बाज/baaj
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बाज  : पुं० [अ० बाज] १. एक प्रकार का बड़ा शिकारी और हिंसक पक्षी। २. एक प्रकार का बगुला। ३. वह पर जो तीर में लगाया जाता है। वि० [फा०] वंचित। रहित। मुहावरा—(किसी चीज या बात से) बाज आना=(क) उपेक्षापूर्वक और जान-बूझकर अथवा त्याज्य या हानिकर समझकर उसे छोड़ देना या वंचित रहना। जैसे—हम ऐसे मकान (या रुपए) से बाज आये। (ख) अलग या दूर रहना। जैसे—तुम बदमाशी से बाज नहीं आओगे। (किसी को किसी काम या बात से) बाज करना=मना करना। रोकना। बाज रखना=(क) न रहने देना। (ख) रोक रखना। बाज रहना=अलग या दूर रहना। प्रत्यय० [फा०] एक प्रत्यय जो शब्दों के अंत में लगकर निम्न अर्थ देता है (क) करने या बनानेवाला। जैसे—बहानेबाज। (ख) अपने अधिकार में, वश में या पास में रखनेवाला अथवा किसी चीज या बात का व्यसन करनेवाला। जैसे—कबूतरबाज, नशेबाज, रंडीबाज वि० [अ० बअज] कोई-कोई। कुछ—थोड़े। कुछ विशिष्ट। जैसे—बाज आगमी बहुत जिद्दी होते हैं। क्रि० वि० बगैर। बिना। उदाहरण—अब तेहि बाज राँक भा डोली।—जायसी। पुं० [सं० वाजि] घोड़ा। पुं० [सं० वाद्य० हिं० बाजा] १. बाजा। २. बाजों से उत्पन्न होनेवाला शब्द। ३. बाजा बजाने का ढंग या रीति। जैसे—मुझे उनमें से किसी का बाजा पसन्द नहीं आया। ४. सितार के ५ तारों में से पहला जो पक्के लोहे का होता है। अव्य० [सं० वर्ज] बिना। उदाहरण—गगन अंतरिख राखा बाज खंभ बिनु टेक।—जायसी। पुं० [देश] ताने के सूतों के बीच में देने की लकड़ी। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बाजड़ा  : पुं०=बाजरा। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बाज-दावा  : पुं० [फा०] १. दावा वापस लेना। नालिश वापस लेना। २. वह पत्र या लेख्य जिसमें अपना दावा वापस लेने का विवरम होता है। क्रि० वि०=लिखना।—लिखाना।
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बाजन  : पुं०=बाजा। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बाजना  : अ० [सं० व्रजन] १. जाना। २. पहुँचना। अ० [सं० वादन] १. तर्क वितर्क या बहस करना। २. लडाई-झगड़ा करना। [सं० वदन] १. कहना। बोलना। २. किसी नाम से प्रसिद्ध होना। पुकारा जाना। ३. आघात लगना। प्रहार होना। वि० बजनेवाला। जो बजता हो।
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बाजरा  : पुं० [सं० वर्जरी] १. एक प्रसिद्ध पौधा जिसके दानों की गिनती मोटे अन्न में होती है। २. उक्त पौधे के दाने जो उबाल या पीसकर खाये जाते हैं।
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बाजरा-मुर्ग  : पुं० [हिं०+फा०] एक प्रकार की काली चिड़िया जिसके ऊपर बाजरे की तरह के पीले दाग होते हैं।
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बाजहर  : पुं०=जहर मोहरा।
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बाजा  : पुं० [सं० वाद्य] १. संगीत में, वह उपकरण जो फूँके अथवा आघात किये जाने पर बजता है तथा जिसमे से अनेक प्रकार के स्वर आदि निकलते हैं। क्रि० प्र०—बजना।—बजाना। पद—बाजा-गाजा (दे०)। २. बच्चों के बजाने का कोई खिलौना। वि० [अ० बअज] कोई-कोई। कुछ जैसे—बाजे आदमी किसी की पुकार पर जरा भी ध्यान नहीं देते।
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बाजा-गाजा  : पुं० [हिं० बाजा+गाजना=गरजना] तरह-तरह के बाजे और उसके साथ होनेवाली धूम-धाम या हो-हल्ला। जैसे—बाजे-गाजे से बरात निकलना।
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बाजार  : पुं० [फा० बाजार] [वि, ० बाजारी, बाजारू] १. वह स्थान जहाँ किसी एक चीज अथवा अनेक चीजों के विक्रय के लिए पास-पास अनेक दूकानें हों। मुहावरा—बाजार करना=चीजें खरीदने के लिए बाजार जाना और चीजें खरीदना। बाजार गरम होना= बाजार में चीजों या ग्राहकों आदि की अधिकता होना। खूब लेने-देन या खीरद-बिक्री होना। (किसी काम या बात का) बाजार गरम होना=किसी काम या बात की बहुत अधिकता या बाहुल्य होना। जैसे—आज-कल चोरियों (या जुए) का बाजार गरम है। बाजार लगना=(क)बहुत सी चीजों का इधर-उधर ढेर लगना। बहुत सी चीजों का यों ही सामने रखा होना। (ख) बहुत भीड़-भाड़ इकट्ठी होना और वैसा ही हो हल्ला होना जैसे बाजारों में होता है। बाजार लगाना=(क) चीजें इधर-उधर फैला देना। (ख) अटाला या ढेर लगाना। (ग) भीड़-भाड़ लगाना और वैसा ही हो-हल्ला करना जैसा बाजारों में होता है। २. वह स्थान जहाँ किसी निश्चित समय, बार तिथि या अवसर आदि पर सब तरह की चीजों की दुकानें लगती हों। हाट। पैठ। मुहावरा—बाजार लगना=बाजार में सब तरह की दुकानें आकर खुलना या लगना। बाजार लगाना=ऐसी व्यवस्था करना कि किसी स्थान पर आकर सब तरह की दुकानें लगें। जैसे—राजा साहब हर मंगलवार को अपने किले के सामने बाजार लगवाते थे।३. किसी चीज की बिक्री की वह दर या भाव जिस पर वह साधारणतः सब जगह बाजारों में बिकती या मिलती हो।क्रि० प्र०—उतरना।—चढ़ना।—बढ़ना। पद—बाजार-भाव=किसी चीज का वह भाव या मूल्य जिस पर नह साधारणतः सब जगह बाजारों में मिलती हैं।मुहावरा—(किसी का) बाजार के भाव पिटना=बहुत बुरी तरह से मारा-पीटा जाना। (व्यंग्य) बाजार तेज होना=चीजों की माँग की अधिकता के कारण उनका मूल्य बढ़ना। बाजार मंदा होना=चीजों की माँग कम होने के कारण चीजों का भाव या मूल्य घटना। ४. व्यापारिक क्षेत्रों में व्यापारियों आदि का वह प्रत्यय या साख जिसके आधार पर उन्हें बाजार से चीजें और रुपए उधार मिलते हैं। जैसे—व्यापारियों को अपना व्यापार चलाने के लिए अपना बाजार बनाये रखना पड़ता है।
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बाजारी  : वि० [हिं० बाजार] १. बाजार-संबंधी। बाजार का। २. जो बहुत अच्छा या बढ़िया न हो। बाजारू। साधारण। ३. बाजार मे होनेवाला। बाजार में प्रचलित। जैसे—बाजारी बोल-चाल। ४. बाजार में रहने या बैठनेवाला। जैसे—बाजारी औरत। ५. दे० ‘बाजारू’।
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बाजारू  : वि० [फा० बाजार] १. बाजार का। बाजारी। (देखें) २. (शब्द या प्रयोग) जिसका प्रयत्न बाजार के साधारण लोगों में ही हो, शिक्षित या शिष्ट समाज मे न होता हो।
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बाजिंदा  : पुं० [फा० बाजिन्दः] १. खेल-तमासे दिखानेवाला। खेलाड़ी। २. लोटेन कबूतर।
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बाजि  : पुं० [सं० वाजिन्, बाज+इनि] १. घोड़ा। २. चिड़िया। ३. तीर। बाण। ४. अड़ूसा। वि० चलनेवाला।
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बाजी  : स्त्री० [फा० बाजी] १. किसी प्रकार की घटना के अनिश्चित परिणाम के प्रसंग में दो या अधिक पक्षों में होनेवाला पारस्परिक निश्चय कि जो पक्ष हार जायगा, उसे जीतनेवाले को उतना धन देना पड़ेगा, अथवा अपनी हार का सूचक अमुक काम करना पड़ेगा। खेलों या लाग-डाँटवली बातों के संबंध में लगाई जानेवाली ऐसी शर्त जिसके अनुसार हार-जीत के साथ कुछ लेना-देना भी पड़ता हो अथवा पुरस्कार भी मिलता हो। बदान। सर्त। २. इस प्रकार होनेवाला लेनदेन या मिलनेवाला पुरस्कार।क्रि० प्र०—जीतना।—बदना।—लगना।—लगाना।—हराना। मुहावरा—बाजी मारना=बाजी जीतना। बाजी के जाना=बाजी जीतना। ३. प्रत्येक बार आदि से अंत तक होनेवाला कोई ऐसा खेल जिसमें हार-जीत के भाव की प्रधानता हो। जैसे—आओ दो बाजी ताश (या शतरंज) हो जाय। क्रि० प्र०—जीतना।—हारना। ४. उक्त प्रकार के खेलों में प्रत्येक खिलाड़ी या दल के खेलने की पारी या बारी। दाँव। स्त्री० [फा० बाज का भाव] १. ‘बाज’ होने की अवस्था या भाव। २. किसी काम या बात के व्यसनी या शौकीन होने की अवस्था या भाव। जैसे—कबूतरबाजी, पतंगबाजी। ३. किसी प्रकार की क्रिया कु समय तक होते रहने का भाव। जैसे—दोनों में कुछ देर तक खूब घूँसेबाजी हुई। पुं० [सं० वाजिन्] घोड़ा। पुं० [हिं० बाजा] वह जो बाजा बजाने का काम करता हो। बजनिया।
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बाजीगर  : पुं० [फा० बाजीगर] [भाव० बाजीगरी] जादू के खेल करनेवाला। जादूगर। ऐंद्रजालिक।
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बाज्  : अव्य० [फा० बाज] १. बिना। बगर। उदाहरण—को उठाए बसारइ बाजू पियारे जीवै।—जायसी। २. अतिरिक्त। सिवा। पुं० [फा० बाजू] १. भुजा। बाँह। २. बाजूबंद।
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बाजू  : पुं० [फा० बाज़ू] १. भुजा। बाहु। बाँह। २. वह जो हाथ की तरह सदा साथ रहता और पूरी सहायता देता हो। ३. किसी चीज का कोई विशिष्ट अंग या पक्ष। पार्श्व। ४. पक्षियों का डैना। ५. बाजूबंद नाम का गहना। ६. उक्त गहने के आकार का गोदना।
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बाजूबंद  : पुं० [फा० बाजूबंद] बाँह पर पहनने का एक प्रकार का गहना। भुजबंद।
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बाजूबीर  : पुं०=बाजूबंद।
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बाजोटा  : पुं० [सं० वाद्य+पट्ट] १. चौकी। २. बैठने की ऊँची जगह। (राज० ) उदाहरण—बाजोटा ऊतरि गादी बैठी।—प्रिथीराज।
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