बंदर/bandar
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बंदर  : पुं० [सं० वानर] [स्त्री० बँदरिया, बँदरी] १. एक प्रसिद्ध स्तनपायी चौपाया जो अनेक वृक्षों आदि पर रहता है। कपि। मर्कट। शाखा-मृग। पद—बंदर का घाव=दे० ‘बंदर-खत’ बंदर घुड़की या बंदर भभकी=बंदरों की तरह डराते हुए दी जानेवाली ऐसी धमकी जो दिखावे भर की हो, पर जो पूरी न की जाय। २. राजा सुग्रीव की सेना का सैनिक। पुं० [फा०] बंदरगाह।
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बंदर-खत  : पुं० [हिं० बंदर+क्षत-घाव] १. बन्दर के शरीर में होनेवाला घाव जिसे प्रायः नोच-नोच कर बढ़ाता रहता है। २. ऐसा कार्य या बात जिसकी खराबी या बुराई जान-बूझकर बढ़ायी जाय। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बंदरगाह  : पुं० [फा०] समुद्र के किनारे का वह स्थान जहाँ जहाज ठहरते हैं।
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बंदर-बाँट  : स्त्री० [हिं० बंदर+बाँटना] न्याय के नाम पर किया जानेवाला ऐसा स्वार्थपूर्ण बँटवारा जिसमें न्याकर्ता सब कुछ स्वयं हजम कर लेता है और विवादी पक्षों को विवाद-ग्रस्त सम्पत्ति में से कुछ भी प्राप्त नहीं होता।
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बँदरा  : पुं० दे० ‘बनरा’। २. दे० ‘बन्दर’।
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बंदरिया  : स्त्री० [हिं० ] बंदर का स्त्री० रूप।
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बंदरी  : स्त्री० [फा० बन्दर] १. बन्दर या बन्दरगाह-संबंधी। २. बन्दरगाह में होकर आनेवाला अर्थात् विदेशी। जैसे—बंदरी तलवार। स्त्री० हिं० बन्दर (जानवर) का स्त्री। मादा बन्दर।
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