रजा से संबंध रखनेवाला। पुं० वह जो इमान का वंशज हो।
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रजस  : स्त्री०=‘रज’।
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रजस्वला  : वि० स्त्री० [सं० रजस्+क्लच्-टाप्] १. (स्त्री०) जिसका रज प्रवाहित हो रहा हो। रजवन्ती। ऋतुमती। २. (बरसाती नदी) जिसका पानी बहुत गंदला और मट-मैला हो गया हो।
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रजा  : स्त्री० [अ० रिजा] १. इच्छा। मरजी। २. अनुमति। आज्ञा। ३. किसी की अनुमति से मिलनेवाली छुट्टी रुखसत। ४. मंजूरी। स्वीकृति। ५. प्रसन्नता। क्रि० प्र० देना।—पाना।—मिलना। लेना। स्त्री० [अ०] आशा।
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रजाइ  : स्त्री०=रजा। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रजाइस  : स्त्री० [अ० रजा+आइस (हिं० प्रत्यय)] १. आज्ञा। हुकुम। २. दे० ‘रजा’। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रजाई  : स्त्री० [सं० रजक=कपड़ा] एक प्रकार का रुईदार ओढ़ना। हलका लिहाफ। स्त्री० [हिं० राजा+आई (प्रत्यय)] राजा होने की अवस्था या भाव। राजापन। स्त्री०=रजा (अनुमति या आज्ञा)। उदाहरण—चले सीस धरि राम रजाई।—तुलसी। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रजाकार  : पुं० [अ० रिजाकार] स्वयं-सेवक।
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रजाना  : पुं० [हिं० रजना का स०] १. राज-सुख का भोग करना। २. बहुत अधिक सुख देना। ३. अच्छी तरह तृप्त या सन्तुष्ट करना। ४. पेट भरकर खिलाना।
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रजामंद  : वि० [अ० रिज़ा+फा० बंद] [भाव० रजामंदी] जो किसी बात पर राजी या सहमत हो।
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रजामंदी  : स्त्री० [अ० रिजा+फा० मंदी] रजामंद अर्थात् राजी या सहमत होने की अवस्था या भाव। सहमति।
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रजाय  : स्त्री० [प्रा० रजाएस] राजा की आज्ञा। स्त्री०=रजा। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रजायस (स्)  : स्त्री० [फा० रजाएस] १. राजा की आज्ञा २. आज्ञा। हुकुम। ३. अनुमति।
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रजिया  : स्त्री० [देश] १. अनाज नापने का एक मान जो प्रायः डेढ़ सेर का होता है। २. उक्त मान से नापने का काठ या बरतन।
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रजिस्टर  : पुं० [अं०] अँगरेजी ढंग की बही या वह किताब जिसमें किसी मद का आय-व्यय अथवा किसी विषय का विस्तृत विवरण, सिलसिलेवार या खानेवार लिखा जाता है। पंजी।
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रजिस्टरी  : स्त्री० [अं०] १. किसी लिखित प्रतिज्ञापत्र को कानून के अनुसार सरकारी रजिस्टरों में दर्ज कराने का काम। पंजीयन। २. डाक से पत्र भेजने का एक प्रकार जिसमें कुछ अधिक महसूल देकर भेजे जानेवाला पत्र का तौल, पता आदि डाकखाने के रजिस्टर में चढ़वाया जाता है।
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रजिस्टर्ड  : वि० [अं०] रजिस्टरी किया हुआ। पंजीकृत।
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रजिस्ट्रार  : पुं० [अं०] १. विधिक लेख्यों को राजकीय पंजियों में निबंधित करनेवाला अधिकारी। २. विश्वविद्यालय का वह अधिकारी जिसकी देखरेख में कार्यालय संबंधी सब कार्य होते हैं।
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रजिस्ट्री  : स्त्री०=रजिस्ट्री।
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रजिस्ट्रेशन  : पुं० [अं०] रजिस्टर में दर्ज करना, कराना या होना।
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रजील  : वि० [अं०] अधम। कमीना। नीच।
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रजु  : स्त्री०=रज्जु। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रजोकुल  : पुं० [सं० राजकुल] राजवंश। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रजोगुण  : पुं० [सं० रजस्-गुण, मयू० स०] प्रकृति के तीन गुणों में से दूसरा गुण (सत्त्व और तम से भिन्न) जिससे जीवधारियों में भोग-विलास तथा बल-वैभव के प्रदर्शन की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है राजस दे० ‘गुण’।
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रजोदर्शन  : पुं० [सं० रजस्-दर्शन, ष० त०] स्त्रियों का रजस्वला होना।
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रजोधर्म  : पुं० [सं० रजस्-धर्म, ष० त०] स्त्रियों का मासिक धर्म।
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रजोनिवृत्ति  : स्त्री० [सं० रजस्-निवृत्ति] स्त्रियों की वह अवस्था या दशा जिसमें उनका मासिक रज निकलना सदा के लिए बंद हो जाता है। (मेनीपांज)।
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रज्जाक  : वि० [अं०] १. रिजक अर्थात् रोजी देनेवाला। अन्नदाता। २. खाना खिलानेवाला। पेट भरनेवाला। पुं० ईश्वर।
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रज्जु  : स्त्री० [सं०√सज् (रचना)+उ, नि, सिद्धि०] १. डोरी। रस्सी। २. घोड़े की लगाम। बागडोर० ३. स्त्रियों की चोटी बाँधने की डोरी।
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रज्जुमार्ग  : पुं० [सं०] ऊँची-नीची पंकिल या पहाड़ी जगहों, बड़े-बड़े कल-कारखानों आदि में एक स्थान से दूसरे स्थान तक चीजें पहुँचाने के लिए बड़े-बड़े खंभों में रस्से विशेषतः लोहे के छोटे रस्से बाँधकर बनाया जानेवाला मार्ग। (रोप-बे)
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रज्जु-सर्प-न्याय  : पुं० [सं० रज्जु-सर्प, सुप्सुपा० स० रज्जुसर्प-न्याय, ष० त०] रस्सी को अच्छी तरह न देख सकने के कारण भूल से साँप समझ लेने अथवा इसी प्रकार और किसी भ्रम में पड़ने की स्थिति या न्याय।
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रज्म  : स्त्री० [अ० रज्म] युद्ध। संग्राम। लड़ाई।
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रझना  : पुं० [सं० रंधन वा रंजन] रँगरेजों का वह पात्र, जिसमें वे रँगे हुए कपड़े का रंग निचोड़ते हैं।
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रटंत  : स्त्री० [चि० रटना+अंत (प्रत्यय)] रटने की क्रिया या भाव। रटाई।
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रटंती  : स्त्री० [सं०√रट् (रटना)+झच्-अन्त, +ङीष्, ] माघ कृष्ण चतुर्दशी।
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रट  : स्त्री० [हिं० रट] रटने की अवस्था, क्रिया या भाव। क्रि० प्र०—मचाना।—लगाना।
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रटन  : स्त्री० [सं०√रट् (रटाना)+ल्युट-अन] बार-बार किसी नाम, शब्द आदि का उच्चारण करने अर्थात् रटने की क्रिया या भाव। रट। रटाई। पुं० कहना। बोलना।
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रटना  : [सं० रटन] कंठस्थ करने तथा स्मृति-पथ में लाने के लिए किसी पद, वाक्य आदि का बार-बार जोर-जोर से तथा जल्दी-जल्दी उच्चारण करना।
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रटति  : वि० [सं०√रट्+क्त] १. रटा हुआ। २. जो रटा जा रहा हो। उदाहरण—अगणित कंठ रटित वन्दे मातरम् मंत्र से।—पंत।
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रठ  : वि० [?] रूखा। शुष्क।
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रड़क  : स्त्री० [हिं० रड़कना] १. किसी चीज के चुभने तथा पीड़ा देने की अवस्था या भाव। जैसे—आँख में होनेवाली रड़क। २. हल्का दर्द या पीड़ा। कसक। जैसे—घाव में कुछ रड़क हो रही है।
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रड़कन  : स्त्री०=रड़क। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रड़कना  : अ० [अं०] १. हल्का दरद होना। २. शरीर में किसी गड़ी या चुभी हुई चीज की कष्टदायक अनुभूति होना। जैसे—आँख में पड़ी हुई धूल या उसके कण का रड़कना। स० धक्का देना। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रड़का  : पुं० [?] झाड़ू। स्त्री०=रड़क। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रड़काना  : स० [?] धक्का देकर निकालना या हटाना।
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रडार  : पुं० =रैडर।
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रढ़ना  : स०=रटना। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रढ़िया  : स्त्री० [देश या राढ़ देश०] एक प्रकार की निम्न कोटि की देशी कपास। वि० [हिं० रार] जिद्दी। हठी। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रण  : पुं० [सं०√रण् (शब्द)+अप्] १. लड़ाई। युद्ध। जंग। पद—रण-क्षेत्र, रण-भूमि, रण-स्थल। २. रमण। ३. आवाज। शब्द। ४. गति। चाल। ५. दुंबा नामक भेड़। पुं० [सं० अरण्य] जंगल। वन। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रण-क्षेत्र  : पुं० [सं० ष० त०] युद्धभूमि। लड़ाई का मैदान।
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रण-चंडी  : स्त्री० [सं० मध्य० स०] रण-क्षेत्र में मार-काट करनेवाली देवी।
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रण-छोड़  : पुं० [सं० रण+हिं० छोड़ना] श्रीकृष्ण का एक नाम जो इस कारण पड़ा था कि वे जरासन्ध के आक्रमण के समय व्रज छोड़कर द्वारका चले गये थे।
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रणखेत  : पुं० =रणक्षेत्र। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रणत्कार  : पुं० [सं०√रण्+शतृ=रणत्-कार, ष० त०] १. झनझनाहट। २. गुंजन (मधु-मक्खी का)।
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रणधीर  : पुं० [सं० स० त०] युद्ध में धैर्यपूर्वक लड़नेवाला अर्थात् बहुत बड़ा योद्धा।
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रणन  : पुं० [सं०√रण्+ल्युट-अन] शब्द करना। बजना।
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रण-नाद  : पुं० [ष० त०] युद्ध के समय होनेवाली योद्धाओं की गरज।
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रण-प्रिय  : पुं० [ब० स०] १. विष्णु २. बाज पक्षी। ३. उशीर। खस।
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रण-भूमि  : स्त्री० [ष० त०] लड़ाई का मैदान।
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रणमंडा  : स्त्री० [सं० रण-मंडन] पृथ्वी (डि०)
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रण-मत्त  : पुं० [स० त०] हाथी। वि० जो युद्ध करने के लिए उतावला हो रहा हो।
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रण-रंग  : पुं० [सं० रण-रण+कन्] १. व्यग्रता। घबराहट। व्याकुलता। २. पछतावा। पश्चात्ताप।
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रण-रणक  : पुं० [सं० रणरण+कन्] १. कामदेव का एक नाम। २. प्रबल कामना। ३. घबराहट। विकलता।
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रणरोज (स्)  : पुं० [सं० अरण्य-रोदन] वन में (जहाँ कोई सुननेवाला न हो) बैठकर व्यर्थ रोना जिसका कोई फल नहीं होता। अरण्य-रोदन।
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रण-लक्ष्मी  : स्त्री० [मध्य० स०] युद्ध में विजय दिलानेवाली एक देवी। विजय-लक्ष्मी।
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रण-वाद्य  : पुं० [ष० त०] युद्ध का बाजा।
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रण-वीर  : पुं० [स० त०] बहुत बड़ा योद्धा।
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रण-वृत्ति  : पुं० [ब० स०] योद्धा। वह जिसकी वृत्ति लड़ते रहने की हो। सैनिक। योद्धा।
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रणसिंघा  : पुं० [सं० रण+हिं० सिंघा] मध्ययुग में, युद्ध के समय बजाया जानेवाला नरसिंघा या तुरही नाम का बाजा।
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रणसिंहा  : पुं० =रणसिंघा।
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रण-स्तंभ  : पुं० [ष० त०] वह स्तंभ जो किसी रण में विजय प्राप्त करने के स्मारक में बना हो। विजय का स्मारक।
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रण-स्थल  : पुं० [ष० त०] लड़ाई का मैदान।
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रण-स्वामी (मिन्)  : पुं० [ष० त०] १. युद्ध का प्रधान संचालक या सेनापति। २. शिव। महादेव।
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रण-हंस  : पुं० [मध्य० स०] एक प्रकार का वर्णवृत्त का नाम जिसके प्रत्येक चरण में सगण, जगण, भगण और रगण होते हैं।
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रणांगण  : पुं० [रण-अंगण, ष० त०] लड़ाई का मैदान।
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रणाजिर  : पुं० [रण-अजिर, ष० त०] लड़ाई का मैदान।
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रणि  : स्त्री० [सं० रजनी] रात्रि। रात। (डिं०) (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रणेचर  : पुं० [सं० रणे√चर् (गति)+अच्, अलुक, स०] विष्णु।
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रणेश  : पुं० [रण-ईश, ष० त०] १. शिव। विष्णु।
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रणोत्कट  : पुं० [रण-उत्कट, स०त०] कार्तिकेय का एक अनुचर। वि० =रणोन्मत्त।
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रत  : पुं० [सं०√रम् (क्रीड़ा)+क्त] १. मैथुन। प्रसंग। २. भग। योनि। ३. लिंग। ४. प्रीति। प्रेम वि० १. जो किसी काम में पूरे मनोयोग से लगा हुआ हो। २. प्रेम में पड़ा हुआ। आसक्त। वि० पुं० +रक्त। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रत-कील  : पुं० [सं० रत√कील् (बाँधना)+क, उप० स०] कुत्ता।
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रत-गुरु  : पुं० [स०त०] स्त्री का पति। खसम। शौहर।
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रत-जगा  : पुं० [हिं० रात+जागना] १. रात में होनेवाला जागरण। २. ऐसा आनन्दोत्सव जिसमें लोग रात भर जागते हैं। ३. एक त्योहार जो पूर्वी संयुक्त प्रान्त तथा बिहार आदि में भाद्रपद कृष्ण की रात हो होता है और जिसमें स्त्रियाँ रात भर जागकर कजली गाती और नाचती हैं।
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रतन  : पुं० =रत्न। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रतन-जोत  : स्त्री० [सं० रत्न-ज्योति] १. एक प्रकार की मणि। २. एक प्रकार की सुगंधित लकड़ी जिसकी छाल से लाल रंग तैयार किया जाता या तेल आदि रँगा जाता है। ३. बड़ी दंती।
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रतनाकर  : पुं० १. दे० ‘रत्नाकर’। २. दे० ‘रतन-जोत’।
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रतनागर  : पुं० =रत्नाकर। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रतनागरभ  : स्त्री० [सं० रत्नगर्भा] पृथ्वी। भूमि। (डि०)
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रतनार  : वि० =रतनारा। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रतनारा  : वि० [सं० रक्त, प्रा० रत्त अथवा रत्न=मानिक+आर (प्रत्यय)] लाल रंग का। सुर्ख।
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रतनारी  : पुं० [हिं० रतनार+ई (प्रत्यय)] एक प्रकार का धान। स्त्री० लाली। सुर्खी। वि०=रतनार।
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रतनारीच  : पुं० [सं० स० त०] १. कामदेव। २. कामुक और लंपट व्यक्ति।
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रतनालिया  : वि० =रतनारा। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रतनावली  : स्त्री०=रत्नावली।
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रत-निधि  : पुं० [ब० स०] खंजन पक्षी। ममोला।
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रतबंध  : पुं० =रतिबंध।
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रत-मुँहा  : वि० [हिं० रत=राजा+मुँह+आँ (प्रत्यय)] [स्त्री० रतमुँही] लाल मुँहवाला। पुं० बंदर। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रतल  : स्त्री० [अ० रत्ल] १. शराब का प्याला। चषक। २. एक पौंड का बटखरा। ३. तौल में पौंड या कोई चीज।
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रतवाँस  : पुं० [हिं० रात+वाँस (प्रत्यय] हाथियों, घोड़ों आदि का वह चारा जो उन्हें रात के समय दिया जाता है। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रतवाई  : स्त्री० [देश] १. नई ईख का रस पहले-पहल पेरना। २. उक्त रस को लोगों में बाँटने की क्रिया या भाव। स्त्री० [हिं० रात] १. मजदूरों का रात-भर काम करना। २. मजदूरों को रात के समय काम करने पर मिलनेवाला पारिश्रमिक। ३. मेवाड़ का एक प्रकार का ग्राम गीत। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रतवाही  : स्त्री०=रतवाई।
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रतब्रण  : पुं० [सं० ब० स०] कुत्ता।
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रतशायी (यिन्)  : पुं० [सं० रत√शो (क्षीण करना)+णिनि] कुत्ता।
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रतहिंडक  : पुं० [सं० च०त०] १. वह जो स्त्रियाँ चुराता हो। २. कामुक और लंपक व्यक्ति।
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रता  : स्त्री० [देश] भुकड़ी। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रताना  : अ० [सं० रात+हिं० आना (प्रत्यय)] रत होना। स० रत करना। अ० [हिं० रत+आना (प्रत्यय)] लाल होना। स० लाल करना।
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रतायनी  : स्त्री० [सं० रत-अयन, ब० स० ङीष्] वेश्या।
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रतालू  : पुं० [सं० रक्तालु] १. पिंडालू नामक कंद जिसकी तरकारी बनाते हैं। २. बराही कन्द। गेंठी।
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रति  : स्त्री० [सं०√रम्+क्तिन्] १. किसी काम, चीज, बात या व्यक्ति में रत होने की अवस्था या भाव। २. उक्त अवस्था में मिलनेवाला आनंद या होनेवाली तृप्ति। ३. विशेषतः मैथुन आदि में होनेवाली तृप्ति या मिलनेवाला आनंद। साहित्य में इसे श्रृंगार रस का स्थायी भाव माना गया है। ४. मैथुन। संभोग। ५. प्रीति। प्रेम। ६. छवि। शोभा। ७. सौभाग्य। ८. गुप्त-भेद। रहस्य। ९. कामदेव की पत्नी का नाम। स्त्री०=रत्ती। अव्य०=रती। स्त्री०=रात। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रतिकर  : अव्य० [हिं० रत्ती] रत्तीभर, अर्थात् बहुत थोड़ा। जरा-सा वि० [सं० रति√कृ (करना)+ट०] १. रति करनेवाला। २. आनन्द और सुख की वृद्धि करनेवाला। ३. अनुराग या प्रेम बढ़ानेवाला। पुं० कामुक और लंपट व्यक्ति।
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रति-करण  : पुं० [ष० त०] रति या संभोग करने का कौशल या ढंग।
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रति-कलह  : पुं० [ष० त०] मैथुन। संभोग।
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रति-कांत  : पुं० [ष० त०] रति का पति। कामदेव।
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रति-कुहर  : पुं० [ष० त०] योनि। भग।
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रति-केलि  : स्त्री० [ष० त०] मैथुन। संभोग।
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रति-क्रिया  : स्त्री० [ष० त०] मैथुन। संभोग।
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रतिगर  : अव्य० [हिं० रात+गर] प्रातःकाल। तड़के। सबेरे। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रति-गृह  : पुं० [ष० त०] योनि। भग।
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रतिज्ञ  : पुं० [ष०रति√ज्ञा (जानना)+क] १. वह जो रति-क्रिया में चतुर हो। २. वह जो स्त्रियों को अपने प्रेम में फँसाने की कला में निपुण हो।
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रति-तस्कर  : पुं० [ष० त०] वह जो स्त्रियों को अपने साथ व्यभिचार करने में प्रवृत्त करता हो।
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रति-दान  : पुं० [ष० त०] संभोग। मैथुन।
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रति-देव  : पुं० [ष० त०] १. विष्णु। २. [ब० स०] कुत्ता। ३. चंद्रवंशी राजा सांकृति के पुत्र एक राजा।
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रति-नाथ  : पुं० [ष० त०] कामदेव।
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रति-नायक  : पुं० [ष० त०] कामदेव।
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रतिनाह  : पुं० =रतिनाथ (कामदेव)।
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रति-पति  : पुं० [ष० त०] कामदेव।
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रति-पाश  : पुं० [ष० त०] सोलह प्रकार के रति-बंधों में से एक भेद। (काम शास्त्र)
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रति-प्रिय  : पुं० [ष० त०] १. कामदेव। २. [ब० स०] मैथुन से आनंदित होनेवाला व्यक्ति। वि० [स्त्री० रति-प्रिया] रति (मैथुन) का शौकीन। कामुक।
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रति-प्रिया  : स्त्री० [ब० स०] १. तांत्रिकों के अनुसार शक्ति की एक मूर्ति का नाम। २. दाक्षायणी देवी का एक नाम। ३. मैथुन से आनंदित होनेवाली स्त्री।
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रति-प्रीता  : स्त्री० [तृ० त०] १. वह नायिका जिसकी रति में विशेष अनुराग हो। कामिनी। २. रति से आनंदित होनेवाली स्त्री।
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रति-बंध  : पुं० [स० त०] काम-शास्त्र में बतलाये हुए संभोग करने के ८४ आसनों में से हर एक।
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रति-भवन  : पुं० [ष० त०] १. रति-क्रीड़ा या मैथुन करने का कमरा या भवन। २. योनि। भग।
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रति-भाव  : पुं० [ष० त०] १. पति, और पत्नी, प्रेमी और प्रेमिका या नायक और नायिका का पारस्परिक अनुराग। २. प्रीति। प्रेम। मुहब्बत।
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रतिभौन  : पुं० =रतिभवन।
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रति-मंदिर  : पुं० [ष० त०] रति-भवन (दे०)।
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रतिमदा  : स्त्री० [सं० ब० स०] अप्सरा।
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रति-मित्र  : पुं० [स०त०] एक रतिबंध। (कामशास्त्र)
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रतियाना  : अ० [हिं० रति=प्रीति+आना (प्रीति)] किसी पर रत या अनुरक्त होना। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रति-रमण  : पुं० [ष० त०] १. रति-क्रीड़ा। मैथुन। २. कामदेव।
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रतिराइ  : पुं० =रतिराज (कामदेव)।
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रति-राज  : पुं० [ष० त०] कामदेव।
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रतिवंत  : वि० [सं० रति+हिं० वंत (प्रत्यय)] सुंदर। खूबसूरत।
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रति-वर  : पुं० [स० त०] १. रति में प्रवीण कामदेव। २. वह धन या भेंट जो नायक-नायिका को रति में प्रवृत्त करने के उद्देश्य से देता है।
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रति-वर्द्धन  : वि० [सं० ष० त०] काम-शक्ति बढ़ानेवाला।
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रति-वल्ली  : स्त्री० [ष० त०] प्रेम। प्रीति। मुहब्बत।
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रतिवाही (हिन्)  : पुं० [सं० रति√वह् (ढोना)+णिनि] संगीत में एक प्रकार का राग, जिसका गान-समय रात को १६ दंड से २0 दंड तक है।
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रतिशास्त्र  : पुं० [मध्य० स०] वह शास्त्र जिसमें रति के ढंगों, आकारों आसनों आदि का विवेचन होता है। कामशास्त्र।
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रतिसत्वरा  : स्त्री० [ब० स०+टाप्] असबरग। पृक्का।
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रति-समर  : पुं० [ष० त०] संभोग मैथुन।
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रति-साधन  : पुं० [ष० त०] पुरुष का लिंग। शिश्न।
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रति-सुन्दर  : पुं० [ष० त०] एक रति बंध। (कामशास्त्र)
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रती  : स्त्री० [सं० रति] १. कामदेव की पत्नी। रति। २. सौन्दर्य। ३. शोभा। ४. मैथुन। संभोग। ५. आनन्द। मौज। स्त्री०=रत्ती। अव्य०बहुत थोड़ा। जरा सा। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है) (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रतीक  : अव्य०=रतिक (थोड़ा सा)।
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रतीश  : पुं० [रति-ईश, ष० त०] कामदेव।
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रतुआ  : पुं० [देश] एक तरह का बरसाती घास। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रतून  : पुं० [देश] वह ईख या गन्ना जो एक बार काट लेने पर सिर उसी पहली जड या पेड़ी से निकलता है। पेड़ी या गन्ना।
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रतोपल  : पुं० [सं० रक्तोत्पल] १. लाल कमल। २. लाल सुरमा। ३. लाल खड़िया। ४. गेरू। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रतौंधी  : स्त्री० [हिं० रात+अंधा] आँख का एक प्रसिद्ध रोग जिसके कारण रोगी को रात के समय कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता।
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रतौन्हीं  : स्त्री०=रतौंधी। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रत्त  : पुं० =रक्त। वि० रत।
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रत्तक  : पुं० [सं० रत्तक, प्रा० रत्त] एक तरह का लाल रंग का पत्थर।
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रत्तरी  : स्त्री०=रात्रि।
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रत्ती  : स्त्री० [सं० रक्ति, का प्रा० रत्तीआ] १. माशे के आठवें अंश के बराबर की एक तौल या मान। २. उक्त परिमाण या बटखरा। ३. घुंघची का दाना जो साधारणतया तौल में माशे के आठवें अंश के बराबर होता है। पद—रत्ती भर=बहुत थोड़ा। जरा सा। वि० बहुत ही थोड़ा। किंचित् मात्र। स्त्री० [सं० रति] १. छवि। शोभा। २. सौन्दर्य।
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रत्थी  : स्त्री०=अरथी। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रत्न  : पुं० [सं०√रम् (क्रीड़ा)+णिच्, न० तकार-अन्तादेश] १. कुछ विशिष्ट छोटे चमकीले खनिज पदार्थ या बहूमूल्य पत्थर जो आभूषणों आदि में जड़े जाते हैं २. माणिक्य मानिक। लाल। ३. वह जो अपनी जाति या वर्ग में औरों से बहुत अच्छा या बढ़-चढ़कर हो। ४. जैनों के अनुसार सम्यक् दर्शन सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र।
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रत्न-कंदल  : पुं० [ष० त०] प्रवाल। मूँगा।
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रत्नकर  : पुं० [सं० रत्न√कृ (करना)+ट] कुबेर का एक नाम।
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रत्न-कर्णिका  : स्त्री० [मध्य० स०] कान में पहनने का एक तरह का जड़ाऊ गहना।
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रत्न-कांति  : स्त्री० [ब० स०] संगीत में कर्नाटकी पद्धति की एक रागिनी।
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रत्न-कूट  : पुं० [ब० स०] १. एक पौराणिक पर्वत का नाम। २. एक बोधिसत्व का नाम।
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रत्नगर्भा  : पुं० [ब० स०] १. कुबेर का एक नाम। २. रत्नाकर। समुद्र। ३. एक बुद्ध का नाम।
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रत्न-गर्भ  : स्त्री० [सं० ब० स०+टाप्] वह जिसके गर्भ में रत्न हो। पृथ्वी।
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रत्नगिरि  : पुं० [मध्य० स०] बिहार के एक पहाड़ का प्राचीन नाम।
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रत्नचूड़  : पुं० [ब० स०] एक बोधिसत्व।
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रत्नछाया  : स्त्री० [सं० रत्नच्छाया] रत्न की आभा, छाया या पानी।
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रत्न-त्रय  : पुं० [ष० त०] सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र (जैन)।
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रत्न-दामा  : स्त्री० [ष० त०] १. रत्नों की माला। २. सीता की माता। (गर्ग संहिता)।
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रत्न-दीप  : पुं० [मध्य० स०] १. रत्नों से जड़ा हुआ दीपक। रत्नजटित दीपक। २. एक कल्पित रत्न का नाम जो बहुत उज्जवल माना गया है।
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रत्न-द्रुम  : पुं० [ष० त०] मूँगा।
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रत्न-द्वीप  : पुं० [मध्य० स०] पुराणानुसार एक द्वीप का नाम।
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रत्न-धर  : पुं० [ष० त०] धनवान्। वि० रत्न धारण करनेवाला।
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रत्न-धेनु  : स्त्री० [मध्य० स०] दान के उद्देश्य से रत्नों की बनाई हुई गौ की मूर्ति।
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रत्न-ध्वज  : पुं० [ब० स०] एक बोधिसत्त्व।
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रत्न-नाभ  : पुं० [ब० स०] विष्णु।
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रत्न-निधि  : पुं० [ष० त०] १. खंजन पक्षी। ममोला। २. समुद्र। ३. मेरू पर्वत। ४. विष्णु।
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रत्न-परीक्षक  : पुं० [ष० त०] जौहरी।
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रत्न-पर्वत  : पुं० [ष० त०] सुमेरु पर्वत।
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रत्न-पाणि  : पुं० [ब० स०] एक बोधिसत्व।
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रत्न-पारखी  : पुं० =रत्न-परीक्षक (जौहरी)।
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रत्न-प्रदीप  : पुं० [मध्य० स०] ऐसा एक कल्पित रत्न जो दीपक के समान प्रकाशमान माना गया है।
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रत्न-प्रभ  : पुं० [ब० स०] देवताओं का एक वर्ग।
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रत्न-प्रभा  : स्त्री० [ब० स०+टाप्] १. पृथ्वी। २. जैनों के अनुसार एक नरक।
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रत्न-बाहु  : पुं० [ब० स०] विष्णु।
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रत्न-भूषण  : पुं० [मध्य० स०] रत्न जटित आभूषण। जड़ाऊ गहना।
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रत्न-माला  : स्त्री० [मध्य० स०] १. रत्नों की माला। २. राजा बलि की कन्या का नाम।
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रत्न-माली (लिन्)  : पुं० [सं० रत्नमाला+इनि] देवताओं का एक वर्ग।
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रत्न-राज्  : पुं० [सं० रत्न√राज् (चमकना)+क्विप्, उप० स०] माणिक्य। लाल।
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रत्न-वती  : स्त्री० [सं० रत्न+मतुप्+ङीष्] पृथ्वी।
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रत्न-शाला  : स्त्री० [ष० त०] १. रत्नों के रखने का स्थान। २. ऐसा भवन या महल जिसकी दीवारों पर रत्न जड़े हों।
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रत्न-सागर  : पुं० [मध्य० स०] समुद्र का वह भाग जहाँ से प्रायः रत्न निकलते हों।
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रत्न-सानु  : पुं० [ब० स०] सुमेरु पर्वत।
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रत्न-सू  : स्त्री० [सं० रत्न√सू (प्रसव)+क्विप्] पृथ्वी।
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रत्नाकर  : पुं० [रत्न-आकर, ष० त०] १. समुद्र। २. ऐसी खान जिसमें से रत्न निकलते हों। ३. वाल्मिकी का पुराना नाम। ४. गौतम बुद्ध का एक नाम।
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रत्नागिरि  : पुं० =रत्नगिरि बिहार में स्थित एक पर्वत।
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रत्नाचल  : पुं० [रत्न-अचल, मध्य० स०] दान के उद्देश्य से लगाया हुआ रत्नों का ढेर।
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रत्नाद्रि  : पुं० [रत्न-अद्रि, मध्य० स०] एक पर्वत। (पुराण)
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रत्नाधिपति  : पुं० [रत्न-अधिपति, ष० त०] कुबेर।
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रत्नावली  : स्त्री० [रत्न-आवली, ष० त०] १. मणियों या रत्नों की अवली या श्रेणी। २. रत्नों की माला। ३. साहित्य में एक अर्थालंकार जिसमें कोई बात ऐसे कलिष्ट शब्दों में कही जाती है कि उनसे प्रस्तुत अर्थों के सिवा कुछ और अर्थ भी निकलते हैं। जैसे—‘आप चतुरास्य लक्ष्मीपति और सर्वज्ञ है’ का साधारण अर्थ के सिवा यह भी अर्थ निकलता है कि आप ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं।
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रत्यर्थी (र्थिन्)  : वि० [सं० रति√अर्थ√णिच् (स्वार्थ में)+णिनि, उप० स०] [स्त्री० रत्यर्थिनी] रति की इच्छा या कामना रखनेवाला। जो रति करना चाहता हो।
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रत्युत्सव  : पुं० [सं० रति-उत्सव, ष० त०] रति या संभोग का उत्सव।
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रथंकर  : पुं० [सं० रथ√कृ (करना)+खच्, मुमागम] १. एक कल्प का नाम। २. एक प्रकार का साम। ३. एक प्रकार की अग्नि।
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रथ  : पुं० [सं०√रम् (क्रीड़ा)+कथन्] १. प्राचीन काल की एक प्रकार की सवारी जिसमें चार या दो पहिये हुआ करते थे। गाडी। बहल। शतांग। स्यंदन। २. शरीर जो आत्मा का यान या सवारी है। उदाहरण—तीरथ चलत मन तीरथ चलत है।—सेनापति। ३. पग या पैर जिससे प्राणी चलते हैं। ४. क्रीड़ा या विहार का स्थान। ५. तिनिश का पेड़। ६. वह शिला-मंदिर जो किसी चट्टान को काटकर बनाया गया हो। (दक्षिण)
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रथ-कल्पक  : पुं० [सं० ष० त०] १. प्राचीन भारत में वह अधिकारी जो किसी राजा के रथों, यानों आदि की देख-रेख रखता था। २. वाहन। ३. घर। ४. प्राचीन भारत में, धनवानों का वह प्रधान अधिकारी जो उनके घर आदि सजाता और उनके पहनने के वस्त्र आदि रखता था।
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रथकार  : पुं० [सं० रथ√कृ (करना)+अण्] १. रथ बनानेवाला कारीगर। २. बढ़ई। ३. माहिष्य पिता से उत्पन्न एक वर्णसंकर जाति।
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रथ-कूबर  : पुं० [ष० त०] रथ का वह भाग जिस पर जूआ बाँधा जाता है। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रथ-क्रांत  : पुं० [ब० स०] संगीत में एक प्रकार का ताल।
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रथ-क्रांता  : स्त्री० [सं० रथक्रांत+टाप्] एक प्राचीन जनपद का नाम।
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रथ-गर्भक  : पुं० [ब० स०+कप्] कंधों पर उठाई जानेवाली सवारी। जैसे—डोला, पालकी आदि।
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रथ-गुप्ति  : स्त्री० [ब० स०] रथ-नीड। (दे०) के चारों ओर सुरक्षा की दृष्टि से लकड़ी-लोहे आदि का लगाया जानेवाला घेरा।
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रथ-चरण  : पुं० [ष० त०] १. रथ का पहिया। [रथचरण+अच्] २. चकवा। चक्रवाक।
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रथ-चर्या  : स्त्री० [ष० त०] रथ पर चढ़कर भ्रमण करना।
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रत-द्रु  : पुं० [मध्य० स०] १. तिनिश का पेड़। २. बेंत।
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रथ-नीड  : पुं० [ष० त०] रथ में वह स्थान जहाँ लोग बैठते हैं। गद्दी।
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रथ-पति  : पुं० [ष० त०] रथ का नायक। रथी।
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रथ-पर्याय  : पुं० [ब० स०] १. तिनिश का पेड़। २. बेंत।
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रथ-पाद  : पुं० =रथचरण।
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रथ-महोत्सव  : पुं० [ष० त०] रथ-यात्रा। (दे०)
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रथ-यात्रा  : स्त्री० [तृ० त०] हिन्दुओं का एक पर्व या उत्सव जो आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को होता है और जिसमें जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा की मूर्तियाँ रखकर उनकी सवारी निकालते हैं।
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रथ-योजक  : पुं० [ष० त०] सारथि।
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रथ-वर्त्म (न्)  : पुं० [ष० त०] राजमार्ग।
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रथवान् (वत्)  : पुं० [सं० रथ+मतुप्] रथ हाँकनेवाला। सारथि।
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रथवाह  : पुं० [सं० रथ√वह (ढोना)+अण्] १. रथ चलानेवाला सारथि २. रथ खींचनेवाला घोड़ा।
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रथ-वाहक  : पुं० [सं० रथवाह+कन्] सारथि।
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रथ-शाला  : स्त्री० [ष० त०] वह स्थान जहाँ रथ रखे जाते हों। गाड़ी खाना।
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रथ-शास्त्र  : पुं० [मध्य० स०] रथ चलाने की क्रिया।
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रथ-सप्तमी  : स्त्री० [मध्य० स०] माघ शुक्ला सप्तमी।
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रथस्था (स्या)  : स्त्री० [सं०] पंचाल देश की राम-गंगा नामक नदी का पुराना नाम।
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रथांग  : पुं० [रथ-अंग, ष० त०] १. रथ का पहिया। २. [रथांग+अच्] चक्र नामक अस्त्र। ३. चकवा पक्षी।
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रथांग-धर  : पुं० [ष० त०] १. श्रीकृष्ण। २. विष्णु।
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रथांग-पाणि  : पुं० [ब० स०] विष्णु।
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रथांगी  : स्त्री० [सं० रथांग+ङीष्] ऋद्धि नामक ओषधि।
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रथाक्ष  : पुं० [रथ-अक्षि, ष० त०] १. रथ का पहिया। २. रथ का धुरा। ३. कार्तिकेय का एक अनुचर। ४. चार अंगुल का एक परिमाण।
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रथाग्र  : पुं० [रथ-अग्र, ब० स०] वह जिसका रथ सबसे आगे हो, अर्थात् श्रेष्ठतम योद्धा।
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रथिक  : पुं० [सं० रथ+ठन्—इक] १. वह जो रथ पर सवार हो। रथी। २. तिनिश का पेड़।
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रथी (थिन्)  : पुं० [सं० रथ+इनि] १. वह जो रथ पर चढ़कर चलता हो। रथी। २. रथ पर चढ़कर युद्ध करनेवाला। रथवाला योद्धा। पद—महारथी। ३. एक बार योद्धाओं से अकेला युद्ध करनेवाला योद्धा। उदाहरण—पूरण प्रकृति सात धीर वीर है विख्यात रथी महारथी अतिरथी रण साजिके।—रघुराज। वि० जो रथ पर सवार हो। स्त्री०=अरथी (मृतक की)।
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रथोत्सव  : पुं० [रथ-उत्सव, ष० त०] रथ-यात्रा। (दे०)
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रथोद्धता  : स्त्री० [रथ-उद्धता, उपमित, स०] ग्यारह अक्षरों का एक प्रकार का वर्णवृत्त जिसका पहला, तीसरा, सातवां, नवाँ और ग्यारहवाँ वर्ण गुरु तथा अन्य वर्ण लघु होते हैं।
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रथ्य  : पुं० [सं० रथ+यत्] १. वह घोड़ा जो रथ में जोता जाता हो २. रथ चलानेवाला। सारथि। ३. पहिया।
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रथ्या  : स्त्री० [सं० रथ्य+टाप्] १. रथों का समूह। २. वह मार्ग जो वनों में रथ के चलने से बन जाता था। ३. बड़े नगरों में वह चौड़ी मार्ग या सड़क जिस पर रथ चलते थे। ४. घर का आँगन या चौक। ५. नाबदान। पनाला।
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रद  : पुं० [सं०√रद् (विलेखन)+अच्] दंत। दाँत। वि०=रद्द।
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रद-क्षत  : पुं० [तृ० त० या ष० त०] रति आदि के समय दाँतों में गड़ने या लगने का चिन्ह।
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रदच्छद  : पुं० [सं० रद्√छद् (आच्छादन)+णिच्+घ, ह्रस्व] होंठ। ओष्ठ।
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रद-छत  : पुं० =रद-क्षत। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रद-दान  : पुं० [सं० ष० त०] (रति के समय) दाँतो से ऐसा दबाना कि चिन्ह पड़ जाय। रद-क्षत करना।
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रदन  : पुं० [सं०√रद्+ल्युट-अन] दशन। दाँत। दंत।
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रदनच्छद  : पुं० [सं० रदन√छद्+णिच्+घ, ह्रस्व०] ओष्ठ। अधर। होंठ।
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रदनी (नि्न्)  : वि० [सं० रदन+इनि] दाँतवाला। पुं० हाथी।
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रद-पट  : पुं० [सं० ष० त०] अधर। होंठ।
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रद-बदल  : स्त्री० [अ० रद्दोबदल] परिवर्तन।
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रदबास  : पुं० [सं० रद+वास=आवरण] होंठ। उदाहरण—अन्तरपट रदबास सरीरु।—नूर मोहम्मद।
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रदी (दिन्)  : पुं० [सं० =रद+इनि] हाथी। गज।
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रदीफ  : स्त्री० [अ० रदीफ़] १. वह व्यक्ति जो घोड़े पर मुख्य सवार के पीछे बैठता है। २. वह शब्द जो गजलों आदि में प्रत्येक काफिए या अन्त्यानुप्रास के बाद आनेवाला शब्द या शब्द-समूह। जैसे—चला है ओ दिले राहत-तलब क्या शदियाँ होकर। जमीने कूए जानों रंज देनी आस्माँ होकर। में ‘शादयाँ’ और ‘आस्माँ’ काफिया है, तथा ‘होकर’ रदीफ है। ३. पीछे की ओर रहनेवाली सेना। पृष्ठ-भाग के सैनिक।
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रदीफवार  : अव्य० [अ+फा० ] १. रदीफ के अनुसार २. वर्णमाला के क्रम से। अक्षर-क्रम से।
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रद्द  : वि० [अ०] १. बदला हुआ। परिवर्तित। २. (लिखित सामग्री) जो नापसंद अथवा दूषित होने पर काट या छांट दी गई हो। जो अनुपयुक्त समझकर निरर्थक या व्यर्थ कर दिया गया हो। स्त्री० [देश] कै। वमन।
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रद्दा  : पुं० [फा० रदः] १. दीवार में जुड़ाई की एक पंक्ति। २. मिट्टी की दीवार उठाने में उतना अंश, जितना चारों ओर एक बार में उठाया जाता है। क्रि० प्र०—उठाना।—रखना। ३. थाली में एक प्रकार की मिठाइयों का चुनाव जो स्तरों के रूप में नीचे-ऊपर होता है। क्रि० प्र०—रखना।—लगाना। ४. नीचे ऊपर रखी हुई वस्तुओं का थाक या ढेर। क्रि० प्र०—चुनना। ५. कुश्ती में अपने प्रतिपक्षी को नीचे लाकर उसकी गरदन पर कुहनी और कलाई के नीचे की हड्डी से रगड़ते हुए आघात करना। क्रि० प्र०—देना।—लगाना। ६. चमड़े की वह मोहरी जो भालुओं के मुँह पर बाँधी जाती है।
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रद्दी  : वि० [फा० रद] १. जो व्यर्थ हो तथा किसी उपयोग में न लाया जा सकता हो। जैसे—रद्दी कागज। २. जिसमें कुछ भी बढ़ियापन या अच्छाई न हो। बहुत ही निम्न कोटि या प्रकार का। जैसे—रद्दी कपड़ा। स्त्री लिखे अथवा छपे हुए ऐसे कागज जिनका उपयोग अब न होने को हो। पुराने और व्यर्थ के कागज।
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रद्दीखाना  : पुं० [हिं० रद्दी+फा० खाना] वह स्थान जहाँ खराब और निकम्मी चीजें रखी या फेंकी जाएँ।
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रधार  : स्त्री० [देश] ओढ़ने का दोहरा वस्त्र। दोहर। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रधेरा जाल  : पुं० [सं० रंध=छेद+ऐरा (प्रत्यय)+जाल] मछली फँसाने का छोटे छेदोंवाला जाल।
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रन  : पुं० [सं० रण] युद्ध। लड़ाई। संग्राम। पुं० [सं० अरण्य] जंगल वन। पुं० [?] १. झील। ताल। समुद्र का वह छोटा खंड जो तीन ओर से स्थल से घिरा हो। छोटी खाड़ी। पुं० [अं०] क्रिकेट के खेल में बल्लेबाज द्वारा एक सिरे से दूसरे सिरे तक लगाई जानेवाली दौड़। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रनकना  : अ० [देश०, सं० रणन=शब्द करना] घुँघरु आदि का मंदमंद शब्द होना।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रनछोर  : पुं० =रणछोड़ (श्रीकृष्ण)।
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रनना  : अ० [सं० रणन=शब्द करना] घुँघरुओं आदि का मन्द और मधुर शब्द में बजना या बोलना। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रनबंका  : पुं० [सं० रण+हिं० बाँका] युद्ध-क्षेत्र में वीरता दिखानेवाला योद्धा। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रन-बरिया  : स्त्री० [देश] एक तरह का जंगली भेड़। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रन-बाँकुरा  : पुं० =रन-बंका।
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रन-लंपिका  : स्त्री० [डिं०] गौ। गाय।
समानार्थी शब्द-  उपलब्ध नहीं
रनवादी  : पुं० [सं० रण+वादी] योद्धा। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रन-वास  : पुं० [हिं० रानी+वास] १. महल का वह अंश जिसमें रानियाँ रहती थीं। अंतःपुर। २. घर में स्त्रियों के रहने का स्थान। जनानखाना।
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रन-वासन  : स्त्री० [देश] एक प्रकार की फली।
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रन-साजी  : स्त्री० [सं० रण+फा० साजी] युद्ध छिड़ने या छेड़ने की अवस्था क्रिया या भाव। उदाहरण—सरजा शिवाजी की सबेग तेज बाजी चाहि गाजी गजनी के रनसाजी जु चहत है।—रत्नाकर।
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रनित  : भू० कृ०=रणित (बजता हुआ)। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रनिवास  : पुं० =रनवास। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रनी  : पुं० [सं० रण+हिं० ई (प्रत्यय)] रण करनेवाला व्यक्ति। योद्धा।
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रनेत  : पुं० [सं० रण+एत (प्रत्यय)] भाला। (डि०) (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रपट  : स्त्री० [हि० रपटना] १. रपटने की क्रिया या भाव। २. ऐसा स्थान जहाँ पैर रपटता या फिसलता हो। ३. जल्दी-जल्दी रपटने अर्थात् तेजी से चलने की क्रिया या भाव। दौड़। ४. ढालुआँ स्थान। उतार ढाल। स्त्री० [अ० रब्त] आदत। टेव। क्रि० प्र०—डालना।—पडना।—होना। स्त्री० [अं० रिपोर्ट] चौकी, थाने आदि में जाकर दी जानेवाली मारपीट, चोरी-डाके आदि दुर्घटनाओं की सूचना। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रपटना  : अ० [सं० रफन=सरकना, मि० फा० रफतन्] १. चिकनी या ढालवी जमीन पर पाँव और फलतः व्यक्ति आदि का फिसलकर आगे बढ़ना। २. तेजी से चलना। स० मैथुन या संभोग करना। (बाजारू) (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रपटा  : पुं० [हिं० रपटना] १. रपटने की क्रिया या भाव। २. ऐसा स्थान या स्थिति जिसमें पैर रपटता या फिसलता हो। फिसलन। ३. ढालुई भूमि। ढाल। ढालन। (रैम्प)
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रपटाना  : स० [हिं० रपटना] १. किसी को रपटने में प्रवृत्त करना। २. (काम) जल्दी से पूरा करना।
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रपटीला  : वि० [हिं० रपटर (ना)+ईला (प्रत्यय)] [स्त्री० रपटीली] इतना या ऐसा चिकना जिस पर पैर फिसलता या फिसल सकता हो। पिच्छिल।
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रपट्टा  : पुं० [हिं० रपटना] १. फिसलने की क्रिया या भाव। रपट। २. बहुत जल्दी-जल्दी चलना। तेज चलना। मुहावरा—रपट्टा मारना=बहुत जल्दी-जल्दी या तेजी से चलना। ३. दौड़-धूप। ४. दे० ‘झपट्टा’। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रपाती  : स्त्री० [?] तलवार। (डि०)
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रपुर  : पुं० [सं० हरिपुर] स्वर्ग। (डि०)
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रफ  : पुं० [अ० रफ़] मचान। वि० [अं०] १. (कागज, कपड़ा आदि) जिसमें चिकनापन न हो। खुरदुरा। २. (विवरण लेख आदि) जो अभी ऐसे रूप में हो कि ठीक तथा साफ किया जाने अर्थात् पुनः लिखा जाने को हो। नमूने के रूप में तैयार किया हुआ।
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रफता  : वि० [अ० रफतः] १. गया या बीता हुआ। गत। २. मृत।
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रफता-रफता  : अव्य० [अ० रफ़तः रफ़तः] शनैःशनै। धीरे-धीरे।
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रफते-रफते  : अव्य, =रफ्ता-रफ्ता।
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रफल  : स्त्री० [अ० राइफल] विलायती ढंग को एक प्रकार की बंदूक। राइफल। पुं० [अं० रैपर] एक तरह की ऊनी मोटी चादर।
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रफा  : वि० [अ० रफस] १. दूर किया या हटाया हुआ। २. मिटाया हुआ। ३. समाप्त या पूरा किया हुआ। ४. निवारित या शांत किया हुआ। पद—रफा-दफा।
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रफाह  : स्त्री० [अं० रिफ्ह] १. आराम। २. भलाई। हित।
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रफीअ  : वि० [अ० रफीअ] १. ऊँचा। बुलंद। २. उत्तम। श्रेष्ठ।
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रफीक  : पुं० [अं० रफीक] १. साथी। संगी। २. सहायक। मददगार। ३. मित्र। वि० प्रायः सदा साथ रहनेवाला।
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रफीदा  : पुं० [अ० रफादः] १. वह गद्दी जिसके ऊपर जीन कसी जाती है। २. कपड़े की वह गद्दी जिसे हाथ में लगाकर नानबाई तंदूर में रोटी चिपकाते हैं। काबुक। ३. एक प्रकार की गोलाकार पगड़ी।
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रफू  : पुं० [फा० रफू] १. एक प्रकार की सिलाई जिसमें बीच से कुछ कटा या फटा हुआ कपड़ा इस प्रकार बीच में सूत भरकर मिलाया जाता है कि साधारणतः जोड़ नहीं दिखाई पड़ता। २. असंगत या असंबद्ध बातों की संगति बैठाने की क्रिया। मुहावरा—(बात) रफू करना=कही हुई दो असंबद्ध या असंगत बातों में सामंजस्य स्थापित करना। बात बनाना।
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रफूगर  : पुं० [फा० रफूगर] [भाव० रफूगरी] वह कारीगर जो कपड़ों में रफू करने या बनाने का काम करता हो।
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रफूगरी  : स्त्री० [फा] रफूगर का काम पेशा या भाव।
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रफू-चक्कर  : वि० [अ० रफू+हिं० चक्कर] जो धीरे से तथा बिना आहट दिये कहीं चला गया हो। चंपत। गायब। (व्यक्तियों के लिए प्रयुक्त) क्रि० प्र० बनना।—होना।
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रफ़त  : स्त्री० [फा०] चलना या जाना जैसे—आमद रफ्त=आना-जाना।
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रफ्तनी  : वि० [फा० ] जो जानेवाला हो। स्त्री० १. जाने की क्रिया या भाव। २. माल का कहीं बाहर भेजा जाना। निकासी। निर्यात।
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रफ्तार  : स्त्री० [फा०] १. गति। चाल। २. चलने-दौड़ने के समय और पार की जानेवाली दूरी के हिसाब से आनुपातिक गति। जैसे—मोटर ५0 मील घंटे की रफ्तार से चलती है। ३. प्रगति। ४. दशा। हालत।
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रफ्तार-गुफ्तार  : स्त्री० [फा०] उठते-बैठते चलने-फिरने और बात-चीत करने का ढंग या भाव। चाल-चलन। तौर-तरीका।
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रफ्ता-रफ्ता  : अव्य० =रफता-रफता।
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रब  : पुं० [अ०] १. मालिक। २. ईश्वर।
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रबकना  : अ० [?] [भाव० रबकी] डर से छिपाना। दुबकना।
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रबड़  : पुं० [अं० रबर] १. एक प्रकार का वृक्ष जो वट वर्ग के अन्तर्गत और जिसका सुखाया हुआ दूध इसी नाम से प्रसिद्ध है। २. उक्त दूध से बना हुआ एक प्रसिद्ध लचीला पदार्थ जिससे गेंद, फीते आदि बहुत सी चीजें बनती हैं। स्त्री० [हिं० रगड़ा] १. बहुत अधिक परिश्रम। रगड़ा। २. व्यर्थ का श्रम। फजूल की हैरानी। क्रि० प्र०—खाना।—पड़ना। ३. रास्ते की ऐसी चक्करदार दूरी जिसमें परिश्रमपूर्वक बहुत चलना पड़ता हो।
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रबड़-छंद  : पुं० [हिं०+सं०] कविता का ऐसा छंद जिसमें मात्राओं आदि की गिनती का कुछ विचार न हो। (व्यंग्य)
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रबड़ना  : स० [हिं० रपटना या सं० वर्तन, प्रा० वहन] १. घुमाना-फिराना। चलाना। २. किसी तरल पदार्थ में कोई वस्तु (करछी आदि) डालकर चारों ओर चलाना या फेरना। फेंटना। ३. किसी से बहुत अधिक परिश्रम कराना। अ० घूमना-फिरना। स०=रगड़ना।
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रबड़ी  : स्त्री० [प्रा० रब्बा=अवलेह] गाढ़ा किया हुआ दूध का लच्छेदार रूप। बसौधी।
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रबदा  : पुं० [हिं० रबड़ना] १. वह श्रम जो कहीं बार-बार आने जाने या दौड़-धूप करने से होता है। २. कीचड़। मुहावरा—रबदा पड़ना=ऐसा पानी बरसना कि रास्ते में कीचड़ हो जाय।
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रबद्द  : स्त्री० [?] आवाज। शब्द
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रबर  : पुं० =रबड़।
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रबाना  : पुं० [देश] एक प्रकार का छोटा डफ जिसके मेंडरे में मंजीरे भी लगे होते हैं।
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रबाब  : पुं० [अ०] सितार, सारंगी आदि की तरह का एक बाजा।
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रबाबिया  : पुं० =रबाबी।
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रबाबी  : पुं० [अ०] रबाब बजानेवाला।
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रबी  : स्त्री० [अ० रबीअ] १. वसंत ऋतु। बहार का मौसिम। २. उक्त ऋतु में तैयार होनेवाली तथा काटी जानेवाली फसल। खरीफ के भिन्न।
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रबीय  : पुं० [अ०] स्त्री या पुरुष की दृष्टि से उसके पहले ब्याह से उत्पन्न पुत्र।
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रबील  : स्त्री० [देश] मँझोले आकार का एक प्रकार का पक्षी।
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रब्त  : पुं० [अ०] १. अभ्यास। मश्क। मुहावरा। रपट। क्रि० प्र०—पड़ना।—होना। २. आपस में होनेवाला मेल-जोल और आत्मीयता का सम्बन्ध।
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रब्त-जात  : स्त्री० [अ०] आपस में होनेवाला मेल-जोल और संग-साथ।
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रब्ध  : भू० कृ० [सं०√रभ् (आरंभ करना)+वत्] [स्त्री० रब्धा] आरंभ किया हुआ। शुरु किया हुआ।
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रब्ब  : पुं० =रब।
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रब्बा  : पुं० [फा० अराबा] १. वह गाड़ी जिस पर तोप लादी जाती है। तोपखाने की गाड़ी। २. ऐसी गाड़ी या रथ जिसे बैल खींचते हों।
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रब्बाब  : पुं० =रबाब।
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रभस  : पुं० [सं०√रभ्+असच्] १. वेग। तेजी। २. प्रसन्नता। हर्ष। ३. प्रेमपूर्वक अथवा प्रेम के कारण मन में होनेवाला उत्साह। ४. उत्सुकता। ५. मान। प्रतिष्ठा। संभ्रम। ६. पश्चात्ताप। पछतावा। ७. कार्य-कारण सम्बन्धी अथवा पूर्वापर का विचार। ८. अस्त्र निष्फल करने की विधि।
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रम  : पुं० [सं० रम (क्रीड़ा)+अच्] १. कामदेव। २. स्त्री० की पति। ३. प्रेमी। प्रेमपात्र। ४. दिव्य व्यक्ति। ५. लाल अशोक। वि० १. प्रिय। मनोरम। सुन्दर। ३. आनन्ददायक। ४. मनोरंजक। वि० [हिं० राम] हिं० राम का वह संक्षिप्त रूप जो उसे यौं० शब्दों के आरम्भ में रखने पर प्राप्त होता है। जैसे—रमक, जरा, रमचेरा। पुं० [अं०] एक प्रकार की विलायती शराब।
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रमइया  : पुं० =राम। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रमक  : पुं० [सं०√रम्+क्वुन्—अक] १. प्रेमपात्र। २. प्रेमी। ३. उपपति जार। स्त्री० [हिं० रमकना] १. झूलने की क्रिया या भाव। २. पेंगा। ३. तरंग। लहर। स्त्री० [अ० रमक] १. अंतिम श्वास। २. अंतिम जीवन। ३. किसी चीज में किसी दूसरी चीज का दिया जानेवाला हल्का पुट।
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रमकजरा  : पुं० [हिं० राम+काजल] एक प्रकार का धान जो भादों में पकता है।
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रमकना  : अ० [हिं० रमना] १. हिडोले पर झूलना। हिडोलें पर पेंग मारना। २. झूमते हुए चलना। अ० [हिं० रमक] किसी चीज में किसी दूसरी चीज में हलकी गन्ध, छाया या प्रभाव दिखाई देना।
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रमचकरा  : पुं० [हि० राम+चक्र] बेसन की मोटी रोटी।
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रमचा  : पुं० [हिं० चमचा] छोटी कलछी। चमचा।
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रम-चेरा  : पुं० [हिं० राम+चेरा=चेला] छोटी-मोटी सेवाएँ करनेवाला व्यक्ति। टहलुआ। (परिहास)
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रमजान  : पुं० [अ० रमज़ान] अरबी वर्ष का नवाँ महीना जिसमें मुसलमान रोजा रखते हैं।
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रम-झल्ला  : पुं० =झमेला। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रम-झिगनी  : स्त्री० दे० ‘भिंडी’। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रमझोला  : पुं० [हि० राम+झूलना] पैर में पहनने के घुँघरु। नूपुर। (डिं०)
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रमझोल  : पुं० [?] ब्रज में, एक प्रकार का लोकगीत।
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रमठ  : पुं० [सं०√रम्=अठन्] १. हींग। २. एक प्राचीन देश। ३. उक्त देश का निवासी।
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रमड़ना  : अ० [सं० रमण] १. रमण करना। रमना। २. किसी बात में मन लगाना। ३. युक्त होना।
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रमण  : पुं० [सं०√रम्+—ल्युट् अन] १. मन प्रसन्न करनेवाली क्रिया। क्रीड़ा। विलास। २. स्त्री-प्रसंग। मैथुन। संभोग। ३. घूमना-फिरना या टहलना। विहार। ४. [√रम्+णिच्+ल्यु—अन] स्त्री का पति जो उसके साथ भोग-विलास करता है। ५. कामदेव। ६. गधा। ७. अंडकोश। ८. सूर्य का अरुण नामक सारथि। ९. एक प्राचीन वन। १॰. एक प्रकार का वर्णिक छन्द। वि० १. रमने या विहार करनेवाला। २. रमण के योग्य। ३. आनन्द या सुख देनेवाला। ४. प्रिय।
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रमणक  : पुं० [सं०√रमण+कन्] पुराणानुसार जंबूद्वीप के अंतर्गत एक वर्ष या खंड। इसे रम्यक भी कहते हैं।
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रमण-गमना  : स्त्री० [सं० ब० स० टाप्] साहित्य में एक प्रकार की नायिका जो यह समझकर दुःखी होता है कि संकेत स्थान पर नायक आया होगा और मैं वहाँ उपस्थित न थी।
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रमणी  : स्त्री० [सं० रमण+ङीष्] १. रमण करने योग्य युवती और सुन्दर स्त्री। २. औरत। नारी। स्त्री। ३. संगीत में कर्णाटकी पद्धति की एक रागिनी। ४. सुगन्धबाला।
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रमणीक  : वि० [सं० रमणीय] जिसमें मन रमण करता हो या कर सकें, अर्थात् सुन्दर। मनोहर।
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रमणीय  : वि० [सं√रम्+अनीयर] जिसमें मन रमण करे या कर सके। अर्थात् सुन्दर। मनोहर।
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रमणीयता  : स्त्री० [सं० रमणीय+तल्+टाप्] १. रमणीय होने की अवस्था, धर्म या भाव। २. सुन्दरता। ३. साहित्य-दर्पण के अनुसार साहित्यिक कृति या रचना का वह माधुर्य जो सब अवस्थाओं में बना रहे या क्षण-क्षण में नवीन रूप धारण किया करे।
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रमता  : वि० [हिं० रमना=घूमना फिरना] जो एक जगह जमकर न रहे बल्कि बराबर इधर-उधर रमण करता हो। घूमता-फिरता। जैसे—रमता जोगी।
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रमति  : पुं० [सं०√रम्+अतिच्] १. नायक। २. स्वर्ग। ३. कामदेव। ४. काल। ५. कौआ।
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रमदी  : पुं० [हिं० राम+सं० आद्य] एक प्रकार का जड़हन जो अगहन के महीने में पकता है। इसका चावल कई बरस तक रह सकता है। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रमन  : पुं० वि० =रमण। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रमनक  : वि० =रमणक।
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रमनकसोरा  : पुं० [देश] एक प्रकार की मछली। कँवल-सोरा।
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रमना  : अ० [सं० रमण] १. रमण करना। २. भोग-विलास या सुख प्राप्ति के लिए कही रहना या ठहरना। मन लगने के कारण कही ठहरना या रहना। ३. रति-क्रीड़ा या संभोग करना। ४. आनंद या मौज करना। मजा लेना। ५. किसी चीज के अन्दर अच्छी तरह भरा हुआ या व्याप्त होना। ६. किसी काम, बात या व्यक्ति में अनुरक्त या लीन होना। ७. किसी के आस-पास घूमना या चक्कर लगाना। ८. चुपके से चल देना। गायब या चंपत होना। संयो० क्रि-जाना।—देना। ९. आनंदपूर्वक घूमना-फिरना। विहार करना। पुं० [सं० रमण] १. चरागाह। चरी। २. वह घेरा जिसमें घूमने-फिरने के लिए पशुओं को खुला छोड़ा जाता है। ३. उपवन। ४. कोई सुन्दर या रमणीक स्थान।
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रमनी  : स्त्री०=रमणी। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रमनीक  : वि० =रमणीक। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रमनीय  : वि० =रमणीय। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रमल  : पुं० [अ०] १. भविष्यत् घटनाओं के संबंध में पासे की बिंदियों की गणना आदि के आधार पर किया जानेवाला कथन। २. वह विद्या जिसके द्वारा उक्त कथन किया जाता है। (यह फलित ज्योतिष का एक प्रकार है)।
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रमा  : स्त्री० [सं०√रम्+णिच्+अच्+टाप्] लक्ष्मी।
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रमा-कांत  : पुं० [ष० त०] विष्णु।
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रमाधव  : पुं० [ष० त०] विष्णु।
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रमा-नरेश  : पुं० [हिं० रमा+नरेश=पति] विष्णु। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रमाना  : स० [हिं० रमना का स० रूप] १. रमण करना। २. अनुरंजित करना। अनुरक्त बनाना। मोहित करना। लुभाना। ३. अनुरक्त करके अपने अनुकूल बनाना। ४. अनुरक्त करके अपने पास रोक रखना। ५. किसी के साथ जोड़ना या लगाना। संयुक्त करना। जैसे—किसी काम में मन रमाना। ६. किसी काम या बात का अनुष्ठान आरंभ करना। जैसे—रास रमाना=रास की व्यवस्था करना। ७. अपने अंग या शरीर में पोतना या लगाना जैसे—शरीर में भभूत रमाना।
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रमा-निवास  : पुं० [हिं० रमा+निवास] लक्ष्मीपति विष्णु।
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रमा-रमण  : पुं० [ष० त०] विष्णु।
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रमाली  : पुं० [फा० रूमाली] एक तह का बढ़िया पतला चावल।
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रमा-वीज  : पुं० [ष० त०] एक प्रकार का तांत्रिक मंत्र जिसे लक्ष्मीबीज भी कहते हैं।
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रमा-वेष्ट  : पुं० [ष० त०] श्रीवास चंदन जिससे तारपीन नामक तेल निकलता है।
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रमास  : पुं० =रवाँस (फली और दाने)।
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रमित  : भू० कृ० [हिं० रमना] लुभाया हुआ। मुग्ध।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रमी  : स्त्री० [मलाय] एक प्रकार की घास। स्त्री० [अं०] एक प्रकार का ताश का खेल।
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रमूज  : स्त्री० [अ० रमज् का बहु] १. कटाक्ष। २. इशारा। संकेत । ३. कोई ऐसी गूढ़ जो सहज में न समझी जा सकती हो। गंभीर विषय। ४. पहेली। ५. श्लिष्ट कथन या बात। श्लेष। ६. भेद या रहस्य की बात।
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रमेश  : पुं० [रमा-ईश, ष० त०] रमा के पति, विष्णु।
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रमेश्वर  : पुं० [रमा-ईश्वर, ष० त०] विष्णु।
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रमेसर  : पुं० =रामेश्वर। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रमेसरी  : स्त्री० [हिं० रामेसर] लक्ष्मी। उदाहरण—पाँचई तेरासि दखिन रमेसरी।—जायसी।
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रमैती  : स्त्री० [देश] १. किसानों की एक रीति जिसमें एक कृषक आवश्यकता पड़ने पर दूसरे खेत में काम करता है और उसके बदले में वह भी उसके खेत में काम कर देता है। इसे पूर्व में पैंठ और अवध के उत्तरीय भागों से हूँड़ कहते हैं। क्रि० प्र०—देना।—लगाना। २. वह नफरी या काम का दिन जो इस प्रकार कार्य करने में लगे।
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रमैनी  : स्त्री० [हिं० रामायण] कबीरदास के बीजक का एक भाग जिसमें दोहे और चौपाइयाँ हैं।
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रम्ज  : स्त्री० [अ०] [बहु, रमूज] १. आँख, भौंह आदि से किया जानेवाला इशारा। संकेत। २. भेद। रहस्य।
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रम्माल  : पुं० [अ०] रमल विद्या का ज्ञाता।
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रम्य  : वि० [सं० रम्+यत्] [स्त्री० रम्या] १. जिसमें मन रमण करता या कर सकता हो। रमणीय। २. मनोहर। सुन्दर। रमणीक। पुं० १. चंपा का पेड़। २. अगस्त का पेड़। ३. परवल की जड़। ४. पुरुष का वीर्य। शुक्र। ५. वायु के सात भेदो में से एक।
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रम्यक  : पुं० [सं० रम्य+कन्] १. जंबूद्वीप का एक खंड। (पुराण) २. महानिंब बकायन।
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रम्य-पुष्प  : पुं० [ब० स०] सेमल का पेड़।
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रम्य-फल  : पुं० [ब० स०] कुचला।
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रम्य-श्री  : पुं० [ब० स०] विष्णु।
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रम्य-सानु  : पुं० [कर्म० स०] पहाड़ के शिखर पर की समस्त भूमि। प्रस्थ।
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रम्या  : स्त्री० [सं० रम्य+टाप्] १. रात। २. गंगा नदी। स्थल-पद्मिनी। ४. महेन्द्र-वारुणी। इंद्रायन। ५. लक्षणा नामक कंद। ६. मेरु की एक कन्या जो रम्य को ब्याही थी ७. संगीत में एक प्रकार की रागिनी। ८. संगीत में धैवत स्वर की तीन श्रुतियों में से अंतिम श्रुति का नाम।
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रम्यामली  : स्त्री० [सं० रम्या-आमली, कर्म० स०] भुँई आँवला।
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रम्हाना  : अ०=रँभाना।
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रय  : पुं० [सं०√रय् (गतौ)+घ] १. वेग। तेजी। २. प्रवाह। बहाव। ३. ऐल के ६ पुत्रों में से एक। पुं० =रज (धूल)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रयणपत  : पुं० [सं० रजनीपति] चंद्रमा। (डि०) (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रयणि  : स्त्री० [सं० रजनी] रात। (डि०) (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रयन  : स्त्री०=रयनि।
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रयना  : स० [सं० रंजन] १. रंग से भिगोना। सराबोर करना। २. अनुरक्त करना। अ० १. रँगा जाना। रंजित होना। २. किसी के प्रेम में अनुरक्त होना। ३. किसी से संयुक्त होना। मिलना।
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रयनि  : स्त्री० [सं० रजनी, प्रा० रयणी] रात्रि। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रया  : स्त्री० [अ०] १. लोगों को धोखे में रखने के लिए बनाया हुआ बाहरी रूप। दिखावा। बनावट। २. धूर्तता। मक्कारी।
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रयाकार  : वि० [अ+फा० ] [भाव० रयाकारी] १. झूठा या दिखौआ बाहरी रूप बनानेवाला आडंबरी। २. धूर्त। मक्कार।
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रयासत  : स्त्री०=रियासत। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रय्यत  : स्त्री० [अ० रइअत] प्रजा। रिआया। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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ररंकार  : पुं० [सं० रकार] रकार की ध्वनि। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रर  : स्त्री० [हिं० ररना] ररने की क्रिया या भाव। रट। रटन। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है) (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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ररक  : स्त्री०=रड़क। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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ररकना  : अ०=रड़कना। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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ररना  : अ० [प्रा० रड=खिसकना] १. अपनी जगह से खिसक कर नीचे आना। २. दीन भाव से प्रार्थना या याचना करते हुए रोना। ३. विलाप करना। रोना। उदाहरण—ररि दूबरि भइ टेक बिहूनी।—जायसी। स०=रटना। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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ररिहा  : वि० [हिं० रखना+हा (प्रत्यय)] ररने या गिड़गिड़ानेवाला। पुं० बहुत ही गिड़गिड़ाते हुए पीछे पड जानेवाला। भिखमंगा या याचक। पुं० =रुरुआ (उल्लू की जाति का पक्षी)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रर्रा  : वि० [हिं० रार=झगड़ा] १. रार अर्थात् झगड़ा करनेवाला। झगड़ालू। २. अधम। नीच। पुं० =ररिहा।
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रलना  : अ० [सं० ललन=लुब्ध होना] १. किसी चीज का दूसरी चीज में अच्छी तरह से घुल मिल जाना। जैसे—दूध में चीनी रलना। २. व्यक्तियों आदि का किसी भीड़ दल आदि में पहुँचना तथा मिलना। सम्मिलित होना। जैसे—दो दलों का रलना। पद—रलना-मिलना। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रल-मिल  : स्त्री० [हिं० रलना+मिलना] १. रलने-मिलने की क्रिया या भाव। २. सम्मिश्रण। मिलावट।
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रलाना  : स० [हिं० रलना का सक० रूप] १. एक चीज को दूसरी चीज में मिलाना। २. य़ुक्त करना।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रलिका  : स्त्री०=रली। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रला-मिला  : वि० [हिं० रलना-मिलना] [स्त्री० रली-मिली] १. जिसमें कई चीजों का मेल या मिश्रण हो। २. जिसका किसी से घनिष्ठ संबंध हो। ३. मिला-जुला मिश्रित।
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रली  : स्त्री० [सं० ललन=केलि, क्रीड़ा] १. रखने अर्थात् मिलने की क्रिया दशा या भाव। २. विहार। क्रीड़ा। ३. आनन्द। प्रसन्नता। हर्ष। पद—रंग-रली (दे०) स्त्री० [?] चेना नामक कदन्न।
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रल्ल  : पुं० =रेला। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रल्लक  : पुं० [सं०√रम्+क्विप्, म-लोप, तुक्, रत√ला+क, रल्ल+कन्] १. एक प्रकार का मृग। २. कंबल।
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रव  : पुं० [सं०√रु (ध्वनि)+अप्] १. आवाज। शब्द। २. कुछ देर तक निरन्तर होता रहनेवाला जोर का शब्द। २. गुल। शोर। हल्ला। पुं० =रवि (सूर्य) स्त्री०=रौ (गति)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रवक  : पुं० [?] एरंड या रेंड का वृक्ष। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रवकना  : अ० [हिं० रमना=चलना] १. तेजी से आगे बढ़ना। २. कोई चीज लेने के लिए उस पर झपटना। ३. उछलना।
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रवण  : पुं० [सं०√रु (ध्वनि)+युच्] १. कांसा नामक धातु। २. कोयल। ३. ऊँट। ४. विदूषक। ५. [√रु+ल्युट-अन]। वि० १. रव अर्थात् शब्द करता हुआ। २. तपा हुआ। गरम ३. अस्थिर। चंचल।
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रवण-रेती  : स्त्री०=रमण-रेती।
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रवताई  : स्त्री० [हिं० रावत+आई (प्रत्यय)] १. रावत होने की अवस्था या भाव। २. रावत का कर्त्तव्य, गुण या पद। ३. प्रभुत्व। स्वामित्व।
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रवथ  : पुं० [सं०√रु+अथ] कोयल।
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रवन  : पुं० [सं० रमण] पति। स्वामी। वि० रमण करनेवाला। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रवना  : अ० [सं० रव+हिं० ना (प्रत्यय)] १. शब्द होना। किसी शब्द या ना्म से प्रसिद्ध होना। ३. बोला या पुकारा जाना। अ० [सं० रमण] १. रमण करना। २. कौतुक या क्रीड़ा करना। ३. किसी के साथ अच्छी तरह मिलना-जुलना। उदाहरण—राम-नाम रवि रहिऔ।—कबीर।
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रवनि, रवनी  : स्त्री०=रमणी।
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रवन्ना  : पुं० [फा० रवाना] घरेलू काम-काज करनेवाला तथा बाजार से सौदा-सुल्फ लानेवाला नौकर। जैसे—एक मेरे घर अन्ना, दूसरे रवन्ना। २. वह कागज जिस पर रवाना किये माल का ब्यौरा होता है। ३. कोई चीज कहीं ले जाने का अनुमति पत्र। जैसे—चुंगी चुका देने पर मिलनेवाला रवन्ना। वि० =रवाना।
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रवाँ  : वि० [फा०] १. बहता हुआ। प्रवाहित। २. जो चल रहा हो। जारी। प्रचलित। ३. (कार्य) जिसका अच्छी तरह अभ्यास हो गया हो, और जिसके निर्वाह या सम्पादन में कोई कठिनता न होती हो। ४. अभ्यस्त। जैसे—रवाँ हाथ। ५. (शस्त्र) जिस की धार चोखी या तेज हो और इसीलिए जो ठीक और पूरा काम देना हो। ५. दे० ‘रवाना’। स्त्री जान। रूह।
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रवाँस  : पुं० [देश] बोडे की जाति का एक पौधा और उसकी फली जिसके बीजों की तरकारी बनती है।
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रवा  : पुं० [सं० रज, प्रा, रअ=धूल] [स्त्री० अल्पा० रई] १. किसी चीज का बहुत छोटा टुकड़ा। कण। दाना। रेजा। जैसे—चाँदी का रवा, मिस्री का रवा। २. किसी चीज के वे कोणाकार या लंबोतरे टुकड़े जो नमी निकल जाने पर प्रायः आपसे आप बन जाते हैं केलास (क्रिस्टल)। पद—रवा भर=बहुत थोड़ा। जरा सा। ३. सूजी जिसके कण उक्त प्रकार के होते हैं। ४. बारुद का कण या दाना। ५. घुँघरू में बजनेवाला कण या दाना। वि० [फा०] १. उचित। वाजिब। २. प्रचलित।
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रवाज  : स्त्री० [फा०] १. तरीका। दस्तूर। २. समाज में प्रचलित या मान्य कोई परंपरा या रूढ़ि। प्रथा। रीति। क्रि० प्र०—चलना।—देना।—निकलना।—पाना।—होना।
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रवादार  : वि० [फा०] [भाव० रवादारी] १. उचित प्रकार का व्यवहार करने तथा संबंध या लगाव रखनेवाला। उदारचेता। २. शुभचिंतक। हितैषी। ३. सहनशील। वि० =रवेदार। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रवादारी  : स्त्री० [फा०] १. रवादार होने की अवस्था या भाव। इस बात का ख्याल कि किसी को कष्ट या दुःख न दिया जाय। ३. उदारता। ४. सहृदयता।
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रवानगी  : स्त्री० [फा०] रवाना होने की क्रिया या भाव। प्रस्थान। चाला।
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रवाना  : वि० [फा० रवानः] १. जिसने कहीं से प्रस्थान किया हो। जो कहीं से चल पड़ा हो। प्रस्थित। २. कहीं से किसी के पास भेजा हुआ।
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रवानी  : स्त्री० [फा०] १. रवाँ होने की अवस्था या भाव। २. बहाव। ३. ऐसी गति जिसमें अटक आदि न होती हो। जैसे—पढ़ने या बोलने में रवानी होना। ४. प्रस्थान। रवानगी। (क्व०)
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रवाब  : पुं० =रबाब।
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रवाबिया  : पुं० [देश] लाल बलुआ पत्थर। पुं० =रबाबिया।
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रवायत  : स्त्री० [अ०] १. कहानी। किस्सा। २. कहावत। स्त्री० [अ० रिवायत] १. किसी के मुख से विशेषतः पैगम्बर के मुख से सुनी हुई बात दूसरों से कहना। २. इस प्रकार कही जानेवाली बात। ३. किवदंती। अफवाह। ४. कहावत। ५. किस्सा। कहानी।
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रवा-रवी  : स्त्री० [फा०] १. जल्दी। शीघ्रता। २. चल-चलाव। ३. भाग-दौड़।
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रवासन  : पुं० [देश] एक प्रकार का वृक्ष जिसके बीज और पत्ते औषधि के काम आते हैं।
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रवि  : पुं० [सं०√रु+इ] १. सूर्य। २. आक। मदार। ३. अग्नि। ४. नायक। नेता। सरदार। ५. लाल अशोक का पेड़। ६. पुराणानुसार एक आदित्य का नाम। ७. एक प्राचीन पर्वत। ८. धृतराष्ट्र का एक पुत्र।
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रवि-उच्च  : पुं० [सं०] किसी ग्रह की कक्षा या भ्रमण-पथ का वह बिंदु जो सूर्य से दूरतम पड़ता हो। ‘रवि-नीच’ का विपर्याय। (एफेलियन)
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रवि-कर  : पुं० [सं० ष० त०] सूर्य की किरण।
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रवि-कांत-मणि  : पुं० [सं० रवि-कांत, तृ० त० रविकान्त-मणि, कर्म० स०] सूर्यकांत मणि।
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रवि-कुल  : पुं० [ष० त०] क्षत्रियों का सूर्यवंश।
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रवि-चक्र  : पुं० [ष० त०] १. सूर्य का मंडल। २. सूर्य के रथ का चक्र या पहिया। ३. फलित ज्योतिष में, एक प्रकार का चक्र जो मनुष्य के शरीर के आकार का होता है और जिसमें यथा-स्थान नक्षत्र आदि रख कर बालक के जीवन की शुभ और अशुभ बातों के सम्बन्ध में फल कहा जाता है।
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रविज  : पुं० [सं० रवि√अन् (उत्पत्ति)+ड] शनैश्चर, जिसकी उत्पत्ति रवि या सूर्य से मानी जाती है।
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रविज-केतु  : पुं० [सं० कर्म० स०] एक प्रकार का केतु या पुच्छल तारे जिसकी उत्पत्ति सूर्य से मानी गई है।
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रविजा  : स्त्री० [सं० रविज+टाप्] यमुना। कालिंदी।
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रवि-जात  : पुं० [सं० पं० त०] सूर्य की किरण। वि० रवि से उत्पन्न।
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रवि-नतय  : पुं० [ष० त०] १. यमराज। २. शनैश्चर। ३. सुग्रीव। ४. कर्ण। ५. अश्वनी कुमार। ६. सावर्णि मनु। ७. वैवस्वत मनु।
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रवि-तनया  : स्त्री० [ष० त०] सूर्य की कन्या यमुना।
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रवि-तनुजा  : स्त्री०=रवि-तनया (यमुना)।
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रवि-दिन  : पुं० [ष० त०] रविवार।
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रविनंद, रवि-नंदन  : पुं० =रवि-तनय।
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रवि-नंदिनी  : स्त्री० [ष० त०] यमुना।
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रवि-नाथ  : पुं० [ब० स०] पद्म। कमल।
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रवि-नीच  : पुं० [सं०] किसी तरह ग्रह की कक्षा या भ्रमण-पथ का वह बिंदु जो सूर्य के निकटतम पड़ता है। ‘रवि-उच्च’ का विपर्याय। (पेरिहीलियन)
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रवि-पुत्र  : पुं० =रवि-तनय।
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रविपूत  : पुं० रविपुत्र (रवि-तनय)। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रवि-प्रिय  : पुं० [ब० स०] १. लाल कमल। २. लाल कनेर। ३. ताँबा। ४. आक। मदार। ५. लकुच या लकुट नामक वृक्ष और उसका फल।
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रवि-प्रिया  : स्त्री० [ब० स०+टाप्] एक देवी। (पुराण)
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रवि-बिंब  : पुं० [ष० त०] १. सूर्य का मंडल। २. माणिक्य या मानिक नामक रत्न।
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रवि-मंडल  : पुं० [ष० त०] वह लाल मंडलाकार बिंब जो सूर्य के चारों ओर दिखाई देता है। रविबिंब।
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रवि-मणि  : पुं० [मध्य० स०] सूर्यकांत मणि।
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रवि-मार्ग  : पुं० [सं०] सूर्य के भ्रमण का मार्ग। क्रांतिवृत्त। (ईक्लिक्टिक)
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रवि-रत्न  : पुं० [मध्य० स०] सूर्यकांत मणि।
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रवि-लोचन  : पुं० [ब० स०] विष्णु।
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रवि-लौह  : पुं० [मध्य० स०] ताँबा।
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रवि-वंश  : पुं० [ष० त०] क्षत्रियों का सूर्यकुल।
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रवि-वंशी (शिन्)  : वि० [सं० रविवंश+इनि] सूर्यवंशी।
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रवि-वाण  : पुं० [सं० उपमित० स०] पौराणिक कथाओं में वर्णित वह वाण जिसके चलाने से सूर्य का सा प्रकाश उत्पन्न होता था।
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रवि-वार  : पुं० [ष० त०] शनिवार और सोमवार के बीच का वार। एतवार।
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रवि-वासर  : पुं० [ष० त०] रविवार।
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रविश  : स्त्री० [फा०] १. चलने की क्रिया, ढंग या भाव। गति। चाल। २. आचार-व्यवहार। ३. तौर-तरीका। रंग-ढंग। ४. शैली। ५. बगीचों की क्यारियों के बीच में चलने के लिए बना हुआ छोटा मार्ग। क्रि० प्र०—काटना।—बनाना।
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रवि-संक्रांति  : स्त्री० [ष० त०] सूर्य का एक राशि में से दूसरी राशि में जाना। सूर्य-संक्रमण। दे० ‘संक्रांति’।
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रवि-संज्ञक  : पुं० [ब० स० कप्] ताँबा।
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रवि-सारथ  : पुं० [ष० त०] रवि अर्थात्, सूर्य का रथ हाँकनेवाला, अरुण।
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रवि-सुन्दर  : पुं० [सं० उपमित स०] वैद्यक में एक प्रकार का रस जिसके सेवन से भगंदर रोग नष्ट हो जाता है।
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रवि-सुअन  : पुं० =रविनंदन (रवि-तनय)।
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रवि-सुत  : पुं० =रविनंदन (रवि-तनय)।
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रवि-सूनु  : पुं० =रविनंदन (रवि-तनय)।
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रवे-दार  : वि० [हिं० रवा+फा० दार] जो रवों के रूप में हो। जिसमें रवे हों।
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रवैया  : पुं० [फा० रवीयः] १. आचार-व्यवहार। २. चाल-चलन। ३. तौर-तरीका। रंग-ढंग।
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रशना  : स्त्री० [सं०√अश् (भोजन)+युच्-अन+टाप्, रशादेश] १. जीभ। रसना। २. रस्सी। ३. कर-धनी। मेखला।
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रशना-कलाप  : पुं० [ष० त०] धागे आदि की बनी हुई एक प्रकार की करधनी जो प्राचीन काल में स्त्रियाँ कमर में पहनती थीं।
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रशना-गुण  : पुं० =रशनाकलाप।
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रशनोपमा  : स्त्री०=रशनोपमा (अलंकार)।
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रशाद  : पुं० [अ०] १. सदाचार। २. सन्मार्ग।
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रशीद  : वि० [अ०] १. रशाद अर्थात् सन्मार्ग पर चलनेवाला तथा दूसरों को सन्मार्ग पर चलानेवाला। २. गुरु-कृपा से जिसने किसी कला या विद्या में निपुणता प्राप्त की हो।
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रश्क  : पुं० [फा०] ईर्ष्याजन्य यह विचार कि जैसा वह है वैसा मुझे भी होना चाहिए, अथवा मैं किसी प्रकार उसके स्थान पर हो जाता।
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रश्मि  : स्त्री० [सं०√अश्+मि, रशादेश] १. किरण। २. पलकों परके बाल। बरौनी। ३. घोडे की लगाम। बाग।
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रश्मि-कलाप  : पुं० [ष० त०] मोतियों का वह हार जिसमें ६४ या ५४ लड़ियाँ हों।
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रश्मि-केतु  : पुं० [मध्य० स०] १. वह केतु या पु्च्छल तारा जो कृतिका नक्षत्र में स्थित होकर उदित हो।
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रश्मि-चित्रण  : पुं० [सं०] रेडियो-चित्रण।
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रश्मि-मापक  : पुं० [ष० त०] विकिरणमापी।
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रश्मि-मुक्  : पुं० [सं० रश्मि√मुच् (छोड़ना)+क्विप्, उपपद, स] सूर्य।
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रष्षन  : पुं० =रक्षण। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रस  : पुं० [सं०√रस् (आस्वादन)+अच्] [वि० रसाल, रसिक] १. वनस्पतियों अथवा उनके फूल-पत्तों आदि में रहनेवाला वह जलीय अंश या तरल पदार्थ जो उन्हें कूटने, दबाने, निचोड़ने आदि पर निकलता या निकल सकता है। (जूस)। जैसे—अंगूर, ऊख, जामुन आदि का रस। २. वृक्षों के शरीर से निकलने या पोछकर निकाला जानेवाला तरल पदार्थ। निर्यास। मद। (सैप) जैसे—ताड़, शाल आदि वृक्षो में से निकला या निकाला हुआ रस। ३. किसी चीज को उबालने पर निकलनेवाला अथवा तरल सार भाग। जूस। रस। शोरबा। ४. प्राणियों के शरीर में से निकलनेवाला कोई तरल पदार्थ। जैसे—पसीना, दूध रक्त आदि। पद—गो-रस=दूध या उससे बने हुए दही, मक्खन आदि पदार्थ। ५. प्राणियों, विशेषतः मनुष्यों के शरीर में खाद्य पदार्थों के पहुँचने पर उनका पहले-पहल बननेवाला वह तरल रूप जिससे आगे चलकर रक्त बनता है। चर्मसार। रक्तसार। रसिका। (वैद्यक में इसे शरीरस्थ सात धातुओं में से पहली धातु माना जाता है)। ६. जल। पानी। उदाहरण—महाराजा किवड़िया खोखो, रस की बूँदें पड़ी।—गीत। ७. पानी में घोला हुआ गुड़, चीनी, मिसरी या ऐसी ही और कोई चीज। जैसे—देहात में किसी के घर जाने पर वह प्रायः रस पिलाता है। ८. कोई तरल या द्रव पदार्थ। ९. घोड़ों, हाथियों आदि का एक रोग जिसमें उनके पैरों में से जहरीला या दूषित पानी बहता या रसता है। १॰. किसी पदार्थ का सार भाग। तत्त्व। सत्त। ११. पारा। उदाहरण—रस मारे रसायन होय (कहा०) १२. धातुओं आदि को (प्रायः पारे की सहायता से) फूँककर तैयार किया हुआ भस्म या रसौषध। जैसे—रसपर्पटी, रस-माणिक्य, रस-सिंदूर आदि। १३. लासा। लुआब। १४. वीर्य। १५. शिंगरफ। हिंगुल। १६. गंध-रस। शिलारस। १७. बोल नामक गंध द्रव्य। १८. जहर। विष। १९. पहले खिचाव का शोरा जो बहुत तेज होता और बढ़िया माना जाता है। २॰. खाने-पीने की चीज मुँह में पड़ने पर उससे जीभ को होनेवाला अनुभव या मिलनेवाला स्वाद। रसनेंद्रिय में होनेवाली अनुभूति या संवेदन (फ्लेवर)। विशेष—हमारे यहाँ वैद्यक में छः रस माने गये हैं—अम्ल, कटु, कषाय, तिक्त, मधुर और लवण। २१. कविता आदि में उक्त रसों के आधार पर माना हुआ छः की संख्या का वाचक शब्द। २२. कार्य, विषय व्यक्ति आदि के प्रति होनेवाला अनुराग। प्रीति। प्रेम। मुहब्बत। पद—रस-भंग=रस-रीति। मुहावरा—रस खोटा होना=आपस में प्रेम-पूर्ण व्यवहार में अन्तर पड़ना। २३. यौवन काल में मनुष्य के मन में अनुराग या प्रेम का होनेवाला संचार। मुहावरा—रस भीजना या भीनना= (क) मनुष्य में यौवन का आरंभ होना। (ख) मन में किसी के प्रति अनुराग या प्रेम का संचार होना। (ग) किसी पदार्थ का ऐसा समय आना कि उससे पूरा आनंद या सुख मिल सके। २४. दार्शनिक क्षेत्र में, इंद्रियार्थों के साथ इंद्रियों का संयोग होने पर मन या आत्मा को प्राप्त होनेवाला आनंद या सुख। २५. लोक-व्यवहार में, किसी काम या बात से किसी प्रकार का संबंध होने पर उससे मिलनेवाला आनंद या उसके फल-स्वरूप उत्पन्न होनेवाली रुचि। मजा। जैसे—कोई किसी रस में मगन है तो कोई किसी रस में। उदाहरण—राम पुनीत विषय रस रुखे। लोलुप भूप भोग के भूखे।—तुलसी। २६. उपनिषदों के अनुसार आनंद-स्वरूप ब्रह्म। २७. मन की उमंग या तरंग। मौज। २८. मन का कोई आवेग। जोश। मनोवेग। २९. किसी काम या बात में रहने या होनेवाला कोई प्रिय अथवा सुखद तत्त्व। जैसे—उसके गले (या गाने) में बहुत रस है। ३॰. किसी कार्य या व्यवहार के प्रति होनेवाली कुतूहलमूलक प्रवृत्ति या उससे होनेवाली सुखद अनुभूति। दिलचस्पी। (इन्टरेस्ट) जैसे—(क) इस पुस्तक में हमें कोई रस नहीं मिला। (ख) वे अब सार्वजनिक कार्यों में विशेष रस लेने लगे हैं। ३१. साहित्यिक क्षेत्र में, (क) तात्वत् वक दृष्टि से कथानकों, काव्यों, नाटकों आदि में रहनेवाला वह तत्त्व जो अनुराग, करुणा क्रोध, प्रीति, रति आदि मनोभाव जो जाग्रत, प्रबल तथा सक्रिय करता है। यह तत्त्व कवियों, लेखकों आदि की प्रतिभा, रचना-कौशल और उपयुक्त शब्द-योजना तथा वाक्य-विन्यास से उत्पन्न होता है। (ख) भारत के प्राचीन साहित्यकारों के मत से उक्त तत्त्व का वह विशिष्ट स्वरूप जिसकी निष्पत्ति अनुभाव विभाव और संचारी के योग से होती है और जो सहृदय पाठकों या दर्शकों के मन में रहनेवाले स्थायी भावों को परिपक्व, पुष्ट और जाग्रत या व्यक्त करके उत्कृष्ट या परम सीमा तक पहुँचाता और पाठकों या दर्शकों को प्रसन्न तथा संतुष्ट करके उनके साथ एकात्मता स्थापित करता है। (सेन्टिमेन्ट) इसके नौ प्रकार या भेद कहे गये हैं०-अद्भुत, करुण, भयानक, रौद्र, वीभत्स, वीर, शांत, श्रृंगार और हास्य। विशेष—प्रत्येक रस के ये चार अंग कहे गये हैं।—स्थायी भाव, विभाव (आलंबन और उद्दीपन), अनुभाव और संचारी भाव। ३२. कविता के उक्त नौ रसों के आधार पर नौ की संख्या का सूचक शब्द। ३३. अनुराग, दया आदि कोमल वृत्तियों के वश में रहने की अवस्था या भाव। उदाहरण—राजत अंग, रस-बिरस अति, सरस-सरस रस भेद।—केशव। ३४. काम-क्रीड़ा,। केलि। रति। विहार। ३५. काम-वासना। ३६. गुण, तत्त्व, रूप, विशेषता आदि के विचार से होनेवाला वर्ग या विभाग। तरह। प्रकार। जैसे—एक रस, समरस। उदाहरण—(क) एक ही रस दुनी न हरब सोक सोंसति सहति।—तुलसी। (ख) सम-रस, समर-सकोच-बस, बिबस न ठिक ठहराइ।—बिहारी। ३७. ढंग। तर्ज। उदाहरण—तिनका बयार के बस भावै त्यों उड़ाइ लै जाइ अपने रस।—स्वामी हरिदास। ३८. गुण। सिफत। ३९. केशव के अनुसार रगण और सगण की संज्ञा। स्त्री० [?] एक प्रकार की भेड़ जो गिलगित्त के पामीर आदि उत्तरी प्रदेशों में पाई जाती है। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रसक  : पुं० [सं० रस+कन्] १. फिटकरी। २. संगेबसरी। खपरिया। पुं० =रक्षक। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रसक-कारवेल्लक  : पुं० [सं० कर्म० स०] पतला खपरिया। संगेबसरी।
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रसक-ददुँर  : पुं० [सं० कर्म० स०] दलदार मोटा खपरिया या संगेबसरी।
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रस-कपूर  : पुं० [सं० रसकर्पूर] एक प्रसिद्ध उपधातु जिसमें पारे का भी कुछ अंश होता है और जो दवा के काम में आता है। यह प्रायः ईगुर के समान होता है, इसीलिए कहीं-कहीं सफेद शिगरफ भी कहलाता है। (कैलोमेल)।
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रस-कर्म  : पुं० [ष० त०] पारे की सहायता से रस आदि तैयार करने की क्रिया। (वैद्यक)
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रस-कलानिधि  : पुं० [स० त०] संगीत में कर्नाटकी पद्धति का एक राग।
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रस-कुल्या  : स्त्री० [ष० त०] कुशद्वीप की एक नदी पुराण।
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रस-केलि  : स्त्री० [मध्य० स०] १. प्रेमी और प्रेमिका की क्रीड़ा या विहार। २. हँसी-दिल्लगी। मजाक।
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रसकोरा  : पुं० [हिं० रस+कौर] रसगुल्ला नाम की मिठाई।
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रसखीर  : स्त्री० [हिं० रस+खीर] गुड़ या चीनी के शरबत अथवा ऊख के रस में पकाए हुए चावल। मीठा भात।
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रसगंध  : पुं० =रसगंधक।
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रसगंधक  : पुं० [सं० रस-गंध, ब० स०+कन्] १. गंधक। २. रसांजन। रसौंत। ३. बोल नामक गन्ध द्रव्य। ४. ईगुर। शिगरफ।
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रसगत-ज्वर  : पुं० [सं० रस-गत, द्वि० त० रसगत-ज्वर, कर्म० स०] वैद्यक के अनुसार ऐसा ज्वर जिसके कीटाणु या विष शरीर की रस नामक धातु तक में पहुँचकर समा गया हो।
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रस-गर्भ  : पुं० [ब० स०] १. रसौत। रसांजन। २. ईगुर। शिगरफ।
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रस-गुनी  : पुं० [सं० रस+गुणी] काव्य, संगीत आदि का अच्छा ज्ञाता। रसज्ञ। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रस-गुल्ला  : पुं० [हिं० रस+गोला] छेने की एक प्रकार की बँगला मिठाई जो गुलाब जामुन के समान गोल और शीरे में पगी हुई होती है।
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रस-ग्रह  : पुं० [सं० रस√ग्रह (ग्रहण)+अच्] जीभ। रसना।
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रस-घन  : पुं० [सं० ब० स०] आनंदघन, श्रीकृष्णचन्द्र। वि० १. बहुत अधिक रसवाला। २. स्वादिष्ट।
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रसचंद्र  : पुं० [सं०] संगीत में बिलावल ठाठ का एक राग।
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रसछन्ना  : पुं० [हिं० रस+छन्ना=छानने की चीज] [स्त्री० अल्पा० रसछन्नी] ऊख का रस छानने की एक प्रकार की चलनी।
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रसज  : पुं० [सं० रस√जन् (उत्पत्ति)+ड] १. गुड़। २. रसौत। ३. शराब की तलछट।
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रस-जात  : पुं० [सं० पं० त०] रसौत।
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रसज्ञ  : वि० [सं० रस√ज्ञा (जानना)+क] [भाव० रसज्ञता] १. वह जो रस का ज्ञाता हो। रस जाननेवाला। २. काव्य के रस का ज्ञाता। काव्य-मर्मज्ञ। ३. रासायनिक क्रियाएँ या प्रयोग करनेवाला। रसायनी। ४. किसी विषय का अच्छा जानकार। निपुण।
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रसज्ञता  : स्त्री० [सं० रसज्ञ+तल्+टाप्] रसज्ञ होने की अवस्था, धर्म या भाव।
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रसज्ञा  : स्त्री० [सं० रसज्ञ+टाप्] १. जीभ। २. गंगा।
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रस-ज्येष्ठ  : पुं० [सं० स० त०] १. मधुर या मीठा रस। २. साहित्य में श्रृंगार रस।
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रसडली  : स्त्री० [हिं० रस+डली] दक्षिण भारत में होनेवाला एक प्रकार का गन्ना जिसका रंग पीलापन लिए हुए हरा होता है। रसवली।
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रसत  : स्त्री० =रसद। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रस-तन्मात्रा  : स्त्री० [ष० त०] जल की तन्मात्रा। वि० दे० ‘तन्मात्र’।
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रसता  : स्त्री० [सं० रस+तल्+टाप्] रस का धर्म या भाव। रसत्व।
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रस-तेज (स्)  : पुं० [ब० स०] खून। रक्त। लहू।
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रस-त्याग  : पुं० [ष० त०] मीठी अथवा रसपूर्ण वस्तुओं का किया जानेवाला त्याग। (जैन)
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रसत्व  : पुं० [सं० रस+त्व] रस का धर्म या भाव। रसता।
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रसद  : वि० [सं० रस√दा (देना)+क] १. रस देनेवाला। २. स्वादिष्ट। ३. आनन्द तथा सुख देनेवाला। पुं० १. चिकित्सक। २. मध्ययुग में वह भेदिया जो किसी को विष आदि खिलाता था। स्त्री० [अ०] १. अंश। हिस्सा। २. बांट। ३. खाद्य सामग्री। विशेषतः कच्चा अनाज जो अभी पकाया जाने को हो। ४. वे खाद्य पदार्थ जो यात्री, सैनिक, आदि प्रवास-काल में अपने साथ ले जाते हैं।
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रसदा  : स्त्री० [सं० रसद+टाप्] सफेद निर्गुंडी।
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रसदार  : वि० [सं० रस+फा० दार (प्रत्यय)] १. जिसमें रस अर्थात् जूस हो। जैसे—रसदार आम। २. जिसमें मिठास हो। जैसे—रसदार बात। ३. स्वादिष्ट। ४. रसेदार।
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रस-दारु  : पुं० [मध्य० स०] वृक्षों में वह ताजी बनी हुई लकडी जो उसकी हीर की लकड़ी और छाल के बीच में रहती है। (सैप-उड)
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रस-दालिका  : स्त्री० [ष० त०] ऊख। गन्ना।
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रस-द्रव्य  : पुं० [मध्य० स०] वह द्रव्य या पदार्थ जो रासायनिक प्रक्रियाओं से बनता या उनमें काम आता हो। (केमिकल)
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रसद्रावी (विन्)  : पुं० [सं० रस√द्रु (गति)+णिच्+णिनि, उप० स०] मीठा जंबूरी नींबू।
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रस-धातु  : पुं० [सं० मध्य० स०] १. पारा। २. शरीर में बननेवाली रस नामक धातु। (दे० रस)।
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रस-धेनु  : स्त्री० [मध्य० स०] दान के उद्देश्य से गुड़ की भेलियों आदि से बनाई जानेवाली गाय की मूर्ति।
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रसन  : पुं० [सं०√रस (आस्वादन)+ल्युट—अन] १. खाने-पीने की चीज का स्वाद लेना। चखना। २. ध्वनि। ३. जबान। जीभ। ४. शरीर के अन्दर का कफ। बलगम। वि० पसीना लानेवाला (उपचार या औषध) पुं० =रशना। (रस्सा)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रसना  : स्त्री० [सं०√रस्+णिच्+युच्-अन+टाप्] १. जीभ। जबान। उदाहरण—सोइ रसना जो हरिगुन गावे। मुहावरा—रसना खोलना=कुछ समय तक चुप रहने के बाद बातें करना या आरंभ करना। बोलने लगना। रसना तालू से लगाना=कुछ भी उत्तर न देना या अथवा न बोलना। २. न्याय के अनुसार ऐसा रस जिसका अनुभव रसना या जीभ से किया जाता है। स्वाद। ३. नागदौनी। रासना। ४. गंध-भद्रा नाम की लता। ५. रस्सी। रज्जु। ६. करधनी। मेखला। ७. लगाम। ८. चन्द्रहार। ९. बौद्ध हठयोग में पिंगला नाड़ी की संज्ञा। अ० [हिं० रस+ना (प्रत्यय)] १. किसी चीज में से कोई तरल या द्रव्य अंश धीरे-धीरे बहना या टपकना। जैसे—छत में से पानी रसना। पद—रस रस या रसे रसे=धीरे-धीरे। २. गीले होने की दशा में, अन्दर का द्रव पदार्थ धीरे-धीरे निकलकर ऊपरी तल पर आना। जैसे—चन्द्रमा के सामने चन्द्रकांत मणि रसने लगती है। ३. रसमग्न होना। प्रफुल्ल होना। ४. अनुराग या प्रेम से युक्त होना। ५. किसी प्रकार के रस में मग्न होना। आनन्द या सुख में लीन होना। ६. किसी चीज या बात से अच्छी तरह युक्त होना।
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रस-नाथ  : पुं० [ष० त०] पारा।
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रसना-पद  : पुं० [ष० त०] नितंब। चूतड़।
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रस-नायक  : पुं० [ष० त०] १. शिव। २. पारा।
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रसना-रव  : पुं० [ब० स०] पक्षी, जो अपनी रसना से शब्द करते हों।
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रसनीय  : वि० [सं०√रस्+अनीयर] १. जिसका रस या स्वाद लिया जा सके। चखे जाने या स्वाद लेने के योग्य। २. स्वादिष्ट।
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रसनेंद्रिय  : स्त्री० [सं० रसना-इंद्रिय, कर्म० स०] रस ग्रहण करने की इंद्रिय, जीभ। रसना।
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रसनेत्रिका  : स्त्री० [सं० रस-नेत्र, उपमित० स+ठन्-इक-टाप्] मैनसिल (खनिज द्रव्य)।
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रसनेष्ट  : पुं० [सं० रसना-इष्ट, ष० त०] ऊख। गन्ना।
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रसनोपमा  : स्त्री० [सं० रसना-उपमा, उपमित, स०] उपमा अलंकार का एक भेद जिसमें पहले उपमेय को किसी दूसरे उपमेय का उपमान, दूसरे उपमेय को तीसरे उपमान और इसी प्रकार उत्तरोत्तर उपमेय को उपमान बनाया जाता है।
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रसपति  : पुं० [सं० ष० त०] १. चन्द्रमा। २. पृथ्वी का स्वामी अर्थात् राजा। ३. पारा। ४. साहित्य में श्रृंगार रस।
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रस-पर्पटी  : स्त्री० [सं० मध्य० स०] पारे को शोधकर बनाया जानेवाला एक प्रकार का रस। (वैद्यक)
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रस-पाकज  : पुं० [सं० रस-पाक, ष० त०√जन् (उत्पत्ति)+ड] १. गुड़। २. चीनी।
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रस-पाचक  : पुं० [सं० ष० त०] मधुर भोजन बनानेवाला। रसोइया।
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रस-पूर्तिका  : स्त्री० [सं० ब० स० कप्+टाप्] मालकंगनी। २. शतावर।
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रस-प्रबंध  : पुं० [सं० मध्य० स०] १. ऐसी कविता जिसमें एक ही विषय बहुत से परस्पर असंबद्ध पद्यों में कहा गया हो। २. नाटक। ३. प्रबंध-काव्य।
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रस-फल  : पुं० [सं० ब०स] १. नारियल का वृक्ष। २. आँवला।
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रस-बंधन  : पुं० [सं० ष० त०] शरीर के अंतर्गत नाड़ी के एक अंश का नाम (वैद्यक)।
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रस-बत्ती  : स्त्री० [हिं० रस+बत्ती] एक प्रकार का पतीला जिसके व्यवहार से पुराने ढंग की तोपे और बंदूकें दागी जाती थी।
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रसबरी  : स्त्री०=रसभरी।
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रसभरी  : स्त्री० [अं० रैप्सबेरी] १. एक प्रकार का पौधा जिसमें खटमीठे गोल फल लगते हैं। २. उक्त पौधे का फल। मकोय।
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रसभव  : पुं० [सं० रस√भू (होना)+अच्] रक्त। खून। लहू।
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रस-भस्म  : पुं० [सं० ष० त०] पारे का भस्म।
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रस-भीना  : वि० [सं० रस+भीनना] [स्त्री० रसभीनी] १. आनन्द में मग्न। २. (व्यंजन) आदि जो न तो अधिक रसेदार ही हो और न बिल्कुल सूखा ही। थोड़े रसावाला।
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रस-भेद  : पुं० [सं० ष० त०] वैद्यक में एक प्रकार का औषध जो पारे से बनता है।
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रसभेदी (दिन्)  : वि० [सं० रसभेद+इनि] (फल) जो अधिक पक और फलतः जूस या रस के अधिक बढ़ जाने के कारण फट गया हो।
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रस-मंजरी  : स्त्री० [सं० मध्य० स०] संगीत में कर्नाटकी पद्धति की एक रागिनी।
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रस-मंडूर  : पु० [सं० मध्य० स०] वैद्यक में एक प्रकार का रसौषध जो हर्रे, गंधक और मंडूर से बनता है और जिसका व्यवहार शूल रोग में होता है।
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रसम  : स्त्री०=रस्म।
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रस-मर्द्दन  : पुं० [सं० ष० त०] पारे को भस्म करने या मारने की प्रक्रिया या भाव। (वैद्यक)
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रस-मल  : पुं० [सं० ष० त०] शरीर से निकलनेवाला किसी प्रकार का मल। जैसे—विष्ठा, मूत्र, पसीना, थूक आदि।
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रस-मसा  : वि० [हिं० रस+मसा (अनु०)] १. आर्द्र। गीला। २. पसीने से तर और थका हुआ। ३. आनन्दमग्न। ४. किसी के प्रेम में पूरी तरह से मग्न। ५. आन्नद देनेवाला। सुखद। जैसे—रस-मसे दिन।
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रस-माणिक्य  : पुं० [सं० स० त०] वैद्यक में एक प्रकार का औषध जो हरताल से बनता है और जो कुष्ट आदि रोगों में उपकारी माना जाता है।
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रस-माता  : स्त्री० [सं० रस-मातृका] जीभ। रसना। जबान। (डिं०) वि० रस में मत्त या मस्त।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रस-मातृका  : स्त्री० [सं० ष० त०] जीभ। जबान।
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रस-मारण  : पुं० [सं० ष० त०] पारा मानने अर्थात् शुद्ध करके उसका भस्म बनाने की क्रिया या भाव।
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रसमाला  : स्त्री० [सं० ष० त०] शिलारस नामक सुगंधित द्रव्य।
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रसमि  : स्त्री० [सं० रश्मि] १. किरण। २. चमक। दीप्ति। ३. प्रकाश।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रसमंडी  : स्त्री० [हिं० रस+मंडी] एक प्रकार की बंगला मिठाई।
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रसमैत्री  : स्त्री० [ष० त०] १. दो या अधिक रसों का मिश्रण। २. साहित्य में रसों में होनेवाला पारस्परिक मेल और सामंजस्य। इसका विपर्याय रस-विरोध है। ३. खाद्य पदार्थों के संबंध में दो ऐसे रसों का मेल जिनसे स्वाद में वृद्धि हो। जैसे—तीता-नमकीन खटमीठा आदि।
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रस-योग  : पुं० [सं० ष० त०] वैद्यक में एक प्रकार का औषध।
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रस-रंग  : पुं० [हिं०] १. प्रेम के द्वारा उत्पन्न या प्राप्त होनेवाला आनन्द या सुख। मुहब्बत का मजा। २. प्रेम के प्रसंग में की जानेवाली क्रीड़ा। केलि।
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रस-रंजनी  : स्त्री० [ष० त०] संगीत में बिलावन ठाठ की एक रागिनी।
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रसरा  : पुं० [स्त्री० रसरी] रस्सा।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रस-राज  : पुं० [सं० ष० त०] १. पारद। पारा। २. साहित्य का श्रृंगार रस। ३. रसांजन। रसौत। ४. वैद्यक में एक प्रकार का औषध जो ताँबे के भस्म, गंधक और पारे के योग से बनता है और जिसका व्यवहार तिल्ली, बरवट आदि में होता है।
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रसराय  : पुं० =रसराज।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रसरी  : स्त्री० रसरा का स्त्री०अल्पा।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रस-रीति  : स्त्री० [सं० ष० त०] प्रेमी या प्रेमिका से बरताव करने का अच्छा ढंग।
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रसरैना  : वि० [सं० रस+रमणी] [स्त्री० रस-रैनी] रसिक। उदाहरण—अति प्रगल्भ बैनी रस रैनी।—नंददास।
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रसल  : वि० [सं० रस√लिह् (आस्वादन)+अच्] १. पारा। २. रसांजन। रसौत।
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रसवंत  : पुं० [सं० रसवत्] रसिक। रसिया। वि० रस से भरा हुआ। रसदार।
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रसवंती  : स्त्री०=रसौत (रसांजन)।
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रसवट  : पुं० =रसवर (नाव की संधियों में भरने का मसाला)।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रसवत्  : वि० [सं० रस+मतुप्] [स्त्री० रसवती] जिसमें रस हो। रसवाला। पुं० साहित्य में एक प्रकार का अलंकार जो उस समय माना जाता है, जब एक रस किसी दूसरे रस अथवा उसके भाव, रसाभाव, भावाभास आदि का अंग बनकर आता है। जैसे—युद्ध में निहत वीरपति का हाथ पकड़कर पत्नी का यह कहते हुए विलाप करना-यह वही हाथ है जो प्रेमपूर्वक मुझे आलिंगन करता था। यहाँ श्रृंगार रस केवल करुण रस का अंग बनकर आया है।
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रसवत  : स्त्री० १. दे० ‘रसौत’। २. दे० ‘दारुहल्दी’।
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रसवती  : स्त्री० [सं० रसवत्+ङीष्] १. संपूर्ण जाति की एक रागिनी जिसमें सब शुद्ध स्वर लगते हैं। २. रसोई घर। वि० स्त्री० रसवाली।
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रसवत्ता  : स्त्री० [रसवत्त+तल्+टाप्०] १. रसयुक्त होने की अवस्था , धर्म या भाव। रसीलापन। २. माधुर्य। मिठास। ३. सुन्दरता।
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रसवर  : पुं० [हिं० रसना] नाव का संधि को बंद करने के लिए उसमें लगाया जानेवाला मसाला।
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रस-वर्णक  : पुं० [सं० ष० त०] वैद्यक की कुछ विशिष्ट वनस्पतियाँ, जिनसे रंग तैयार किये जाते हैं। जैसे—अनार का फूल, लाख, हल्दी मंजीठ आदि।
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रसवली  : स्त्री०=रस-डली (गन्ना)।
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रसवाई  : स्त्री० [हिं० रस+वाई (प्रत्यय)] किसानों के यहाँ किसी फसल का ऊख पहली बार पेरने के समय होनेवाला एक कृत्य।
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रसवाद  : पुं० [सं० ष० त०] १. रस अर्थात् प्रेम या आनंद की बातचीत रसिकता की बातचीत। २. मन बहलाव के लिए होनेवाला परिहास हँसी-ठट्ठा। ३. प्रेमी और प्रेमिका में होनेवाली व्यर्थ की कहा-सुनी या बकवास। ४. साहित्यिक क्षेत्र में यह मत या सिद्धान्त कि रस के सम्बन्ध में विचार करते हुए और उसके महत्त्व का ध्यान रखते हुए ही साहित्यिक रचना की जानी चाहिए।
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रसवादी (दिन्)  : वि० [सं० रसवाद+इनि] रसवाद-संबंधी। पुं० रसवाद के सिद्धान्तों का प्रतिपादक या अनुयायी।
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रसवान् (वत्)  : पुं० [सं० रस+मतुप्] वह पदार्थ जिसमें ऐसा गुण या शक्ति हो जिसमें उसके कण रसना से संयुक्त होने पर विशेष प्रकार की अनुभूति या संवेदन हो।
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रसवास  : पुं० [सं० ब० स०] ढगण के पहले भेद (।ऽ) की संज्ञा।
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रस-वाहिनी  : स्त्री० [सं० रस√वह् (प्रापण)+णिनि, +ङीष् उप० स०] वैद्यक के अनुसार खाए हुए पदार्थ से बने सार-भाग को फैलानेवाली नाड़ी।
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रसविक्रयी (यि्)  : पुं० [सं० रस-वि√क्री (बेचना)+णिनि, उप० स०] वह जो मदिरा बेचता हो, अर्थात् कलवार।
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रसविरोध  : पुं० [सं० ष० त०] ऐसे रसों का मिश्रण या मेल जिससे स्वाद बिगड़ जाता है। (सुश्रुत) जैसे—तीते और मीठे में नमकीन और मीठे में कड़ुए और मीठे में रसविरोध है। २. साहित्य में एक ही पद्य में होनेवाली दो परस्पर प्रतिकूल रसों की स्थिति।
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रस-वेधक  : पुं० [सं० ष० त०] सोना।
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रस-शार्दूल  : पुं० [सं० स० त०] वैद्यक में एक प्रकार का रस जो अभ्रक, ताँबे, लोहे, मैनसिल, पारे, गंधक, सोहागे, जवाखार, हड़ और बहेड़े आदि के योग से बनता है और जो सूतिका रोग के लिए विशेष उपकारी कहा गया है।
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रस-शास्त्र  : पुं० [सं० ष० त०] रसायन-शास्त्र।
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रस-शेखर  : पुं० [सं० स० त०] वैद्यक के अनुसार एक प्रकार का रस जो पारे और अफीम के योग से बनता है और जो उपदंश आदि रोगों में गुणकारी कहा गया है।
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रस-शोधन  : पुं० [सं० ष० त०] १. पारे को शुद्ध करने की क्रिया या भाव। २. सुहागा।
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रस-संप्रदाय  : पुं० [सं०] साहित्यिक क्षेत्र में ऐसे लोगों का वर्ग या समूह जो रसवाद के अनुयायी हों अथवा उसके सिद्धान्तों का पालन करते हों।
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रस-संभव  : पुं० [सं० ष० त०] रक्त। लहू। खून।
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रस-संरक्षण  : पुं० [सं० ष० त०] पारे को शुद्ध और मूर्च्छित करने, बाँधने और भस्म करने की ये चारों क्रियाएँ। (वैद्यक)
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रस-संस्कार  : पुं० [सं० ष० त०] पारे के मूर्च्छन, बंधन, मारण आदि अठारह प्रकार के संस्कार। (वैद्यक)
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रस-सागर  : पुं० [सं० ष० त०] प्लक्ष द्वीप में स्थित ऊख के रस का एक सागर। (पुराण)
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रस-साम्य  : पुं० [सं० ष० त०] रोगी की चिकित्सा करने के पहले यह देखना कि शरीर में कौन सा रस अधिक और कौन-सा कम है। (वैद्यक)
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रस-सार  : पुं० [सं० ष० त०] १. मधु। शहद। २. जहर। विष। (डिं०)
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रस-सिंदूर  : पुं० [मध्य० स०] पारे और गंधक के योग से बनाया जानेवाला एक प्रकार का रस। (वैद्यक)
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रस-स्थान  : पुं० [सं० ष० त०] ईंगुंर।
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रसाँ (सा)  : वि० [फा०] पहुँचाने या ले जानेवाला। जैसे—चिट्टीरसाँ।
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रसांगक  : पुं० [सं० रस-अंग, ब० स+कन्] धूप सरल का वृक्ष। श्रीवेष्ठ।
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रसांजन  : पुं० [सं० रस-अंजन, मध्य० स०] रसौत। रसवत।
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रसांतर  : पुं० [सं० रस-अंतर, मयू० स०] एक रस की अवस्थिति में दूसरे रस का होनेवाला आविर्भाव या संचार।
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रसांतरण  : पुं० [सं० रस-अंतरण, ष० त०] एक रस की अवस्थिति हटा कर दूसरे रस का संचार करना। जैसे—प्रेम चर्चा के समय बिगड़कर प्रिय की उपेक्षा करना या उसे भय दिखाना या क्रोध के समय हँसाकर प्रसन्न करना।
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रसा  : स्त्री० [सं० रस+अच्+टाप्] १. पृथ्वी। जमीन। २. रासना। ३. पाढ़ा नामक लता। ४. शल्लकी सलई। ५. कंगनी नामक अन्न। ६. द्राक्षा। दाख। ७. मेदा। ८. शिलारस। लोबान। ९. आम। १॰. काकोली। ११. नदी। १२. रसातल। १३. रसना। जीभ। पुं० [हिं० रस] १. तरकारी आदि का झोल। शोरबा। पद—रसेदार= (तरकारी) जिसमें रसा भी हो। शोरबेदार। २. जूस। रस। जैसे—फलों का रसा। वि० =रसाँ।
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रसाइन  : पुं० =रसायन। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रसाइनी  : स्त्री०=रसाइनी। पुं० =रसायनज्ञ। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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रसाई  : स्त्री० [फा०] १. पहुंचने की क्रिया या भाव। पहुँच। २. बुद्धि आदि के कहीं तक पहुँच सकने की शक्ति।
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रसाकर्षण  : पुं० [सं० रस-आकर्षण, ष० त०] वह प्रक्रिया जिससे शरीर का कोई अंग रंध्रों के द्वारा बाहर का रस खींचकर अपने अन्दर करता है। (ओस्मोमिस)।
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रसाग्रज  : पुं० [सं० रस-अग्रज, ष० त०] रसौत।
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रसाग्र्य  : पुं० [सं० रस-अग्र, य, ष० त०] १. पारा। २. रसाजंन। रसौत।
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रसाज्ञान  : पुं० [सं० रस-अज्ञान, ष० त०] १. इस बात की जानकारी न हो कि अमुक रस कौन हैं। २. वह स्थिति या दशा जिसमें रस अर्थात् स्वाद का ज्ञान न होता हो।
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रसाढ्य  : पुं० [सं० रस-आढ्य, तृ० त०] अमड़ा। आम्रातक।
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रसाढ्या  : स्त्री० [रसाढ्य+टाप्] रासना।
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रसातल  : पुं० [सं० ष० त०] पुराणानुसार पृथ्वी के नीचेवाले सात लोकों में से छठा लोक। मुहावरा—रसातल पहुँचाना या रसातल में पहुँचाना=पूरी तरह से नष्ट या मटियामेट कर देना। मिट्टी में मिला देना। बरबाद कर देना।
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रसादार  : वि० =रसेदार।
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रसाधार  : पुं० [सं० रस-आधार, ष० त०] सूर्य।
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रसाधिक  : पुं० [सं० रस-अधिक, च० त०] सुहागा।
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रसाधिका  : स्त्री० [सं० रस-अधिका, तृ० त०] किशमिश।
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रसाध्यक्ष  : पुं० [सं० रस-अध्यक्ष, ष० त०] प्राचीन भारत में वह राजकर्मचारी जो मादक द्रव्यों को जाँच-पड़ताल और उनकी बिक्री आदि की व्यवस्था करता था।
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रसापकर्षण  : पुं० [सं० रस-अपकर्षण, ष० त०] वह प्रक्रिया जिसके द्वारा शरीर का कोई अंग अथवा अपने अंदर का ऐसा ही और कोई पदार्थ रस-रंध्रों द्वारा बाहर निकालता है। (एन्डोमोसिस)
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रसा-पति  : पुं० [सं० ष० त०] पृथ्वी-पति। राजा।
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रसापायी (यिन्)  : वि० [सं० रसा√पा (पीना)+णिनि] जो जीभ से पानी पीता हो। जैसे—कुत्ता, साँप आदि। पुं० कुत्ता।
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रसाभास  : पुं० [सं० रस-आ√भास् (चमकना)+अच्] १. भारतीय साहित्य शास्त्र के अनुसार किसी साहित्यिक रचना में कहीं-कहीं दिखाई देनेवाली वह स्थिति जिसमें रस का पूरी तरह से परिपाक नहीं होने पाता, और इसलिए जिसके फलस्वरूप सहृदयों को ऐसा जान पड़ता है कि रस की पूर्ण निष्पति नहीं हुई है उसका आभास मात्र दिखाई देता है। जैसे—यदि श्रृंगार रस में हास्य रस का, हास्य रस में वीभत्स रस का अथवा वीर रस में भयानक रस का मिश्रण कर दिया जाय तो प्राथमिक या मूल रस का परिपाक नहीं होने पाता और रस के परिपाक के स्थान पर रसाभाव मात्र होकर रह जाता है कुछ आचार्यों का मत है कि रसाभास वस्तुतः रस का बाधक और विरोधी तत्त्व है पर कुछ आचार्य कहते हैं कि रसाभास होने पर भी रस-दशा ज्यों कि त्यों आस्वाद्य बनी रहती हैं।
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रसामृत  : पुं० [सं० रस-अमृत, कर्म० स०] पारे, गंधक शिलाजीत, चंदन, गुडुच, धनियाँ, इंद्रजौ, मुलेठी आदि के योग से बनाया जानेवाला एक प्रकार का रस।
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रसाम्ल  : पुं० [सं० रस-अम्ल, ब० स०] १. अम्लबेतस्। अमलबेद। २. चुक नाम की खटाई। ३. वृक्षाम्ल। विषांविल।
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रसाम्लक  : पुं० [सं० रसाम्ल+कन्] एक प्रकार की घास।
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रसाम्ला  : स्त्री० [सं० रसाम्ल+टाप्] पलाशी नाम की लता।
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रसायन  : पुं० [सं० स-अयन, ब० स०] १. आरंभिक भारतीय वैद्यक में औषध, चिकित्सा आदि के क्षेत्रों में रस अर्थात् पारे का प्रयोग करने की कला या विद्या। २. परवर्ती काल में उक्त कला के आधार पर पारे के प्रयोगों से धातुओं आदि में अद्भुत और असाधारण तात्त्विक परिवर्तन कर दिखाने अथवा उन्हें भस्म करने की कला या विद्या जिसके फलस्वरूप आगे चलकर भारत, पश्चिमी एशिया तथा यूरोप के कुछ देशों में बहुत से लोग इस बात की छानबीन और प्रयोग करने लगे थे कि पीतल लोहे आदि को किस प्रकार सोने के रूप में परिवर्तित किया जा सकता है। कीमियागारी। विशेष—पाश्चात्य देशों में इसी प्रकार के प्रयोग करते-करते कुछ लोगों ने वे तत्त्व और सिद्धान्त ढूँढ़ निकाले थे, जिनके आधार पर आधुनिक रसायन-शास्त्र (देखें) का विकास हुआ है। ३. परवर्ती भारतीय वैद्यक में कुछ विशिष्ट प्रकार के ऐसे औषध या दवाएँ जिनके संबंध में यह माना जाता है कि इनके सेवन से मनुष्य कभी बीमार या बुड्ढा नहीं हो सकता और उसमें फिर नया जीवन और युवावस्था आ जाती है। ४. आधुनिक भारतीय वैद्यक में कुछ विशिष्ट प्रकार की ओषधियों से बनी हुई कुछ ऐसी दवाएँ जो मनुष्यों का बल-वीर्य आदि बढ़ानेवाली मानी जाती है। जैसे—आमलक रसायन, ब्राह्मी, रसायन, हरीतकी रसायन आदि। ५. तक्र। मठा। ६. बायबिंडग। बिंडग। ७. जहर। विष। ८. कटि। कमर। ९. गरुड़ पक्षी।
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रसायनज्ञ  : पुं० [सं० रसायन√ज्ञा (जानना)+क] रसायन क्रिया का जाननेवाला। वह जो रसायन विद्या जानता हो।
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रसायनफला  : स्त्री० [ब० स०+टाप्] हर्रे। हड़। हरीतकी।
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रसायनवर  : पुं० [सं० स० त०] लहसुन।
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रसायनवरा  : स्त्री० [सं० स० त०] १. कँगनी। २. काकजंघा।
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रसायन-विज्ञान  : पुं० =रसायन-शास्त्र।
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रसायन-शास्त्र  : पुं० [सं० ष० त०] आधुनिक काल में विज्ञान की वह शाखा जिसमें इस बात का विवेचन होता है कि पदार्थों में क्या-क्या गुण और तत्त्व होते हैं, दूसरे पदार्थों के योग से उनमें क्या-क्या प्रतिक्रियाएँ होती हैं, और उन्हें किस प्रकार रूपांतरित किया जा सकता है। (कैमिस्ट्री) विशेष—इस शास्त्र का मुख्य सिद्धान्त यह है कि सभी पदार्थ कुछ मूल तत्त्वों या द्रव्यों के अलग-अलग प्रकार के परमाणुओं से बने हुए होते है वैज्ञानिकों ने अब तक ऐसे १00 से अधिक मूल तत्त्व या द्रव्य ढूँढ़ निकाले हैं। उनका कहना है कि जब एक प्रकार के परमाणु किसी दूसरे प्रकार के परमाणुओं से मिलते हैं, तब उनसे कुछ नये द्रव्य या पदार्थ बनते हैं, इस शास्त्र में इसी बात का विचार होता है कि उन तत्त्वों में किस-किस प्रकार के परिवर्तन या विकार होते हैं, और उन परिवर्तनों का क्या परिणाम होता है।
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रसायन-श्रेष्ठ  : पुं० [सं० स० त०] पारा।
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रसायनिक  : वि० =रासायनिक।
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रसायनी  : स्त्री० [सं० रस√अय् (प्राप्ति)+ल्यु-अन+ङीष्] १. वह औषध जो बुढ़ापे को रोकती या दूर करती हो। २. गुडुच। ३. काकमाची। मकोय। ४. महाकरंज। ५. गोरख मुण्डी। अमृत संजीवनी। ६. मांसरोहिणी। ७. मंजीठ। ८. कन-फोड़ा नाम की लता। ९. कौंछ। केवाँच। १॰. सफेद निसोथ। ११. शंखपुष्पी। शंखाहुली। १२. कंदगिलोय। १३. नाड़ी नामक साग। पुं० रसायन। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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रसाल  : वि० [सं० रस-आ√ला (आदान)+क] १. रस से पूर्ण। रस से भरा हुआ। रसपूर्ण। २. मीठा। मधुर। ३. रसिक। रसीला। सहृदय। ४. साफ किया हुआ। परिमार्जित और शुद्ध। पुं० १. ऊख। गन्ना। २. आम। ३. गेहूँ। ४. बोल नामक गंध-द्रव्य। ५. कटहल। ६. कंदूर तृण। ७. अमलबेत। ८. शिलारस। लोबान। पुं० [अ० इरसाल] कर। राजस्व। खिराज। वि० =रिसाल।
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