ब/ba
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ब  : देववाणी वर्णमाला का पवर्गीय वर्ण जो व्याकरण तथा भाषा-विज्ञान की दृष्टि से ओष्ठ्य, अघोष, अल्पप्राण तथा स्पुष्ट व्यंजन है। पुं० [सं०√बल् (जीवन देना)+ड] १. वरुण। २. समुद्र। २. जल। पानी। ४. सुगंधि। ५. ताना। ६. घड़ा। ७. भग। योनि। अव्य० [फा०] एक अव्यय जो अरबी-फारसी शब्दों के पहले लगकर ये अर्थ देता है।—(क) सहित। साथ। जैसे—बखैरियत-खैरियत से। (ख) पूर्वक। जैसे—बखूबी। (ग) के द्वारा। जैसे—बजरिया=जरिये द्वारा। (घ) पर या से। जैसे—खुद ब-खुद-आप=से आप। (च) किसी की तुलना में। जैसे—बब-जिन्स=किसी के ठीक अनुरूप। (छ) अनुसार। जैसे—बदस्तूर, बमूजिव।
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बंक  : वि० [सं० वक्र, वंक] १. टेढ़ा। तिरछा। २. जिसमें पुरुषार्थ और विक्रम हो। ३. दुर्गम। ४. विकट। पुं० दे० ‘बाँकरा’। पुं० अस्थि। हड्डी। उदाहरण—मचक्कहिं रीढंक बंक अमाप।—कविराज सूर्यमल। पुं० [अं० बैक] वह महाजनी संस्था जो मुख्य रूप से सूद पर रुपयों के लेन-देन का काम करती हो। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बंकर  : वि० [सं० बंक] १. वंक। टेढ़ा। २. तीव्र। ३. विकट। पुं० [सं० व्यंकट] हनुमान।
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बंकनाल  : स्त्री० [हिं० बंक+नाल] १. सुनारों की एक नली जो बहुत बारीक टुकड़ों की जोड़ाई करने के समय चिराग की लौ फूँकने के काम आती है। बगनहा। २. कोई टेढ़ी पतली नली। ३. हठयोग में शंखिनी नाड़ी का एक नाम।
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बंकराज  : पुं० [हिं० बंक+राज] एक प्रकार का साँप।
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बंकवा  : पुं० [सं० बंक] एक तरह का बढ़िया अगहनिया धान। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बंकसाल  : पुं० [देश] जहाज का वह बड़ा कमरा जिसमें मस्तूलों पर चढ़ायी जानेवाली रस्सियाँ या जंजीरें ठीक करके रखी जाती है।
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बंका  : वि० [सं० वंक] [भाव० बंकाई] १. टेढ़ा। तिरछा। २. दुर्गम। ३. विकट। ४. पराक्रमी। ५. बाँका।
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बंकाई  : स्त्री० [हिं० बंक+आई (प्रत्यय)] टेढ़ापन। तिरछापन। वक्रता।
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बंकी  : स्त्री०=बाँक।
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बंकुर  : वि० [भाव० बंकुरता]=बंक (वक्र)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बंकुरा  : वि०=बंक। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बँकैअन  : अव्य० , पुं०=बकैयाँ। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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बंग  : पुं०=वंग।
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बंगई  : स्त्री० [सं० वंग] सिलहट की भूमि में होनेवाली एक तरह की कपास। स्त्री० [हिं० बंगा] १. उद्दंडता। २. झगड़ालूपन। ३. बदमाशी। लुच्चापन। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बंगउर  : पुं०=बिनौना। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बंगड़ी  : स्त्री० [देश] १. लाख या काँच की बनी हुई चूड़ी या कंगन। २. आलू की फसल में होनेवाला एक तरह का रोग। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बँगला  : वि० [हिं० बंगाल] १. बंगाल प्रदेश संबंधी। २. बंगाल में बनने या होनेवाला। जैसे—बंगला मिठाई। स्त्री० १. बंगाल देश की भाषा। २. उक्त भाषा की लिपि जो देवनागरी का ही एक स्थानिक रूप है। पुं० १. एक मंजिला हवादार तथा बरामदेवाला छोटा मकान जिसकी छत प्रायः खपरैल की होती है तथा जो खुले स्थान में बना हुआ होता है। २. कोई छोटा हवादार तथा बरामदेवाला मकान। ३. बोल-चाल में ऊपरवाली छत का बना हुआ हवादार कमरा।
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बंगलिया  : पुं० [हिं० बंगाल] १. एक प्रकार का धान। २. एक प्रकार का मटर।
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बंगली  : स्त्री० [?] स्त्रियों का एक आभूषण जो हाथों में चूड़ियों के सथ पहना जाता है। पुं० [हिं० बंगाल] एक प्रकार का पान। पुं० [ ?] घोड़ा। (डिंगल)
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बंगसार  : पुं० [?] समुद्र में बनाया हुआ चबूतरा जिस पर से यात्री जलयान में चढ़ते हैं। बनसार।
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बंगा  : वि० [सं० बंक] [स्त्री० बंगी] १. टेढ़ा। २. झगड़ालू। ३. पाजी। लुच्चा। ४. अज्ञानी। मूर्ख। ५. उद्दंड।
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बंगारी  : पुं० [सं० वंग+अरि] हरताल। (डिं०)
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बंगाल  : पुं० [सं० वंग] १. भारत का एक पूर्वी प्रदेश जिसका आधा भाग पूर्वी बंगाल (पाकिस्तान) और आधा भाग पश्चिमी बंगाल (भारत) के नाम से प्रसिद्ध है। बंग प्रदेश। २. संगीत में एक प्रकार का राग जिसे कुछ लोग भैरव राग का और कुछ लोग मेघ राग का पुत्र मानते हैं।
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बंगालिका  : स्त्री० [?] एक रागिनी जिसे कुछ लोग मेघराग की पत्नी मानते हैं।
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बंगाली  : पुं० [हिं० बंगाल+ई (प्रत्यय)] बंगाल अर्थात् वंग-प्रदेश का निवासी। वि० १. बंगाल देश का। बंगाल संबंधी। स्त्री० १. बँगला भाषा। २. संगीत में सम्पूर्ण जाति की रागिनी जो ग्रीष्म ऋतु में प्रातःकाल गायी जाती है। ३. विशुद्ध अद्वैत का ज्ञान प्राप्त होने की अवस्था। (बौद्ध)
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बंगुरी  : स्त्री०=बँगली। (आभूषण)।
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बंगू  : पुं० [देश] १. वंग तथा दक्षिण भारत की नदियों में होनेवाली एक तरह की मछली। २. जंगी या भौरा नाम का खिलौना।
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बंगोभा  : पुं० [देश] गंगा और सिंधु नदियों में होनेवाला एक तरह का कछुआ।
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बंचक  : वि० [भाव० बंचकता]=वंचक ठग।
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बंचकताई  : स्त्री०=बंचकता।
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बंचन  : पुं०=वंचन।
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बंचना  : स० [सं० वंचन] ठगना। छलना। अ० ठगा जाना। स्त्री०=वंचना। स० [सं० वाचन] पढ़ना। बाँधना।
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बंचर  : पुं०=वनचर।
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बंचवाना  : हिं० [हिं० बाँचना का प्रे०] बाँचने (पढ़ने) का काम दूसरे से कराना। पढ़वाना।
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बंचित  : वि०=वंचित।
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बंछना  : स० [सं० वांछा] वांछा अर्थात् इच्छा करना। चाहना। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बंछनीय  : वि०=वांछनीय। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बंछित  : वि०=वांछित। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बंज  : पुं० [देश] हिमालय प्रदेश में होनेवाला एक प्रकार का बलूत जिसकी लकड़ी का रंग खाकी होता है। इसे सिल और मारू भी कहते हैं। पुं०=बनिज। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बंजर  : वि० [सं० वन+उजड़] (भूमि) जिसमें कोई चीज न उगली हो फलतः जो उपजाऊ न हो। ऊसर। पुं० बंजर भूमि।
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बंजर-भूमि  : स्त्री० [सं०] शुष्क प्रदेशों मे कटा-फूटा या ऊबड़-खाबड़ भू-खंड जिसमें कोई वनस्पति नहीं होती। ऐसी भूमि में बीच-बीच में छोटी-मोटी चट्टाने या टीले भी होते हैं। (बैड लैंड)
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बंजरिया  : वि०=बंजर। स्त्री०=बन-जरिया। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बंजारा  : पुं०=बनजारा।
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बंजुल  : पुं०=वंजुल (अशोक)।
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बंझा  : वि० स्त्री०=बाँझ।
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बँटन  : पुं० [हिं० बाँटना] बाँठने की क्रिया या भाव।
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बँटना  : अ० [हिं० ‘बाँटना’ का अ०] अलग-अलग हिस्सों में बाँटा जाना। २. किसी प्रकार या रूप में विभक्त या विभाजित होना। संयो० क्रि०—जाना। पुं०=बँटना। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बँटवाई  : स्त्री० [हिं० बँटवाना] बँटवाने की क्रिया, भाव या पारिश्रमिक। स्त्री०=बँटाई। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बँटवाना  : स० [हिं० बाँटना] दूसरों को कोई चीज बाँटने में प्रवृत्त करना। स०=बटवाना।
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बँटवारा  : पुं० [हिं० बाँटना] १. बाँटने का काम। २. भाइयों, हिस्सेदारों आदि में होनेवाला सम्पत्ति का विभाजन। अलगोझा। जैसे—(क) खेत का बँटवारा। (ख) देश का बँटवारा।
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बंटा  : पुं० [सं० वटक, हिं० वटा+गोला] [स्त्री० अल्पा० बंटी] कोई छोटा गोल चौकोर डिब्बा। जैसे—पान का बंटा। वि० छोटे कद का। नाटा।
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बँटाई  : स्त्री० [हिं० बाँटना] १. बाँटने की क्रिया भाव या पारिश्रमिक। २. बाँटे जाने की अवस्था या भाव। ३. किसी को जोतने-बोने के लिए खेत देने का वह प्रकार जिसमें खेत का मालिक लगान के बदले में उपज का कुछ अंश लेता है। जैसे—यह खेत इस साल बँटाई पर दिया गया है।
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बँटाधार  : वि० [सं० विनष्ट+आधार] पूरी तरह से चौपट नष्ट या भ्रष्ट किया हुआ। (पूरब)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बँटाना  : स० [हिं० बाँटना] १. किसी सम्पत्ति आदि के हिस्से लगवाकर अपना हिस्सा लेना। जैसे—उसने सारी जायदाद बँटा ली है। २. किसी काम या बात में इस प्रकार सम्मिलित होना कि दूसरे का भार कुछ हलका हो जाय। जैसे—(क) किसी का दुःख बँटाना। (ख) कि सी काम में हाथ बँटाना। ३. दे० ‘बँटवाना’।
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बँटावन  : वि० [हिं० बँटवाना] बँटवाकर अपना हिस्सा लेनेवाला।
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बँटी  : स्त्री० [?] हिरन आदि पशुओं को फँसाने का जाल या फंदा। स्त्री० हिं० बंटा का स्त्री० अल्पा०।
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बँटैया  : वि० [हिं० बाँटना] बाँटनेवाला। वि० [हिं० बँटवाना] बँटवाकर अपना हिस्सा ले लेनेवाला।
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बँड  : वि०=बाँड़ा। पुं०=बंडा।
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बँडल  : पुं० [अं०] रस्सी आदि से अच्छी तरह बँधा हुआ पुलिंदा।
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बँडवा  : वि०=बाँड़ा। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बंडा  : पुं० [हिं० बंटा] १. अरुई की जाति की एक लता। २. उक्त लता के कंद जिनकी तरकारी बनायी जाती है। ३. अनाज रखने का बखार।
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बंडी  : स्त्री० [हिं० बाँड़ा=कटा हुआ] १. बिना आस्तीन की एक प्रकार की कुरती। फतूहीं। मिरजई। २. बगलबन्द नाम का पहनने का कपड़ा।
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बँडेर  : स्त्री० [सं० वरदंड] वह बल्ला या शहतीर जिसके ऊपर छाजन का ठाठ स्थित होता है।
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बंडेरा  : पुं०=बँडेर। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बंडेरी  : स्त्री०=बंडेर। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बंद  : पुं० [सं० बंध से फा०] १. वह चीज जो किसी दूसरी चीज को बाँधती हो। जैसे—डोरी रस्सी आदि। २. लोहे आदि की वह लम्बी पट्टी जो बड़ी-बड़ी गठरियों संदूकों आदि पर इसलिए रक्षा के विचार से बाँधी जाती है ताकि माल बाहर भेजते समय उसमें से कुछ चुराया या निकाला न जा सके। ३. किसी प्रकार की लम्बी धज्जी या पट्टी। जैसे—कपड़े या कागज का बन्द। ४. वास्तु रचना में, पत्थर की वह पटियाँ या पत्थरों की वह श्रृंखला जो दीवारों में मजबूती के लिए लगाई जाती है और जिसके ऊपर फिर दीवार उठायी जाती है। ५. पानी की बाढ़ आदि रोकने के लिए बनाया जानेवाला घुस्स। बाँध। ६. फीते की तरह सी कर बनायी हुई कपड़े की वह डोरी या फीता जिससे अँगरखे चोली आदि के पल्ले आपस में बाँधे जाते हैं। ७. कागज धातु आदि की पतली लम्बी धज्जी। पट्टी। ८. लाक्षणिक रूप में किसी प्रकार का नियंत्रण या बंधन। जैसे—बंदे के जाये बंदी में नहीं रहते। ९. उर्दू कविता में वह पद या पाँच या छः चरणों का होता है। १॰. कविता का कोई चरण या पद। ११. शरीर के अंगों का जोड़ या संधिस्थान। जैसे—बंद बंद जकड़ना या ढीला होना। १२. कोई काम कौशलपूर्वक करने का गुण, योग्यता या शक्ति। १३. तरकीब। युक्ति। उदाहरण—कस्बोहुनर के याद हैं जिनको हजार बन्द।—नजीर। वि० १. (पदार्थ या व्यक्ति) जो चारों ओर से घिरा या रुका हुआ हो। जैसे—(क) कोठरी में सब सामान बन्द है। (ख) पुलिस ने उसे थाने में बन्द कर रखा है। २. (स्थान) जो चारों ओर से खुलता या खुला हुआ न हो फलतः जो इस प्रकार घिरा हो कि उसके अन्दर कुछ या कोई आ-जा न सके। जैसे—वह मकान जो चारों तरफ से बन्द हैं, अर्था्त उसमें प्रकाश, वायु आदि के आने का यथेष्ठ मार्ग नहीं हैं। ३. (स्थान) जिसके अन्दर लोगों के अन्दर आने जाने की मनाही या रुकावट हो। जैसे—जन-साधारण के लिए किला आज-कल बन्द हो गया है। ४. (किसी प्रकार का मार्ग या रास्ता) जो अवरुद्ध हो अर्थात् जिसके आगे ढकना, ताला दरवाजा या ऐसी ही कोई और बाधक चीज या बात लगी हो जिसके कारण उसके अन्दर पहुँचना या बाहर निकलना न हो सकता हो। जैसे—नाली का मुँह बन्द हो गया है, जिससे छत पर पानी रुकता है। ५. ढकने, दरवाजे पल्ले आदि के संबंध में जो इस प्रकार भेड़ा या लगाया गया हो कि आने-जाने या निकालने रखने क रास्ता न रह जाय। जैसे—कमरा (या संदूक) बन्द कर दो। विशेष—इस अर्थ में इस शब्द का प्रयोग ढकने, दरवाजे आदि के संबंध में भी होता है और उस चीज के संबंध में भी जिसके आगे वे लगे रहते हैं। ६. शरीर के अंगों, यंत्रों आदि के संबंध में जिनकी क्रिया या व्यापार पूरी तरह से रुक गया हो अथवा रोक दिया गया हो। जैसे—(क) बुढ़ापे के कारण उनके कान बन्द हो गये हैं। (ख) घोड़े के पिछले पैर दो दिन से बन्द है अर्थात् ठीक तरह से हिल-डुल नहीं सकते। (ग) पानी की कल (या बिजली) बन्द कर दो। ७. किसी प्रकार के मुख या विवर के संबंध में जिसका अगला भाग अवरूद्ध या सम्पुटित हो। जैसे—(क) कमल रात में बन्द हो जाता है और दिन में खुलता( या खिलता) है। (ख) थोड़ी मिट्टी डालकर यह गड्ढा बन्द कर दो। ८. (कार्य करने का स्थान) जहाँ अस्थायी या स्थायी रूप से कार्य रोक दिया गया हो या स्थगित हो चुका हो। जैसे—(क) जाड़े में रात को ९ बजे सब दुकानें बन्द हो जाती है। जैसे—(ख) उनका छापाखाना (या विद्यालय) बहुत दिनों से बंद पड़ा है। ९. कोई ऐसा कार्य, गति या व्यापार जो चल न रहा हो बल्कि थम या रूक गया हो। जैसे—(क) अब थोड़ी देर में वर्षा बन्द हो जायगी। (ख) उन्होंने प्रकाशन का काम बन्द कर दिया है। १॰. (व्यक्ति) जो अक्रिय तथा उदास होकर बैठा हो। (क्व० ) जैसे—आज-सबेरे से तुम इस तरह बन्द से क्यों बैठे हो। ११. लेन-देन या हिसाब-किताब जिसके व्यवहार का अन्त हो चुका हो। जैसे—आज-कल हमारा सारा लेन-देन बन्द है। १२. (व्यक्ति) जिसके साथ समाजिक व्यवहार का अन्त हो चुका हो। जैसे— वह साल भर से बिरादरी से बन्द है। १३. कोई परिमित अवधि जिसकी समाप्ति हो गयी हो या हो चली हो। जैसे—एक दो दिन में यह महीना (या साल) बन्द हो रहा है। १४. शस्त्रों की धार आदि के संबंध में जिसमें कार्य करने की शक्ति न रह गयी हो, जो कुंठित हो गया ह। जैसे—यह चाकू (या कैंची) तो बिलकुल बन्द हैं, अर्थात् इससे काटने या कतरने का काम नहीं हो सकता। वि० शब्दों के अन्त में प्रत्यय के रूप में प्रयुक्त होने पर जड़ने बाँधने या लगाने वाला। जैसे—कमर-बन्द, नालबन्द, नैचा बन्द। वि०=वंद्य (वंदनीय)। पुं०=विंदु। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बंदक  : वि० १.=वंदक (वंदना करनेवाला)। २. बंधक (बाँधनेवाला)। वि० [हिं० बंद+क(प्रत्यय)] बन्द करनेवाला। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बंदगी  : स्त्री० [फा०] १. किसी के सामने यह मान लेना कि मैं बन्दा (सेवक) हूँ और आप मालिक (स्वामी) हैं। अधीनता और दीनता स्वीकृत करना। २. मन में उक्त प्रकार का भाव या विचार रखकर की जानेवाली ईश्वर की वंदना। ईश्वरारधन। ३. किसी को आदरपूर्वक किया जानेवाला अभिवादन। नमस्कार। सलाम। ४. आज्ञा-पालन। ५. टहल। सेवा। उदाहरण—जैसी बन्दगी वैसा इनाम।—(कहा०)
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बंद-गोभी  : स्त्री० [हिं० बंद+गोभी] १. कमरकल्ला। पातगोभी का पौधा। २. उक्त पौधे का फल जिसकी तरकारी बनायी जाती है
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बंदन  : पुं० [सं० बंदगी-गोरोचन] १. रोचन। रोली। २. ईंगुर सिंदूर। पुं०=वंदन।
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बंदनवान  : पुं० [सं० बंधन] कारागार का प्रधान अधिकारी। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बंदनवार  : पुं० [सं० वंदनमाला] आम, अशोक आदि की पत्तियों को किसी लम्बी रस्सी में जगह-जगह टाँकने पर बननेवाली श्रृखला जो शुभ अवसरों पर दरवाजों, दीवारों आदि पर लटकायी जाती है। तोरण।
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बंदनसाल  : स्त्री० [सं० बंधन+शाला] कारागार। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बंदना  : स० [सं० वंदन] १. वंदना या आराधना करना। २. नमस्कार या प्रणाम करना। स्त्री०=वंदना। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बंदनी  : स्त्री० [सं० वंदनी=माथे पर बनाया हुआ चिन्ह] स्त्रियों का एक आभूषण जो सिर पर आगे की ओर पहना जाता है। इसे बंदी या सिरबंदी भी कहते हैं। वि०=वंदनीय। जैसे—जग-बंदनी।
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बंदनीमाल  : स्त्री० [सं० बंदनमाला] वह लम्बी माला जो गले से पैरों तक लटकती हो। घुटनों तक लटकती हुई लम्बी माला।
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बंदर  : पुं० [सं० वानर] [स्त्री० बँदरिया, बँदरी] १. एक प्रसिद्ध स्तनपायी चौपाया जो अनेक वृक्षों आदि पर रहता है। कपि। मर्कट। शाखा-मृग। पद—बंदर का घाव=दे० ‘बंदर-खत’ बंदर घुड़की या बंदर भभकी=बंदरों की तरह डराते हुए दी जानेवाली ऐसी धमकी जो दिखावे भर की हो, पर जो पूरी न की जाय। २. राजा सुग्रीव की सेना का सैनिक। पुं० [फा०] बंदरगाह।
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बंदर-खत  : पुं० [हिं० बंदर+क्षत-घाव] १. बन्दर के शरीर में होनेवाला घाव जिसे प्रायः नोच-नोच कर बढ़ाता रहता है। २. ऐसा कार्य या बात जिसकी खराबी या बुराई जान-बूझकर बढ़ायी जाय। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बंदरगाह  : पुं० [फा०] समुद्र के किनारे का वह स्थान जहाँ जहाज ठहरते हैं।
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बंदर-बाँट  : स्त्री० [हिं० बंदर+बाँटना] न्याय के नाम पर किया जानेवाला ऐसा स्वार्थपूर्ण बँटवारा जिसमें न्याकर्ता सब कुछ स्वयं हजम कर लेता है और विवादी पक्षों को विवाद-ग्रस्त सम्पत्ति में से कुछ भी प्राप्त नहीं होता।
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बँदरा  : पुं० दे० ‘बनरा’। २. दे० ‘बन्दर’।
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बंदरिया  : स्त्री० [हिं० ] बंदर का स्त्री० रूप।
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बंदरी  : स्त्री० [फा० बन्दर] १. बन्दर या बन्दरगाह-संबंधी। २. बन्दरगाह में होकर आनेवाला अर्थात् विदेशी। जैसे—बंदरी तलवार। स्त्री० हिं० बन्दर (जानवर) का स्त्री। मादा बन्दर।
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बंदली  : पुं० [देश] रूहेलखंड में पैदा होनेवाला एक प्रकार का धान जिसे रायमुनिया और तिलोकचंदन भी कहते हैं।
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बंदवान  : पुं० [सं० बंदी+वान] बंदीगृह का रक्षक। कैदखाने का प्रधान अधिकारी।
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बंदसाल  : पुं० [सं० बंदी+वान] बंदीगृह। कैदखाना।
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बंदा  : पुं० [फा० बंदः] १. दास। सेवक। २. भक्त। ३. मनुष्य। विशेष—वक्ता नम्रता सूचित करने के लिए इसका प्रयोग अपने लिए भी करता है। जैसे—लीजिए बन्दा हाजिर हैं। पुं० [सं० बंदी] कैदी। बंदी।
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बंदा-नवाज  : वि० [फा० बंदा नवाज] [भाव० बंदा-नवाजी] १. आश्रितों और दीनों पर अनुग्रह या कृपा करनेवाला। दीन-दयालु। २. भक्त वत्सल।
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बंदा-परवर  : पं० [फा० बंदपर्वर] [भाव० बंदा-परवरी] बंदा नवाज।
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बंदानी  : पुं० [?] गोलंदाज। तोप चलानेवाला। (लश्करी)। पुं० [?] एक प्रकार का हलका गुलाबी रंग जो प्याजी से कुछ गहरा होता है। वि० उक्त प्रकार के रंग का।
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बंदारू  : वि० [सं० वंदारू√वन्द+आरू] आदरणीय और पूज्य। वंदनीय। पुं० बंदाल। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बंदाल  : पुं० [?] देवदाली। घघरबेल।
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बंदि  : स्त्री० [सं० वंदि] बंधन। २. कैद। स्त्री०=बंदीगृह। (कारागार)। पुं०=बंदी या वंदी (कैदी)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बंदि कोष्ठ  : पुं० [सं० वंदीकोष्ठ] वंदीगृह (कारागार)।
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बंदि छोर  : वि०=बंदीछोर।
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बंदिया  : स्त्री०=बंदी (आभूषण)।
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बंदिश  : स्त्री० [फा०] १. बाँधने की क्रिया या भाव। २. किसी प्रकार का बन्धन या रुकावट। ३. कविता के चरणों वाक्यों आदि में होनेवाली शब्द योजना शब्द योजना। रचना-प्रबंध। जैसे—गजल या गीत की बंदिश। ४. किसी को चारों ओर से बाँध रखने के लिए की जानेवाली योजना। ५. कोई बड़ा काम छेडने अथवा किसी प्रकार की रचना आरम्भ करने से पहले किया जानेवाला आयोजन या आरम्भिक व्यवस्था ६. षड्यंत्र।
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बंदी  : पुं० [सं० चारणों की एक जाति जो प्राचीन काल में राजाओं का कीर्तिगान किया करती थी। भाट। चारण। दे० बंदी।] पुं० [सं० वन्दिन्] कैदी। बँधुआ। स्त्री० वंदनी (शिर पर पहनने का गहना)। वि० फा० बँदा (दास या सेवक) का स्त्री। स्त्री० [फा०] १. बंद करने की क्रिया या भाव। जैसे—दुकान बंदी। २. बाँधने की क्रिया या भाव। जैसे—नाकेंबंदी। ३. व्यवस्थित रूप में लाने का भाव। जैसे—दलबन्दी।
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बंदीखाना  : पुं० [फा० बंदीखानः] जेलखाना। कैदखाना।
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बंदीघर  : पुं० [सं० बंदिगृह] कैदखाना। जेलखाना।
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बंदीछोर  : वि० [फा० बंदी+हिं० छोर (ड़) ना] १. कैद से छुड़ाने वाला। २. २. संकटपूर्ण बंधन से छुड़ानेवाला।
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बंदीवान  : पुं० [सं० वंदिन्] कैदी।
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बंदूक  : स्त्री० [अ०] एक प्रसिद्ध अस्त्र जिसमें कारतूस, गोली आदि भरकर इस प्रकार छोड़ी जाती है कि लक्ष्य पर जाकर गिरती है। क्रि० प्र०—चलाना।—छोड़ना।—दागना। मुहावरा—बंदूक भरना—बंदूक में कारतूस गोली आदि रखना।
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बंदूकची  : पुं० [अं० बंदूक+फा० ची (प्रत्यय)] १. बंदूक चलाने वाला सिपही। २. बंदूक की गोली से लक्ष्य-भेदन करनेवाला व्यक्ति।
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बंदूख  : स्त्री०=बंदूक। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बंदेरा  : पुं० [फा० बन्दः] [स्त्री० बँदेरी] १. दास। २. सेवक। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बंदोड़  : पुं० [फा० बन्दः] गुलाम। दास। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बंदोबस्त  : पुं० [फा०] १. प्रबंध। व्यवस्था। २. खेतों की हदबंदी उनकी मालगुजारी आदि निश्चित करने का काम। पज-बंदोबस्त आरिजी-कृषि संबंधी होनेवाली अस्थायी व्यवस्था बंदोबस्त-इस्तमरारी या दवामी-पक्की और सदा के लिए निश्चित कृषि-व्यवस्था। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बंध  : पुं० [सं०√बंध् (बंधना)+घञ्] १. वह चीज जिससे कोई दूसरी चीज बाँधी जाय। जैसे—डोरी फीता रस्सी आदि। २. बाँधने की क्रिया या भाव। ३. बंधन। ४. किसी को पकड़कर बाँध रखने की क्रिया। कैद। ५. कोई चीज अच्छी तरह गँठ या बाँधनेकर तैयार करना। जैसे—काव्य-ग्रंथ का सर्ग-बंध। ६. रचना करना। बनाना। ७. कल्पना करना। ८. गद्य या पद्य के रूप में साहित्यिक रचना करना। निबंध रचना। ९. लगाव। संबंध। १॰. आपस में होनेवाला एक प्रकार का निश्चय। ११. योग साधन की कोई मुद्रा। जैसे—उड्डीयान बंध। १२. कोक शास्त्र में रति के मुख्य सोलह आसनों में से एक आसन। १३. रति या स्त्री-सम्भोग करने का कोई आसन या मुद्रा। १४. चित्रकाव्य में छंद की ऐसी रचना जिसकी कुछ विशिष्ट नियमों के अनुसार उसकी पंक्तियों के अक्षर बैठाने से किसी विशेष प्रकार की आकृति या चित्र बन जाय। जैसे—अश्वबंध, ख़ड्गबंध छत्र-बंध आदि। १५. बनाये जानेवाले मकान की लम्बाई औरचौड़ाई का योग। १६. काया। शरीर। १७. जलाशय़। किनारे का बाँध। पुं०=बंधु। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बंधक  : वि० [सं०√बंध् (बंधना)+ण्वुल्-अक] १. बाँधनेवाला। २. (पदार्थ) जो किसी से रुपए उधार लेने के समय इस दृष्टि से जमानत के रूप में उसके पास रखा गया हो कि जब तक रुपया (और सूद) चुकाया न जायगा, तब तक वह उसी के पास रहेगा। रेहन। ३. अदला-बदली या विनिमय करनेवाला। पुं० [सं० बंध+कन्] लेन-देन या व्यवहार का वह प्रकार जिसमें किसी से रुपया उधार लेने के समय कोई मूल्यवान् वस्तु इस दृष्टि से महाजन के पास जमानत के तौर पर रख दी जाती है कि यदि ऋण और ब्याज न चुकाया जा सके तो महाजन वह वस्तु बेचकर अपना प्राप्य धन ले सकता है। रेहन। (मार्टगेज)।
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बंध-करण  : पुं० [ष० त०] कैद करना। कारावास में बन्द करना।
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बंधक-कर्ता (र्तृ)  : पुं० [सं० ष० त०] वह जो कोई चीज बंधक रूप में किसी के यहाँ रखता हो। (मार्टगेजर)।
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बंधकी  : स्त्री० [सं० बंधक+ङीष्] १. व्यभिचारिणी स्त्री। २. रंडी। वेश्या। वि० [हिं० बंधक] जो बंधक के रूप में पड़ा या रखा गया हो। जैसे—बंधकी मकान।
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बंध-तंत्र  : पुं० [मध्य० स०] किसी राजा अथवा राज्य की सम्पूर्ण सैनिक शक्ति। पूरी सेना।
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बंधन  : पुं० [सं०√बंध्+ल्युट—अन] १. बँधने या बाँधने की क्रिया या भाव। २. बाँधनेवाली कोई चीज, तत्त्व या बात। जैसे—जंजीर, डोरा रस्सी प्रतिज्ञा वचन आदि। ३. कोई ऐसी चीज या बात जो किसी को उच्छृंखल होने या मनमाना आचरण अथवा व्यवहार करने से रोकती है। कोई ऐसा तत्त्व या बात जो किसी को नियमित या मर्यादित रूप से आचरण करन के लिए बाध्य करती हो। जैसे—प्रेम या समाज का बंधन। ४. वह स्थान जहाँ कोई बाँध या रोककर रखा गया हो अथवा रखा जाता हो। जैसे—कारागार आदि। ५. कोई चीज अच्छी तरह गठ या बाँधकर तैयार करना। जैसे—सेतु-बंधन। ६. शरीर के अन्दर की रगें जिनसे भिन्न-भिन्न अंग बँध रहते हैं। मुहावरा—(किसी के) बंधन ढीले करना=(क) बहुत अधिक मारना-पीटना। (ख) सारी शेखी या हेकड़ी निकाल देना। ७. नदियों आदि का बाँध। ८. पुल। सेतु। ९. वध। हत्या। १॰. हिंसा। ११. शिव का एक नाम।
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बंधन-ग्रंथि  : स्त्री० [ष० त०] १. शरीर में वह हड्डी जो किसी जोड़ पर हो। २. फाँस। ३. पशुओं को बाँधने की डोरी या रस्सी।
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बंधन-पालक  : पुं० [ष० त०] कारागार का प्रधान अधिकारी।
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बंधन-रक्षी (क्षिन्)  : पुं० [सं० बंधन√रक्ष्+णिनि] कारागार का प्रधान अधिकारी।
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बंधन-स्तंभ  : पुं० [ष० त०] वह खम्भा या खूँटा जिससे पशुओं को बाँधा जाता है।
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बँधना  : अ० [हिं० ‘बाँधना’ का अ० रूप] १. बंधन मे आना या पड़ना। बाँधा जाना। २. डोरी, रस्सी आदि से इस प्रकार लपेटा जाना अथवा कपड़े आदि की गाँठ से इस प्रकार कसा या जकड़ा जाना कि जल्दी उससे छूटा न जा सके। जैसे—गौ या घोड़ा बँधना, गठरी या पारसल बँधना। ३. किसी प्रकार के नियमन, प्रतिबंध आदि से युक्त होना। जैसे—प्रतिज्ञा या वचन से बँधना। ४. कारागार आदि में रखा जाना। कैद होना। जैसे—दोनों गुडे साल-साल भर के लिए बंध गये। ५. अच्छी तरह गठकर ठीक या प्रस्तुत होना। बनाया जाना। रचित होना। जैसे—मजमून बँधना। ६. पालन, प्रचलन आदि के लिए नियत या निर्धारित होना। जैसे—कायदा या नियम बँधना। ७. किसी के साथ इस प्रकार संबंद्ध संयुक्त या संलग्न होना कि जल्दी अलगाव या छुटकारा न हो। उदाहरण—अली कली ही तै, बँध्यो आगे कौन हवाल।—बिहारी। ८. ध्यान, विचार आदि के संबंध में निरंतर कुछ समय तक एक ही रूप में बना या लगा रहना जैसे—किसी आदमी या बात का ख्याल बँधना।
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बंधनागार  : पुं० [सं० बंधन-आगार, ष० त०] कारागार।
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बंधनालय  : पुं० [सं० बंधन-आलय० , ष० त०] कारागार।
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बंधनि  : स्त्री०=बंधन।
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बंधनी  : स्त्री० [सं०√वंध्+ल्युट-अन, ङीष्] १. शरीर के अन्दर की वे मोटी नसें जो संधि-स्थान पर होती है और जिनके कारण दो अवयव आपस में जुड़े रहते हैं। २. वह जिससे कोई चीज बाँधी जाय।
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बंधनीय  : वि० [सं०√बंध्+अनीयर्] जो बाँधा जा सके या बाँधा जाने को हो। पुं० १. बाँध। २. पुल। सेतु।
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बंध-पत्र  : पुं० [सं० ष० त०] १. विधिक दृष्टि से मान्य वह पत्र जिस पर हस्ताक्षर करनेवाला व्यक्ति अपने आपको कोई काम करने के लिए प्रतिज्ञा बद्ध करता है। जैसे—नियत काल तक कोई काम या नौकरी करते रहने, नियत समय पर कहीं उपस्थित होने या कुछ धन देने का बंध-पत्र। २. एक प्रकार का सार्वजनिक ऋण-पत्र जिसमे निश्चित समय के अन्दर कुछ विशिष्ट नियमों या शर्तों के अनुसार लिया हुआ ऋण चुकाने की प्रतिज्ञा होती है। (बांड)। विशेष—अंतिम प्रकार का बंध-पत्र राज्यों नगर-निगमों और बड़ी-बड़ी व्यापारिक संस्थाओं के द्वारा प्रचलित होते हैं।
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बंध-मोचनिका  : स्त्री० [सं० ष० त०] एक योगिनी का नाम।
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बंध-मोचिनी  : स्त्री०=बंधमोचनिका।
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बंधव  : पुं०=बाँधव। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बंधवाना  : स० [हिं० बाँधना का प्रे०] १. बाँधने का काम किसी दूसरे से कराना। किसी को कुछ बाँधने में प्रवृत्त करना। जैसे—बिस्तर बँधवाना। २. नियत या मुकर्रर कराना। ३. वास्तु आदि की रचना कराना। जैसे—कुआँ या तलाब बँधवाना। ४. बंधन अर्थात् कारागार आदि में डलवाना या रखवाना। जैसे—चोरों को बँधवाना।
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बंधान  : स्त्री० [हिं० बँधना] १. बँधे हुए की अवस्था या भाव। २. वह नियत परम्परा या परिपाटी जिसके अनुसार कुछ विशिष्ट अवसरों पर कोई विशिष्ट काम करने का बंधन लगा होता है। ३. वह धन जो उक्त परिपाटी के अनुसार दिया या लिया जाय। ४. संगीत में गीत, ताल, स्वर, लय आदि के संबंध में बँधे हुए नियम। ५. बाँध।
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बंधाना  : स०=बँधवाना।
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बंधानी  : पुं० [सं० बंध] बोझ ढोनेवाला। मजदूर। कुली। स्त्री०=बंधान।
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बंधाल  : पुं० [हिं० बंधान] जलयान, नाव आदि के पेदें का वह भाग जिसमें छेदों में से रिसकर आया हुआ पानी जमा होता है और जो बाद में उलीचकर बाहर फेका जाता है। गमतखाना। गमतरी।
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बंधिका  : स्त्री०=[हिं० बंधन] करघे में की वह डोरी जिसमें ताने की साँधी बाँधी जाती है। (जुलाहे)
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बंधित  : भू० कृ० [सं० बंध्या] बाँझ। (डिंगल)
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बंधित्र  : पुं० [सं०√बंध्+इत्र] १. काम-देव। २. तिल। (चिन्ह)। ४. चमड़े का बना हुआ पंखा।
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बंधी (धिन्)  : वि० [सं० बंध+इनि] १. बंधन में कसा, जकड़ा या पड़ा हुआ। २. जिसमें या जिसके लिए किसी प्रकार का बंधन हो। स्त्री० [हिं० बाँधना] १. बँधे हुए होने की अवस्था या भाव। २. बँधा हुआ क्रम। नियमित रूप से या नियत समय पर नियत समय पर नित्य किया जानेवाला काम। जैसे—हमारे यहाँ दूध की बंधी लगी है। क्रि० प्र०—लगना।—लगाना।
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बंधु  : पुं० [सं०√बंध् (बन्धन)+उ] १. भाई। भ्राता। २. परम आत्मीय और भाइयों की तरह साथ रहने का काम आनेवाला व्यक्ति। ३. ऐसा प्रिय मित्र जिसके साथ भाइयों का सा व्यवहार हो। ४. पिता। ५. एक वर्ण वृत्त जिसके प्रत्येक चरण में क्रमशः तीन-तीन भगण और दो दो गुरु होते हैं। दोधक। ६. बंधूक नामक पौधा और उसका फूल।
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बँधुआ  : वि० [हिं० बँधना+आ (प्रत्य)] १. जो बँधा रहता हो। २. (पशु आदि) जिसे बाँधकर रखा गया हो। पुं० कैदी। बंदी।
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बंधुक  : स्त्री० [सं० बंधु+उक] १. डेढ़ दो फुट ऊँचा। एक तरह का क्षुप जिसमें गोलाकार लाल रंग के फूल दोपहर के समय खिलते हैं। ३. उक्त क्षुप का फूल जो वैद्यक में बात तथा पित्त नाशक और कफ बढ़ानेवाला माना जाता है। दुपहिया। ३. जारज संतान।
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बंधुका  : स्त्री० [सं० बंधु+कन्+टाप्] व्यभिचारिणी स्त्री।
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बंधुकी  : स्त्री० [सं० बंधु+कन्+ङीष्] व्यभिचारिणी स्त्री।
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बंधु-कृत्य  : पुं० [सं० ष० त०] व्यक्ति का अपने भाई-बंधुओं तथा स्वजनों के प्रति होनेवाला कर्तव्य।
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बंधु-जीव  : पुं० [सं० बंध्√जीव् (जीना)+णिच्+अच्] बंधूक (फौधा और फूल)। दुपहरिया।
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बंधु-जीवक  : पुं० [सं० बंधुजीव+कन्] बंधूक। दुपहरिया।
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बंधुता  : स्त्री० [सं० बंधु+तल्+टाप्] १. बंधु होने की अवस्था या भाव। २. बंधुओं अर्थात् स्वजनों में परस्पर होनेवाला उचित व्यवहार। भाई-चारा। ३. दोस्ती। मित्रता। ४. भाई-बंधु तथा स्वजनों का वर्ग।
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बंधुत्व  : पु० [सं० बंधु+त्व]=बंधुता।
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बंधु-दत्त  : भू० कृ० [सं० तृ० त०] बंधुओं द्वारा दिया हुआ। बंधुओं से प्राप्त। पुं० बंधुओं स्वजनों आदि द्वारा कन्या को विवाह के अवसर पर दिया जानेवाला धन।
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बंधुदा  : स्त्री० [सं० बंधु√दा (देना)+क+टाप्] १. दुराचारिणी स्त्री। बदचलन औरत। २. रंडी। वेश्या।
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बंधुमान् (मत्)  : वि० [सं० बंधु+मतुप्] जिसके कई या बहुत से बंधु या स्वजन हों।
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बंधुर  : पुं० [सं०√बंधु+उरच्] १. बहरा आदमी। २. हंस। ३. बगुला। ४. मुकुट। ५. गुल दुपहरिया का पौधा या फूल। ६. काकड़ा सिंधी। ७. विंडग। ८. चिड़िया। पक्षी। ९. खली। वि० १. मनोहर। २. नम्र। विनीत। ३. झुका हुआ। सुन्दर। ४. ऊँचा-नीचा।
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बंधुरा  : स्त्री० [सं० बंधुर+टाप्] बंधुदा (दे०)
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बंधुल  : वि० [सं०√बंधु+उलच्] १. झुका हुआ। वक्र। २. सुन्दर। नम्र। पुं० १. वह व्यक्ति जो पर-पुरुष से उत्पन्न हुआ हो, पर किसी दूसरे के घर में पला हो तथा पराये के अन्न से पुष्ट हुआ हो। २. बदचलन स्त्री का लड़का। ३. वेश्या का लड़का।
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बंधूआ  : पुं०=बँधुआ। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बंधूक  : पुं० [सं०√बंध्+ऊक्] -बंधुक।
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बंधूप  : पुं०=बंधूक। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बंधूर  : पुं० [सं०√बंध्+ऊरच्] १. झुका हुआ। २. ऊंचा-नीचा। ३. मनोहर। पुं० छेद।
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बंधेज  : पुं० [हिं० बंधना+एज (प्रत्यय)] १. कोई नियत और परम्परागत प्रथा। विशेषतः बँधी हुई तथा सर्वमान्य ऐसी परम्परा जिसके अनुसार संबंधियों सेवकों आदि को कुछ विशिष्ट अवसरों पर धन आदि दिया जाता है। २. उक्त प्रथा के अनुसार दिया अथवा किसी को मिलनेवाला धन। ३. दे० बाँधनूँ। (छपाई) ४. प्रतिबंध। रुकावट। ५. ऐसी युक्ति जिससे वीर्य को जल्दी स्खलित नहीं होने दिया जाता। वाजीकरण।
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बंध्य  : वि० [सं०√बंध्+यक्] १. जो बँधा जा सके अथवा बाँधने केयोग्य हो। २. कारावास में रखे जाने के योग्य। ३. जो तैयार किये जाने बनाये जाने अथवा निर्मित किये जाने को हो। ४. जो उपजाऊ न हो। ऊसर। ५. बाँझ। (स्त्री)
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बंध्या  : स्त्री० [सं० बंध्य+टाप्] १. स्त्री या मादा प्राणी जिसे संतान न होती हो। बाँझ। पद—बंध्या पुत्र। (देखें)। २. योनि का एक रोग। ३. एक गंध-द्रव्य।
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बंध्या-कर्कोटकी  : स्त्री० [सं० ष० त०] कड़वी ककड़ी। बाँझ-ककोड़ा।
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बंध्यापन  : पुं०=बाँझपन।
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बंध्यापुत्र  : पुं० [सं० ष० त०] १. बाँझ स्त्री का पुत्र अर्थात् ऐसा अनहोना व्यक्ति जो कभी अस्तित्व में न आ सकता हो। २. लाक्षणिक अर्थ में कोई ऐसी चीज या बात जो बंध्या के पुत्र के समान अनहोनी हो।
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बंध्यासुत  : पुं० [ष० त०] बंध्यासुत।
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बं-पुलिस  : स्त्री० [अ० बम+पुलिस] सार्वजनिक शौचालय।
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बंब  : पुं० [अनु०] १. बंब शिव शिव आदि शब्दों की ऊँची ध्वनि जो शैव लोग भक्ति की उमंग में शिव को प्रसन्न करने के लिए किया करने हैं। २युद्धारम्भ में वीरों का उत्साहवर्धक नाद। रणनाद। उदाहरण—नारद कब बंदूक चलाया व्यासदेव कब कब बजाया। कबीर। ३. बहुत जोर का शब्द। क्रि० प्र०—देना।—बोलना। ४. धौंसा। नगाड़ा। ५. सींग का बना हुआ तुरही की तरह का एक बाजा। ६. दे० ‘बम’।
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बंबई  : स्त्री० [सं० वल्मीक] १. दीमकों की बांबी। २. रहस्यवादी संतों की भाषा में देह। शरीर।
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बंबा  : पुं० [अ० बंमा] १. स्रोत। सोता। २. उद्गम। ३. पानी की कल। पम्प। ४. जल-कल। ५. पानी बहाने का नल। ६. कोई लम्बोतरा गोल पात्र। जैसे—डाक की चिट्ठियाँ डालने का बंबा।
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बंबाना  : अ० [अनु०] गौ आदि पशुओं का बाँ-बाँ शब्द करना। रँभाना।
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बंबू  : पुं० [मलाया बम्बू-बाँस] १. चंडू पीने की बाँस की नली। २. नली। क्रि० प्र०—पीना।
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बंबूकाट  : पुं० [मलाया० बंबू+अं० कार्ट] एक प्रकार की टाँगे की तरह की सवारी (पश्चिम)।
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बँबूर  : पुं०=बबूल।
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बंभ  : पुं०=ब्रह्म। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बँभनाई  : स्त्री० [सं० ब्राह्मण] १. ब्राह्मणत्व। ब्राह्मणपन। २. ब्राह्मणों की यजमानी धोती। ३. दुराग्रह। ४. जिद। हठ।
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बंस  : पुं०=वंश।
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बंसकपूर  : पुं०=बंस-लोचन।
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बंसकार  : पुं० [सं० वंश] बाँसुरी। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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बँसगर  : पुं० [हिं० बाँस+फा० गर (प्रत्यय)] बाँस की चटाइयाँ टोकरियाँ आदि बनानेवाला व्यक्ति। वि० [सं० वंश] अच्छे वंशवाला। कुलीन।
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बँस-दिया  : पुं० [हिं० बाँस+दिया] गाड़े हुए बाँस के ऊपरी सिरे पर लटकाया जानेवाला दीया। विशेष दे० ‘आकाश दीप’।
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बंसमुरगी  : स्त्री० [हिं० बाँस+मुरगी] एक प्रकार की चिड़िया जो तालों के किनारे तथा घनी झाड़ियों के आस-पास रहती है। इसे दहक भी कहते हैं।
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बंसरी  : स्त्री०=बाँसुरी। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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बँसली  : स्त्री०=बाँसुरी।
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बंस-लोचन  : पुं०=वंशलोचन।
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बँसवाड़ा  : पुं० [हिं० बाँस+बाड़ा (प्रत्यय)] [स्त्री० अल्पा० बँसवाड़ी] १. वह बाजार या मुहल्ला जहाँ बाँस बेचनेवालों की बहुत सी दुकानें या घर हों। २. एक जगह उगे हुए बाँसों का समूह। कोठी।
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बँसवार  : पुं० [स्त्री० अल्पा० बँसवारी]=बँसवाड़ा। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बँसहटा  : पुं० [हिं० बाँस] [स्त्री० अल्पा० बँसहटी] वह चारपाई जिसमें पाटी की जगह बाँस लगे हुए हों।
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बंसार  : पुं० [देश] बंसगार (लश्करी)।
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बंसी  : स्त्री० [सं० वंशी] १. बाँसुरी। बंशी। २. देवताओं के चरणों में मानी जानेवाली एक प्रकार की रेखा जो बाँसुरी के आकार की होती है। ३. लाक्षणिक अर्थ में कोई चीज या बात जिससे किसी को फँसाया जाता हो। ४. धान के खेतों मे होनेवाली एक प्रकार की घास। बाँसी। ५. एक प्रकार का गेहूँ। ६. तीस परमाणुओं की एक तौल त्रणरेणु। स्त्री० [सं० वरिशी] मछली फँसाने की कँटिया।
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बंसीधर  : पुं०=वंशीधर (श्रीकृष्ण)।
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बँसुला, बँसूला  : पुं०=वसूला।
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बँसोर  : पुं० [हिं० बाँस] बाँस की चटाइयाँ, टोकरियाँ आदि बनानेवाली एक जाति।
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बँहगी  : स्त्री० [सं० वह] भार ढोने का एक प्रकार का उपकरण जिसमें एक लम्बे बाँस के टुकड़ें के दोनों सिरों पर रस्सियों के बड़े-बड़े छीकें या दौरे लटका दिये जाते हैं और जिनमें बोझ रखा जाता है। क्रि० प्र०—उठाना।—ढोना।
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बँहरखा  : पुं० [हिं० बाँह] बाँह पर पहनने का एक गहना। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बँहिया  : स्त्री० १.=बाँह। २.=बहँगी।
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बँहूटा, बँहूटा  : पुं० [हिं० बाँह] बाँह पर पहनने का एक प्रकार का गहना। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बँहोल  : स्त्री० १. बाँह। २. बहँगी।
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बँहूटा, बँहूटा  : पुं० [हिं० बाँह] बाँह पर पहनने का एक प्रकार का गहना।
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बँहोल (ी)  : स्त्री० [हि० बाँह] आस्तीन।
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बँहोलनी, बँहोली  : स्त्री०=बँहोल। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बइठना  : अ०=बैठना। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बइर  : विर=पुं० १.=बैर। २.=बेर। (पेड़ या फल)। वि०=वथिर (बहरा)। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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बउर  : पुं० १. दे० ‘बौर’। २. दे० ‘मौर’। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बउरा  : वि०=बावला। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बउराना  : अ० स०=बौराना।
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बक  : पुं० [सं०√बंक् (टेढ़ा होना) अच्, पृषो० सिद्धि] १. बगला। २. एक प्राचीन ऋषि। ३. अगत्स्य नामक वृक्ष और उसका फूल। ४. कुबेर। ५. एक राक्षस जिसे भीम ने मारा था। ६. एक राक्षस जिसे श्रीकृष्ण ने मारा था। वि० बगुले की तरह सफेद। स्त्री० [हिं० बकना] १. बकने की क्रिया या भाव। २. बकवाद। क्रि० प्र०—लगाना। पद—बक-बक या बक-झक-(क) बकवाद। प्रलाप। व्यर्थवाद। (ख) कहा-सुनी। ३. मुँह से निकलनेवाली बात। वचन।
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बकचंदन  : पुं० [देश] एक वृक्ष का नाम जिसकी पत्तियाँ गोल तथा बड़ी होती है। भकचंदन।
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बक-चक  : स्त्री० [अनु०] मध्य युग का एक प्रकार का हथियार।
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बकचन  : पुं०=बक-चंदन। स्त्री०=बकुचन। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बकचर  : वि० [सं० बक√चर् (गति)+ट] ढोंगी।
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बकचा  : पुं०=बकुचा।
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बक-चिंचिका  : स्त्री० [सं०] कौआ नाम की मछली।
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बकची  : स्त्री०=बकुची।
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बकुचन  : स्त्री०=बकुचन।
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बकजित्  : पुं० [सं० बक√जि (जीतना)+क्विप्, तुक्, उप० स०] १. भीम। २. श्रीकृष्ण।
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बकठाना  : अ० [सं० विकुंठन] बहुत कसैली चीज खाने से जीभ का कुछ ऐंठना या सिकुड़ना।
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बकतर  : पुं० [फा० बक्तर] [स्त्री० अल्पा० बकतरी] मध्य-युग में युद्ध के समय पहना जाना वाला एक तरह का अँगरखा जिसमें आगे और पीछे दो दो तबे लगे रहते थे। चार-आईना। सन्नाह। (जिरह से भिन्न)।
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बकतर-पोश  : पुं० [फा० बक्तर+पोश] वह योद्धा जो बकतर पहने हो।
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बकता  : पुं०=बक्ता। पुं०=बखता। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बकतार  : पुं०=वक्ता। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बकतिया  : स्त्री० [देश] एक प्रकार की छोटी मछली।
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ब-कदर  : क्रि० वि० [फा० ब+अं० कद्र] १. अमुक दर, मान या हिसाब से। २. अनुसार।
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बक-ध्यान  : पुं० [सं० ष० त०] कोई दुष्ट उद्देश्य सिद्ध करने के लिए उसी प्रकार भोले-भाले या सीधे-सादे बनकर विचार करते रहना जिस प्रकार जिस प्रकार बगुला जलाशयों में से मछलियाँ खाने के लिए चुपचाप खड़ा रहता है। बनावटी साधु-भाव। क्रि० प्र०—लगाना।
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बक-ध्यानी (निन्)  : वि० [हिं० बकध्यान+इनि] बक-ध्यान लगानेवाला।
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बकना  : स० [सं० वचन] १. उटपटाँग या व्यर्थ की बहुत सी बातें कहना। व्यर्थ बहुत बोलना। पद—बकना-झकना=क्रोध में आकर बिगड़ते हुए बहुत-सी खरी खोटी बातें कहना। २. निरर्थक बातों या शब्दों का उच्चारण करना। प्रलाप करना। बड़बड़ाना। ३. विवश होकर अपने अपराध या दोष के संबंध की सब बातें बताना।
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बक-निषुदन  : पुं० [सं० ष० त०] १. भीम। २. श्रीकृष्ण।
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बक-पंचक  : पुं० [सं० ब० स०+कप्] कार्तिक महीने में शुक्लपक्ष की एकादशी से पूर्णिमा तक के पाँच दिन जिनमें मांस मछली आदि खाना बिलकुल मना है।
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बकम  : पुं०=वक्कम।
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बकमौन  : पुं० [सं० ष० त०] अपने दुष्ट उद्देश्य की सिद्धि के निर्मित बगुले की भाँति मौन तथा शांत बनकर चुपचाप रहने की क्रिया, भाव या मुद्रा। वि० जो उक्त उद्देश्य तथा प्रकार से बिलकुल चुप या मौन हो।
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बक-यंत्र  : पुं० [सं० उपमि० स०] वैद्यक में औषधों का सार निकालने के लिए एक प्रकार का यंत्र जो कांच की शीशी के आकार का होता है।
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बकर  : पुं० [अ० बकर] गाय का बैल।
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बकर-ईद  : स्त्री०=बकरीद।
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बकर-कसाव  : पुं० [हिं० बकरी+अ० कस्साव-कसाई] [स्त्री० बकर-कसायिन] बकरों का मांस बेचनेवाला पुरुष। कसाई।
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बकरना  : स० [हिं० बकार अथवा बकना] १. आप से आप बकना। बड़बड़ाना। २. अपने अपराध या दोष की बातें विवश होकर कहना।
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बकरम  : पुं० [अ० बकरम्] गोंद आदि लगाकर कड़ा किया हुआ वह करारा कपडा जो पहनने के कपड़ों के कालर, आस्तीन आदि में कडा़ई लाने के लिए अन्दर लगाया जाता है।
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बकरवाना  : स० [हिं० बकरना का प्रे०] किसी को बकरने में प्रवृत्त करना।
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बकरा  : पुं० [सं० बर्कार] [स्त्री० बकरी] एक प्रसिद्ध नर-पशु जिसके सींग तिकोने, गठीले और ऐंठनदार तथा पीठ की और झुके हुए होते हैं। पूँछ छोटी होती है और शरीर से एक प्रकार की गंध आती है। अज। छाग।
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बकराना  : स०=बकरवाना।
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बकल  : पुं०=बकला। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बकलस  : पुं०=बकसुआ।
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बकला  : पुं० [सं० वल्कल] [स्त्री० अल्पा० बकली] १. पेड़ की छाल। २. फल के ऊपर का छिलका।
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बकली  : स्त्री० [देश] एक प्रकार का बड़ा और सुन्दर वृक्ष जिसे धावा घव आदि भी कहते हैं।
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बकवती  : स्त्री० [सं० वक+मतुप, ङीष्+वकलती] एक प्राचीन नदी।
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बकवाद  : स्त्री० [हिं० बक+वाद] लम्बी-चौड़ी बेसिर-पैर की तथा बिना मतलब की कही जानेवाली बातें। क्रि० प्र०—करना।
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बकवादी  : वि० [हिं० बकवाद+ई (प्रत्यय)] १. (व्यक्ति) जो बकवाद करता हो। २. बहुत अधिक बातें करनेवाला। जो प्रकृतिश प्रायः बातें करता रहता हो। ३. बकवाद संबंधी या बकवादी के रूप में होनेवाला।
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बकवाना  : स० [हिं० बकना का प्रे०] १. किसी को बकने या बकवाद करने में प्रवृत्त करना। २. किसी से कोई बात कहलवा लेना। कहनें में विवश करना।
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बकवास  : स्त्री० [हिं० बकना+वास (प्रत्यय)] १. बकवाद। २. बकवाद या बक-बक करने की प्रवृत्ति या शौक। क्रि० प्र०—लगना।
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बकवासी  : वि०=बकवादी।
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बक-वृत्ति  : स्त्री० [सं० ष० त०] बकों या बगुलों (पक्षियों) की सी वह वृत्ति जिसमें वह ऊपर से देखने पर तो बहुत भोला-भाला या सीधा-सादा बना रहता है पर अन्दर ही अन्दर अनेक प्रकार के छल-कपट की बातें सोचता रहता है। वि० [ष० त०] (व्यक्ति) जिसकी मनोवृत्ति उस प्रकार की हो बक-ध्यानी।
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बकव्रती (तिन्)  : वि० [सं० बक-व्रत, ष० त०+इनि] बक वृत्तिवाला। कपटी।
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बकस  : पुं० [अं० बाक्स] १. लकड़ी लोहे आदि का बना हुआ एक तरह का ढक्कनदार चौकोर आधान जिसमें वस्त्र आदि सुरक्षा की दृष्टि से रखे जाते हैं। संदूक। २. गहने, घड़ियाँ आदि रखने का खाना।
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बकसना  : स० [फा० बख्श+हिं० ना (प्रत्यय)] १. उदरतापूर्वक किसी को कुछ दान देना। २. अपराधी या दोषी को दण्डित न करके उसे क्षमा करना। माफ करना। ३. दयापूर्वक छोड़ देना या जाने देना।
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बकसवाना  : स०=बखशवाना।
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बकसा  : पुं० [देश] जलाशयों के किनारे रहनेवाली एक तरह की घास। पुं०=बकस (संदूक)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बकसाना  : स० [हिं० बकसना का प्रे० रूप] क्षमा या माफ कराना। बखशवाना।
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बकसी  : पुं०=बख्शी। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बकसीला  : वि० [हिं० बकठाना] [स्त्री० बकसीली] जिसके खाने से मुँह का स्वाद बिगड़ जाय और जीभ ऐंटने लगे। बकबका।
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बकसीस  : स्त्री० [फा० बख्शिश] १. दान। २. इनाम। पुरस्कार। ३. शुभ अवसरों पर गरीबों तथा सेवकों को दिया जानेवाला दान।
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बकसुआ  : पुं० [अं० बकल] पीतल, लोहे आदि का एक तरह का चौकोर छल्ला जिससे तस्मे फीते आदि बाँधे जाते हैं। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बका  : स्त्री० [अ० बका] १. नित्यता। २. अनश्वरता। ३. अस्तित्व में बने रहना। ४. जीवन।
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बकाइन  : पुं०=बकायन (वृक्ष)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बकाउ  : स्त्री०=बकावली। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बकाउर  : स्त्री०=बकावली। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बकाना  : स० [हिं० बकना का प्रे० रूप०] १. किसी को बकने में प्रवृत्त करना। २. किसी को दबाकर उसके मन की छिपी हुई बात कहलाना।
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बकायन  : पुं० [हिं० बड़का+नीम ?] नीम की जाति का एक पेड़ जिसकी पत्तियाँ नीम की पत्तियों के समान तथा कुछ बड़ी और दुर्गन्धयुक्त होती है। महानिंब।
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बकाया  : वि० [अ० बक़ायः] बाकी बचा हुआ। अवशिष्ट। शेष। पुं० १. वह धन जो किसी की ओर निकल रहा हो। ऐसा धन जिसका भुगतान अभी होने को हो। २. बचा हुआ धन। बचत। ३. किसी काम या बात का वह अंश जिसका अभी संपादन होना शेष हो।
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बकारि  : पुं० [सं० बक-अरि, ष० त०] बकासुर के शत्रु अर्थात् श्रीकृष्ण।
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बकारी  : स्त्री० [सं० वकार या वाक्य] वह शब्द जो मुँह से प्रस्फुटित् हो। मुँह से निकलनेवाला शब्द। क्रि० प्र०—निकलना।—फूटना। स्त्री०=बिकारी। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बकावर  : स्त्री०=बकावली। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बकावली  : स्त्री० [सं० बक-आवली, ष० त०] १. बगुलों की पंक्ति। बक-समूह। २. दे० ‘गुल-बकावली’ (पौधा और फूल)।
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बकासुर  : पुं० [सं० बक-असुर, मध्य० स०] एक दैत्य जिसे श्रीकृष्ण ने मारा था।
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बकिनव  : पुं०=बकायन (वृक्ष)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बकिया  : वि० [अ० बकियः] बाकी बचा हुआ। अवशिष्ट।
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बकी  : स्त्री० [सं० बक+ङीष्] बकासुर की बहिन पूतना नामक राक्षसी।
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बकुचन  : स्त्री० [?] १. हाथ जोड़ना। २. मुटठी या पंजे में पकड़ना। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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बकुचना  : अ० [सं० बिकुचन] सिमटना। सिकुड़ना। संकुचित होना।
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बकुचा  : पुं० [हिं० बकुचना] [स्त्री० बकुची] १. छोटी गठरी। बकचा। २. ढेर। ३. गुच्छा। ४. जुड़ा हुआ हाथ।
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बकुचाना  : स० [हिं० वकुचा] किसी वस्तु को बकुचे में बाँधकर कंधे पर लटकाया या पीछे पीठ पर बाँधना।
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बकुची  : स्त्री० [सं० वाकुची] एक प्रकार का पौधा जो हाथ-सवा हाथ ऊँचा होता है। इसके कई अंग ओषधि के काम आते हैं। स्त्री० हिं० बकुचा (गठरी) का स्त्री० अल्पा०। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बकुचौहाँ  : अव्य० [हिं० बकुचा+औहाँ (प्रत्यय)] [स्त्री० बकुचौही] बकुचे की भाँति। बकुचे के समान। वि० जो बकुचे या गठरी के रूप में हो।
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बकुर  : पुं० [सं० भास्कर या भयंकर पृषो सिद्धि] १. भास्कर। सूर्य। २. बिजली। विद्युत। ३. तुरही। पुं०=बक्कुर। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बकुरना  : अ ०=बकरना।
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बकराना  : स० [हिं० बकुरना का प्रे० रूप] अपराध या दोष कबूल कराना या मुँह से कहलाना।
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बकुल  : पुं० [सं०√बंक्+उरच्, र—ल] १. मौलसिरी। २. शिव। ३. एक प्राचीन देश। वि० [स्त्री० बकुली]=वक्र (टेढ़ा)।
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बकुलटर  : पुं० [हि० बकुला+टरर अनु०] पानी के किनारे रहनेवाली एक प्रकार की चिड़िया जिसका रंग सफेद होता है और जो दो-तीन हाथ ऊँची होती है।
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बकुला  : पुं०=बगुला। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बकुली  : स्त्री० हिं० बक (बगला) की मादा। उदा०—बकुली तेहि जल हंस कहावा।—जायसी।
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बकूल  : पुं०=वकुल।
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बकेन  : स्त्री० [सं० वष्कयणी] ऐसी गाय या भैंस, जिसे ब्याये ५-६ महीने के ऊपर हो चुका हो, और जो बराबर दूध देती हो। दे० ‘लवाई’ का विपर्याय।
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बकेना  : स्त्री०=बकेन। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बकेरुका  : स्त्री० [सं० बंक (टेढ़ा)+ड+एरुक्+कन्+टाप्] १. छोटी बकी। २. हवा से झुकी हुई वृक्ष की शाखा।
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बकेल  : स्त्री० [हिं० बकला] पलाश की जड़ जिसे कूटकर रस्सी बनाते हैं।
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बकैयाँ  : स्त्री० [सं० बक+ऐयाँ (प्रत्यय)] छोटे बच्चों का घुटनों के बल चलने की क्रिया।
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बकोट  : स्त्री० [सं० प्रकोष्ठ या अभिकोष्ठ, पा० पक्कोष्ठ] १. बकोटने की क्रिया या भाव। २. बकोटने के फल-स्वरूप पड़ा हुआ चिन्ह। ३. बकोटने के लिए बनायी हुई उँगलियों और हथेली की मुद्रा। ४. किसी पदार्थ की उतनी मात्रा जितनी उक्त मुद्रा में समाती हो। चंगुल। जैसे—एक बकोट चना इसे दे दो।
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बकोटना  : स० [वि० बकोट+ना (प्रत्यय)] १. नाखूनों से कोई चीज विशेषतः शरीर की त्वचा या मांस नोचना। २. लाक्षणिक रूप में कोई चीज किसी से बलपूर्वक लेना या वसूल करना। उदाहरण—ये चंदा बकोटनेवाले फिर जेल से बाहर आ गये।—वृन्दावनलाल वर्मा।
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बकोटा  : पुं० [हिं० बकोटना] १. बकोटने की क्रिया या भाव। २. बकोटने से पड़नेवाला चिन्ह या निशान। ३. उतनी मात्रा जितनी चंगुल या मुट्ठी में आ जाय।
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बकोरी  : स्त्री०=गुलबकावली।
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बकौंड़ा  : पुं० [हिं० बक्कल] पलाश के पेड़ की जड़ों का कूटा हुआ वह रूप जिसे बटकर रस्सी बनायी जाती है। पुं०=बकौरा। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बकौरा  : पुं० [हिं० बाँका] [स्त्री० अल्पा० बकौरी] वह टेढ़ी लकड़ी जो बैलगाड़ी के दोनों ओर पहिए के ऊपर लगायी जाती है। पैंगनी। पैजनी। पुं०=बकौड़ा। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बकौरी  : स्त्री०=गुल-बकावली। उदाहरण—कोइ बोल सिरि पुहुप बकौरी।—जायसी। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बकौल  : अव्य० [अ० बकौल] (किसी के) कथनानुसार । जैसे—बक़ौले शख्से=किसी व्यक्ति के कथनानुसार।
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बक्कम  : पुं० [अ० वकम] एक प्रकार का वृक्ष जो मद्रास, मध्यप्रदेश, तथा वर्मा में अधिक होता है। यह आकार में छोटा और कँटीला होता है। पतंग।
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बक्कल  : पुं० [सं० वल्कल, पा० वक्कल] १. छिलका। २. छाल।
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बक्का  : पुं० [देश] [स्त्री० अल्पा० बक्की] धान की फसल में लगनेवाले एक तरह के सफेद या खाकी रंग के छोटे-छोटे कीड़े।
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बक्काल  : पुं० [अ० बक्काल] १. सब्जी बेचनेवाला व्यक्ति। कुंजड़ा। २. बनिया। वणिक। ३. परचूनिया।
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बक्की  : वि० [हिं० बकना] बकवाद करनेवाला। बकवादी। स्त्री० [देश] भादों में पककर तैयार होनेवाला एक तरह का धान।
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बक्कुर  : पुं० [सं० वाक्य] मुँह से निकला हुआ शब्द। बोल। वचन। क्रि० प्र०—निकलना।—फूटना। पुं०=बक्कर।
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बक्खर  : पुं० [देश०] १. कई प्रकार के पौधों की पत्तियों और जड़ों आदि को कूटकर तैयार किया हुआ वह खमीर जो दूसरे पदार्थों मं खमीर उठाने के लिए डाला जाता है। २. वह स्थान जहाँ पर गाय-बैल बाँधे जाते हैं। पुं०=बखार (तृण)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बक्षोज  : पुं० वक्षोज (स्तन)। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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बक्स  : पुं०=बकस।
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बखत  : पुं० १.=वक्त (समय) २.=बख्त (भाग्य)।
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बखतर  : पुं०=बकतर।
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बखता  : पुं० [?] भुना हुआ चना जिसका ऊपरी छिलका उतारा जा चुका हो। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बखर  : पुं० [?] खेत जोतने के उपकरण। पुं०=बखार। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बखरा  : पुं० [फा० बखरः] १. भाग। हिस्सा। २. किसी चीज या चीजों का कई अंशों में होनेवला वह विभाजन जो अलग-अलग हिस्सेदार को मिलता है। पुं०=बखार।
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बखरी  : स्त्री० [हिं० बखार का स्त्री० अल्पा०] गाँव में वह मकान जो साधारण घरों की अपेक्षा बड़ा या बढ़िया हो।
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बखरैत  : वि० [हिं० बखरा+ऐत(प्रत्यय)] बखरा या हिस्सा बँटानेवाला। हिस्सेदार। साझीदार।
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बखसना  : अ०=बख्शना (क्षमा करना)।
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बखसीस  : स्त्री०=बक्सीस।
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बखसीसना  : स० [फा० बख्शिश] बखशिश के रूप में देना। प्रदान करना।
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बखान  : पुं० [सं० व्याख्यान, पा० पक्खान] १. बखानने की क्रिया या भाव। २. बखान कर कहीं जानेवाली बात। ३. विस्तारपूर्वक किया जानेवाला वर्णन। ४. तारीफ। प्रशंसा।
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बखानना  : स० [हिं० बखान+ना (प्रत्यय)] १. विस्तारपूर्वक कहना या वर्णन करना। २. तारीफ या प्रशंसा करना। ३. विस्तारपूर्वक तथा गालियाँ देते हुए किसी के दुर्गुणों दोषों आदि का उल्लेख करना। ४. गालियाँ देते हुए किसी का उल्लेख करना। जैसे—किसी का बाप-दादा बखारना।
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बखार  : पुं० [सं० आकार] [स्त्री० अल्पा० बखारी] १. दीवार, या टट्टी आदि से घेरकर बनाया हुआ गोल और विस्तृत घेरा जिसमें गाँवों में अन्न रखा जाता है। २. वह स्थान जहाँ किसी चीज की प्रचुरता हो।
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बखारी  : स्त्री० [हिं० बखार] छोटा बखार।
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बखिया  : पुं० [फा० बखियः] १. एक प्रकार की महीन और मजबूत सिलाई, जिसमें दोहरे टाँके लगाये जाते हैं। क्रि० प्र०—उघड़ना।—उधेड़ना।—करना। मुहावरा—बखिया उधेड़ना=भेद खोलना। भंडा फोड़ना। २. जमा। पूँजी। ३. योग्यता। ४. शक्ति। सामर्थ्य। ५. गति। पहुँच।
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बखियाना  : स० [हिं० बखिया] बखिया (सिलाई) करना।
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बखीर  : स्त्री० [हिं० खीर का अनु०] गन्ने के रस में चावल पकाकर बनायी जानेवाली एक तरह की खीर।
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बखील  : वि० [अ० बखील] [भाव० बखीली] कृपण। कंजूस। सूम।
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बखीली  : स्त्री० [अ० बखीली] कंजूसी। कृपणता।
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बखूबी  : अव्य० [फा०] १. खूबी के साथ। भलीभाँति। अच्छी तरह से। २. पूरी तरह से या पूर्ण रूप से।
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बखेड़ा  : पुं० [हिं० बिखरना] १. किसी चीज के इस प्रकार विखरे हुए होने की स्थिति कि उसे इकट्ठा करने तथा सँवारने में अधिक परिश्रम तथा समय अपेक्षित हो। २. व्यर्थ का विस्तार। आडम्बर। ३. कोई उलझनवाला और बहुत अधिक काम जिसे सरलता से सुलझाया और सम्पन्न न किया जा सकता हो। ४. कोई सांसारिक क्रिया-कलाप। ५. झगड़ा। विवाद।
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बखेड़िया  : वि० [हिं० बखेड़ा+इया (प्रत्यय)] बखेड़ा करनेवाला। बखेड़ा अर्थात् विवाद करनेवाला। बहुत अधिक झगड़ालू।
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बखेरना  : स०=बिखेरना।
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बखेरी  : स्त्री० [देश०] छोटे कद का एक प्रकार का कँटीला वृक्ष जिसके फलों से चमड़ा रंगा तथा सिझाया जाता है। इसे कुंती भी कहते हैं।
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बखोरना  : स० [हिं० खोर=गली] सीधे रास्ते से छुड़ा या बहकाकर किसी और रास्ते पर ले जाना। बहकाकर इधर-उधर ले जाना। उदाहरण—साँकरि खोरि बखोरि हमें किन खोरि लगाय खिसैबौ करौं कोइ।—देव। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बख्त  : पुं० [फा० बख्त] किस्मत। भाग्य। पद—बख्तो-जला=बहुत बड़ा अभागा। पुं०=वक्त (समय)।
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बख्तर  : पुं०=बकतर।
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बख्तावर  : वि० [फा० बख्तावर] [भाव० बख्तावरी] १. सौभाग्यशाली। २. धनी। सम्पन्न।
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बख्श  : वि० [फा० बख्श] १. समस्त पदों के अन्त में, देने या प्रदान करनेवाला। जैसे—जाँ-बख्श-जीवन देनेवाला। २. बक्शने अर्थात् क्षमा करनेवाला। जैसे—खता-बख्श=अपराध क्षमा करनेवाला। ३. नामों के अन्त में बख्शिश देन, प्रसाद। जैसे—करीम बख्श, मौला-बख्श।
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बख्शना  : स० [फा० बख्श] १. प्रदान करना। देना। २. क्षमा करना। ३. दयापूर्वक छोड़ देना या जाने देना।
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बख्शनामा  : पुं०=बख्शिशनामा।
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बख्शवाना  : स० [हिं० बख्शना का प्रे० रूप०] किसी को कोई चीज बखसीस रूप में देने अथवा किसी अपराधी को क्षमा करने में प्रवृत्त करना।
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बख्शाना  : स०=बख्शवाना।
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बख्शिश  : स्त्री० [फा० बख्शिश] १. दानशीलता। २. दान। ३. इनाम। पुरस्कार। ४. क्षमा।
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बख्शिशनामा  : पुं० [फा० बख्शिशनामः] वह पत्र जिसके अनुसार कोई सम्पत्ति बख्शी या प्रदान की गयी हो। दान-पत्र।
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बख्शी  : पुं० [फा०] १. मध्य-युग में सैनिकों को तनख्वाह बाँटनेवाला एक कर्मचारी। २. खजांची। ३. गाँव, देहातों में कर वसूल करनेवाला अधिकारी।
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बख्शीश  : स्त्री०=बख्शिश।
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बग  : पुं०=बगुला। स्त्री० हिं० बाग (लगाम) का संक्षिप्त रूप। जैसे—बगछुट, बगमेल।
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बगई  : स्त्री० [देश०] १. एक प्रकार की मक्खी जो कुत्तों पर बहुत बैठती हैं। कुकुरमाछी। २. पतली और लम्बी पत्तियोंवाली एक प्रकार की घास, जिससे डोरियाँ बटी जाती है। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बगछुट  : वि० [हिं० बाग+छूटना] १. (घोड़ा) जिसकी बाग या लगाम छोड़ दी गयी हो इसलिए जो बहुत तेजी से दौड़ा जा रहा हो। अव्य० इस रूप में दौड़ना या भागना कि मानो कोई नियंत्रण न रह गया हो। बे-हताशा। सरपट।
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बगटुट  : वि० अव्य०=बगछुट।
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बगड़  : पुं० [?] बाड़ा। घेरा। पुं०=बागड़। (राज० ) स्त्री०=बगल। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बगड़ा  : पुं० [?] गौरैया (चिड़िया) (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बगतर  : पुं०=बकतर। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बगदना  : अ० [सं० विकृत, हिं० बिगड़ना] १. बिगड़ना। खराब होना। २. रास्ता भूलकर कहीं से कहीं चले जाना। भटकना। ३. कर्त्तव्य सुमार्ग आदि से च्युत होना।
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बगदर  : पुं० [देश०] मच्छर। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बगदवाना  : स० [हिं० बगदाना का प्रे० रूप०] किसी को बगदने में प्रवृत्त करना।
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बगदहा  : वि० [हिं० बगदना+हा(प्रत्यय)] [स्त्री० बगदही] १. बिगडऩेवाला। २. (पशु) जो गुस्से में आकर जल्दी बिगड़ खड़ा होता हो। ३. लड़नेवाला। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बगदाद  : पुं० [फा० बग़दाद] इराक नामक राज्य की राजधानी।
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बगदाना  : स० [हिं० बगदना] १. नष्ट या बरबाद करना। २. भ्रम में डालकर भटकाना। ३. गिराना। लुढ़काना। ३. कर्त्तव्य, प्रतिज्ञा आदि से च्युत कराना।
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बगना  : अ० [सं० वल्गन] १. घूमना-फिरना। गमन करना। जाना। ३. दौड़ना। ४. भागना। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बगनी  : स्त्री० [?] एक प्रकार का टोंटीदार लोटा। स्त्री० बगई (घास)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बगबगाना  : अ० [अनु०] ऊँट का काम-वासना से मत्त होना।
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बग-मेल  : पुं० [हिं० बाग+मेल] १. दूसरे घोड़े के साथ बाग मिलाकर चलना। एक पंक्ति में या बराबर-बराबर चलना। २. घुड़सवारों की पंक्ति या सतर। ३. यात्रा, युद्ध आदि में होनेवाला संग साथ। ४. बराबरी। समानता। क्रि० वि० १. घोड़ों के सवारों के संबंध में बाग मिलाये हुए और साथ-साथ। २. बराबर साथ रहते हुए।
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बगर  : पुं० [सं० प्रघण, प्रा० पघम] १. महल। प्रासाद। २. घर। मकान। ३. कमरा। कोठरी। ४. आँगन। सहन। ५. गौए-भैसे आदि बाँधने का स्थान। स्त्री०=बगल। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बगरना  : अ० [सं० विकिरण] फैलना। बिखरना। छितराना। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बगरवाना  : सं० [हिं० बगराना का प्रे० रूप०] किसी को कुछ बगराने अर्थात् बिखेरने में प्रवृत्त करना।
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बगरा  : पुं०=[देश] एक प्रकार की छोटी मछली जो जमीन पर उछलती हुई चलती है। इसे थुमा भी कहते हैं।
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बगराना  : स० [हिं० बगरना का स० रूप०] बिखेरना। छितराना। अ० बिखरना।
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बगरिया  : स्त्री० [देश] गुजरात, राज्य के कच्छ-काठियावाड़ आदि प्रदेशों में होनेवाली एक तरह की कपास। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बगरी  : पुं० [हिं० बगर का स्त्री० रूप०] १. छोटा महल। २. मकान। बखरी। ३. गौएँ, भैसें आदि बाँधने का छोटा बाड़ा। पुं० [देश] एक प्रकार का धान। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बगल  : स्त्री० [फा० बगल] १. बाहु-मूल के नीचे का गड्ढा। काँख। पद—बगल-गंध। (देखें)। मुहावरा—बगलें बजाना=बहुत प्रसन्नता प्रकट करना। खूब खुशी मनाना। विशेष—प्रायः लड़के बहुत प्रसन्न होने पर बगल में हथेली रखकर उसे जोर से बाँह से दबाते हैं जिससे विलक्षण शब्द होता है। उसी के आधार पर यह मुहावरा बना है। २. छाती के दोनों किनारों का वह भाग जो बाँह गिराने पर उसके नीचे पड़ता है। पार्श्व। पद—बगल-बंदी। (देखें)। मुहावरा—(किसी की) बगल गरम करना-सहवास या सम्भोग करना। बगल में दाबना या लेना-(क) कोई चीज उठाकर ले चलने के लिए उसे बगल में रखना तथा भुजा से अच्छी तरह दबाकर थामे रखना। जैसे—गठरी बगल में दबाकर चल पड़ना। (ख) अपने अधिकार में करना। उदाहरण—लै गै अनूप रूप सम्पत्ति बगल में दाबि उचिके अचान कुच कंचन पहार से।—देव। बगलें झाँकना-निरूतर या लज्जित होने पर यह समझने के लिए इधर-उधर देखना कि अब क्या करना या कहना चाहिए। ३. कपड़े का वह टुकड़ा जो अँगऱखे कुरते आदि की आस्तीन में बगल के नीचे पड़नेवाले अंश में लगाया जाता है। ४. वह जो किसी की दाहिनी या बायी ओर स्थित या प्रतिष्ठित हो। जैसे—(क) सभापति की बगल में अतिथि विराजमान थे। (ख) उनकी दुकान की बगल में पान की एक दुकान है। ५. समीप का स्थान। पास की जगह। पद—बगल में-(क) पास में। (ख) एकओर। जैसे—बगल में हो जाओ।
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बगल-गंध  : स्त्री० [हिं० बगल+गंध] १. बगल या काँख में होनेवाला एक प्रकार का फोड़ा। कँखवार। कँखौरी। २. एक प्रकार का रोग जिसमें बगल में काँख में से बहुत बदबूदार पसीना निकलता है।
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बगलगीर  : वि० [अं० बगल+फा० गीर०] [भाव० बगलगीरी] १. जोबगल या पास में स्थित हो। जिसे बगल में सटाकर बैठाया गया हो। पार्श्ववर्ती। २. जो गले मिला हो अथवा जिसे गले से लगाया गया हो। आलिंगित। मुहावरा—बगलगीर होना-आलिंगन करना।
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बगलबंदी  : स्त्री० [हिं० बगल+बंद] एक प्रकार की मिरजई जिसमें बगल में बन्द बाँधे जाते हैं।
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बगला  : पुं० [हिं० बक+ला (प्रत्यय)] [स्त्री० बगली] १. सारस की जाति का सफेद रंग का एक पक्षी जिसकी टाँगे, चोंच और गला लम्बा और पूँछ बहुत छोटी होती है। पद—बगला-भगत (देखें)। २. रहस्य सम्प्रदाय में, मन। पुं० [हिं० बगल] थाली की बाढ़। अँवठ। पुं० [देश] एक प्रकार का झाड़ीदार पौधा।
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बगला-भगत  : पुं० [हिं० ] वह जो देखने में बहुत धार्मिक तथा सीधा-सादा जान पड़ता हो, पर वास्तव में बहुत बड़ा कपटी या धूर्त हो।
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बगलामुखी  : स्त्री० [सं० ] तंत्र के अनुसार एक देवी। कहते हैं कि इसकी आराधना करने से शत्रु की वाणी कुंठित एवं शेष इंद्रियाँ स्तम्भित हो जाती हैं।
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बगलियाना  : अ० [हिं० बगल+इयाना (प्रत्यय)] बात-चीत या सामना न करते हुए बगल से होकर निकल जाना। कतारकर निकल जाना। स० १. बगल में करना या ले जाना। २. बगल में दबाना। ३. अलग करना या हटाना।
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बगली  : वि० [हिं० बगल+ई (प्रत्यय)] १. बगल से संबंध रखनेवाला। बगल का। पद—बगली घूँसा (देखें)। २. एक ओर का। स्त्री० १. ऊँटों का एक दोष जिसमें चलते समय उनकी जाँघ की रगपेट में लगती है। २. मुग्दर चलाने का एक ढंग। ३. वह थैली जिसमें दरजी सूई-तागा आदि रखते हैं। तिलेदानी। ४. दरवाजे की बगल में लगायी जानेवाली सेंध। क्रि० प्र०—काटना।—मारना। ५. अँगरखे की आस्तीन में लगाया जानेवाला कपड़े का वह टुकड़ा जो बगल के नीचे पड़ता है। बगल। स्त्री० [हिं० बगला] १. मादा बगुला। २. बगुले की जाति की एक छोटी चिड़िया जो ढीठ होने के कारण मनुष्यों के इतने पास आ जाती है कि लोग इसे ‘अंधी बगली’ भी कहते हैं।
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बगली घूँसा  : पुं० [हिं०] १. वह घूँसा जो किसी की बगल में अथवा किसी की बगल छिपकर किया जाय। २. वह वार जो आड़ में रहकर अथवा छिपकर किया जाय। ३. वह वार जो साथी बनकर या साथी होने का ढोंग रचकर किया जाय। ४. वह व्यक्ति जो धोखे से उक्त प्रकार का वार करता हो।
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बगली टाँग  : स्त्री० [हिं० बगली+टाँग] कुश्ती का एक पेंच।
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बगली बाँह  : स्त्री० [हिं० बगली+बाँह] एक प्रकार की कसरत जिसमें दो आदमी बराबर खड़े होकर अपनी बाँह से एक-दूसरे की बाँह में धक्का देते हैं।
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बगलेंदी  : स्त्री० [?] एक प्रकार की चिड़िया।
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बगलौहाँ  : वि० [हिं० बगल+औहाँ] [स्त्री० बगलौहीं] बगल की ओर झुका हुआ। तिरछा। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बगसना  : स०=बख्शना। उदाहरण—होइ कृपाल हस्तिनी संग बगसी रुचि सुन्दर।—चंदबरदाई। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बगा  : पुं० [सं० वक्र] बगुला। पुं०=बागा। (पहनने का)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बगाना  : स० [हिं० बगना] घुमाना-फिराना। सैर कराना। स० [सं० विकीरण] फैलाना। बिखेरना। उदाहरण—टूटि तार अंगार बगावै।—नंददास। स०=भागना। अ०=भागना। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बगार  : पुं० [देश] गौओं के बाँधने का स्थान गो-शाला। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बगारना  : स० [सं० विकीरण, हिं० बगरना] १. फैलाना। २. छितराना। बिखेरना। स० -बगराना। उदाहरण—सब देसनि में निज प्रभात निज प्रकृति बगारति—रत्नाकर। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बगावत  : स्त्री० [अ० बगावत] १. आज्ञा, आदेश आदि की की जानेवाली स्पष्ट अवज्ञा। २. विद्रोह। सैनिक विद्रोह अथवा युद्धात्मक भावना से युक्त विद्रोह। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बगितारा  : पुं० [सं० वक्तृ] १. जोर से की जानेवाली पुकार। २. बकबक। बकवाद। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बगिया  : स्त्री० [हिं० बाग+इया] छोटा बाग विशेषतः फूल वारी।
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बगीचा  : पुं० [फा० बागचः] [स्त्री० अल्पा० बगीची] १. छोटा बाग। २. फुलवारी।
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बगुरदा  : पुं० [?] पुरानी चाल का एक अस्त्र।
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बगुलपतोख  : पुं० [हिं० बगला+पतोख] एक प्रकार का जल-पक्षी।
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बगुला  : पुं० १.=बगला। २.=बगूला।
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बगुली  : स्त्री०=बगली। (चिड़िया)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बगूरा  : पुं०=बगूला। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बगूला  : पुं० [हिं० बाउ (वायु)+गोला] तेज हवा की वह अवस्था जिसमें वह घेरा बाँधकर चक्कर लगाती हुई तथा ऊपर उठती हुई आगे बढती है। चक्रवात। बवंडर।
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बगेड़ी  : स्त्री०=बगेरी (चिड़िया)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बगेदना  : स० [हिं० बगदना] १. धक्का देकर गिरा या हटा देना। २. विचलित करना। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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बगेरी  : स्त्री० [देश] खाकी रंग की एक प्रकार की छोटी चिड़िया। बगौधा। भरुही।
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बगैचा  : पुं०=बगीचा। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बगैर  : अव्य० [अ० बगैर] न होने की दशा मे। बिना। जैसे—आपके बगैर काम नहीं चलेगा।
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बगौधा  : पुं० [देश] [स्त्री० बगौधी] बगेरी (चिड़िया)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बग्गा-गोटी  : स्त्री० [?] लड़कों का एक प्रकार का खेल। उदाहरण—तीनों बग्गा गोटी खेला करेंगे।—वृन्दावनलाल वर्मा।
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बग्गी  : स्त्री०=बग्घी। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बग्घी  : स्त्री० [अं० बोगी] चार पहियों की पाटनदार गाड़ी जिसे एक या दो घोड़े खींचते हैं।
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बघंबर  : पुं०=बाघंबर। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बघ  : पुं० [हिं० बाघ] हिन्दी ‘बाघ’ का संक्षिप्त रूप जो उसे समस्त पदों के आरम्भ में लगने से प्राप्त होता है। जैसे—बघ-छाला, बख-नखा।
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बघ-छाला  : स्त्री० [हिं० बाघ+छाला] बाघ की खाल। बाघंबर।
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बघनखा  : पुं० [हिं० बाघ+नखा (नखोंवाला)] [स्त्री० अल्पा० बघनखी] १. बाघ के नख के आकार-प्रकार के प्राचीन अस्त्र। शेरपंजा। २. गले में पहनने का एक प्रकार का गहना जिसमें चाँदी या सोने के खंडों में बाघ के नाखून जड़े रहते हैं।
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बघनहाँ  : पुं०=बघनखा। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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बघनहियाँ  : स्त्री० दे० ‘बघनखा’। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बघना  : पुं०=बघनहाँ। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बघबाव  : पुं० [हिं० बाघ+वायु] बाघ या शेर के शरीर की दुर्गंध। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बघरूरा  : पुं० [हिं० वायु+गंडूरा] बगूला। चक्रवात। बवंडर।
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बघवार  : पुं० [हिं० बाघ+बाल] बाघ की मूँछ का बाल। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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बघार  : पुं० [हिं० बघारना] १. बघारने की क्रिया या भाव। २. वह मसाला जो बघारते समय घी में डाला जाय। तड़का। छौक। क्रि० प्र०—देना। ३. बघारने से निकलनेवाली सोंधी गंध। क्रि० प्र०—आना।—उठना।—निकलना। ४. पाण्डित्य प्रदर्शन के लिए किसी विषय की की जानेवाली थोथी चर्चा। ५. शराब पीने के समय बीच-बीच में तम्बाकू, बीड़ी आदि पीने की क्रिया (व्यंग्य)।
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बघारना  : स० [सं० व्याधारण] १. कलछी या चिम्मच में घी को आग पर तपाकर और उसमें हींग, जीरा आदि सुगंधित मसाले छोड़कर उसे तरकारी, दाल आदि की बटलोई में उसका मुँह ढाँककर छोड़ना जिससे वह सुगंधित हो जाय़। तड़का देना या लगाना। छौंकना। २. अपनी योग्यता, शक्ति का बिना उपयुक्त अवसर के ही आवश्यकता से अधिक या निरर्थक प्रदर्शन करना। जैसे—अँगरेजी या संस्कृत बघारना। ३. डींग या शेखी के संबंध में आतंक जमाने के लिए बढ़ा-चढ़ाकर चर्चा करना। जैसे—शेखी बघारना।
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बघूरा  : पुं०=बगूला। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बघेरा  : पुं० [हिं० बाघ] लकड़बग्घा। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बघेलखंड  : पुं० [हिं० बघेल (जाति)+खंड] [वि० बखेलखंडी] आधुनिक मध्यप्रदेश के अन्तर्गत नागौद, रीवाँ मैहर आदि भूभागों की सामूहिक संज्ञा।
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बघेलखंडी  : वि० [हिं० बघेलखंड] बघेलखंड का। बघेलखंड संबंधी। पुं० बघेलखंड की बोली। बघेली। (देखें)।
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बघेली  : स्त्री० [हिं० बघेलखंड] बघेलखंड की बोली जो पूर्वी हिन्दी के अन्तर्गत मानी गयी है और अवधी से बहुत कुछ मिलती-जुलती है। स्त्री० [हिं० बा+एली (प्रत्यय)] बरतन खरादनेवालों का वह खूँटा जिसका ऊपरी सिरा आगे की ओर कुछ बढ़ा होता है।
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बघैरा  : पुं०=बगेरी (चिड़िया)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बच  : स्त्री० [सं० बच] पर्वतीय प्रदेश के जलाशयों के तट पर होनेवाला एक प्रकार का पौधा जिसके अंगों का उपयोग ओषधि में होता है। पुं० [सं० वचः] वचन। बात। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बचका  : पुं०=बजका (पकवान)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बचकाना  : वि० [हिं० बच्चा-काना (प्रत्य)०] [स्त्री० अल्पा० बचकानी] १. बच्चों के पहनने या काम में आनेवाला। जैसे—बचकानी टोपी। २. बच्चों की तरह छोटे आकार-प्रकार का। जैसे—बचकाना पेड़। ३. बच्चों के स्वभाव का। जैसे—बचकानी बुद्धि।
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बचत  : स्त्री० [हिं० बचना] १. बचे हुए होने की अवस्था या भाव। जैसे—इस तरह करने से काम में समय की बहुत बचत होती है। २. व्यय आदि के बाद बच रहनेवाली धन-राशि। ३. लागत, व्यय आदि निकालने के बाद क्या बचा हुआ धन। मुनाफा। लाभ (सेविंग) ४. लाक्षणिक अर्थ में किसी प्रकार से होनेवाला छुटकारा या बचाव। जैसे—झूठ बोलने से तुम्हारी बचत नहीं हो सकेगी।
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बचता  : पुं० [हिं० बचना] [स्त्री० बचती] देन चुकाने उपयोग व्यय आदि करने के उपरान्त बचा हुआ धन।
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बचन  : पुं० [सं० वचन] १. मुँह से कही हुई बात। वचन। २. वाणी। ३. दृढ़ता, प्रतिज्ञा, शपथ आदि के रूप में कहीं हुई ऐसी बात जिसमें कभी अन्तर न पड़े। प्रतिज्ञा। जैसे—हम तो अपने वचन से बँधे हैं। क्रि० प्र०—छोड़ना। तोड़ना। देना। निभाना। पालना। लेना। मुहावरा—बचन देना-दृढ़ प्रतिज्ञापूर्वक यह कहना कि हम तुम्हारा अमुक काम अवश्य कर देगें। (किसी से) बचत बँधाना-दृढ़ प्रतिज्ञा कराना। उदाहरण—नन्द जसोदा बचन बँधायो ता कारण देही धरि आयो।—सूर। बचन माँगना=किसी से यह प्रार्थना करना कि आपने जो वचन दिया था उसका पालन करें। बचन हारना-प्रतिज्ञापूर्वक किसी से कही हुई बात या किसी को दिये हुए वचन का पालन कनरे के लिए विवश होना। ४. किसी से निवेदन या प्रार्थनापूर्वक कही जानेवाली बात। मुहावरा—(किसी के आगे) बचन डालना-किसी काम या बात के लिए प्रार्थना या याचना करना।
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बचन-विदग्धा  : स्त्री०=वचन-विदग्धा।
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बचना  : अ० [सं० वचन-न पाना] १. उपयोग, कार्य, व्यय आदि हो चुकने के बाद भी कुछ अंश पास या शेष रह जाना। अवशिष्ट होना। जैसे—(क) दस रुपयों में से तीन रूपये बचे हैं। (ख) दो कुरते बन जाने पर भी गज भर कपड़ा बचेगा। २. बंधन विपद, संकट आदि से किसी प्रकार अलग या दूर या सुरक्षिक रहना। जैसे—वह गिरने से बाल-बाल बच गया। ३. किसी कार्य में संलग्न न होना अथवा दूसरों द्वारा किये जानेवाले कार्यों के परिणाम, प्रतिक्रिया प्रभाव आदि से अछूता रहना। जैसे—(क) किसी के आक्षेप से बचना। (ख) झूठ बोलने से बचना। ४. किसी का सामना करने या किसी के सम्पर्क में आने से घबराना या संकोच करना और सहसा उसका सामना न करना या उसके सम्पर्क में न आना। जैसे—वह तगादा करनेवालों से बचता फिरता है। ५. किसी गिनती, वर्ग, समाज आदि के अन्तर्गत न आना या न होना। छूट या रह जाना। जैसे—इनके व्यंग्य वाणों से कोई बचा नहीं हैं। स० [सं० वचन] कथन करना। कहना। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बचपन  : पुं० [हिं० बच्चा+पन (प्रत्यय)] १. बच्चा (अल्पवयस्क) होने की अवस्था या भाव। २. बाल्यावस्था। लड़कपन। ३. बालकों की तरह किया जानेवाला सयानों द्वारा कोई कार्य। बचपना।
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बचपना  : पुं० [हिं० बचपन] १. बचपन। २. सयाने व्यक्तियों द्वारा किया जानेवाला कोई ऐसा असोभनीय कार्य जो उनकी बुद्धि की अपरिपक्वता का सूचक होता है।
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बचवा  : पुं० [हिं० बच्चा] १. बालक। बच्चा। २. हाथ में पहनने की अँगूठी में लगे हुए छोटे घुँघरू। उदाहरण—उँगली तेरी छल्ला सोभे, बचवे की बहार। (झूमर)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बचवैया  : वि० [हिं० बचाना+वैया (प्रत्यय)] बचानेवाला। रक्षक।
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बचा  : पुं० [सं० वत्स, पा० बच्छ, हिं० वच्चा] [स्त्री० बच्ची] १. लड़का। बालक। २. एक प्रकार का तुच्छतासूचक सम्बोधन। जैसे—अच्छा बचा, तुमसे भी किसी दिन समझ लूँगा।
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बचाना  : स० [हिं० बचना का स०] १. ऐसी क्रिया करना जिससे कुछ या कोई बचे। २. उपयोग, व्यय आदि के उपरांत भी कुछ अवशिष्ट रखना। जैसे—वह दो चार रुपए, रोज बचा लेता है। ३. किसी प्रकार केकष्ट, बंधन संकट आदि से किसी प्रकार अलग करके मुक्त या सुरक्षित करना। जैसे—जुरमाने, रोग या सजा से बचाना। ४. दुष्कर्म, दूषित प्रभाव आदि से अलग और सुरक्षित रखना। जैसे—किसी को कुमार्ग में पड़ने से बचाना। ५. आघात, आक्रमण आदि से सुरक्षा करना। ६. सामना न होने देना या सम्पर्क में न आने देना। जैसे—(क) किसी से आँख बचाना। (ख) किसी का सामना बचाना।
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बचाव  : पुं० [हिं० बचना] १. कष्ट, संकट आदि में बचे हुए होने की अवस्था या भाव। जैसे—इस पेड़ के नीचे धूप (या वर्षा) से बचाव किया जानेवाला उपाय या प्रयत्न। २. कष्ट, संकट आदि से बचने के लिए किया जानेवाला उपाय या प्रत्यत्न। ३. बचत। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बचिया  : स्त्री० [हिं० बच्चा-छोटा] कसीदे के काम में छोटी-छोटी बूटियाँ।
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बचुआ  : पुं० [देश०] एक प्रकार की मछली। पुं०=बच्चा। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बचून  : पुं० [हिं० बच्चा] भालू का बच्चा। (कलंदर)
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बचो  : पुं० [देश०] एक तरह की लता।
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बच्चा  : पुं० [सं० वत्स, प्रा० बच्छ, फा० बच्चः] [स्त्री० बच्ची] १. किसी प्राणी का नवजात शिशु। जैसे—कुत्ते या बिल्ली का बच्चा, आदमी का बच्चा। २. मनुष्य जाति का कम अवस्थावाला प्राणी। बालक। पद—बच्चे-कच्चे=छोटे-छोटे। बाल बच्चे। मुहावरा—बच्चा देना=गर्भ से संतान उत्पन्न करना। प्रसव करना। पद—बच्चों का खेल-बहुत ही तुच्छ, सहज या साधारण काम। वि० १. कम उमरवाला। २. नादान। ३. अनुभवहीन।
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बच्चाकश  : वि० [फा०] बहुत बच्चे जननेवाली (स्त्री)। (विनोद) बच्चाकश
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बच्ची  : स्त्री० [हिं० बच्चा का स्त्री० रूप] १. छोटी लड़की। २. छोटी घोड़िया जो छत या छाजन में बड़ी घोड़िया के नीचे लगायी जाती है। ३. वे बाल जो होंठ के नीचे बीच में जमते हैं ४. दे० ‘बचिया’।
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बच्चेदानी  : स्त्री०=बच्चादान (गर्भाशय)।
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बच्छ  : पुं० [सं० वत्स, प्रा० बच्छ] १. बच्चा। २. बेटा। ३. बछड़ा।
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बच्छनाग  : पुं०=बछनाग। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बच्छल  : वि०=वत्सल।
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बच्छस  : पुं० [सं० वक्षस्] वक्षःस्थल। छाती।
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बच्छा  : पुं० [सं० वत्स, प्रा० बच्छ] [स्त्री० बछिया] १. गाय का बच्चा। बछवा। बछड़ा। २. किसी पशु का बच्चा। (क्व०)
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बछ  : पुं० [सं० वत्स, प्रा० बच्छ] गाय का बच्चा। बछड़ा। स्त्री०=बच (ओषधि)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बछड़ा  : पुं० [हिं० बच्छ+ड़ा (प्रत्यय)] [स्त्री० बछड़ी, बछिया] गाय का बच्चा।
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बछनाग  : पुं० [सं० वत्सनाग] एक स्थावर विष। (एकोनाइट)
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बछरा  : पुं०=बछड़ा। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बछरू  : पुं०=बछड़ा (गाय का बच्चा)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बछल  : वि०=वत्सल। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बछवा  : पुं० [हिं० बच्छ] [स्त्री० बछिया] गाय का बच्चा। बछड़ा। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बछा  : पुं०=बच्छा। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बछिया  : स्त्री० [हिं० बछा] गाय का मादा बच्चा। पद—बछिया का ताऊ या बाबा=(बैल की तरह) निर्बुद्धि या मूर्ख)
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बछेड़ा  : पुं० [सं० वत्स, प्रा० वबच्छ, पुं० हिं० बच्छ] [स्त्री० बछेड़ी] घोड़े का बच्चा।
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बछेरा  : पुं०=बछेड़ा। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बछेरू  : पुं०=बछड़ा। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बछौंटा  : पुं० [हिं० बाछ+औंटा (प्रत्यय)] वह चंदा जो हिस्से के मुताबित लगाया या लिया जाय।
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बजंत्री  : पुं० [हिं० बाजा] १. बाजा बजानेवाला। बजनिया। २. बाजे, बजानेवालों की मण्डली। ३. मुसलमानी राज्यकाल में बाजा बजानेवालों से लिया जानेवाला एक तरह का कर।
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बजकंद  : पुं० [सं० वज्रकंद] एक प्रकाल का जंगली लता।
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बजकना  : अ० [अनु०] तरल पदार्थ का सड़कर या बहुत गंदा होकर बुलबुले फेंकना। बजबजाना।
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बजका  : पुं० [हिं० बजकना] १. बेसन आदि की वे पकौड़ियां जो दही में डाली जाने से पहले पानी में फुलायी जाती है। २. दे० ‘बचका’।
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बजगारी  : स्त्री० [सं० वज्र] वज्रपात। उदाहरण—देऊ जबाव होई बजगारी।—कबीर। वि० दे० ‘वज-मारा’। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बजट  : पुं० [अं०] १. आय-व्यय का मासिक या वार्षिक लेखा। २. आय-व्यय पत्रक।
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बजड़ना  : सं० १. टकराना। २. कहीं जाकर पहुँचना।
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बजड़ा  : पुं०=बजरा।
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बजनक  : पुं० [?] पिस्ते का फूल जिससे रेशम का सूत रँगा जाता है।
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बजना  : पुं० [हिं० बाजा] १. किसी चीज पर आघात किये जाने पर ऊँची ध्वनि निकलना। जैसे—(क) घंटा बजना। (ख) तबला या मृदंग बजना। २. ऐसा आघात लगना जिससे किसी प्रकार का उच्च शब्द उत्पन्न हो। जैसे—किसी के सिर पर डंडा बजना। ३. अस्त्र शस्त्र आदि का शब्द करते हुए प्रहार होना। जैसे—लाठी बजना। ४. ऐसी लड़ाई या झगड़ा होना जिसमें मार-पीट भी हो। ५. हठ करना। जिद करना। अड़ना। ६. किसी नाम से ख्यात या प्रसिद्ध होना वि० बजनेवाला। जो बजता हो। पुं० १. चाँदी का रुपया जो ठनकाने या पटकने से बजता अर्थात् शब्द करता है। (दलाल) २. दे० ‘बाजा’। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बजनियाँ  : पुं० [हिं० बजना+इया (प्रत्यय)] वह जो बाजा बजाने का व्यवसाय करता हो। वह जिसका पेशा बाजा बजाना हो। (प्रायः ब्याह-शादी आदि के अवसरों पर बाजा बजानेवालों के लिए प्रयुक्त)
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बजनिहाँ  : पुं०=बजनिहाँ।
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बजनी  : स्त्री० [हिं० बजाना] ऐसी लड़ाई या झगड़ा जिसमें उठा-पटक या मार-पीट भी हो। वि० बजने या बजाया जानेवाला। बजनूँ।
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बजनूँ  : वि० [हिं० बजाना] बजने या बजाया जानेवाला। जो बजता या बजाया जाता हो।
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बजबजाना  : अ० [अनु] १. उमस, गरमी आदि के कारण किसी जलीय या तरल पदार्थ में खमीर उठते पर अथवा उसके सड़ने पर उसमें से बुलबुले निकनला। जैसे—कटहल या भात बजबजाना। २. इस प्रकार बुलबुले निकनले से पदार्थ का दूषित होना।
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बजमारा  : वि० [सं० वज्र+हिं० मारा] [स्त्री० बजमारी] १. वज्र से आहत। जिस पर वज्र पड़ा हो। २. बहुत बड़ा अभागा।
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बजरंग  : वि० [सं० वज्र+अंग] १. वज्र के समान कठोर अंगोंवाला। २. परम शक्तिशाली और हृष्ट-पुष्ट। पुं० हनुमान।
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बजरंगबली  : पुं० [हिं० बजरंग+बली] हनुमान। महावीर।
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बजरंगी बैठक  : स्त्री० [हिं० बजरंग+बैठक] एक प्रकार की बैठक जिससे शरीर बहुत अधिक पुष्ट होता है।
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बजर  : वि० [सं० वज्र] १. बहुत मजबूत। दृढ़ या पक्का। उदाहरण—किसूँ सफीला भुरज की काहू बजर कपाट।—बाँकीदास। २. कठोर। पुं०=वज्र।
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बजरबट्ट  : पुं० [हिं० बजर+बट्टा] १. एक प्रकार के वृक्ष के फल का दाना या बीज जोकाले रंग का होता है और जिसकी माला नजर आदि की बाधा से बचाने के लिए लोग बच्चों को पहनाते हैं। २. व्यापक अर्थ में कोई ऐसी चीज जो किसी प्रकार का अपशकुन तथा दूषित प्रभाव रोकती है। ३. एक प्रकार का खिलौना।
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बजरबोंग  : पुं० [हिं० बजर+बोंग (अनु० )] १. एक प्रकार का धान जो अगहन मास में पकता है। २. बड़ा भारी या मोटा डंडा।
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बजर-हड्डी  : स्त्री० [हिं० बजर+हड्डी] घोडो़ के पैरों में गाँठे पड़ने का एक रोग।
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बजरा  : पु० [सं० वज्रा] वह बड़ी नाव जो कमरे के समान खिड़कियों तथा पक्की छतवाली होती है। पुं०=बाजरा। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बजरागि  : स्त्री०=वज्राग्नि (बिजली)।
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बजरिया  : स्त्री० [हिं० बाजार+इया (प्रत्यय)] छोटा बाजार।
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बजरी  : स्त्री० [सं० वज्र] १. पत्थर को तोड़कर बनाये जानेवाले वे छोटे-छोटे टुकड़े जो फरश, सड़क आदि बनाने के काम आते हैं। २. आकाश से गिरनेवाला पत्थर। ओला। ३. वह छोटा नुमायशी कँगूरा जो किले आदि की दीवारों के ऊपरी भाग में बराबर थोड़े-थोड़े अंतर पर बनाया जाता है और जिसकी बगल में गोलियाँ चलाने के लिए कुछ अवकाश रहता है। स्त्री० [हिं० बाजरा] वह बाजरा जिसके दाने बहुत छोटे-छोटे हों।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बजवाई  : स्त्री० [हिं० बजवाना+ई (प्रत्यय)] १. बाजा बजवाने का कार्य या भाव। २. वह मजदूरी जो किसी से बाजा बजवाने के फलस्वरूप उसे दी जाती है।
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बजवाना  : स० [हिं० बजाना का प्रे०] [भाव० बजवाई] किसी को कुछ बजाने में प्रवृत्त करना। जैसे—बाजा बजवाना।
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बजवैया  : वि०= [हिं० बजाना+वैया (प्रत्यय)] बजानेवाला। जो बजाता हो।
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बजा  : वि० [फा० बजा] १. जो अपने उचित उपयुक्त य ठीक स्थान पर हो। २. उचित वाजिब। मुहावरा—बजा लाना=(क) पूरा कराना। पालन करना। जैसे—हुकुम लाना। (ख) सम्पादन करना। जैसे—आदाब बजा लाना। ३. जो दुरुस्त तथा शुद्ध हो।
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बजागि  : स्त्री० [सं० वज्र+अग्नि] वज्र की आग अर्थात् विद्युत। बिजली। उदाहरण—सूरज आग बजागि दुख तृष्ण पाप बिलाप।—केशव। २. भीषण कष्ट देनेवाला ताप। उदाहरण—बिरह बजागिं सौंह रथ हाँका।—जायसी
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बजागिन  : स्त्री०=बजागि।
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बजाज  : पुं० [अ० वज्जाज] [स्त्री० बजाजिन, भाव० बजाजी] कपडे का व्यापारी। कपड़ा बेचनेवाला
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बजाजा  : स्त्री० [हिं० बजाज] वह बाजार जिसमें कपड़ा की बहुत सी दुकानें हो।
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बजाजी  : स्त्री० [अ० बज्जाजी] १. बजाज का काम। कपड़ा। बेचने का व्यवसाय। २. बजाज की दुकान पर बिकनेवाले या बिकने योग्य कपड़े।
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बजाना  : स० [हिं० बाजा] १. किसी चीज परइस प्रकार आघात करना कि उसमें से शब्द निकलने लगे। जैसे—(क) घंटा बजाना। (ख) ताली बजाना। २. कोई ऐसी विशिष्ट प्रक्रिया करना जिससे कोई वाद्य, सुर ताल लय आदि में शब्द करने लगे। जैसे—शहनाई या सितार बजाना। पद—बजाकर=डंका पीटकर। खुल्लमखुल्ला। मुहावरा—गाल बजाना=दे० ‘गाल’ के अन्तर्गत मुहा० । वर्दी बजाना-सैनिकों को कवायद आदि के लिए बुलाने के उद्देश्य से बिगुल बजाना। ३. लाठी सोंटे आदि से लड़ाई-झगड़ा करना। ४. पुकारना। बुलाना। (पूरब) ५. खरेपन आदि की परीक्षा के लिए किसी चीज को उछालकर पटकर अथवा उस पर आघात करके शब्द उत्पन्न करना। पद—ठोंकना-बजाना=(क) अच्छी तरह जाँचना या परखना। जैसे—जो चीज लो वह ठोंक-बजाकर लिया करो। (ख) बात या व्यक्ति के संबंध में प्रामाणिकता, सत्यता आदि का निश्चय करना। जैसे—उन्हें अच्छी तरह ठोंक-बजाकर देख लो। कही ऐसा न हो, कि वे पीछे मुकर जायँ। ५. आघात या प्रहार करना। मारना-पीटना। जैसे—जूते बजाना। ६. स्त्री के साथ प्रसंग या सम्भोग करना। (बाजारू) स० [फा० बजा+ना (प्रत्यय)] पालन करना। जैसे—ताबेदारी बाजाना, हुकुम बजाना।
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बजाय  : अव्य० [फा०] (किसी की) जगह या स्थान पर अथवा बदले में जैसे—उन्हें रुपयों के बजाय कपड़ा भी मिल जाय तो काम चन जायगा।
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बजार  : पुं०=बाजार। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बजारी  : वि०=बाजारी। वि० [हिं० बाजना-बोलना] बहुत बढ़-च़ढ़कर और व्यर्थ बोलनेवाला। उदाहरण—कीर्ति बड़ों करतूति बड़ा जन बात बड़ो सो बड़ोई बजारी।—तुलसी। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बजारू  : वि०=बाजारू। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बजावनहार  : वि०=[हिं० बजाना+हार (प्रत्यय)] बजानेवाला। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बजावना  : स०=बजाना। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बजुआ  : पुं० बाजू।
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बजुज  : क्रि० वि० [फा० बजुज] अतिरिक्त। सिवा। जैसे—बजुज इसके सिवा और कोई चारा नहीं है।
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बजुल्ला  : पुं० [सं० बाजू+उल्ला (प्रत्यय)] बाँह पर पहनने का बिजायट नाम का गहना।
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बजूका  : पुं० [?] १. धातु का एक प्रकार का बड़ा नल जिसमें से बिजली की सहायता से शत्रुओं पर अग्नि बाण आदि छोड़े जाते हैं। (इसका प्रयोग पहले-पहल अमेरिका ने दूसरे यूरोपीय महायुद्ध में किया था) २. दे० ‘बिजुखा’।
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बजूखा  : पुं० १.=बजूका। २.=बिजूखा।
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बज्जना  : अ०=बजना।
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बज्जर  : पुं०=बज्र।
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बज्जात्  : वि० [फा० बदजात] [भाव० बज्जाती] १. दुष्ट। पाजी। २. कमीना। नीच। अधम।
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बज्जाती  : स्त्री० [फा० बदजाती] १. दुष्टता। पाजीपन। २. कमीनापन। नीचता। अधमता।
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बज्जुन  : पुं० [हिं० बजना] बाजा।
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बज्म  : स्त्री० [फा० बज़्म] १. सभा। २. गोष्ठी।
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बज्र  : पुं० वज्र।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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बज्ज्री  : पुं०=बज्री। (इन्द्र)।
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बझना  : अ० [सं० बद्ध, प्रा० वज्झ+ना(प्रत्यय)] १. बंधन में पड़ना। बँधना। २. उलझना। फँसना। ३. किसी से उलझकर लड़ाई झगड़ा करना। ४. जिद या हठ करना।
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बझवट  : स्त्री० [हिं० बाँझ+वट (प्रत्यय)] १. बाँझ स्त्री। २. कोई बाँझ मादा पशु। ३. वह डंठल जिसमें से बाल तोड़ ली गयी हो। स्त्री० बझावट।
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बझाऊ  : वि० [हिं० बझाना] बझाने अर्थात् फँसानेवाला। पुं० बझाव।
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बझान  : स्त्री० [हिं० बझना] बझने या बझाने की अवस्था क्रिया या भाव। बझाव।
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बझाना  : स० [हिं० बना का सकर्मक रूप] १. बंधन में डालना या लाना। २. उलझाना। फँसाना। ३. जाल में फँसना। अ० बंधन में फँसना। जकड़ा जाना। बझना। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बझाव  : पुं० [हिं० बझाना] १. जाल, फंदे आदि में बझाने की क्रिया या भाव। बझावट। २. बझाने या फँसानेवाली कोई चीज। बझावट।
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बझावट  : स्त्री० [हिं० बझना+आवट (प्रत्यय)] १. बझने या बझाने की अवस्था या भाव। बझाव। २. उलझन। ३. जाल । बझाव।
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बझावन  : स०=बझाना।
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बझावा  : पुं० [हिं० बझाना-फँसाना] किसी को फँसाने के लिए बनाया हुआ जाल या गम्भीर योजना।
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बट  : पुं० [सं० वट] १. बड़ा का पेड़। वट। २. किसी चीज का गोला। ३. सिल पर चीजें पीसने का बटटा। ४. बाट। मार्ग। रास्ता। ५. चीजों को तौलने का बटखरा। बाट। ६. बड़ा नाम का पकवान। पुं० [हिं० बटना-बल डालना] १. बटे हुए होने की अवस्था या भाव। २. रस्सी आदि की वह ऐंठन जो उसे बटने से पडती है। बल। क्रि० प्र०—डालना।—देना। ३. पेट में होनेवाली ऐंठन या पड़नेवाली मरोड़। पं० [हिं० ] बाट का वह संक्षिप्त रूप जो उसे योगिक शब्दों के आरम्भ में लगने से प्राप्त होता है। जैसे—बटखरा, बट-मार। पुं० [हिं० बँटना] बँटने पर मिलनेवाला अंश। बाँट। हिस्सा। उदाहरण—लाज म्रजाद मिली औरन कौ मृदु मुसुकानि मेरे बट आई।—नारायण स्वामी।
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बटई  : स्त्री०=बटेर। उदाहरण—तीतर बटई लवा न बाँचे।—जायसी। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बटकना  : अ०=बचना। (बुदेल० ) उदाहरण—ईसुर कान बटकने नइयाँ देख लेव यह ज्वानो।—लोकगीत।
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बटखर  : पुं०=बटखरा।
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बटखरा  : पुं० [सं० बटक] धातु, पत्थर आदि का किसी नियत तौल का टुकड़ा जिससे अन्य पदार्थ तराजू पर तौले जाते हैं।
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बट-छीर  : पुं० [सं० वट+हिं० छीर] वट वृक्ष की वह छाल जो पहनने के काम आती थी। उदाहरण—होत प्रात बट-छीर मँगावा।—तुलसी।
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बटन  : स्त्री० [हिं० बटना] १. रस्सी आदि बटने या ऐंठने की क्रिया या भाव। २. बँटने के कारण रस्सी आदि में पड़ी हुई ऐंठन। बल। पुं० [अं०] १. धातु, सींग, सीप आदि की बनी हुई चिपटे आकार की कड़ी गोल घुंड़ी जो कोट कुरते अंगरखे आदि में टाँकी जाती है और जिसे काज नामक छेद में फँसा देने से खुली जगह बंद हो जाती है और कपड़ा पूरी तरह से बदन को ढक लेता है। बुताम। २. उक्त आकार-प्रकार की वह घुंड़ी जिसे उठाने, दबाने हिलाने आदि से कोई यांत्रिक क्रिया आरम्भ या बंद होती है। जैसे—बिजली का बटन। क्रि० प्र०—दबाना। ३. बादले का एक प्रकार का तार।
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बटना  : स० [सं० वट=बटना] कई तंतुओं, तागों या तारों को एक साथ मिलाकर इस प्रकार जोड़ना कि वे सब मिलकर एक हो जायँ। ऐंठन देकर मिलाना। जैसे—डोरी, तागा या रस्सी बटना। पुं० रस्सी आदि बटने का कोई उपकरण या यंत्र। स० बचाना। (बट्टे से पीसना)। पुं० [सं० उद्धर्चन, आ० उव्वाटन] सिल पर पीसी हुई सरसों, चिरौंजी आदि का लेप जो शरीर की माल छुड़ाने के लिए मला जता है। उबटन। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बटपरा  : पुं०=बटपार।
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बटपार  : पुं० [स्त्री० पटपारिन्] दे० ‘बट-मार’।
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बट-पारी  : स्त्री० दे० ‘बट-मारी’। पुं०=बट-पार (बट-मार)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बटम  : पुं० [?] पत्थर गढ़नेवालों का एक औजार जिससे वे कोना नापकर ठीक करते हैं। कोनिया। पुं०=बटन। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बटम-पाम  : पुं० [बटम+अं० पाम-ताड़] बंगाल में होनेवाला एक प्रकार का ऊँचा पेड़।
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बट-मार  : पुं० [हिं० बाट+मारना] पथिकों या यात्रियों को मार्ग में मारकर धन, सम्पत्ति छीन लेनेवाला लुटेरा।
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बट-मारी  : स्त्री० [हिं० बटमार] बटमार का काम या भाव।
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बटला  : पुं० [सं० वर्तुल, प्रा० बट्टल] [स्त्री० अल्पा० बटली] चावल, दाल आदि पकाने का चौड़ा मुँह का गोल बरतन। बड़ी बटलोई। देग। देगचा। बटुआ।
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बटली  : स्त्री०=बटलोई।
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बटलोई  : स्त्री० [हिं० बटला] छोटा बटला। बटली। देगची।
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बटवाँ  : वि० [हिं० बाटना=पीसना] सिल पर पीसा या पिसा हुआ। उदाहरण—कटवाँ बटवाँ मिला सुबासू।—जायसी। वि० [हिं० बटना=बल डालना] बटा हुआ।
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बटवा  : पुं०=बटुआ। पुं०=बटला। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बटवाई  : स्त्री० [हिं० बटवाना+आई (प्रत्यय)] बटवाने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
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बटवाना  : स० [हिं० बाटना का प्रे०] बाटने या पीसने का काम किसी से करवाना। स०=बँटवाना। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बटवार  : पुं० [हिं० बाट] १. रास्ते पर पहरा देनेवाला व्यक्ति। पहरेदार। २. रास्ते पर खड़ा होकर वहाँ का कर उगाहनेवाले कर्मचारी।
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बटवारा  : पुं०=बँटवारा।
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बटा  : पुं० [स० वटक] [स्त्री० अल्पा० बटिया] १. कोई गोलाकार चीज। गोला। २. कंदुक। गेंद। ३. पत्थर का टुकड़ा। ढोंका। पुं० [हिं० बाट] बटोही। पुं० १. गणित में एक प्रकार का चिन्ह जो छोटी किंतु सीधी क्षैतिज रेखा के रूप में (-) होता है और जो किसी पूरी इकाई का भिन्न अर्थात् अंश या खंड सूचित करता है। जैसे—३/४ (तीन बटा चार) में ३ और ४ के बीच की पाई बटा कहलाती है। २. गणित में भिन्न अर्थात् पूरी इकाई के तुल्नात्मक अंश या खंड कावाचक शब्द। जैसे—दो बटा (या बटे) तीन का अर्थ होगा-पूरी इकाई के तीन भागों में से दो भाग।
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बटाई  : स्त्री० [हिं० बटना] बटने या ऐंठन डालने की क्रिया, भाव या पारिश्रमिक। स्त्री०=बँटाई। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बटाऊ  : पुं० [हिं० बाट=रास्ता+आऊ (प्रत्यय)] १. बाट अर्थात् राह पर चलता हुआ व्यक्ति। राही। २. अनजान। अपरिचित या राह-चलता नया आया हुआ व्यक्ति। मुहावरा—बटाऊ होना=चलता होना। चल देना। पुं० [हिं० बाँटना] १. बँटवाने या विभाग करानेवाला। २. अपना अंश या प्राप्य बँटवा या अलग कराकर लेनेवाला।
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बटाक  : वि० [हिं० बड़ा] १. बड़ा। २. ऊँचा। ३. विशाल।
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बटाटा  : पुं० [अं० पोटैटो] आलू (कंद)।
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बटाना  : स० [हिं० बटना का प्रे०] बटने या बाटने का काम किसी और से कराना। अ० पटाना (बन्द होना)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बटालियन  : पुं० [अं०] पैदल सेना का एक बड़ा विभाग।
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बटाली  : स्त्री० [लश०] बढ़इयों का एक औजार। रुखानी। (लश०)
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बटिका  : स्त्री०=वटिका।
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बटिया  : स्त्री० [हिं० बटा=गोला] १. गोली। बटी। २. सिल पर पीसने का छोटा बटटा। लोढिया। स्त्री०=बँटई (खेतों की उपज की)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बटी  : स्त्री० [सं० बटी] १. किसी चीज की बनायी हुई छोटी गोली। वटी। २. पीठी की बड़ी या बरी। स्त्री०=वाटिका।
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बटु  : पुं०=वटु (ब्रह्मचारी)।
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बटुआ  : पुं० [सं० बटक या हिं० बटना] [स्त्री० अल्पा० बटुई] १. कपड़े, चमड़े आदि का खाने तथा ढक्कनदार एक उठौआ छोटा आधान जिसमें रुपये-पैसे आदि रखे जाते हैं।
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बटुई  : स्त्री०=बटलोई।
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बटुक  : पुं०=वटुक (ब्रह्मचारी)। पुं० [?] लवंग।
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बटुरना  : अ० [हिं० बटोरना का अ०] १. इकट्ठा या एकत्र होना। २. सिमटना। ३. बटोरा जाना। संयो० क्रि०–जाना।
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बटुरी  : स्त्री० [देश] खेसारी या मोठ नाम का कदन्न। स्त्री०=बटलोई।
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बटुला  : पुं० [स्त्री० अल्पा० बटुली]-बटला।
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बटुवा  : पुं०=बटुआ। पुं०=बटला। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बटे  : पुं०=बटा (गणित का)।
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बटेर  : स्त्री० [सं० वर्तिर] तीतर की तरह की एक छोटी चिड़िया जो अधिक उड़ नहीं सकती। जिसका मांस खाया जाता है। कुछ शौकीन लोग बटेरों को आपस में लड़ाते भी है।
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बटेरबाज  : पुं० [हिं० बटेर+फा० बाज] [भाव० बटेरबाजी] बटेर पकड़ने, पालने या लड़ानेवाला व्यक्ति।
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बटेरबाजी  : स्त्री० [हिं० बटेर+फा० बाजी] बटेर पकड़ने, पालने या लड़ाने का काम या शौक।
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बटेरा  : पुं० [हिं० बटा] कटोरा। पुं०=नर बटेर। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बटैरी  : स्त्री० [हिं० बाँटना] हिन्दुओं में विवाह के समय की एक रस्म जिसमें कन्या पक्षवाले को आभूषण, धन, वस्त्र आदि देते हैं।
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बटोई  : पुं०=बटोही। स्त्री०=बटलोई।
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बटोर  : पुं० [हिं० बटोरना] १. बटोरने की क्रिया या भाव। २. कसी विशिष्ट उद्देश्य से बहुत से आदमियों को इकट्ठा करना। जैसे—बिरादरी के लोगों की अथवा पंचायत की बटोर। ३. चीजें बटोर कर उनका लगाया हुआ ढेर। ४. कूड़े-करकट का ढेर (कहार)।
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बटोरन  : स्त्री० [हिं० बटोरना] १. बटोरने की क्रिया या भाव। २. वह जो कुछ बटोर कर रखा या हुआ हो। ३. कमरे, घर आदि के झाड़े-बुहारे जाने पर निकलनेवाला कूड़ा जो प्रायः एक स्थान पर इकट्ठा कर लिया जाता है। ४. खेत में पड़े हुए अन्न के दाने जो बटोर कर इकट्ठा किये जायँ।
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बटोरना  : स० [हिं० बटुरना] १. छितरी या बिखरी हुई वस्तुओं को उठा या खिसकाकर एक जगह करना। जैसे—(क) गिरे हुए पैसे बटोरना। (ख) कूड़ा बटोरना। क्रि० वि०=देना।—लेना। २. इकट्ठा करना, जोड़ना या जमा करना। जैसे—धन बटोरना। ३. फैलायी या फैली हुई चीज समेटना। जैसे—चादर या पैर बटोरना। ४. चुनना।
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बटोही  : पुं० [हिं० बाट] बाट अर्थात् रास्ते पर चलने वाला या चलता हुआ यात्री। राही। पथिक। मुसाफिर।
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बट्ट  : पुं० [हिं० बटक] १. बटा। गोला। २. कन्दुक। गेंद। ३. बटखरा। बाट। पुं० [हिं० बटना] १. कोई चीज बटने से पड़ा हुआ बल। वट। २. शिकन। सिलवट। पुं०=बाट (रास्ता)।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बट्टन  : पुं० [हिं० बटना] बादले से भी पतला एक प्रकार का तार।
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बट्टा  : पुं० [सं० बटक, हिं० बटा-गोला] [स्त्री० अल्पा० बट्टी, पटिया] १. पत्थर का वह गोला टुकड़ा जो सिल पर कोई चीज कूटने या पीसने के काम आता है। कूटने या पीसने का पत्थर। लोढ़ा। २. पत्थर आदि का कोई गोल-मटोल टुकड़ा। बट्टा। ३. छोटा गोल डिब्बा। जैसे—गहने या पान के बीड़े रखने का बट्टा। ४. छोटा गोलाकार दर्पण। ५. वह कटोरा या प्याला जिसे औंधा रखकर बाजीगर उसमें किसी वस्तु का आना या निकल जाना दिखलाते हैं। पद—बट्टेबाज। (देखें)। ६. एक प्रकार की उबाली हुई सुपारी। पुं० [सं० वर्ति, प्रा० बाट्ट-बनिये का व्यवसाय] १. किसी चीज के पूरे दाम मे होनेवाली वह कमी जो उस चीज मे कोई खोट, त्रुटि दोष या मिलावट होने के कारण की जाती है। पद—बट्टे से=त्रुटि, दोष मिलावट आदि के कारण किसी चीज की अंकित, नियत या प्रसम दर की अपेक्षा कुछ कम मूल्यपर। जैसे—जिस गहने मे टाँके अधिक होते हैं, वह पूरे दाम पर नहीं बल्कि बट्टे से बिकता है। क्रि० प्र०—काटना।—देना।—लगाना। २. सिक्के आदि तुड़ाने या बदलवाने में होनेवाली मूल्य की कमी। भाँज। जैसे—सौ रूपये का नोट भुनाने में दो आना बट्टा लगता है। क्रि० प्र०—लगना। पद—ब्याज-बट्टा (देखें)। ३. उक्त दृष्टि या विचार से होनेवाला घाटा या टोटा। जैसे—वह थान अन्दर से कटा हुआ था इसलिए दुकानदार को एक रुपया बट्टा सहना पड़ा। क्रि० प्र०—सहना। पद—बट्टा-खाता (देखें)। ४. दस्तूरी दलाली आदि के रूप में दिया जानेवाला धन। ५. किसी चीज या बात मे होनेवाला ऐब, कलंक या दोष। दाग। जैसे—तुम्हारा यह आचरण तुम्हारी प्रतिष्ठा में बट्टा लगानेवाला है। क्रि० प्र०—लगना।—लगाना।
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बट्टा-खाता  : पुं० [हिं० बट्टा+खाता] महाजनों के यहाँ एक बही या लेखा जिसमें डूबी हुई अथवा न वसूल होने वाली रकमें लिखी जाती है। मुहावरा—बट्टे खाते लिखना=न प्राप्त हो सकनेवाली रकम डूबी हुई रकमों के खाते में चढ़ाना।
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बट्टाढाल  : वि० [हिं० बट्टा+ढालना] इतना चौरस और चिकना कि उस पर कोई गोला लुढ़काया जाय तो लुढ़कता जाय। खूब समतल और चिकना। पुं० उक्त प्रकार का चिकना और चौरस समतल स्थान।
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बट्टाबाज  : वि०, पुं०=बट्टेबाज।
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बट्टी  : स्त्री० [हिं० बट्टा] १. पत्थर आदि का छोटा टुकड़ा। २. सिल पर चीजें पीसने का छोटा बट्टा। ३. किसी चीज का प्रायः गोलाकार खंड। टिकिया। जैसे—साबुन की बट्टी।
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बट्टू  : स्त्री० [हिं० बट्टा] १. धारीदार चारखाना। २. दक्षिण भारत में होनेवाला एक प्रकार का ताड़। बजरबट्टू। ताली। ३. बोड़ा या लोबिया नाम की फली। ४. लोहे का वह गोला जिसे नट लोग उछालते गायब करते और पिर निकालकर दिखलाते हैं। बट्टा। उदाहरण—जिहि विधि नट के बट्ट।—नागरी दास।
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बट्टे खाते  : वि० [हिं० (रकम)] जो डूब गयी हो या वसूल न हो सकती हो। क्रि० प्र०—डालना।—लिखना।
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बट्टेबाज  : पुं० [हिं० बट्टा+फा० बाज] १. नजर-बंद का खेल करनेवाला जादूगर। २. बहुत बड़ा चालाक या धूर्त। वि० दुश्चरित्रा (स्त्री)। पुंश्चली।
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बठिया  : स्त्री० [देश] पाथे हुए सूखे कंडों का ढेर। उपलों का ढेर।
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बड़ंगा  : पुं० [हिं० बड़ा+अंग+आ (प्रत्यय)] [स्त्री० अल्पा० बडंगी] दीवारों पर लम्बाई के बल बीच-बीच रखा जानेवाला बल्ला जिस पर छाजन टिकी होती है।
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बडंगी  : पुं० [हिं० बड़ा+अंग] घोड़ा। (डिं० )।
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बड़ंगू  : पुं० [देश] दक्षिण भारत में होनेवाला एक प्रकार का जंगली पेड़।
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बड़  : स्त्री० [अनु० बड़बड़] १. बड़बड़ाने या मुँह से बड़-बड़ शब्द उत्पन्न करने की क्रिया या भाव। २. निरर्थक या व्यर्थ की बातें। प्रलाप। जैसे—पागलों की बड़। ३. डींग। शेखी। क्रि० प्र०—मारना।—हाँकना। पुं० [सं० वट] बड़ का पेड़। वट-वृक्ष। वि० १. हिं० बडा का संक्षिप्त रूप जो उसे समस्त पदों के आरम्भ में लगने से प्राप्त होता है। जैसे—बड़-बेला, बड़-भागी। २. उदाहरण—पुनि दातार दइअ बड़ कीन्हा।—जायसी।
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बड़का  : वि० [हिं० बड़ा] [स्त्री० बड़की] बोल-चाल में (वह) जो सबसे बड़ा हो। जैसे—बड़के भैया, बड़की दीदी। (पूरब)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बड़ कुँइयाँ  : स्त्री० [हिं० बड़ा+कुआँ] कच्चा कुआँ।
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बड़-कौला  : पुं० [हिं० बड़+कोंपल] बरगद का पेड़।
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बड़-गुल्ला  : पुं० [हिं० बड़+बगुला] एक प्रकार का बगला।
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बड़-दंता  : वि० [हिं० बड़+दाँत] [स्त्री० बड़दंती] बड़े-बड़े दाँतों वाला।
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बड़-दुमा  : पुं० [हिं० बड़ा+फा० दुम] वह हाथी जिसकी पूँछ पाँव तक लम्बी हो। लम्बी दुम का हाथी। वि० [स्त्री० बड़-दुमी] बड़ी दुम या पूँछवाला।
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बड़प्पन  : पुं० [हिं० ब़ड़+पन (प्रत्यय)] बड़े अर्थात् श्रेष्ठ होने की अवस्था, गुण या भाव। महत्त्व। श्रेष्ठता। बड़ाई। जैसे—तुम्हारा बड़प्पन इसी में है कि तुम कुछ मत बोलो।
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बड़-फर  : पुं० [हिं० ब़ड़+फलक] ढाल। (डिं० ) उदाहरण—बड़-फरि ऊछजतै विरुधि।—प्रिथीराज।
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बड़-फन्नी  : स्त्री० [हिं० बड़ा+फन्नी] वह मठिया (हाथ में पहनने का गहना) जो साधारण से अधिक चौड़ी होती है।
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बड़-बट्टा  : पुं० [हिं० बड़+बट्टा] बरगद का फल।
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बड़बड़  : स्त्री० [अनु०] १. मुँह से निकलनेवाले ऐसे शब्द जो न तो स्पष्ट रूप से दूसरों को सुनायी पड़े और न जिनका जल्दी कोई संगत अर्थ निकल सकता हो। बड़बड़ाने की क्रिया या भाव। २. व्यर्थ की बातचीत। प्रलाप। बकवाद। क्रि० प्र०—करना।—लगाना। ३. क्रोध में आकर अपने मन की भड़ास निकालने के विचार से बहुत धीरे-धीरे मुँह से उच्चरित होनेवाले शब्द।
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बड़बड़ाना  : अ० [अनु० बड़बड़] १. धीरे-धीरे तथा अस्पष्ट रूप से इस प्रकार बोलना कि बड़-बड़ के सिवा और कुछ सुनायी न दे। २. क्रोध में आकर आप ही आप कुछ कहते रहना। कुड़बुड़ाना। ३. बकबक करना। बकवाद। करना।
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बड़बड़िया  : वि० [अनु० बड़बड़+इया (प्रत्यय)] १. बड़ाबड़ अर्थात् बकवाद करनेवाला। २. कोई बात अपने मन में न रख सकने के कारण दूसरों से कह देनेवाला।
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बड़-बोल  : पुं० [हिं० बड़+बोल] [स्त्री० बड़-बोली] अपने कर्तृत्व, योग्यता, शक्ति आदि का अत्यक्तिपूर्ण कथन। डींग या सेखी की बात। वि०=बड़-बोला।
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बड़-बोला  : वि० [हिं० बड़+बोल] [स्त्री० बड़-बोली] बड़ी-बड़ी बातें बघारने या डींग हाँकनेवाला। बढ़-बढ़कर लम्बी चौड़ी बातें करनेवाला।
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बड़-भाग  : वि०=बड़भागी।
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बड़-भागा  : वि० [हिं० बड़+भागी(सं० भागिन्)] [स्त्री० बड़-भागी] बड़े अर्थात् उत्तम भाग्यवाला। सौभाग्यशाली। उदाहरण—ऊधो आज भई बड़-भागी।—सूर।
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बड़-भागी  : वि०=बड़भागा।
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बड़-भुज  : पुं०=भड़-भूँजा। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बड़रा  : वि० [स्त्री० बड़री]-बड़का। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बड़राना  : अ०=बर्राना। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बड़वा  : स्त्री० [सं० वल√वा+क+टाप्, ल-ड] १. घोड़ी। २. सूर्य की पत्नी की संज्ञा जिसने घोड़ी का रूप धारण कर लिया था। ३. अश्विनी नक्षत्र। ४. वायु देव की एक परिचायिका। ५. एक प्राचीन नदी। ६. दासी। सेविका। ७. बड़वानल। पुं० [हिं० बड़ा] भादों मास के अन्त में होनेवाला एक प्रकार का धान।
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बड़वाग्नि  : स्त्री०=बड़वानल (समुद्र की अग्नि)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बड़वानल  : पुं० [हिं० बड़वा-अनल, ष० त०] समुद्र के अन्दर चट्टानों में रहनेवाली आग जो सबसे अधिक प्रबल तथा भीषण मानी गयी है।
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बड़वामुख  : पुं० [हिं० बड़वा-मुख, ष० त० अच्] १. बडड़वाग्नि। २. शिव का मुख।
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बड़वार  : वि० [भाव० बड़वारी] बड़ा।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बड़वारी  : स्त्री० [हिं० बड़वार] १. बड़प्पन। २. बड़ाई। महत्त्व। ३. प्रशंसा।
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बड़वाल  : स्त्री० [देश] हिमालय की तराई मे होनेवाली भेड़ों की एक जाति।
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बड़वा-सुत  : पुं० [सं० ष० त०] अश्विनीकुमार।
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बड़वाहृत  : पुं० [सं० तृ० त०] स्मृतियों से अनुसार वह व्यक्ति जिसे किसी दासी से विवाह करने के कारण दासत्व ग्रहण करना पड़ा हो।
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बड़-हंस  : पुं० [हिं० बड़+सं० हंस] एक राग जो मेघ का पुत्र माना जाता है। कुछ लोग इसे संकर राग भी कहते हैं।
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बड़-हंस-सारंग  : पुं० [हिं० बड़हंस+सारंग] सम्पूर्ण जाति का एक राग जिसमें सब शुद्ध स्वर लगते हैं।
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बड़-हंसिका  : स्त्री० [हिं० बड़+सं० हंसिका] एक रागिनी जो हनुमत् के मत से मेघराग की स्त्री कही गई है।
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बड़हना  : पुं० [हिं० बड़+धान] १. एक तरह का धान। २. उक्त धान का चावल। वि०=बड़ा। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बड़हर  : पुं० [?] वह स्थान जहाँ पर जलाये के लिए सूखे कंडे इकट्ठा करके रखे जाते हैं। पुं०=बड़हल। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बड़हल  : पुं० [हिं० बड़+फल] १. एक प्रकार का बड़ा पेड़ जो पश्चिमी घाट, पूर्व बंगाल और कुमाऊँ की तराई आदि में बहुत होता है। २. उक्त पेड़ का फल जो अचार बनाने अथवा यों ही खाने के काम आता है।
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बड़हार  : पुं० [हिं० वर+आहार] विवाह हो जाने के उपरान्त कन्या पक्षवालों द्वारा वर और बरातियों को दी जानेवाली ज्योनार
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बड़ा  : वि० [सं० वर्द्धन, प्रा० बड़ढ़न, हिं० बढ़ना या सं० बड्] [स्त्री० अल्पा० बड़ी] १. जो अपने आकार, धारिता, मान, विस्तार आदि के विचार से औरों से बढ़-बढ़कर हो। प्रसम या साधारण से अधिक डील-डौल वाला। जैसे—(क) बड़ा पेड़, बड़ा मकान, बड़ा संदूक। (ख) बड़ा दिन। पद—बड़ा आदमी बड़ा घर, बड़ा बूढ़ा (दे० स्वतंत्र शब्द)। मुहावरा—बड़ी-बड़ी बातें करना=अपनी अथवा किसी की योग्यता शक्ति आदि के संबंध में बहुत कुछ अत्युक्तिपूर्ण या बड़ा-चढ़ाकर बातें करना। २. जो गरिमा, गुण, मर्यादा महत्त्व आदि के विचार से औरों से बहुत आगे बढ़ा हुआ हो। जैसे—(क) बड़ा दिन। (ख) बड़ा साहस। (ग) बड़ा कारीगर। ३. जो अधिकार, अवस्था, पद, मर्यादा शक्ति आदि के विचार से बढ़ा हुआ या बढ़-चढ़कर हो। जैसे—(क) बड़ा अधिकारी। (ख) बड़े-बूढ़े (या बड़े लोग) जो कहें, वह मान लेना चाहिए। ४. जो किशोर विशेषतः युवावस्था को प्राप्त हो चुका हो। जैसे—लड़की बड़ी हो गयी है, अब इसका विवाह कर देना चाहिए। ५. तुल्नात्मक दृष्टि से जिसकी अवस्था या वय अपने वर्ग के औरों से अधिक हो। ज्यादा उमरवाला। जैसे—बड़ा भाई, बड़े मामा। ६. जो मात्रा, मान, संख्या आदि के विचार से औरों से बढ़-चढ़कर हो। जैसे—(क) उन्हें इस वर्ष सबसे बड़ा इनाम मिला है। (ख) खाते में एक बड़ी रकम छूट गयी है। ७. जो बहुत अधिक स्थान घेरता हो। अधिक जगह घेरनेवाला। जैसे—बड़ा कारखाना, बड़ी दुकान। ८. जो देखने में तो बहुत बढ़-चढ़कर महत्त्वपूर्ण या प्रभावशाली हो (फिर भी जिसमें कुछ तत्त्व या सार न हो)। जैसे—बड़ी बोल बोलना, बड़ी-बड़ी बातें बघारना। ९. कुछ अवस्थाओं में किसी अनिष्ट अप्रिय या अशुभ क्रिया के स्थान पर अथवा ऐसी ही किसी संज्ञा के साथ प्रयुक्त होनेवाला विशेषण। जैसे—(क) दीया बड़ा करना अर्थात् बुझाना) बड़ा जानवर (अर्थात् गीदड़ या साँप)। क्रि० वि० बहुत अधिक। उदाहरण—बड़ी लम्बी है जमीं मिलेगे लाख हमीं।—कोई शायर। पुं० [सं० वटक, हिं० वटा] [स्त्री० अल्पा० बड़ी] १. एक प्रकार का पकवान जो मसाला मिली हुई उर्द की पीठी की गोल चक्राकार टिकियों के रूप में होता है और घी या तेल में तलकर बनाया जाता है। २. उत्तरी भारत में होनेवाली एक प्रकार की बरसाती घास।
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बड़ा आदमी  : पुं० [हिं० ] १. ऐसा आदमी जिसके पास यथेष्ट धन सम्पत्ति हो। अमीर। धनवान। २. ऐसा आदमी जो गुण, पद, मर्यादा आदि के विचार से औरों से बहुत बढ़कर हो।
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बड़ाई  : स्त्री० [हिं० बड़ा+ई (प्रत्यय)] १. बड़े होने की अवस्था या भाव। बड़ापन। २. किसी काम या बात में औरो की अपेक्षा बढ़-चढ़कर होनेवाला कोई विशेष गुण या श्रेष्ठता। ३. उक्त के आधार पर किसी की होनेवाली प्रतिष्ठा या मान-मर्यादा। महिमा। ४. किसी मे होनेवाले विशिष्ट गुण के संबंध में कही जानेवाली प्रशंसात्मक उक्ति। ५. प्रशंसा। तारीफ। मुहावरा—(किसी की) बड़ाई देना=किसी के गुण, योग्यता आदि का आदर करते हुए उसका आदर या प्रशंसा करना। (अपनी) बड़ाई मारना=अपने मुँह से आप अपनी योग्यता या बखान या प्रशंसा करना।
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बड़ा कुँवार  : पुं० [हिं० बड़ा+कुँवार] केवड़े की तरह का एक पेड़ जिसके पत्ते किरिच की तरह लम्बे होते हैं।
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बडा घर  : पुं० [हिं०] १. कुलीन, प्रतिष्ठित, और सम्पन्न कुल। ऊँचा और कुलीन घराना। २. लाक्षणिक अर्थ में, कारागार या जेलखाना। मुहावरा—बड़े घर की हवा खाना=कैद भुगतना।
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बड़ा दिन  : पुं० [हिं० बड़ा+दिन] २५ दिसम्बर का दिन जो ईसाइयों का प्रसिद्ध त्योहार है। विशेष—प्रायः इसी दिन या इसके कुछ आगे-पीछे दिन-मान का बढ़ना आरम्भ होता है, इसी से इसे बड़ा दिन कहते हैं।
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बड़ा नहान  : पुं० [हिं०] वह स्नान जो प्रसूता को प्रसव के चालीसवें दिन कराया जाता है।
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बड़ानी  : वि०=बड़ा। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बड़ा पीलू  : पुं० [हिं० बड़ा+पीलू] एक प्रकार का रेशम का कीड़ा।
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बड़ा बाबू  : पुं० [हिं०] किसी कार्यालय का प्रधान लिपिक जिसके अधीन कई लिपिक काम करते हों।
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बड़ा बूढ़ा  : पुं० [हिं० ] ऐसा व्यक्ति जो अवस्था या वय के विचार से भी और गुण, योग्यता आदि के विचार से भी औरों से बढ़-चढ़कर या श्रेष्ठ हो बुजुर्ग।
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बडि (लि) श  : पुं० [सं० बलिन√शो (तीक्ष्ण करना)+क, ल—ड] १. मछली फँसाने की कँटिया। बाँसी। २. शल्य चिकित्सा में काम आनेवाला एक शस्त्र।
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बड़ी  : स्त्री० [हिं० बड़ा] १. आलू, दाल, सफेद कुम्हड़े आदि को पीसकर तथा उसमें नमक, मिर्च, मसाला आदि डालकर उसका सुखाया हुआ कोई छोटा टुकड़ा जो दाल, तरकारी आदि में डाला जाता है। कुम्हड़ौरी। २. मांस की बोटी। (डिं० )।
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बड़ी इलायची  : स्त्री० [हिं० ] १. एक प्रकार का इलायची का पेड़ जिसका फल कुछ बड़ा और काले रंग का होता है २. उक्त का फल जिसके दाने या बीज मसाले के रूप में प्रयुक्त होते हैं।
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बड़ी गोटी  : स्त्री० [?] चौपायों की एक बीमारी।
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बड़ी बात  : स्त्री० [हिं० ] कोई महत्त्वपूर्ण किंतु कठिन काम। जैसे—उन्हें रास्ते पर लाना कौन बड़ी बात है।
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बड़ी माता  : स्त्री० [हिं० बड़ी+माता] शीतला। चेचक। (पॉक्स)।
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बड़ी मैल  : स्त्री० [देश०] एक प्रकार की चिड़िया जो बिलकुल खाकी रंग की होती है।
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बड़ी राई  : स्त्री० [हिं० बड़ी+राई] एक प्रकार की सरसों जो लाल रंग की होती है। लाही।
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बडूजा  : पुं०=बिड़ौजा। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बड़ेरा  : वि० [हिं० बड़ा+रा (प्रत्यय)] [स्त्री० बड़ेरी] १. बड़ा। २. प्रधान। मुख्य। पुं० [सं० बड़ीभि, प्रा० बड़ीहि+रा] [स्त्री० अल्पा० बड़ेरी] कुएँ पर दो खम्भों के ऊपर ठहरायी हुई वह लकड़ी जिसमें घिरनी लगी रहती है। पुं० १.=बँडेर। २.=बवंडर। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बड़े लाट  : पुं० [हिं० बड़ा+अं० लाँर्ड] अंगरेजी शासन-काल में भारत का सर्व०-प्रमुख प्रधान शासक। गर्वनर जनरल।
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बड़ैल  : पुं० [हिं० बड़ा] जंगली सूअर। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बड़ौखा  : पुं० [हिं० बड़ा+ऊख] एक प्रकार का गन्ना जो बहुत लम्बा और नरम होता है। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बड़ौना  : पुं० [हिं० बड़ापन] १. बड़ाई। महिमा। २. प्रशंसा। तारीफ। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बड्ड  : वि०=बड़ा।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बड्डान  : अ०=बड़बड़ाना।
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बढ़ती  : स्त्री०=बढ़ती। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बढ़  : वि० [हिं० बढ़ना] १. बढ़ा हुआ। २. अधिक। ज्यादा। ३. मूर्ख। ४. हिं० बढ़ना (क्रि० ) का विशेषण की तरह प्रयुक्त होने वाला संक्षिप्त रूप। स्त्री० १.=बढ़ती। २.=बाढ़।
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बढ़ई  : पुं० [सं० वर्द्धकि० प्रा० वडुइ] १. लकड़ी को छील तथा गढ़कर उसके उपयोगी उपकरण बनानेवाला कारीगर। २. उक्त कारीगरों की एक जाति या वर्ग। ३. रहस्य संप्रदाय में गुरु जो शिष्य रूपी कुन्दे को गढ़-छीलकर सुन्दर मूर्ति का रूप देता है।
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बढ़ई मधु-मक्खी  : स्त्री० [हिं०] एक प्रकार की मधु-मक्खी जिसका रंग काला और पंख नीले होते हैं। यह वृक्षों के काठ तक काट डालती है।
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बढ़ती  : स्त्री० [हिं० बढ़ना+ती (प्रत्यय)] १. बढ़ने, अथवा बढ़े हुए होने की अवस्था या भाव। २. गिनती तौल, नाप मान आदि में उचित या नियत से अधिक या बढ़ा हुआ अंश। ३. धन-धान्य परिवार आदि की वृद्धि। पद—बढ़ती का पहर=उन्नति और समृद्धि के दिन। ४. आवश्यकता, उपभोग, व्यय आदि की पूर्ति हो चुकने पर भी कुछ बच रहने की अवस्था या भाव। बचत। (रसप्लस) ५. मूल्य की वृद्धि। पद—बढ़ती से=अंश-पत्र, राज-ऋण, विनिमय आदि की दर के संबंध मे अंकित या नियत मूल्य की अपेक्षा कुछ अधिक मूल्य पर।
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बढ़ती-फसल  : स्त्री० [हिं०+अ] वह फसल जो अभी खेत में बढ़ रही हो, पर अभी पूरी तरह से तैयार न हुई हो। (ग्रोइंग क्रॉप)।
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बड़दार  : स्त्री० [हिं० बाढ़+धार] पत्थर काटने की टाँकी। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बढ़न  : स्त्री० [हिं० बढ़ना] बढ़ने तथा बढ़े हुए होने की अवस्था या भाव। बढ़ती। वृद्धि।
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बढ़ना  : अ० [सं० वर्द्धन, प्रा० वड्ढन] १. आकार, क्षेत्र, विस्तार व्याप्ति सीमा आदि में अधिकता या वृद्धि होना। जितना या जैसा पहले रहा हो, उससे अधिक होना। जैसे—(क) पेड़-पौधों या बच्चों का बढ़ना। (ख) कर्मचारियों की छुट्टियाँ बढ़ना। (ग) दाढ़ी या नाखूनों का बढ़ना। २. परिमाण, मात्रा, संख्या आदि में अधिकता या वृद्धि होना। जैसे—(क) घर का खर्च बढ़ना। (ख) देश की जन-संख्या बढ़ना। (ग) नदी में जल बढ़ना। ३. कार्य-क्षेत्र, गुण आदि का विस्तार होना। व्याप्ति में अधिकता या वृद्धि होना। जैसे—(क) झगड़ा-तकरार या वैर-विरोध बढ़ना। (ख) प्रभाव-क्षेत्र या व्यापार बढ़ना। ४. तीव्रता, प्रबलता वेग शक्ति आदि में अधिकता या वृद्धि होना। जैसे—(क) किसी चलनेवाली चीज की चाल बढ़ना। (ख) रोग या विकार बढ़ना। ५. किसी प्रकार की उन्नति या तरक्की होना। जैसे—वह तो हमारे देखते-देखते इतना बढ़ा है। ६. आगे की ओर चलना या अग्रसर होना। जैसे—(क) आज-कल औद्योगिक क्षेत्र में अनेक पिछड़े हुए देश आगे बढ़ने लगे हैं। (ख) आका में गुड्डी या पतंग बढ़ना। (ग) तुम्हारें तो पैर ही नहीं बढ़ते। मुहावरा—बढ़ चलना=(क) उन्नति करना। (ख) अपनी योग्यता, सामर्थ्य आदि से अतिरिक्त आचरण या व्यवहार करना। (ग) अभिमान या ऐंठ दिखाना। इतराना। ७. प्रतियोगिता, होड़ आदि में किसी से आगे होना। जैसे—अब यह कई बातों में तुमसे बहुत आगे बढ़ गया है। ८. रोजगार या व्यापार में लाभ के रूप में धन प्राप्त होना। जैसे—चलो इस सौदे में हजार रुपए तो बढ़े।, अर्थात् हजार रुपए की आय या लाभ हुआ। ९. कुछ विशिष्ट प्रसंगों में मंगल-भाषित के रूप में कुछ समय के लिए किसी काम, चीज या बात का अन्त या समाप्ति होना। जैसे—(क) किसी स्त्री के हाथ की चूड़ियाँ बढ़ना, अर्थात् उतारी या तोड़ी जाना। (ख) दीया बढ़ना, अर्थात् बुझाया जाना, दुकान बढ़ना अर्थात् कुछ समय के लिए बन्द होना। स० बढ़ाना। विस्तृत करना। उदाहरण—स्रवन सुनत करुना सरिता भए बढैयो बसन उमंगी।—सूर। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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बढ़नी  : स्त्री० [सं० बर्द्धनी, प्रा० बड्ढनी] १. झाड़ू। बुहारी। कूचा। मार्जनी। २. वह अनाज या धन जो किसानों को खेती-बारी आदि के काम पर पेशगी दिया जाता और बाद में कुछ बढ़ाकर लिया जाता है। स्त्री० [हिं० बढ़ना] पेशगी। अग्रिम।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बढ़वाना  : स० [हिं० बढ़ाना का प्रे०] किसी को कुछ बढ़ाने में प्रवृत्त करना। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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बढ़वारि  : स्त्री०=बढ़ती। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बढ़ाना  : स० [हिं० बढ़ाना का स०] १. किसी को बढ़ने में प्रवृत्त करना। ऐसा काम करना जिससे कुछ या कोई बढ़े। २. कोई चीज या बात का विस्तार करते हुए उसे किसी दूर के बिन्दु समय आदि तक ले जाना। विस्तार अधिक करना। जैसे—(क) उपन्यास या कहानी का कथाभाग बढ़ाना। (ख) नौकरी की अवधि या समय बढ़ाना। (ग) धातु को पीटकर उसका तार या पत्तर बढ़ाना। ३. परिमाण, मात्रा, संख्या आदि में अधिकता या वृद्धि करना। जैसे—(क) किसी चीज की दर या भाव बढ़ाना। (ख) किसी का वेतन (या सजा) बढ़ाना। (ग) अपनी आमदनी बढ़ाना। ४. किसी प्रकार की व्याप्ति में विस्तार करना। जैसे—झगड़ा या वात बढ़ाना। कार-बार या रोजगार बढ़ाना। पद—बढ़ा-चढ़ाकर=(क) इतनी अधिकता करके कि अत्युक्ति के क्षेत्र तक जा पहुँचे। जैसे—बढ़ा-चढ़ाकर किसी की प्रशंसा करना या कोई बात कहना। (ख) उत्तेजित या उत्साहित करके। बढ़ावा देकर। जैसे—किसी को बढ़ा-चढ़ाकर किसी के साथ लड़ा देना। ५. जो चीज आगे चल या जा रही हो।, उसेक क्षेत्र गति आदि में अधिकता या वृद्धि करना। जैसे—(क) चलने में कदम या पैर बढ़ाना, अर्थात् जल्दी-जल्दी पर रखते हुए चलना (ख) गुड्डी या पतंग बढ़ाना अर्थात् उसकी डोर या नख इस प्रकार ढीली करना कि वह दूर तक जा पहुँचे। ६. गुण, प्रभाव, शक्ति आदि में किसी प्रकार की तीव्रता या प्रबलता उत्पन्न करना। जैसे—(क) किसी का अधिकार (या मिजाज) बढ़ाना। (ख) अपनी जानकारी या परिचय बढ़ाना। ७. जो चीज जहाँ स्थित हो, उसे वहाँ से आगे बढ़ने में प्रवृत्त करना। जैसे—जूलुस या बारात बढ़ाना। ८. प्रतियोगिता आदि में किसी की तुलना मे आगे ले जाना या श्रेष्ठ बनाना। जैसे—घुड़-दौड़ में घोड़ा आगे बढ़ाना। ९. किसी को यथेष्ठ उन्नत सफल या समृद्ध करना। उदाहरण—सूरदास करूणा-निधान प्रभु जुग जुग भगति बढ़ा दो।—सूर। १॰. कुछ प्रसंगों में मंगल-भाषित के रूप में कुछ समय के लिए किसी काम या चीज का अन्त या समाप्ति करना। जैसे—(क) चूड़ियाँ बढ़ाना-उतारना या तोड़ना। (ख) दीया बढ़ाना-बुझाना। (ग)दुकान बढ़ाना=बन्द करना। अ० खतम या समाप्त होना। बाकी न रह जाना। चुकाना उदाहरण—मेघ सबै जल बरखि बढ़ाने विधि गुन गये सिराई।—सूर।
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बढ़ा-बढ़ी  : स्त्री० [हिं० बढ़ना] १. आचरण, व्यवहार आदि में आवश्यकता या औचित्य से अधिक आगे बढ़ने की क्रिया या भाव। मर्यादा या सीमा का उल्लंघन। जैसे—इस तरह की बढ़ा-बढ़ी ठीक नहीं हैं। २. प्रतिद्वंद्विता। होड़।
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बढ़ार  : पुं० दे० ‘बड़हार’।
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बढ़ाली  : स्त्री० [देश] कटारी। कटार।
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बढ़ाव  : पुं० [हिं० बढ़ना+आव (प्रत्यय)] १. बढ़ने या बढ़े हुए होने की अवस्था या भाव। २. फैलाव। विस्तार। ३. मूल्य आदि की वृद्धि। ४. बढ़ती। बाढ़।
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बढ़ावन  : स्त्री० [हिं० बढ़ावना] गोबर की टिकिया जो बच्चों की नजर झाड़ने के काम में आती है।
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बढ़ावना  : स०=बढ़ाना।
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बढ़ावा  : पुं० [हिं० बढ़ाव] १. आगे बढ़कर कोई महत्त्वपूर्ण काम करने के लिए किसी को दिया जानेवाला प्रोत्साहन। २. प्रोत्साहित करने के लिए कही जानेवाली बात। क्रि० प्र०—देना।
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बढ़िया  : वि० [हिं० बढ़ना] (पदार्थ) जो गुण, रचना, रूप-रंग सामग्री आदि की दृष्टि से उच्च कोटि का हो। उम्दा। जैसे—बढ़िया कपड़ा, बढ़िया चावल, बढ़िया पुस्तक बढ़िया बात। पुं० १. गन्ने अनाज आदि की फसल का एक रोग जिससे कनखे नहीं निकलते और बढ़ाव बन्द हो जाता है। २. प्रायः डेढ़ नर की एक पुरानी तौल। ३. एक प्रकार का कोल्हू। स्त्री० १. एक प्रकार की दाल। २. जलाशयों आदि की बाढ़।
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बढ़ियार  : वि० [हिं० बढ़ना] (जलाशय या नदी) जिसमें बाढ़-आयी हो। जैसे—बढ़ियार गंगा। स्त्री० नदियों आदि में आनेवाली पानी की बाढ़। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बढ़ेल  : स्त्री० [देश] हिमालय पर पाई जानेवाली एक प्रकार की भेड़।
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बढ़ेला  : पुं० [सं० वराह] बनैला सूअर। जंगली सूअर।
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बढ़ैया  : वि० [हिं० बढ़ाना, बढ़ना] १. बढ़ानेवाला। २. उन्नति करनेवाला। वि० [हिं० बढ़ना] बढ़नेवाला। उन्नतिशील। पुं०=बढ़ई। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बढ़ोत्तरी  : स्त्री० [हिं० बाढ़+उत्तर] १. उत्तरोत्तर होनेवाली वृद्धि। बढ़ती। २. उन्नति। तरक्की। ३. व्यापार में होनेवाला लाभ।
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बणिक  : पुं० [स० वणिक्] १. वह जो वाणिज्य अर्थात् रोजगार या व्यापार करता हो। रोजगारी। व्यवसायी। व्यापारी। २. कोई विशिष्ट चीज बेचनेवाला सौदागर। ३. गणित, ज्योतिष में छठा करण।
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बणिक-पथ  : पुं० [सं० वणिक्पथ] १. वाणिज्य। २. व्यापार की चीजों की आमदनी। रफ्तनी। ३. व्यापारी। ४. दुकान। ५. तुला राशि।
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बणिक-सार्थ  : पुं० [सं० वणिकसार्थ] व्यापारियों का समूह।
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बणिग्बंधु  : पुं० [सं० वणिग्बन्धु] नील का पौधा।
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बणिग्वह  : पुं० [सं० वणिग्वड] ऊँट।
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बणिज्वीथी  : स्त्री० [सं० वणिग्वीथी] बाजार।
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बणिग्वृत्ति  : स्त्री० [सं० बणिग्वृत्ति] बणिक का पेशा। व्यापार।
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बणिज्  : पुं०=वणिक्।
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बत  : स्त्री० [हिं० बात का संक्षिप्त रूप] हिंदी ‘बात’ का संक्षिप्त रूप जो उसे समस्त पदों के आरम्भ में लगने से प्राप्त होता है। जैसे—बत-कही, बत-रस। स्त्री० [अ०] १. बतख की जाति की एक मौसमी चिड़िया जो मटमैले रंग की होती है। १. बत्तख।
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बतक  : स्त्री० [हिं० बत्तख] १. बत्तख की गरदन के आकार की एक प्रकार की सुराही जिसमें शराब रखी जाती थी। (राज० ) २. बत्तख नाम की चिड़िया।
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बत-कट  : वि० [हिं० बात+काटना] १. बाट काटने अर्थात् उसकी यथार्थता को चुनौती देनेवाला। २. किसी के बोलने के समय बीच में उसे बार-बार टोकनेवाला। उदाहरण—नस-कट खटिया बत-कट जोय।—घाघ।
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बत-कहाव  : पुं०=बत-कही। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बत-कही  : स्त्री० [हिं० बात+कहना] १. साधारणतः केवल मन वहलाने या सम बिताने के लिए की जानेवाली इधर-उधर की बात-चीत। उदाहरण—करत बत-कही अनुज सम मन सिय-रूप लुभान।—तुलसी। २. बात-चीत की तरह का बहुत ही तुच्छ या साधारण काम। उदाहरण—दसकंधर मारीच बत-कही।—तुलसी। ३. बाद-विवाद। कहा-सुनी। तकरार। ४. झूठ-मूठ या मन से गढ़कर कही जानेवाली बात।
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बतख  : स्त्री० [अ० बत] हंस की जाति की पानी की एक चिड़िया जिसका रंग सफेद पंजे झिल्लीदार और चोंच का अग्र भाग चिपटा होता है। और जिसके अंडे मुर्गी के अंडों से कुछ बड़े होते हैं।
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बत-चल  : वि० [हिं० बात+चलाना] बकवादी। बक्की। स्त्री०=बात-चीत।
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बत-छुट  : वि० [हिं० बात+छूटना] बिना सोचे-समझे। अच्छी-बुरी सब तरह की बातें कह डालनेवाला।
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बत-धर  : वि० [हिं० बात+सं० धर=धारण करनेवाला] जो अपनी कही हुई बात या दिये हुए वचन का सदा पूरी तरह से पालन करता हो।
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बत-बढ़ाव  : पुं० [हिं० बात+बढ़ाव] १. बात बढ़ने अर्थात् झगड़ा खड़े होने की अवस्था या भाव। २. छोटी या तुच्छ बात को दिया जानेवाला विकट और विस्तृत रूप।
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बत-बाती  : स्त्री० [हिं० बात] १. बे-सिर पैर की बात। बकवाद। २. किसी से छेड़-छाड़ करने या घनिष्ठता बढ़ाने के लिए की जानेवाली बात-चीत। उदाहरण—कछुक अनूठे मिस बनाय ढिग आय करत बतबाती।—आनन्दघन। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बतर  : वि०=बदतर।
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बत-रस  : पुं० [हिं० बात+रस] बातों से मिलनेवाला आनन्द।
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बत-रसिया  : वि० [हिं० बात+रसिया] १. हर बात में रस लेनेवाला। २. जिसे बहुत बात-चीत करने का चस्का हो। बातों का शौकीन।
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बतरान  : स्त्री० [हिं० बतराना] बातचीत।
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बतराना  : अ० [हिं० बात+आना (प्रत्यय)] बातचीत। करना। उदाहरण—हम जाने अब बात तिहारी सूधे नहीं बतराति।—सूर।
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बतरानि  : स्त्री०=बतरान। बात-चीत। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बतरावनि  : स्त्री० [हिं० बतराना] १. बात-चीत। वार्तालाप। उदाहरण—‘ललित किसोरी’ फूल झरनि या मधुर-मधुर बतरावनि।—ललित किशोरी। २. बात-चीत करने का ढंग या प्रकार। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बतरौहाँ  : वि० [हिं० बात] [स्त्री० बतरौही] बहुत बातें करनेवाला। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बतलाना  : स०=बताना। अ०=बतराना। (बात-चीत करना)।
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बत-वन्हा  : पुं० [देश] एक तरह की नाव।
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बताना  : स० [हिं० बात+ना (प्रत्यय) या सं० वदन=कहना] १. कोई बात कहकर किसी को कोई जानकारी या परिचय कराना। जैसे—तुम्हारी नौकरी लगने की बात मुझे उसी ने बतायी थी। २. कोई कठिन काम या बात इस प्रकार दिखलाना या समझाना कि उससे अनजानों का ज्ञान या योग्यता बढ़े। जैसे—(क) गुरु जी ने अभी तुम्हें व्याकरण का वषय नहीं बताया है। (ख) नौकर ने मालिक को खर्च का हिसाब बताया। ३. किसी प्रकार का निर्देश या संकेत करना। जैसे—किसी की ओर उंगली दिखाकर बताना। ४. नाच-गाने आदि के प्रसंग में ऐसी मुद्राएँ बनाना जो गीत के भाव के अनुरूप या उनकी स्पष्ट परिचायक हों। जैसे—वह गाता (या नाचता) तो उतना अच्छा नहीं हैं, पर भाव बहुत अच्छा बताता है। मुहावरा—भाव बताना=किसी काम या बात के समय स्त्रियों के से हाव-भाव प्रदर्शित करना। ५. किसी को धमकाते हुए यह आशा प्रकट करना कि हम तुम्हारा अभिमान दूर कर देंगे या तुम्हारी बुद्धि ठिकाने कर देंगे। जैसे—अच्छा किसी दिन तुम्हें भी बताऊँगा। ६. दिखलाना। जैसे—बावली को आग बताई उसने ले घर में लगाई। (कहा० )। पुं० [सं० वर्तक=एक धातु] १. हाथ में पहनने का कड़ा। २. वह फटा-पुराना या साधारण कपड़ा जो पगड़ी बाँधने से पहले यों ही सिर पर इसलिए लपेट लिया जाता है कि बालों से पगड़ी गंदी या मैली न होने पावे।
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बताशा  : पुं०=बतासा।
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बतास  : स्त्री० [सं० बातास] १. बात के प्रकोप के कारण होनेवाला गठिया नामक रोग। क्रि० प्र०—घरना।—पकड़ना।२. वायु। हवा।
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बतासना  : अ० [हिं० बतास] हवा चलना या बहना। (पूरब)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बतासफेनी  : स्त्री० [हिं० बतासा+फेनी] टिकिया के आकार की एक मिठाई।
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बतासा  : पुं० [हिं० बतास=हवा] १. एक प्रकार की मिठाई जो चीनी की चाशनी टपकाकर बनायी जाती है और जो फूल की तरह फूली हुई और बहुत हलकी होती है। २. एक प्रकार की छोटी आतिशबाजी जो मिट्टी के कसोरे में मसाला बनायी जाती है। ३. पानी का बुलबुला।
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बतासी  : स्त्री० [देश] एक प्रकार की कालापन लिए हुए खैरे रंग की चिड़िया जिसकी आँख की पुतली गहरी-भूरी चोंच काली और पैर ललछौह होते हैं।
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बतिया  : स्त्री० [सं० वर्तिका, प्रा० बत्तिआ=बत्ती] सब्जी के काम में आनेवाला कोई छोटा कच्चा ताजा हरा फल। जैसे—कद्दू या बैगन की बतिया। स्त्री०=बात। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बतियाना  : अ० [हिं० बात] बातचीत करना।
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बतियार  : स्त्री० [हिं० बात] बातचीत।
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बतीसा  : पुं० [हिं० बत्तीस] [स्त्री० अल्पा० बत्तीसी] १. बत्तीस वस्तुओं का समाहार या समूह। २. बत्तीस दवाओं और मेवों के योग से बनाया हुआ लड्डू या हलवा जो प्रसूता को पुष्टि के लिए खिलाया जाता है। ३. दाँत से काटने का घाव या चिन्ह।
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बतीसी  : स्त्री०=बत्तीसी।
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बतू  : पुं०=कलाबत्तू।
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बतोला  : पुं० [हिं० बात+ओला (प्रत्यय)] १. धोखा देने के उद्देश्य से कही जानेवाली बात। २. झांसा। मुहावरा—बतोले बनाना=(क) बातें बनाना। (ख) भुलावा देना।
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बतौर  : अव्य० [अ०] १. (किसी की) तरह पर। रीति से। तरीके पर। २. के सदृश। के समान।
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बतौरी  : स्त्री० [?] रसौली।
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बतौल-कुंती  : स्त्री० [हिं० बात] कान में बातचीत करने की नकल जो बंदर करते हैं। (कलंदर)।
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बत्त  : स्त्री०=बात।
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बत्तक  : स्त्री०=बत्तख।
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बत्तर  : वि०=बदतर।
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बत्तरी  : स्त्री०=बात।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बत्ता  : पुं० [सं० बर्त्तक] सरकंडे के वे मुट्ठे जो छाजन के छप्पर के अगले भाग में बाँधे जाते हैं।
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बत्तिस  : वि०=बत्तीस।
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बत्ती  : स्त्री० [सं० वर्ति, प्रा० बत्ति] १. प्रकाश के निर्मित जलाया जानेवाला सूत, रूई, कपड़े आदि का बटा हुआ लम्बोतरा लच्छा जो तेल आदि से भरे हुए दीए में रखा जाता है। मुहावरा—बत्ती चढ़ाना=शमादान में मोमबत्ती लगाना। (बत्ती जलाना=अँधेरा होने पर प्रकाश के लिए दीपक जलाना। (किसी चीज में) बत्ती लगाना-पूरी तरह से नष्ट-भ्रष्ट करना। जैसे—वह लाखों रुपए की सम्पत्ति में बत्ती लगाकर कंगाल हो गया। ३. दीपक। चिराग। ४. रोशनी प्रकाश। मुहावरा—बत्ती दिखाना=प्रकाश दिखाना। ५. लपेटा हुआ चीथड़ा जो किसी वस्तु में आगे लगाने के काम में लाया जाय। फलीता। पलीता। ६. बत्ती के आकार-प्रकार की कोई गोलाका लम्बी चीज। जैसे—घाव में भरने की बत्ती लाह की बत्ती। ७. छाजन में लगाने का फूस आदि का पूला। ८. कपड़े की वह लम्बी धज्जी जो घाव में मवाद साफ करने के लिए भरते हैं। ९. सौंफ आदि पर गंध-द्रव्य का ज्वलनशील पदार्थ लपेटकर बनायी जानेवाली बत्ती जो पूजन यादि के समय जलायी जाती है। जैसे—अगरबत्ती, धूपबत्ती, मोमबत्ती। १॰. पगड़ी या चीरे का ऐंठा या बटा हुआ कपड़ा। ११. कपड़े के किनारे का वह भाग जो सीने के लिए मरोड़कर बत्ती के रूप में लाया जाता है।
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बत्तीस  : वि० [सं० द्वाविंशत, प्रा० बत्तीसा] गिनती या संख्या में जो तीस से दो अधिक हो। पुं० उक्त की सूचक संख्या जो इस प्रकार (३२) लिखी जाती है।
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बत्तीसा  : पुं०=बतीसी।
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बत्तीसी  : स्त्री० [हिं० बत्तीस] १. एक ही तरह की बत्तीस चीजों का समूह। २. मनुष्य के मुँह से ३२ दाँतों का समूह। मुहावरा—बत्तीसी खिलना=मुँह पर स्पष्ट रूप से हँसी दिखायी देना। (किसी की) बत्तीसी झाड़ना=इतना मारना कि सब दाँत टूट जाएँ। बत्तीसी दिखाना=निर्लज्जतापूर्वक हँसना। बत्तीसी बजना=सरदी के कारण दाँतों का काँपकर कटकट शब्द करना।
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बत्रीस  : वि० पुं०=बत्तीस।
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बथना  : अ० [सं० व्यथा] पीड़ा या दर्द होना। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बथान  : पुं० [सं० वास+स्थान] १. पशुओं के बाँधे जाने की जगह। पशु-शाला। २. गिरोह। झुंड। स्त्री० [हिं० बथना] पीड़ा। दर्द। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बथिया  : स्त्री० [?] सूखे गोबर का ढेर।
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बथुआ  : पुं० [सं० वास्तुक, पा० बात्थुआ] १. मोटे, चिकने हरेरंग के पत्तोंवाला एक पौधा जो १ से ४ हाथ तक ऊँचा होता है तथा गेहूँ जौ आदि के खेतों मे अधिक होता है। २. उक्त के पत्ते अथवा उनका बना हुआ साग।
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बथ्य  : स्त्री० [सं० वस्तु] चीज़।
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बद  : स्त्री० [सं० वर्धन=गिल्टी] १. आतशक या गरमी की बीमारी के कारण या यों ही सूजी हुई जाँघ पर की गिल्टी। गोहिया। बाघी। २. चौपायों का एक संक्रामक रोग जिसमें उनके मुँह से लार बहती है और खुर तथा मुँह में दाने पड़ जाते हैं। वि० [फा०] [भाव० बदी] १. खराब बुरा। २. दुराचारी। ३. दुष्ट। पाजी। स्त्री० [हिं० बदना] १. पलटा। बदला। एवज। जसे—इसके बद में कुछ और दे दो। २. किसी का निश्चित पक्ष। जैसे—दो गाँठ रूई हमारी बद की भी खरीद लो, अर्थात् उसके घाटे-नफे के हम जिम्मेदार रहेंगे।
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बद-अमली  : स्त्री० [फा० बद+अ० अमल] राज्य या शासन का कुप्रबन्ध। शासनिक अव्यवस्था। अराजकता।
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बतजामी  : स्त्री० [फा०] कुप्रबंध। अव्यवस्था।
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बदइंकार  : वि० [फा०] [भाव० बदकारी] १. बुरा काम करनेवाला। कुकर्मी। २. दुराचारी।
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बदकारी  : स्त्री० [फा०] १. कुकर्म। २. व्यभिचार।
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बदकिस्मत  : वि० [फा० बंद+अ० किस्मत] बुरी किस्मतवाला फूटे भाग्यवाला अभागा।
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बदखत  : वु० [फा० बदखत] [भाव० बदखती] लिखने में जिसके अक्षर सुन्दर और स्पष्ट न होते हों।
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बदख्वाह  : वि० [फा० बदख्वाह] [भाव० बदख्वाही] १. बुराई चाहनेवाला। २. जो शुभचिंतक न हो।
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बद-गुमान  : वि० [फा०] [भाव० बद-गुमानी] जिसके मन में किसी के प्रति बुरी धारणा हो।
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बद-गुमानी  : स्त्री० [फा०] किसी के प्रति होनेवाली बुरी धारणा।
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बद-गो  : वि० [फा०] [भाव० बदगोई] १. दूसरों की निन्दा या बुराई करनेवाला। २. चुगलखोर। ३. गालियाँ बकनेवाला।
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बद-गोई  : स्त्री० [फा०] १. किसी के संबंध में बुरी बात कहना। निंदा या निदा करने की क्रिया या भाव। २. बदनामी। ३. चुंगलखोरी। ४. गाली-गलौच।
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बद-चलन  : वि० [फा०] [भाव० बद-चलनी] १. बुरे रास्ते पर चलनेवाला। २. दुश्चरित्र। ३. वेश्यागामी।
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बद-चलनी  : स्त्री० [फा०] बद-चलन होने की अवस्था या भाव।
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बद-जबान  : वि० [फा० बद-जबान] [भाव० बद-जवानी] १. अनुचित गंदी या दूषित बातें करनेवाला। २. गाली-गलौच करनेवाला।
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बदजात  : वि० [फा० बद+अ० जात] [भाव० बदजाती] अधम। नीच।
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बद-तमीज  : वि० [फा० बद+तमीज] [भाव० बदतमीजी] शिष्टाचार और सलीके का ध्यान न रखते हुए अनुचित आचरण या व्यवहार करनेवाला (व्यक्ति)।
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बद-तमीजी  : स्त्री० [फा० बदतमीजी] १. बदतमीज होने की अवस्था या भाव। २. शिष्टाचार और सलीके से रहित कोई अशोभनीय आचरण या व्यवहार।
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बदतर  : वि० [फा०] बुरे से बुरा। बहुत बुरा।
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बददिमाग  : वि० [फा०+अ,] [भाव० बद-दिमागी] १. जरा सी बात पर बुरा मान जानेवाला (व्यक्ति) २. अभिमानी। घमंडी।
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बद-दिमागी  : स्त्री० [फा०+अ०] १. जरा सी बात पर बुरा मानने की आदत। २. अहंकार।
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बद-दुआ  : स्त्री० [फा०+अ०] ऐसी अहित कामना जो शब्दों के द्वारा प्रकट की जाय। शाप। क्रि० प्र०—देना।
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बदन  : पुं० [फा०] तन। देह। शरीर। मुहावरा—बदन टूटना-शरीर की हड्डियों विशेषतः जोड़ों में पीड़ा होना। अंग-अंग में पीड़ा होना। बदन तोड़ना-पीड़ा के कारण अंगों तो तानना और खींचना। तन-बदन की सुध न रहना-(क) अचेत रहना। बेहोश रहना। (ख) इतना ध्यानस्थ रहना कि आस-पास की बातों का कुछ भी पता न चले। पुं० [सं० बदन] मुख। चेहरा। जैसे—गज-बदन। स्त्री० [हिं० बदना] कोई बात बदने की क्रिया या भाव। बदान। उदाहरण—बदन बदी थी रंग-महल की टूटी मँडैया में ल्याइ उतारयो (गीत)।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बदन-तौल  : स्त्री० [फा० बदन+हिं० तौल] मालखंभ की एक कसरत जिसमें हत्थी करते समय मालखंभ को एक हाथ से लपेटकर उसीं के सहारे सारा बदन ठहराते या तौलते हैं।
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बदन-निकाल  : पुं० [फा० बदन+हिं० निकालना] मालखंभ की एक कसर जिसमे मालखंभ के पास खड़े होकर दोनों हाथों की कैंची बाँधते हैं।
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बद-नसीब  : वि० [फा०+अ०] [भाव० बद-नसीबी] बुरे नसीबवाला। अभागा।
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बद-नसीबी  : वि० [फा०] दुर्भाग्य।
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बदना  : स० [सं०√बद्=कहना] १. कथन या वर्णन करना। कहना। २. बात करना। बोलना ३. दृढ़ता या निश्चयपूर्वक कोई बात कहना। पद—बदकर या कह-बदकर-(क) बहुत ही दृढ़ता या निश्चयपूर्वक कहकर। जैसे—वह कह-बदकर कुश्ती जीतता है। (ख) दृढ़ता पूर्वक आगे बढ़कर। ४. प्रणाम के रूप में मानना। ठीक समझना। सकारना। उदाहरण—औरहू न्हायो सु मैं न बदी, जब नेह-नदी में न दी पग—आँगुरी।—नागरीदास। ५. आपस में नियत, निश्चित या पक्का करना। ठहराना। जैसे—दोनों पहलवानों की कुश्ती बदी गयी है। उदाहरण—(क) बदन बदी थी रंग-महल की टूटी मँडैया में ल्याइ उतारयो। (ख) अवधि बदि सैयाँ अजहूँ न आवे।—गीत। ६. किसी प्रकार की प्रतिद्वन्द्विता या होड़ के संबंध में बाजी या शर्त लगाना। जैसे—तुम तो बात-बात में शर्त बदने लगते हो। ७. बड़ा या महत्व का मानना उदाहरण—हिरदय में से जाइयौ, मरद बदौंगो तोहि। ८. किसी को किसी गिनती या लेखे में समझना। ध्यान में लाना। मान्य समझना। जैसे—यह तो तुम्हे कुछ भी नहीं बदता। उदाहरण—(क) सकति सनेहु कर सुनति करीऐ मै न बदउँगा भाई।—कबीर। (ख) बदतु हम कौं नेकु नाँही मरहिं जौ पछिताहिं।—सूर। १॰. नियत या मुकर्रर करना। जैसे—किसी को अपना गवाह बदना। अ० पहले से नियत निश्चित या स्थिर होना। जैसे—जो भाग्य में बदा होगा। वही होगा।
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बदनाम  : वि० [फा०] [भाव० बदनामी] जिसका बुरा नाम फैला हो, अर्थात् कुख्यात।
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बदनामी  : स्त्री० [फा०] वह गर्हित या निन्दनीय लोक-चर्चा जो कोई अनुचित या बुरा काम करने पर समाज में विपरीत धारणा फैलने के कारण होती है। अपकीर्ति। कुख्याति। लोक-निंदा। (स्कैडल)। क्रि० प्र०—फैलना।-फैलाना।
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बदनी  : वि० [फा०] १. शारीरिक। २. शरीर से उत्पन्न। पुं० [हिं० बदना] एक तरह का शर्तनामा जिसके अनुसार किसान अपनी फसल बाजार भाव से कुछ सस्ते मूल्य पर महाजन को उससे लिए हुए ऋण के बदले में देता है।
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बद-नीयत  : वि० [फा० बद+अं० नीयत] [भाव० बदनीयती] १. जिसकी नीयत बुरी हो। जो सदाशय न हो। बुरे भाववाला। २. लोभी। लालची। ३. बेईमान।
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बदनीयती  : वि० [फा०+अं०] १. नीयत बुरी होने की अवस्था या भाव। २. लालच। ३. बेईमानी।
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बदनुमा  : वि० [फा० बद=बुरा+नुमा=दिखनेवाला] [भाव० बदनुमाई] जो देखने में कुरूप, भद्दा या भोड़ा हो।
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बद-परहेज  : वि० [फा० बद-परहेज] [भाव० बद-परहेजी] व्यक्ति जो ऐसी चीजों का भोग करता हो। जो उसके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हों और जिनसे उसे वस्तुतः परहेज करना चाहिए।
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बद-परहेजी  : स्त्री० [फा० बद-परहेजी] १. परहेज न करने की अवस्था या भाव। बीमार का खाने-पीने में परहेज न करना। २. कुरूप का भोग।
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बदफेल  : वि० [फा० बद+अ० फेल] [भाव० बद-फेली] दुष्कर्म करनेवाला। दुष्कर्मी।
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बदफेली  : स्त्री० [फा० बद+अ० फेली] १. दुष्कर्म। २. पर-स्त्री के साथ किया जानेवाला सम्भोग।
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बदबख्त  : वि० [फा० बदख्त] [भाव० बदबख्ती] अभागा।
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बदबख्ती  : स्त्री० [फा० बदबख्ती] अभागापन।
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बद-बला  : स्त्री० [फा०] चुडैल। डाइन। वि० १. चुडैल या डाइन की तरह का। २. दुष्ट। ३. उपद्रवी।
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बद-बाछ  : पुं० [फा० बद+हिं० बाछ] बेईमानी या अनुचित रूप से प्राप्त किया जानेवाला हिस्सा।
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बदबू  : स्त्री० [फा०] बुरी गन्ध या दुर्गन्ध। क्रि० प्र०—आना।—उठना।—निकलना।—फैलना।
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बदबूदार  : वि० [फा०] जिसमें से बुरी बास निकल रही हो। दुर्गन्धयुक्त।
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बद-मजगी  : स्त्री०=[फा० बदमजगी] ‘बद-मजा’ होने की अवस्था या भाव।
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बद-मजा  : वि० [फा० बदमजा] [भाव० मदमजगी] १. (वस्तु) जिसका मजा अर्था्त स्वाद बुरा हो। २. (स्थिति आदि) जिसके रंग में भंग पड़ गया हो फलतः पूरा-पूरा आनन्द न मिल रहा हो।
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बद-मस्त  : वि० [फा०] [भाव० बदमस्ती] १. मदोन्मत्त। २. कामोन्मत्त।
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बदमस्ती  : स्त्री० [फा०] १. बद-मस्त होने की अवस्था या भाव। २. नशा।
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बदमाश  : वि० [फा० बद+अ० मआश-जीविका] [भाव० बदमाशी] १. जिसकी जीविका बुरे काम से चलती हो। २. बुरे और निकृष्ट काम करनेवाला। दुर्वृत्त। ३. कुपथगामी। बदचलन। ४. गुंडा और लुच्चा।
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बदमाशी  : स्त्री० [फा० बद+अ० मआशी] १. बदमाश होने की अवस्था या भाव। २. बदमाश का कोई कार्य। ३. कोई ऐसा कार्य जो लड़ाई-झगड़ा करने अथवा किसी के अहित के उद्देश्य से जान-बूझकर किया जाय। ४. व्यभिचार।
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बद-मिजाज  : वि० [फा० बदमिजाज] [भाव० बदमिजाजी] (व्यक्ति) जो चिड़चिड़े स्वभाव का हो।
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बद-मिजाजी  : स्त्री० [फा० बद+मिजाजी] बुरा स्वभाव। चिड़चिड़ापन।
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बदरंग  : वि० [फा० ] १. बुरे रंगवाला। २. जिसका रंग उड़ गया हो या फीका पड़ गया हो। ४. विवर्ण। ४. खराब। खोटा। ५. (ताश के खेलमें वह व्यक्ति) जिसके पास किसी विशिष्ट रंग का पत्ता न हो। पं० १. बदरंगी। २. चौसर के खेल में वह गोटी जो रंग न हुई हो, अर्थात् पूगनेवाले घर में न पहुँची हो।
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बदरंगी  : स्त्री० [फा०] १. रंग का फीकापन या भद्दापन २. ताश के खेल में किसी विशिष्ट रंग के पत्ते न होने की स्थिति।
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बदर  : पुं० [सं०√बद् (स्थिर होना)+अरच्] १. बेर का पेड़ या फल। २. कपास। ३. बिनौला। क्रि० वि० [फा०] दरवाजे पर। जैसे—दर-बदर भीख माँगना। मुहावरा—(किसी को) बदर करना-=घर से निकालकर दरवाजे के बाहर कर देना। जैसे—किसी को शहर बदर करना अर्थात् इसलिए दरवाजे तक पहुँचा देना कि वह जहाँ चाहे चला जाय, परन्तु लौटकर न आये। (किसी के नाम) बदर निकालना=किसी के जिम्में रकम बाकी निकालना। किसी के हिसाब मे उसके नाम बाकी बताना।
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बदर-नवीसी  : स्त्री० [फा०] १. हिसाब-किताब की जाँच। २. हिसाब-किताब में से गड़बड़ रकमें छाँटकर निकाल अलग करना।
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बदरा  : स्त्री० [फा० बदर+टाप्] वराह क्रांति का पौधा। पुं०=बादल (मेघ)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बदराई  : स्त्री०=बदली (आकाश की मेघाच्छन्नता)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बदरामलक  : पुं० [सं० उपमि० स०] पानी आमला।
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बद-राह  : वि० [फा०] बुरे रास्ते पर चलनेवाला। कुमार्गी। २. दुष्ट। पाजी।
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बदरि  : पुं० [सं०√बद् (स्थिर होना)+अरि, बा०] १. बेर का पेड़। उक्त पेड़ का फल।
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बदरिका  : स्त्री० [सं० बदरी+कन्+टाप्, ह्रस्व] १. बेर का पेड़ और उसका फल। बदरि। २. गंगा का उद्गम स्थान तथा उसके आस-पास का क्षेत्र।
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बदरिकाश्रम  : पुं० [सं० बदरिका-आश्रम, मध्य० स०] उत्तर प्रदेश के गढ़वाल जिले के अन्तर्गत एक प्रसिद्ध तीर्थ-स्थल जहाँ किसी समय नर-नारायण ऋषियों ने तपस्या की थी।
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बदरी  : स्त्री० [सं० बदर+ङीष्] बेर का पेड़ और उसका फल। बदरि। स्त्री०=बदली। स्त्री० [देश] १. थैली। २. बोझ। ३. माल का बाहर भेजा जाना। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बदरीच्छद  : पुं० [सं० ब० स०] एक तरह का गंध द्रव्य।
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बदरी-नाथ  : पुं० [सं० ष० त०] १. बदरिकाश्रम नाम का तीर्थ। २. उक्त तीर्थ के देवता या उनकी मूर्ति।
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बदरी-नारायण  : पुं० [सं० ष० त०] बदरी-नाथ।
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बदरी-पत्रक  : पुं० [सं० ब० स०+कन्] एक प्रकार का सुगन्ध द्रव्य। नखरी।
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बदरीफला  : स्त्री० [सं० ब० स०] नील शेफालिका का वृक्ष और उसका फल।
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बदरीबण  : पुं०=बदरीवन।
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बदरी-वन  : पुं० [सं० ष० त०] १. वह स्थान जहां बेर के बहुत से फेड़ हैं। २. बदरिकाश्रम।
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बदरुन  : पुं० [?] पत्थर या लकड़ी में की जानेवाली एक प्रकार की जालीदार नक्काशी जिसमें बहुत से कोने होते हैं।
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बदरोब  : वि० [फा०+अ०] [भाव० बदरोबी] १. जिसका रोब होना तो चाहिए, फिर भी कुछ रोब न हो २. तुच्छ। ३. भद्दा।
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बदरौंह  : वि० [फा० बदरी] बदचलन। बदराह। पुं० [हिं० बादल] आकाश में छाये हुए हलके बादल।
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बदरौनक  : वि० [फा० बदरौनक़] १. जिसमें कोई शोभा न हो। श्री-हीन। २. उजाड़।
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बदल  : पुं० [अ०] १. बदलने की क्रिया या या भाव। २. बदले में दी हुई वस्तु। ३. पलटा। प्रतिकार। ४. क्षतिपूर्ति। पुं० [हिं० बदलना] बदले हुए होने की अवस्था या भाव।
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बद-लगाम  : वि० [फा०] जिसके मुँह में लगाम न हो, अर्थात् जिसे भला-बुरा कहने में संकोच न हो। मुँहजोर। मुँहफट।
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बदलना  : अ० [अ० बदल-परिवर्तन+ना (प्रत्यय)] १. किसी चीज या बात का अपना पुराना रूप छोड़कर नया रूप धारण करना। एक दशा या रूप से दूसरी दशा या रूप में आना या होना। जैसे—ऋतु बदलना, रंग बदलना, स्वभाव बदलना। २. किसी चीज, बात या व्यक्ति का स्थान किसी दूसरी चीज बात या व्यक्ति को प्राप्त होना। जैसे—(क) इस महीने कई गाड़ियों का समय बदल गया है। (ख) जिले से कई अधिकारी बदल गये हैं। (ग) कल सभा में हमारा छाता (या जूता) किसी से बदल गया था। ३. आकार-प्रकार गुण-धर्म रूप-रंग आदि के विचार से और अथवा पहले से बिलकुल भिन्न हो जाना। जैसे—(क) इतने दिनों तक पहाड़ पर (याविदेश में) रहने से उसकी शक्ल ही बिलकुल बदल गयी है। संयो० क्रि०—जाना। स० १. जो कुछ पहले से हो या चला आ रहा हो उसे हटाकर उसके स्थान पर कुछ और करना, रखना या लाना। जैसे—(क) कपड़े बदलना अर्थात् पुराने या मैले कपड़े उतारकर नये तथा साफ कपड़े पहनना। २. जो कुछ पहले से हो, उसे छोड़कर उसके स्थान पर दूसरा ग्रहण करना। जैसे—(क) उन्होंने अपना पहले वाला मकान बदल दिया है। (ख) रास्ते में दो जगह गाड़ी बदलनी पड़ती है। ३. अपनी कोई चीज किसी को देकर उसके स्थान पर उससे दूसरी चीज लेना० विनिमय करना। जैसे—हमने दुकानदार से अपनी कलम (या किताब) बदल ली थी। संयो० क्रि० -डालना।—देना।—लेना। ४. किसी के आकार-विकार गुण-धर्म रंग-रूप आदि में कोई तात्त्विक या महत्त्वपूर्ण परिवर्तन करना। जैसे—(क) उन्होंने मकान की मरम्मत क्या करायी है, उसकी शक्ल ही बिलकुल बदल दी है। (ख) विद्रोहियों ने एक ही दिन में देश का सारा सासन बदल दिया। संयो० क्रि०—डालना।—देना।
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बदलवाना  : स० [हिं० बदलना का प्रे०] बदलने की काम दूसरे से कराना।
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बदला  : पुं० [अ० बदल, हिं० बदलना] १. बदलने की क्रिया, भाव या व्यापार। २. वह अवस्था जिसमें एक चीज देकर उसके स्थान पर दूसरी चीज ली जाती है। आदान-प्रदान। विनिमय। जैसे—किसी की घड़ी (या छड़ी) से अपनी घड़ी (या छड़ी) का बदला करना। ३. किसी की कोई क्षति या हानि हो जाने पर उसकी पूर्ति के लिए दिया जानेवाला धन या कोई चीज। क्षति-पूर्ति। जैसे—यदि आपकी पुस्तक मुझसे खो जायगी, तो मै उसका बदला आपकों दे दूँगा। पद—बदले या बदले में-रिक्त स्थान की पूर्ति के लिए। किसी के स्थान पर। जैसे—हमारी जो कलम उनसे टूट गयी थी, उसके बदले (या बदले में) उन्होंने यह नयी कलम भेज दी है। ४. किसी ने जैसा व्यवहार किया हो, उसके साथ किया जानेवाला वैसा ही व्यवहार। प्रतिकार। पलटा। जैसे—सज्जन पुरुष बुराई का बदला भी भलाई से ही देते हैं। ५. जिसने जैसी हानि पहुँचायी हो उसे भी अपने संतोषार्थ वैसी ही हानि पहुँचाने की भावना, अथवा पहुंचायी जानेवाली वैसी ही हानि। मुहावरा—(किसी से) बदला चुकाना या लेना=जिसने जैसी हानि पहुँचायी हो उसे भी वैसी ही हानि पहुँचाना। अपने मनस्तोष के लिए किसी के साथ वैसा ही बुरा व्यवहार करना जैसा पहले उसने किया हो। जैसे—भले ही आज उन्होने मुझ पर झूठा अबियोग लगाया हो पर मैं भी किसी दीन उनसे इसका बदला लेकर रहूँगा। ६. किसी काम या बात से प्राप्त होनेवाला प्रतिफल। किसी काम या बात का वह परिमाण जो प्राप्त हो या भोगना पड़े। जैसे—तुम्हें भी किसी न किसी दिन इसका बदला मिलकर रहेगा क्रि० प्र०—देना।—पाना।—मिलना। ७. कोई धन या और कोई चीज जो किसी को कोई काम करने पर उसे प्रसन्न या संतुष्ट करने के लिए दिया जाय। एवज। मुआवजा। जैसे—उनकी सेवाओं का बदला यह सामान्य पुरस्कार नहीं हो सकता।
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बदलाई  : स्त्री० [हिं० बदलना+आई (प्रत्यय)] १. बदलने की क्रिया या भाव। अदल-बदल। विनिमय। २. बदले में ली या दी जानेवाली चीज। ३. बदलने के लिए बदले में दिया जानेवाला धन। ४. अपकार, हानि आदि करने पर किसी की की जानेवाली क्षति-पूर्ति।
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बदलाना  : स०=बदलवाना। अ०=बदलना (बदला जाना)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बदली  : स्त्री० [अ० बदल+ई (प्रत्यय)] १. बदले हुए होने की अवस्था या भाव। २. किसी सेवा के कर्मचारी को एक स्थान से हटाकर दूसरे स्थान पर भेजा जाना। तबादला। स्थानांतरण (ट्रान्सफर) स्त्री० [हिं० बादल] १. छोटा बादल। २. आकाश में बादलों के छाये हुए होने की अवस्था या भाव। स्त्री०=बदरी (बेर का फल) उदाहरण—भली विधि हो बदली मुख लावै।—केशव। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बदलौअल  : स्त्री० [हिं० बदलना] १. अदल-बदल करने की क्रिया या भाव। २. बदले जाने की अवस्था या भाव।
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बदलौवल  : स्त्री०=बदलौअल।
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बद-शकल  : वि० [फा० बदशकल] [भाव० बदशकली] बुरी और भद्दी शक्ल-सूरत का। कुरूप। बेडौल।
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बदशऊर  : वि० [फा० बद+अं० शऊर] [भाव० बदशऊरी] १. जो ठीक ढंग से तथा शिष्टतापूर्वक कोई काम करना न जानता हो। २. बदतमीज। ३. मूर्ख।
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बदशुगन  : वि० [फा०] १. अशुभ। २. मनहूस।
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बदशगूनी  : स्त्री० [फा०] शगुन का खराब होना।
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बदसलीका  : वि० [फा०+अ० सलीकः] १. बदशुऊर। २. बदतमीज।
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बदसलूकी  : स्त्री०, [फा० बद+अ० सलूक] बुरा व्यवहार। अशिष्ट व्यवहार।
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बदसूरत  : वि० [फा० बद+अ० सूरत] [भाव० बदसूरती] भद्दी सूरतवाला। कुरूप। बेडौल।
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बदसूरती  : स्त्री० [फा० बद+अं० सूरती] बद-सूरत होने की अवस्था या भाव।
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ब-दस्त  : अव्य० [फा०] किसी के हाथ से या द्वारा। मारफत। हस्ते।
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बदस्तूर  : अव्य० [फा०] १. जिस प्रकार से पहले से होता आया हो। उसी प्रकार। २. जिस रूप में पहले रहा हो, उसी रूप में। बिना किसी परिवर्तन या हेर-फेर के। यथापूर्व। यथावत।
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बदहज़मी  : स्त्री० [फा० बद+अ० हज़्मी] १. खायी हुई चीज हजम न होने की अवस्था या भाव। अजीर्ण। अपच। २. वह स्थिति जिसमें कोई चीज या बात ठीक तरह से नियंत्रित न रखी जा सके, और अनावश्यक रूप में प्रदर्शित की जाय। जैसे—अक्ल या दौलत की बद-हज्मी।
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बदहवास  : वि० [फा०+अय] [भाव० बद-हवासी] १. जिसके होश-हवास ठिकाने न हों। बौखलाया हुआ। २. उद्दिग्न। विकल। ३. अचेत। बेहोश।
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बद-हाल  : वि० [फा०+अ०] [भाव० बदहाली०] १. दुर्दशाग्रस्त। रोग से आक्रांत और पीड़ित। ३. कंगाल।
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बदान  : स्त्री० [हिं० बदना+आन (प्रत्यय)] १. बदने की क्रिया या भाव। २. बाजी या शर्त का बदा जाना। अव्य० १. शर्त से बाजी लगाकर। २. दृढ़तापूर्वक प्रतिज्ञा करते हुए।
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बदा-बदी  : स्त्री० [हिं० बदना] १. ऐसी स्थिति जिसमें दोनों पक्ष एक दूसरे से आगे निकलकर अथवा एक-दूसरे को नीचा दिखाना चाहते हों। २. दे० ‘बदान’। क्रि० वि० कह-कहकर। उदाहरण—बदा-बदी ज्यों खेलत हैं ए बदरा बदराह।—बिहारी।
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बदाम  : पुं०=बादाम।
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बदामा  : वि० [फा०] बादाम के आकार-प्रकार का। अंडाकार। (ओवल)।
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बदामी  : पुं० [हिं० बादाम] कौड़ियाले की जाति का एक प्रकार का पक्षी। वि० बादाम के रंग का। बादामी।
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बदि  : स्त्री० [सं० वर्त्त-पलटा] किसी काम या बात का बदला चुकाने के लिए किया जानेवाला काम या बात। बदला। अव्य० १. किसी काम या बात के पलटे या बदले में। २. किसी की खातिर में० ३. लिए। वास्ते। स्त्री०=बदी (कृष्ण पक्ष)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बदी  : स्त्री० [सं० बहुल में का ब+दिवस में का दि-बदि०] चांद्र मास का कृष्ण पक्ष। अँधेरा पाख। सुदी का विपर्याय। जैसे—भादों बदीअष्टमी। स्त्री० [फा०] १. बद अर्थात् बुरे होने की अवस्था या भाव। खराबी। बुराई। पद—नेकी-बदी=(क) उपकार और अपकार। भलाई और बुराई। (ख) घर-गृहस्थी में होनेवाले शुभ और अशुभ काम या घटनाएँ। (विवाह, मृत्यु आदि) जैसे—वह नेकी-बदी में सबका साथ देते (या सबके यहाँ आते-जाते) हैं। २. किसी का किया जानेवाला अपकार या अहित। जैसे—उन्होंने तुम्हारे साथ कोई बदी तो नहीं की थी। ३. किसी की अनुपस्थिति में की जानेवाली उसकी निंदा।
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बदीत  : वि० [सं० विदित] प्रसिद्ध। मशहूर। उदाहरण—जगत बदीत करी मन—मोहना।—मीराँ।
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बदूख  : स्त्री०=बंदूख। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बदूर (ल)  : पुं०=बादल। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बदे  : अव्य० [हिं० बद-पक्ष०] वास्ते। लिए। खातिर (पूरब)। उदाहरण—भेंवल छयल या दूध में खाजा तोरे बदे।—तेगअली। पुं० वह मूल्य जिसमें दलाली की रकम भी सम्मिलित हो। (दलाल)।
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बदौलत  : अव्य० [फा० ब+अ० दौलत] १. कृपापूर्ण अवलम्ब या सहारे से। जैसे—उन्हें यह नौकरी आपकी ही बदौलत मिली थी। २. कारण या वजह से।
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बद्दर  : पुं०=बादल। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बद्दल  : पुं०=बादल। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बद्दू  : पुं० [अ० बद्दू] अरब की एक असभ्य खानाबदोश जाति। वि० [फा० बद]=बदनाम।
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बद्ध  : वि० [सं०√बंध्+क्त] १. जो बाँधा हो या बाँधा गया हो। जकड़ा या बंधन मे पड़ा हुआ। २. जो किसी प्रकार के घेरे में हो। जैसे—सीमा युद्ध। ३. जिस पर कोई प्रतिबंध या रुकावट लगी हो। जैसे—नियमबद्ध, प्रतिज्ञा बद्ध। ४. जो किसी प्रकार निर्धारित या निश्चित किया गया हो। जैसे—आज्ञा-बद्ध। ५. अच्छी तरह जमाया या बैठा हुआ। स्थित। जैसे—पंक्ति बद्ध। ७. किसी के साथ जुड़ा लगा या सटा हुआ। जैसे—कर-बद्ध। ८. कुछ वशिष्ट नियमों के अनुसार किसी निश्चित और विशिष्ट रूप में लाया या रचा हुआ। जैसे—छंदोबद्ध, भाषा-बद्ध। ९. उलझा या फँसा हुआ। जैसे—प्रेम-बद्ध, मोह-बद्ध। १॰. जिसकी गति, मार्ग या प्रवाह रुका हुआ हो। जसे-कोष्ठ-बद्ध। ११. धार्मिक क्षेत्र में जो सासारिक बंधन या मोह-माया में पड़ा हो। मुक्त का विपर्याय।
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बद्धक  : वि० [सं० बद्ध+कन्] जो बाँध या पकड़कर मँगाया गया हो। पुं० बँधुआ कैदी।
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बद्ध-कक्ष  : वि० [सं० ब० स०] बद्ध परिकर। तैयार। प्रस्तुत।
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बद्धकोष्ठ  : पुं० [सं० ब० स०] पाखाना कम या न होने का रोग। कब्ज। कब्जियत। वि० जिसे उक्त रोग हो। कब्ज से पीड़ित।
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बद्ध-कोष्ठता  : स्त्री० [सं० बद्ध-कोष्ठ+तल्० टाप्] वह स्थिति जिसमें पाखाना कम या न होता हो। कब्जियत।
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बद्ध-गुद  : पुं० [सं० ब० स०] आँतों में मल अवरुद्ध होने का रोग।
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बद्ध-गुदोदर  : पुं० [सं० ब० स०] पेट का एक रोग जिसमें हृदय और नाभि के बीच में पेट कुछ बढ़ जाता है और जिसके फलस्वरूप मल रुक-रुककर और थोड़ा-थोड़ा निकलता है।
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बद्ध-ग्रह  : वि० [सं० ब० स०] हठी।
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बद्ध-चित्त  : वि० [सं० ब० स०] जिसका मन किसी वस्तु या विशय पर जमा हो। एकाग्र।
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बद्ध-जिह्व  : वि० [सं० ब० स०] जो चुप्पी साधे हो। मौन।
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बद्ध-दृष्टि  : वि० [सं० ब० स०] जिसकी दृष्टि किसी पर जमी या लगी हो।
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बद्ध-परिकर  : वि० [सं० ब० स०] जो कमर बाँधे हुए कोई काम करने के लिए तैयार हो। उद्यत तत्पर।
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बद्ध-प्रतिज्ञ  : वि० [सं० ब० स०] प्रतिज्ञा से बँधा हुआ। वचन-बद्ध।
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बद्ध-फल  : पुं० [सं० ब० स०] करंज।
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बद्ध-भूमि  : स्त्री० [सं० कर्म० स०] १. मकान बनाने के लिए ठीक की हुई भूमि। २. मकान का पक्का फर्श।
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बद्ध-मुष्टि  : वि० [सं० ब० स०] १. जिसकी मुट्ठी बँधी रहती हो; अर्थात् जो निर्धनों को भिक्षा ब्राह्मणों को दान आदि न देता हो। २. बहुत कम खर्च करनेवाला। कंजूस।
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बद्ध-मूल  : वि० [सं० ब० स०] १. जिसने जड़ पकड़ ली हो। २. जो मलूतः दृढ़ और अटल हो गया हो।
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बद्ध-मौन  : वि० [सं० ब० स०] चुप्प। मौन।
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बद्ध-रसाल  : पुं० [सं० कर्म० स०] एक प्रकार का बढ़िया आम।
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बद्ध-राग  : वि० [सं० ब० स०] किसी प्रकार के राग या प्रेम में बँधा हुआ। अनुरक्त।
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बद्ध-वर्चस  : वि० [सं० ब० स०] मल-रोदक। कब्जियत कनरेवाला।
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बद्ध-वाक्  : वि० [सं० ब० स०] वचन-बद्ध।
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बद्ध-वैर  : वि० [सं० ब० स०] जिसके मन में किसी के प्रति पक्का वैर हो।
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बद्ध-शिख  : वि० [सं० ब० स०] १. जिसकी शिखा या चोटी बँधी हुई हो। २. अल्पवयस्क। पुं० छोटा बच्चा। शिशु।
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बद्ध-शिखा  : स्त्री० [सं० बद्ध-शिख+टाप्] भूम्यामलकी।
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बद्ध-सूतक  : पुं० [सं० कर्म० स०] रसेश्वर दर्शन के अनुसार पारा जो अक्षत, लघुद्रावी तेजोविशिष्ट निर्मल और गुरु कहा गया है।
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बद्ध-स्नेह  : वि० [सं० ब० स०] किसी के स्नेह में बँधा हुआ। अनुरक्त। आसक्त।
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बद्धांजलि  : वि० [सं० बद्-आजलि, ब० स०] सम्मान प्रदर्शन के लिए जिसने हाथ जोड़े हों। कर-बद्ध।
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बद्धानुराग  : वि० [सं० बद्ध-अनुराग, ब० स०] आसक्त।
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बद्धी  : स्त्री० [सं० बद्ध+हिं० ई (प्रत्यय)] १. वह जिससे कुछ कसा या बाँधा जाय। जैसे—डोरी, तस्मा, फीता आदि। २. माला या सिकड़ी के आकार का चार लड़ों का एक गहना जिसकी दो लड़ तो गले में होती है और दो लड़ दोनों कंधों पर जनेऊ की तरह बाँहों के नीचे होती हुई छाती और पीठ तक लटकी रहती है। ३. किसी लम्बी चीज की चोट से शरीर पर पड़नेवाला लम्बा चिन्ह या निशान। साँट जैसे—बेंत की मार से शरीर पर बद्धियाँ पड़ना। क्रि० प्र०—पड़ना।
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बद्दोदर  : पुं० [सं० बद्ध-उदर, ब० स०] बद्ध-गुदोदर रोग। बद्ध-कोष्ठ।
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बध  : पुं०=वध। स्त्री० बढ़ती (अधिकता)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बधइया  : स्त्री०=बधाई। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बध-गराड़ी  : स्त्री० [बिं० बाध+गराड़ी] रस्सी बटने का एक उपकरण।
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बधना  : स० [सं० बधू+हिं० ना (प्रत्यय)] वध या हत्या करना। मार डालना। पुं० [सं० वर्द्धन] मुसलमानों का एक तरह का टोंटीदार लोटा। पुं० [देश०] लाख की चूड़ियाँ बनानेवालों का एक औजार।
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बध-भूमि  : स्त्री० [सं० बध-भूमि] १. वध करने का नियत स्थान। २. वह स्थान जहाँ अपराधियों को प्राण-दण्ड दिया जाता हो।
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बधवा  : पुं० १.=-बधावा। २. दे० ‘बधाई’। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बधाई  : स्त्री० [सं० बर्द्धन, पं० बधना-बढ़ना] १. बढ़ने की अवस्था, क्रिया या भाव। बढ़ती। वृद्धि। २. किसी की उन्नति या भाग्योदय होने अथवा किसी के यहाँ कोई मांगलिक अथवा शुभ कार्य होने पर प्रसन्नतापूर्वक उसका किया जानेवाला अभिनन्दन और उसके प्रति प्रकट की जानेवाली शुभ-कामना। यह कहना कि हम आपके अमुक अच्छे काम या बात से बहुत अधिक प्रसन्न हुए हैं, और आपकी इसी प्रकार की उन्नति या वृद्धि की हार्दिक कामना करते हैं। मुबारकबाद। (कांग्रेचुलेशंस) जैसे—किसी के यहाँ पुत्र का जन्म या विवाह होने पर या किसी के प्रतिष्ठित पद पर पहुँचने अथवा कोई बहुत बड़ा काम करने या सफल-मनोरथ होने पर उसे बधाई देना। क्रि० प्र०—देना।—मिलना। ३. घर में पुत्र-जन्म, विवाह आदि शुभ कृत्यों के अवसर पर होनेवाला आनंद-मंगल या उसके उपलक्ष्य में होनेवाला उत्सव। ४. उक्त अवसरों पर होनेवाला नृत्य, गीत आदि। ५. वह उपहार या धन जो उक्त प्रकार के आनन्दमय अवसरों पर अपने आश्रितों, छोटों या निकटस्थ संबंधियों को अपनी प्रसन्नता के प्रतीक के रूप में दिया या बाँटा जाता है। जैसे—उन्होंने अपने संबंधियों को दो-दो रुपए बधाई के दिये हैं। क्रि० प्र०—देना।—बाँटना।
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बधाऊ  : पुं० १.=बधाई। २.=बधावा। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बधाना  : स० [हिं० बधना का प्रे०] बधने या हत्या करने का काम दूसरे से कराना। [हिं० बधिया] (बैल आदि का) बधिया किया जाना। स०=बढ़ाना। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बधाया  : पुं० [हिं० बधाई] १. बधाई। २. बधावा।
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बधावड़ा  : पुं०=बधावा। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बधावना  : स०=बधाना। पं० दे० ‘बधाई’। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बधावा  : पुं० [हिं० बधाई] १. बधाई। २. शुभ अवसर पर होनेवाला आनन्दोत्सव या गाना-बजाना। क्रि० प्र०—बजना। ३. वह उपहार या भेंट जो गाजे-बाजे के साथ कुछ वशिष्ट मांगलिक अवसरों पर संबधियों के यहाँ भेजी जाती है। ४. इस प्रकार उपहार ले जानेवाले लोग।
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बधिक  : पुं० [सं० घातक] १. बध करने या मार डालनेवाला। हत्यारा। २. वह जो अपराधियों के प्राण लेता हो। फाँसी देने या सिर काटनेवाला। जल्लाद। ३. व्याध। बहेलिया।
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बधिया  : वि० [हिं० बध-मारना] (वह बैल या कोई नर-पशु) जिसका अंडकोश कुचल या निकाल दिया गया हो और फलतः उसे षंड कर दिया गया हो। नपुंसक किया हुआ चौपाया खस्सी। आख्ता। आडूँ का विपर्याय। पुं० उक्त प्रकार का बैल जिस पर प्रायः बोझ लादकर ले जाते हैं। मुहावरा—बधिया बैठना-इतना घाटा होना कि कारबार बन्द हो जाय। पुं० [?] एक प्रकार का गन्ना। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बधियाना  : स० [हिं० बधिया] कुछ विशिष्ट नर-पशुओं का शल्य से अंडकोश निकालकर उन्हें बधिया करना। बधिया बनाना।
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बधिर  : पुं० [सं०√बन्ध् (बाँधना)+किरच्, न-लोप] [भाव० बधिरता] जिसमें सुनने की शक्ति न हो या न रह गयी हो। बहरा।
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बधिरता  : स्त्री० [सं० बधिर+तल्,+टाप्] श्रवण-शक्ति का अभाव। बहरापन। बधिर होने की अवस्था या भाव।
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बधिरित  : भू० कृ० [सं० बधिर+क्विप्+इमानिच्] बधिरता। बहरापन।
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बधू  : स्त्री० [सं०√बन्ध् (बाँधना)+ऊ, न-लोप] -बधू।
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बधूक  : पुं०=बगूला (बवंडर)।
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बधैया  : स्त्री०=बधाई।
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बध्य  : वि० [सं० वध्य] १. जिसे वध किया जा सके या जो वध किये जाने को हो। २. वध किये या मारे जाने के योग्य।
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बन  : पुं० [सं० वन०] १. वह पर्वतीय या मैदानी क्षेत्र जिसमें न तो मनुष्य रहते हों और न जिसमें खेती-बारी होती हो, बल्कि जिसमें प्रकृति-प्रदत्त पेड़-पौधों तथा जंगली जानवरों की बहुलता हो। जंगल। कानन। पद—बन की धातु-गेरू नामक लाल मिट्टी। २. समूह। ३. जल। पानी। ४. उपवन। बगीचा। ५. निराने या नींदने की मजदूरी। निरौनी। निंदाई। ६. वह अन्न जो किसान लोग मजदूरों को खेत काटने की मजदूरी के रूप में देते हैं। ७. कपास का पौधा। उदाहरण—सनु सूक्यौ पीतौ बनौ ऊखौ लई उखारि।—बिहारी। ८. वह भेंट जो किसान लोग अपने जमींदार को किसी उत्सव के उपलक्ष्य में देते हैं। शादियाना। ९. दे० वन। पुं०=बंद। स्त्री० [हिं० बनाना] १. सज-धज। बनावट। २. बाना। भेस।
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बन-आलू  : पुं० [हिं० बन+आलू] जमींकंद की जाति का एक कंद। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बनउर  : पुं० १.=बिनौला। २.=ओला। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बन-कंडा  : पुं० [हिं० बन+कंडा] वह कंडा या गोहरी जो पाथकर न बनायी गयी हो बल्कि जंगल मे गाय भैस आदि के गोबर के सूख जाने पर आप से आप बनी हो।
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बनक  : स्त्री० [सं० वन+क (प्रत्यय)] वन की उपज। जंगल की पैदावार। जैसे—गोंद, लकड़ी शहद आदि। स्त्री० [?] एक प्रकार का साटन। स्त्री०=बानक। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बन-ककड़ी  : स्त्री० [सं० वन-कर्कटी] एक पौधा जिसका गोंद दवा के काम आता है।
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बनकटी  : स्त्री० [हिं० वन (जंगल)+काटना] १. जंगल काटकर उसे आबादी करने, खेती-बारी अथवा रहने के योग्य बनाने का हक। २. एक प्रकार का पहाडी बाँस जिससे टोकरे बनाये जाते हैं।
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बनकर  : पुं० [सं० बनकर] १. शत्रु के चलाये हुए हथियार को निष्फल करने की एक युक्ति। २. सूर्य। (डिं०)। पुं० [स० वन+कर] वह कर जो जंगल में होनेवाली वस्तुओं के क्रय-विक्रय पर लगता है।
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बन-कल्ला  : पुं० [हिं० बन+कल्ला] एक प्रकार का जंगली पेड़।
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बन-कस  : पुं० [हिं० वन+कुश] एक प्रकार की घास जिसे वनकुस, बँभनी, मोप और बाभर भी कहते हैं। इससे रस्सियाँ बनायी जाती है।
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बनकोरा  : पुं० [देश] लोनिया का साग। लोनी।
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बनखंड  : पुं० [स० वनखंड] १. वन का कोई खण्ड या भाग। २. वन्य प्रदेश।
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बनखंडी  : स्त्री० [हिं० वन+खंडा=टुकड़ा] १. वन का कोई खंड या भाग। २. छोटा जंगल या वन। वि० वन या जंगल में रहने या होनेवाला।
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बनखरा  : पुं० [हिं० वन+खरा०] वह भूमि जिसमें पिछली फसल में कपास बोयी गयी हो।
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बनखोर  : पुं० [देश] कौंर नामक वृक्ष।
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बनगाव  : पुं० [हिं० वन+फा० गाव=हिं० गौ०] १. एक प्रकार का बड़ा हिरन जिसे रोझ भी कहते हैं। २. एक प्रकार का जंगली तेंदू (वृक्ष)।
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बनगोभी  : स्त्री० [हिं० बन+गोभी] एक तरह की जंगली घास।
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बनचर  : पुं० [स० वनचर] १. जंगल में रहनेवाला पशु। वन्य पशु। २. वन या जंगल में रहनेवाला आदमी। जंगली मनुष्य। ३. जल में रहनेवाले जीव-जन्तु। वि० वन में रहनेवाला।
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बनचरी  : स्त्री० [देश] एक प्रकार की जंगली घास जिसकी पत्तियाँ ज्वार की पत्तियों की तरह होती है। बरो। पुं०=बनचर। वि० बनचर का। बनचर संबंधी। जैसे—बनचरी रंग ढंग।
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बनचारी  : वि० [सं० बनचारिन्] वन में घूमने-फिरने या रहनेवाला। पुं० १. वन में रहनेवाले पशु, मनुष्य आदि। २. जल में रहनेवाले जीव-जन्तु। जलचर।
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बनचौर  : स्त्री० [स० बन+चमरी] पर्वतीय प्रदेशों में होनेवाली एक तरह की गाय जिसकी पूँछ की चँबर बनायी जाती है। सुरागाय।
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बनचौरी  : स्त्री०=बनचौर।
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बनज  : पुं० [स० वनज०] जंगल में होने या रहनेवाला जीव। वि० दे० ‘वनज’। पुं०=वाणिज्य। (व्यापार)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बनजना  : सं० [हिं० बनज] १. व्यापार करना। २. किसी के साथ किसी तरह की बात-चीत या लेन-देन निश्चित करना। जैसे—किसी की लड़की के साथ अपना लड़का बनजना (अर्थात् ब्याह पक्का करना)। स० १. व्यापार करने के लिए कोई चीज खरीदना। २. किसी को इस प्रकार वश में करना कि मानो उसे मोल ले लिया गया हो। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है) (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बनजर  : स्त्री०=बंजर।
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बनजरिया  : स्त्री० [हि० बन+जारना=जलाना] भूमि का वह टुकड़ा जो जंगल को जला या काटकर खेती-बारी के लिए उपयुक्त बनाया गया हो।
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बनजात  : पुं० [सं० वनजात०] कमल।
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बनजारा  : पुं० [हि० वनिक+हारा] १. वह व्यक्ति जो बैलों पर अन्न लादकर बेचने के लिए एक देश से दूसरे देश को जाता है। टाँडा लादनेवाला। व्यक्ति। टँडैया। बंजारा। २. व्यापारी। सौदागर।
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बनजी  : पुं० [सं० वाणिज्य] १. व्यापार या रोजगार करनेवाला। सौदागर। २. वाणिज्य। व्यापार।
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बनज्योत्स्ना  : स्त्री० [सं० वनज्योत्स्ना] माधवी लता।
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बनड़ा  : पुं० [?] बिलावन राग का एक भेद। यह झूमड़ा ताल पर गाया जाता है। पुं० [हिं० बना=दूल्हा] विवाह के समय वर-पक्ष में गाया जानेवाला एक प्रकार का गीत।
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बनड़ा-जैत  : पुं० [हिं० बनड़ा+सं० जयत] एक शालक राग जो रूपक ताल पर गाया जाता है।
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बनड़ा-देवगरी  : पुं० [हिं० बनड़ा+सं० देवगिरि] एक शालकराग जो एकताले पर गाया जाता है।
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बनत  : स्त्री० [हिं० बनना+त (प्रत्यय)] १. किसी चीज के बनने या बनाये जाने का ढंग, प्रक्रिया या भाव। २. किसी चीज की बनावट या रचना का विशिष्ट ढंग या प्रकार। अभिकल। भांत। (डिजाइन)। ३. पारस्परिक अनुकूलता या सामंजस्य। मेल। ४. गोटे-पट्टे की तरह की एक प्रकार की पतली पट्टी। बाँकड़ी।
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बनताई  : स्त्री० [हिं० बन+ताई (प्रत्यय)] १. वन या जंगल की सघनता। २. वन की भयंकरता। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बनतुरई  : स्त्री० [हि० वन+तुरई] बंदाल।
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बन-तुलसी  : स्त्री० [हिं० बन+तुलसी] बर्बर नाम का पौधा जिसकी पत्ती और मंजरी तुलसी की सी होती है। बर्बरी।
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बनद  : पुं० [सं० वनद] बादल। मेघ। वि० जल देनेवाला। जलद।
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बनदाम  : स्त्री० [सं० वनदाम] वन माला।
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बनदेवी  : स्त्री० [सं० वनदेवी] किसी वन की अधिष्ठात्री देवी।
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बनधातु  : स्त्री० [सं० बनधातु] गेरु या और कोई रंगीन मिट्टी।
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बनना  : अ० [सं० वर्णन; प्रा० वष्णन=चित्रित होना, रचा जाना] १. अनेक प्रकार के उपकरणों तत्त्वों आदि के योग से कोई नयी चीज तैयार होना अथवा किसी नये आकार या रूप में प्रस्तुत होकर असित्व में आना। जैसे—कल-कारखानों में कागज, चीनी या धातुओं की चीजें बनाना। पद—बना-बनाया=(क जो पहले से बनकर ठीक या तैयार हो। जैसे—बना-बनाया कुरता मिल गया। (ख) जिसमें पहले से ही पूर्णता हो, कोई कोर-कसर न हो। उदाहरण—मैं याचक बना-बनाया था।—मैथिलीशरण। मुहावरा—(किसी का) बना रहना-संसार में कुशलतापूर्वक जीवित रहना। जैसे—ईश्वर करे यह बालक बना रहे। (किसी का किसी स्थान पर) बना रहना=उपस्थित या वर्तमान रहना। जैसे—आप जब तक चाहें यहाँ बने रहें। २. किसी पदार्थ का ऐसे रूप में आना जिसमें वह व्यवहार में आ सके। काम मे आने के योग्य होना। जैसे—दाव या भोजन बनना। ३. किसी प्रकार के रूप परिवर्तन के द्वारा एक चीज से दूसरी नयी चीज तैयार होना। जैसे—चीनी से शरबत बनना, रूई से डोरा या सूत बनना। ४. उक्त के आधार पर पारस्परिक व्यवहार में किसी के साथ पहलेवाले भाव या संबंध के स्थान पर कोई दूसरा नया भाव या संबंध स्थापित होना। जैसे—(क) मित्र का शत्रु अथवा शत्रु का मित्र बनना। (ख) किसी का दत्तक पुत्र या मुँह-बोला भाई बनना। ५. आविष्कार आदि के द्वारा प्रस्तुत होकर सामने आना। जैसे—अब तो नित्य सैकड़ों तरह के नये-नये यंत्र बनने लगे हैं। ६. पहले की तुलना में अधिक अच्छी उन्नत या संतोषजनक अवस्था या दशा में आना या पहुँचना। जैसे—वे तो हमारे देखते-देखते बने हैं। पद—बनकर-अच्छी तरह से पूर्ण रूप से। भली-भाँति। उदाहरण—मनमोहन से बिछुरे इतही बनि कै न अबै दिन द्वै गये हैं।—पद्याकर। बनठनकर=खूब-बनाव सिंगार या सजावट करके। जैसे—आज-कल तो वह खूब बन-ठनकर घर से निकलते हैं। ७. किसी विशिष्ट प्रकारका अवसर योग या स्थिति प्राप्त होना। मुहावरा—बन आना=अच्छा अवसर योग या स्थिति होना। जैसे—उन लोगों के लड़ाई-झगड़े में तुम्हारी खूब बन आयी है। प्राणों पर आ बनना=ऐसी स्थिति आ पहुँचना कि प्राण जाने का भय हो। जान जाने तक की नौबत आना। जैसे—तुम्हारें अत्याचारों (या दुर्व्यवहारों) से तो मेरे प्राण पर आ बनी है। (किसी का) कुछ बन बैठना=वास्तविक अधिकार गुण योग्यता आदि का अभाव होने पर किसी पद या स्थिति का अधिकारी बन जाना अथवा यह प्रकट करना कि हम उपयुक्त या वास्तविक अधिकारी है। जैसे—वह कुछ सरदारों को अपनी ओर मिलाकर राजा (या शासक) बन बैठा। (हिं० के हो बैठना मुहा० की तरह प्रयुक्त) ८. किसी काम का ऐसी स्थिति में होना कि वह पूरा या सम्पन्न हो सके। सम्भव होना। जैसे—जिस तरह बने, उसकी जान बचाओ। ९. किसी प्रक्रिया से ऐसे रूप में आना जो बहुत ही उपयुक्त ठीक या सुन्दर जान पड़े। जैसे—(क) नयी बेल टँकने से यह साड़ी बन गयी हैं। (ख) दफ्ती पर चढ़ने और हाशिया लगने से यह तस्वीर बन गयी है। १॰. किसी प्रकार के दोष, विकार आदि दूर किये जाने पर या मरम्मत आदि होने पर किसी चीज का ठीक तरह काम में आने के योग्य होना। जैसे—पाँच रूपये में यह घड़ी बनकर ठीक हो जायगी। ११. किसी पद या स्थान पर नियुक्त या प्रतिष्ठित होकर नये अधिकार, मर्यादा आदि से युक्त होना। जैसे—किसी कार्यालय का व्यवस्थापक (या मंदिर का पुजारी) बनना। मुहावरा—बन बैठना=अधिकार ग्रहण करने या रूप धारण करके किसी पद या स्थान पर आसीन होना। जैसे—उनके मरते ही उनका भतीजा मालिक बन बैठा। १२. आर्थिक क्षेत्र में, किसी प्रकार की प्राप्ति या लाभ होना। जैसे—चलो इस सौदे में १॰. रूपये बन गये। १३. आपस में यथेष्ठ मित्रता के भाव से और घनिष्ठापूर्वक आचरण निर्वाह या व्यवहार होना। जैसे—इधर कुछ दिनों से उन दोनों में खूब बनने लगी है। १४. अभिनय आदि में किसी में किसी पात्र की भूमिका में दर्शकों के सामने आना। किसी का रूप धारण करना। जैसे—मैं अकबर बनूँगा और तुम महाराणा प्रताप बनना। १५. समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करने के उद्देश्य से अपने आपको अधिक उच्च कोटि का या योग्य सिद्ध करने के लिए प्रायः गम्भीर मुद्रा धारण करके औरों से कुछ अलग-अलग रहना। जैसे—अब तो बाबू साहब हम लोगों से बनने लगे हैं। १६. किसी के बढ़ावा देने या बहकाने पर अपने आपको अधिक योग्य या समर्थ समझने लगना। और फलतः दूसरों की दृष्टि में उपहासास्पद तथा मूर्ख सिद्ध होना। जैसे—आज पंडितों की सभा में शास्त्री जी खूब बने। विशेष—इस अर्थ में इस शब्द का प्रयोग प्रायः सकर्मक रूप में ही अधिक होता है। (जैसे—शास्त्री जी खूब बनाये गये) अकर्मक रूप में अपेक्षया कम ही होता है।
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बनिनि  : स्त्री० [हिं० बनना] १. बनावट। २. बनाव-सिंगार। ३. सजावट। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बननिधि  : पुं० [सं० वननिधि] समुद्र।
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बन-पति  : पुं० [स० वनपति] सिंह। शेर।
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बन-पथ  : पुं० [सं० वनपथ] १. समुद्र। २. ऐसा रास्ता जिसमें नदियाँ या जलाशय बहुत पड़ते हों। ३. ऐसा रास्ता जिसमें जंगल बहुत पड़ते हों।
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बन-पाट  : पुं० [हिं० बन+पाट] जंगली सन। जंगली पटुआ।
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बन-पाती  : स्त्री०=वनस्पति।
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बन-पाल  : पुं० [सं० वनपाल] बन या बाग का रक्षक। माली।
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बन-पिंडालू  : पुं० [हिं० बन+पिंडालू] एक प्रकार का मझोले जंगली वृक्ष। इसकी लकड़ी कंघी, कमलदान या नक्काशीदार चीजें बनाने के काम आती है।
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बनप्रिय  : पुं० [सं० बन-प्रिय, ब० स०] कोयल। कोकिल।
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बन-पती  : स्त्री०=वनस्पति। उदाहरण—भएउ बसंत राती बनपती।—जायसी। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बन-फूल  : पुं० [हिं० वन+फूल०] जंगली वृक्षों के फूल।
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बन-फ़्शई  : वि० [फा०] १२. नीले रंग का। २. हलका हरा। पुं० उक्त प्रकार का रंग।
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बनफ्शा  : पुं० [फा० बनफ़्शा] एक प्रकार का वनस्पति जो नेपाल कश्मीर और हिमालय पर्वत के अनेक स्थानों में होती है और औषधि के काम आती है।
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बनबकरा  : पुं० [हिं० बन+बकरा] पर्वतीय प्रदेशों में होनेवाला एक तरह का बकरा।
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बन-बास  : पुं० [सं० बन-वास] १. बन में जाकर रहने की क्रिया या अवस्था। २. प्राचीन भारत में, एक प्रकार का देश-निकाले का दंड।
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बन-बासी  : वि० [हिं० बनबास] १. बन में रहनेवाला। जंगली। २. बन में जाकर बसा हुआ। ३. जिसे बनबास (दंड) मिला हो।
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बनबाहन  : पुं० [सं० वनवाहन] जलयान। नाव नौका।
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बन-बिलार  : पुं०=बन-बिलाव। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बनबिलाव  : पुं० [हिं० बन+बिलाव-बिल्ली] बिल्ली की तरह का या उससे कुछ बड़ा और मटमैले रंग का एक जंगली हिंसक जंतु जो प्रायः झाड़ियों में रहता है और चिड़ियाँ पकड़कर खाता है। कुछ लोग इसलिए पालते हैं कि उससे चिड़ियों का शिकार करने मे बहुत सहायता मिलती है। इसके कानों का ऊपरी या बाहरी भाग काला होता है इसीलिए इसे ‘स्याहगोश’ भी कहते है।
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बनबेर  : पुं० [हिं०] एक प्रकार का जंगली बेर।
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बन-मानुस  : पुं० [हिं० बन-मानुष] बंदरों से कुछ उन्नत और मनुष्य से मिलते-जुलते जंगली जंतुओं का वर्ग जिसमें गोरिल्ला, चिम्पैंजी, औरंग, ऊटंग आदि जन्तु हैं।
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बनमाल  : स्त्री०=बनमाला।
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बनमाला  : स्त्री० [सं० वन-माला] १. जंगली फूलों को पिरो कर बनायी हुई माला। २. पैरों तक लम्बी वह माला जो तुलसी की पत्तियों और कमल, पारजात और मंदार के फूलों को पिरो कर बनायी जाती है।
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बनमाली  : वि० [सं० बनमाली] जो बनमाला धारण करता या धारण किये हुए हो। पुं० १. श्रीकृष्ण। २. नारायण। विष्णु। ३. बादल। मेघ। ४. ऐसा प्रदेश जिसमें बहुत से वन या जंगल हों।
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बनमुरगा  : पुं० [हिं० बन+फा० मुर्ग] [स्त्री० बनमुर्गी] एक तरह का जंगली मुर्गा जो पालतू मुर्गों की अपेक्षा कुछ बड़ा होता है।
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बनमुरगिया  : स्त्री० [हिं० बन+फा० मुर्ग,+हिं० इया (प्रत्य०)] हिमालय की तराई में रहनेवाला एक प्रकार का पक्षी जिसका गला और छाती सफेद और सारा शरीर आसमानी रंग का होता है।
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बनमुर्गी  : स्त्री० [हिं०+फा०] कुकुटी नामक जंगली चिड़िया।
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बनरखा  : पं० [हिं० बन+रखना-रक्षा करना] १. जंगल और उसमें की सम्पत्ति की रक्षी करनेवाला व्यक्ति। २. एक जंगली जाति जो पशुपक्षी पकड़ने और मारने का कम करती है।
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बनरा  : पुं० [हिं० बनना] [स्त्री० बनरी] १. वर। दुल्हा। २. विवाह के समय गाये जानेवाले एक प्रकार के गीत। पुं०=बंदर। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बनराज  : पुं० [सं० बन-राज, ष० त०] १. बन का राजा अर्थात् सिंह। २. बहुत बड़ा वृक्ष। पुं०=वृन्दावन। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बनराय  : पुं०=वनराज। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बनराह  : पुं० [सं० वन+राज] घना या बड़ा जंगल। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बनरी  : स्त्री० [हिं० बरना का स्त्री०] नयी ब्याही हुई बधू। दुल्हन। स्त्री०=बंदरी (मादा बंदर)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बनरीठा  : पुं० [हिं० वन+रीठा] एक प्रकार का जंगली रीठे का वृक्ष जिसके बीजों से लोग कपड़े तथा केश धोते हैं।
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बनरीहा  : स्त्री० [हिं० वन+रीहा (रीस) या सं० रूह-पौधा।] एक प्रकार का पौधा जिसकी घास को बटकर रस्सी बनायी जाती है। रीसा।
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बनरुह  : पुं० [सं० वनरुह] १. जंगली पेड़। २. कमल।
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बनरुहिया  : स्त्री० [सं० वनरुह] एक तरह का पौधा और उसकी कपास।
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बनरोहू  : पुं० [हिं०] एक प्रकार का चौपाया जो देखने में बड़ी छिपकली की तरह होता है। (पैग्मेलिन)।
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बनवना  : स०=बनाना। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बनवरा  : पुं०=बिनौला।
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बनवसन  : पुं० [सं० वनवसन] वृक्ष की छाल का बना हुआ कपड़ा।
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बनवा  : पुं० [सं० वन-जल+वा (प्रत्यय)] पनडुब्बी नामक जल-पक्षी। पुं० [?] एक प्रकार का बछनाग (विष)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बनवाना  : स० [हिं० बनाना का प्रे० रूप] बनाने का काम दूसरे से कराना। किसी को कुछ बनाने में प्रवृत्त करना।
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बनवारी  : पुं०=वनमाली (श्रीकृष्ण)।
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बनवासी  : वि० पुं०=वनवासी।
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बनवैया  : वि० [हिं० बनाना+वैया (प्रत्यय)] बनानेवाला। वि० [हिं० बनवाना+वैया (प्रत्यय)] बनवानेवाला।
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बनसपती  : स्त्री०=वनस्पति।
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बनसार  : पुं० [सं० वन+शाला] समुद्र तट का वह स्थान जहाँ से जहाज पर चढ़ा या जहाँ से जहाज से उतरा जाता है।
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बनसी  : स्त्री० [हिं० बंसी] १. बाँसुरी। २. मछलियाँ फँसाने की कँटिया। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बनस्थली  : स्त्री०=वनस्थली (वन की भूमि)।
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बनस्पति  : पुं०=वनस्पति।
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बनहटी  : स्त्री० [देश०] एक प्रकार की छोटी नाव।
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बनहरदी  : स्त्री० [सं० वन हरिद्रा] दारुहलदी।
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बना  : पुं० [?] एक प्रकार का छंद जिसमें १0, ८ और १४ के विश्राम से ३२ मात्राएँ होती है। इसे दंडकला भी कहते हैं पुं० [हिं० बनना] [स्त्री० बनी] दूल्हा। वर। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बनाइ  : अव्य० [हिं० बनाकर-अच्छी तरह] १. अच्छी तरह। भली-भाँति (दे० बनाना के अंतर्गत पर बनाकर) २. अधिकता से। ३. निपट। बिलकुल। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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बनाउ  : पुं०=बनाव। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बनाउरि  : स्त्री०=वाणाविल (वाणों की पंक्ति)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बनाग्नि  : स्त्री० [सं० बनाग्नि] वन में लगनेवाली आग। दावानल।
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बनात  : स्त्री० [हिं० बनाना] [वि० बनाती] एक प्रकार का बढ़िया तथा रंगीन ऊनी कपड़ा।
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बनाती  : वि० [हिं० बनात+ई (प्रत्यय)] १. बनात संबंधी। २. बनात का बना हुआ।
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बनान  : स्त्री० [हि० बनाना] बनाने की क्रिया, ढंग या भाव। बनावट।
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बनाना  : स० [हिं० बनना का स०] १. किसी चीज को अस्तित्व देना या सत्ता में लाना। रचना। जैसे—(क) ईश्वर ने यह संसार बनाया है। (ख) सरकार ने कानून बनाया है। २. भौतिक वस्तुओं के संबंध में उन्हें तैयार या प्रस्तुत करना। रचना। जैसे—(क) मकान या कारखाना बनाना। (ख) गंजी या मोजा बनाना। ३. अभौतिक तथा अमूर्त वस्तुओं के संबंध में विचार जगत से लाकर प्रत्यक्ष करना। जैसे—कविता बनाना। पद—बनाकर=खूब अच्छी तरह। भली-भाँति। जैसे—आज हम बनाकर तुम्हारी खबर लेगे। मुहावरा—(किसी व्यक्ति को) बनाये रखना-अच्छी दशा में अथवा ज्यों का त्यों रखना। रक्षापूर्वक रखना। (किसी व्यक्ति को) बनाये रखना=सकुशल, जीवित या वर्तमान रखना। जैसे—(क) ईश्वर आपको बनाये रखे (आर्शीवाद) (ख) किसी को अनुकूल या अपने प्रति दयालु रखना। जैसे—उन्हें बनाये रखने से तुम्हारा लाभ ही होगा। ४. ऐसे रूप में लाना कि वह ठीक तरह से काम मे आ सके अथवा भला और सुन्दर जान पड़े। ५. किसी विशिष्ट स्थिति में लाना। जैसे—उन्होंने अपने आपको बना लिया है अथवा अपने लड़के को बना दिया है। मुहावरा—बनाये न बनना=बहुत प्रयत्न करने पर भी कार्य की सिद्धि या सफलता न होना। जैसे—अब हमारे बनाये तो नही बनेगा। उदाहरण—जौ नहिं जाऊँ रहइ पछितावा। करत विचार न बनइ बनावा।—तुलसी। ६. आर्थिक क्षेत्र में उपार्जित या प्राप्त करना। लाभ करना। जैसे—उन्होने कपड़े के रोजगार में लाखों रुपये बना लिये है। ७. किसी पदार्थ के रूप आदि में कुछ विशिष्ट क्रियाओं के द्वारा ऐसा परिवर्तन करना कि वह नये प्रकार से काम में आ सके। जैसे—गुड़ से चीनी बनाना, चावल से भात बनाना, आटे से रोटी बनाना। ८. एक विशिष्ट रूप से दूसरे विपरीत या विरोधी रूप में लाना। जैसे—(क) मित्र को शत्रु अथवा शत्रु को मित्र बनाना। (ख) झूठ को सच बनाना। ९. दोष, विकार आदि दूर करके उचित या उपयुक्त दशा या रूप में लाना। जैसा होना चाहिए वैसा करना। जैसे—पछोड़ या पटककर अनाज बनाना। १॰. जो चीज किसी प्रकार बिगड़ गयी हो उसे ठीक करके ऐसा रूप देना कि वह अच्छी तरह काम दे सके। मरम्मत करना। जैसे—कलम बनाना, घड़ी बनाना। ११. किस प्रकार का आविष्कार करके कोई नयी चीज तैयार या प्रस्तुत करना। जैसे—नये तरह का इंजन या हवाई जहाज बनाना। १२. अंकन, लेखन आदि की सहायता से नयी रचना प्रस्तुत करना। जैसे—गजल या तसवीर बनाना। १३. किसी को किसी पद या स्थान पर आसीन अथवा प्रतिष्ठित, करके अधिकार, प्रतिष्ठा, मर्यादा आदि से युक्त करना। जैसे—(क) किसी को मठ का महंत या सभा का सभापति बनाना। (ख) अपना प्रतिनिधि बनाना। १४. किसी के साथ कोई नया पारिवारिक संबंध स्थापित करना। जैसे—किसी को अपना दामाद, भाई या लड़का बनाना। १५. बात-चीत में किसी की प्रशंसा करते हुए उसे बढ़ावा देते हुए ऐसी स्थिति में लाना कि वह आत्म-प्रशंसा करता-करता औरों की दृष्टि में उपहासास्पद और मूर्ख सिद्ध हो। जैसे—आज पंडित जी को लोगों ने खूब बनाया। १६. कोई विशिष्ट क्रिया या व्यापार सम्पन्न करना। जैसे—(क) खिलाड़ी का गोल बनाना। (ख) नाई का दाढ़ी बनाना। (ग) डाक्टर का आँख बनाना।
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बनाफर  : पुं० [सं० वन्यफल] राजपूत क्षत्रियों की एक शाखा।
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बना-बनत  : स्त्री० [हिं० बनना] वर और कन्या का सम्बन्ध स्थिर करने से पहले उनकी जन्म-पत्रियों का गणित ज्योतिष के अनुसार किया जानेवाला मिलान। क्रि० प्र०—निकालना।—बनाना।—मिलाना।
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बनाम  : अव्य० [फा०] १. किसी के नाम पर। नाम से। जैसे—बनामे खुदा=ईश्वर के नाम पर। २. किसी के उद्देश्य के किसी के प्रति। ३. किसीके विरुद्ध। जैसे—यह दावा सरकार बनाम बेनीमाधव दायर हुआ है अर्थात् सरकार ने बेनीमाधव पर मुकदमा चलाया है।
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बनाय  : अव्य० [हिं० बनाकर=अच्छी तरह] १. अच्छी तरह बनाकर। २. ठीक ढंग से। अच्छी तरह। ३. पूरी तरह से। पूर्णतया।
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बनार  : पुं० [?] १. चाकसू नामक ओषधि का वृक्ष। २. काला सकौदा। कासमर्द। ३. एक मध्ययुगीन राज्य जो वर्तमान काशी की सीमा पर था। अव्य दे० ‘बनाय’। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बनारना  : स० [?] काटना, विशेषतःकाट-काटकर किसी चीज के टुकड़े करना।
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बनारस  : पुं० [सं० वाराणसी] [वि० बनारसी] हिन्दुओं के प्रसिद्ध तीर्थ काशी का आधुनिक नाम।
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बनारसी  : वि० [हिं० बनारस+ई (प्रत्यय)] १. बनारस (नगर) संबंधी। २. बनारस में बनने, रहने या होनेवाला। जैसे—बनारसी साड़ी। पुं० बनारस का निवासी।
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बनारी  : स्त्री० [सं० प्रणाली] कोल्हू में नीचे की ओर लगी हुई नाली की वह लकड़ी जिससे रस-नीचे नांद में गिरता है।
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बनाल  : पुं०=बंदाल। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बनाला  : पुं०=बंदाल। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बनावंत  : स्त्री० दे० ‘बना=बनत’।
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बनाव  : पुं० [हिं० बनना+आव (प्रत्यय)] १. बनने, या बनाये जाने की क्रिया या भाव। २. बनावट। रचना। ३. श्रृंगार। सजावट। पद—बनाव-सिंगार।
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बनावट  : स्त्री० [हिं० बनाना+आवट (प्रत्यय)] [वि० बनावटी] १. किसी चीज के बनने या बनाये जाने का ढंग या प्रकार। रचने या रचे जाने की शैली। रूप-विधान। २. किसी वस्तु का वह रूप जो उसे बनाने या बनाये जाने पर प्राप्त होता है। रूप-रचना। गढ़न। जैसे—इन दोनों कमीजों की बनावट में बहुत थोड़ा अन्तर है। ३. किसी चीज को विशिष्ट और सुन्दर रूप में लाने की क्रिया या भाव। रूपाधान। (फार्मेशन)। ४. केवल दूसरों को दिखाने के लिए बनाया जानेवाला ऐसा आचरण, रूप या व्यवहार जिसमें तथ्य, दृढ़ता, वास्तविकता, सत्यता आदि का बहुत कुछ या सर्वथा अभाव हो। केवल दिखावटी आकार-प्रकार आचार-व्यवहार या रूप-रंग। ऊपरी दिखाबा। आडंम्बर। कृत्रिमता। जैसे—(क) यह उनकी वास्तविक सहानुभूति नहीं है, कोरी बनावट है। (ख) उसकी बनावट मे मत आना वह बहुत बड़ा धूर्त है। ५. वह दम्भपूर्ण मानसिक स्थिति जिसमें मनुष्य अपने आपको यथार्थ अथवा वास्तविकता से अधिक योग्य, सदाचारी आदि सिद्ध करने का प्रयत्न करता है। पाखंडपूर्ण, मिथ्या, आचरण और व्यवहार। (एफेकेटशन) जैसे—यों साधारणतः वे अच्छे विद्वान है पर उनमें बनावट इतनी अधिक है कि लोग उनकी बातों से घबराते हैं। ६. दे० ‘रचना’।
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बनावटी  : वि० [हिं० बनावट] १. जिसमें केवल बनावट हो तथ्य या वास्तविकता कुछ भी न हो। ऊपरी या बाहरी। जैसे—बनावटी हँसी। २. वास्तविक के अनुकरण पर बनाया हुआ। कृत्रिम। नकली। जैसे—बनावटी नगीना।
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बनावन  : पुं० [हिं० बनाना] १. बनाने की क्रिया या भाव। २. अन्न में मिली हुई वे कंकड़ियाँ आदि जो बिनकर निकाली जाती है। ३. इस तरह बिनकर निकली हुई रद्दी चीजों का ढेर।
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बनावनहारा  : वि० पुं० [हिं० बनाना+हारा (प्रत्यय)] १. बनानेवाला। सुधारनेवाला।
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बनाव-सिंगार  : पुं० [हिं० ] किसी चीज की विशेषतः शरीर की वह सजावट जो प्रायः दूसरों को आकृष्ट करने या उन पर प्रभाव डालने के लिए की जाती है।
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बनास  : स्त्री० [देश०] राजपूताने की एक नदी जो अर्वली पर्वत से निकलकर चम्बल नदी में गिरती है।
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बनासपती  : स्त्री०=वनस्पति। वि० वनस्पतियों से बनाया हुआ। जैसे—बनासपती घी। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बनि  : अव्य० [हिं० बनाना] पूर्णरूप से अच्छी तरह। बनाकर। उदाहरण—अमित काल मै कीन्ह मजूरी आजु दीन्ह विधि बनि भलि भूरी।—तुलसी। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बनिक  : पुं०=बणिक। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बनिज  : पुं० [सं० वाणिज्य] १. रोजगार। व्यापार। २. व्यापार की वस्तु। सौदा। ३. ऐसा आसामी जिससे यथेष्ठ आर्थिक लाभ प्राप्त किया जा सके। ४. धनी या सम्पन्नी यात्री। (ठग)। क्रि० प्र०—फँसाना।
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बनिजना  : स० [सं० वाणिज्य, हिं० बनिज+ना (प्रत्यय)] १. खरीदना और बेचना। रोजगार करना। २. मोल लेना। खरीदना। ३. किसी को मूर्ख बनाकर कुछ रुपये ठगना।
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बनिजारा  : पुं०=बनजारा।
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बनिजारिन  : स्त्री ०=बनजारिन। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बनिजारी  : स्त्री०=बनजारिन।
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बनिजी  : वि० [सं० वणिज्] वाणिज्य-संबंधी। पुं० घूम-घूमकर सौदा बेचनेवाला व्यापारी। पेरीदार।
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बनित  : स्त्री० [हिं० बनना] बानक। बाना। वेश।
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बनिता  : स्त्री० [स० बनिता] १. स्त्री० औरत। २. जोरू पत्नी। भार्या।
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बनिया  : पुं० [सं० वणिक्] [स्त्री० बनियाइन, बनैनी] १. व्यापार करने वाला व्यक्ति। व्यापारी। वैश्य। च आटा, दाल, नमक मिर्च आदि बेचनेवाला दुकानदार। मोदी। ३. लाक्षणिक अर्थ में, व्यापारिक मनोवृत्तिवाला फलतः स्वार्थी व्यक्ति।
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बनियाइन  : स्त्री० [अ० बैनियन] कमीज, कुरते आदि के नीचे पहनने का एक तरह का सिला हुआ कम लम्बा पहनावा। गंजी। स्त्री० हिं० ‘बनिया’ का स्त्री० । (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बनिस्बत  : अव्य० [फा०] किसी की तुलना या मुकाबले में० अपेक्षया। जैसे—उस कपड़े की बनिस्बत यह कपड़ा कहीं अच्छा है।
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बनिहार  : पुं० [हिं० बन+हार (प्रत्यय) अथवा हिं० बन्नी] वह आदमी जो कुछ वेतन अथवा उपज का अंश लेकर दूसरों की जमीन जोतने, बोने, फसल आदि काटने और खेत की रखवाली का काम करता है।
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बनी  : स्त्री० [हिं० वन] १. वन का एक टुकड़ा। वनस्थली। २. बगीचा। वाटिका। उदाहरण—महादेव की सी बनी चित्र लेखी।—केशव। ३. एक प्रकार की कपास। स्त्री० [पुं० बना] १. दुल्हन। वधू। २. सुन्दरी। स्त्री। नायिका। पुं०=बनिया।
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बनीनी  : स्त्री० [हिं० बनी+ईनी (प्रत्यय)] १. वैश्य जाति की स्त्री। बनिये की स्त्री।
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बनीर  : पुं०=बानीर (बेंत)।
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बनेठी  : स्त्री० [हिं० बन+सं० यष्टि] एक तरह की छड़ी जिसके दोनों सिरों पर एक-एक लट्टू लगा रहता है। और जिसका उपयोग मुख्यतः पटेबाजी के खेलों में होता है।
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बनेला  : पुं० [देश०] रेशम बनानेवाला एक प्रकार का कीड़ा। वि० बनैला।
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बनैया  : वि० [हिं० बनाना] बनानेवाला। वि०=बनैला। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बनैल  : वि०=बनैला। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बनैला  : वि० [हिं० बन+ऐला (प्रत्यय)] जंगली। वन्य। पुं० जंगली सूअर।
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बनोबास  : पुं०=बनवास। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बनौआ  : वि० [हिं० बनाना+औआ (प्रत्यय)] १. बना या बनाया हुआ। २. कृत्रिम। बनावटी।
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बनौट  : स्त्री०=बिनवट। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बनौरी  : स्त्री० [हिं० वन+औटी (प्रत्यय)] कापस के फूल का सा। कपासी। पुं० एक प्रकार का रंग जो कपास के रंग से मिलता-जुलता है। स्त्री०=बिनवट। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बनौरी  : स्त्री० [हिं० बन-जल+ओला] आकाश में बरसनेवाले हिमकण। ओला। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बन्ना  : पुं० [हिं० बनना या बना०] [स्त्री० बन्नी] १. लोकगीतों में, वर। दूल्हा। २. विशेषतः वह व्यक्ति जिसका विवाह हो रहा हो। ३. विवाह के समय में, वर पक्ष की स्त्रियों के द्वारा गाया जानेवाला एक तरह का लोकगीत। बनड़ा।
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बन्नात  : स्त्री०=बनात (एक तरह का ऊनी रंगीन कपड़ा)।
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बन्नी  : वि० [हिं० वन] वन में होनेवाला। जैसे—बन्नी खड़िया, बन्नी मिट्टी आदि। स्त्री० [हिं० बन्ना] १. दुल्हिन। २. कन्या जिसका विवाह हो रहा हो। स्त्री० [?] १. खेत में काम करनेवालों को मिलनेवाला खड़ी फसल का कुछ अंश। २. उतनी भूमि जिसमें उक्त अंश हो।
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बन्हि  : स्त्री०=बहिन (बहिन)।
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बपंस  : पुं० [हिं० बाप+सं० अंश] १. पिता की सम्पत्ति में पुत्र को मिलनेवाला अंश। २. वह गुण जो पुत्र को पिता से प्राप्त हुआ माना जाय।
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बप  : पुं० [सं० वप्तृ] बाप। पिता। पुं० वपु। (शरीर)।
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बपतिस्मा  : पुं० [अं० बैप्टिज़्म] नव-जात शिशु अथवा अन्य धर्मावम्बी को मसीही धर्म में दीक्षित करते समय होनेवाला एक संस्कार।
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बपना  : स० [सं० वपन] वपन करना। बीज बोना।
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बप-मार  : वि० [हिं० बाप+मारना] [भाव० बप-मारी] १. जिसने अपने पिता का वध किया हो। २. जो अपने पूज्य और बड़े व्यक्तियों तक का अपकार करने से भी न चुके। बड़ों तक के साथ द्रोह या विश्वास घात करनेवाला।
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बपु  : पुं० [सं० बपु०] १. शरीर। देह। २. ईश्वर का शरीरधारी रूप। अवतार। ३. आकृति। रूप। शकल।
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बपख  : पुं० [सं० वपुष] देह। शरीर।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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बपुरा  : वि०=बापुरा (बेचारा)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बपौती  : स्त्री० [हिं० बाप+औती (प्रत्यय)] १. पिता की ऐसी सम्पत्ति जो पुत्र को उत्तराधिकार के रूप में मिली हो, मिलने को हो, अथवा उसे प्राप्य हो। २. वह अधिकार जो किसी को अपने पिता तथा पितृ-पक्ष की सम्पत्ति पर होता है।
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बप्पा  : पुं० [हिं० बाप] पिता। बाप। पद—बप्पारे बप्पा-आश्चर्य, दुःख आदि के समय मुँह से निकलनेवाला पद।
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बफरना  : अ० [सं० विस्फालन] १. अभिमान या गर्वपूर्वक लड़ने के लिए ताल ठोंकना या किसी प्रकार का शब्द करना। २. उत्पात या उपद्रव करना। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बफारा  : पुं० [हिं० भाप+आरा (प्रत्यय)] १. ओषधि के युक्त किये गये जल को उबालने पर उसमें से निकलनेवाली भाप। २. उक्त भाप से किया जानेवाला सेंक। क्रि० प्र०—देना।—लेना। ३. वे औषधियाँ जो उक्त कार्य के लिए गरम पानी में उबाली जाती है
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बफौरी  : स्त्री० [हिं० भाप०] भाप से पकायी जानेवाली या पकी हुई बरी। [हिं० बफरना] उछलने की क्रिया या भाव। उछाला। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बबकना  : अ०=बमकना (दे०)।
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बबर  : पुं० [अ०] १. बिल्ली की जाति का एक बिना पूँछवाला वन्य पशु जो सेर को भी मार डालता है। २. बड़ा शेर। सिंह। ३. वह कम्बल जिस पर शेर की खाल की सी धारियाँ बनी होती है। वि० शेर के साथ विशेषण रूप में प्रयुक्त होने पर, भयानक और विकराल। जैसे—बबर शेर।
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बबरी  : स्त्री० [हिं० बबर] १. लटका हुआ बाल। (विशेषकर घोड़े का)। २. बालों की लट।
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बबा  : पुं०=बाबा। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बबुआ  : पुं० [हिं० बाबू] [स्त्री० बबुआइ, बबुई] १. दामाद, और पुत्र के लिए प्यार का सम्बोधन। (पूरब)। २. जमींदार और रईस। ३. छोटे लड़कों के लिए प्यार का सम्बोधन।
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बबुई  : स्त्री० [हिं० बबुआ का स्त्री०] १. बेटी। कन्या। २. बड़े जमींदार या रईस की लड़की। ३. पति की छोटी बहन। छोटी ननद।
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बबुनी  : स्त्री०=बबुई।
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बबुर  : पुं०=बबूल।
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बबूना  : पुं० [?] एक प्रकार की छोटी चिड़िया जिसका ऊपरी बदन हरापन लिये सुनहला पीला और दुम गहरी भूरी होती है। इसकी आँखों के चारों ओर एक सफेद छल्ला सा रहता है।
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बबूल  : पुं० [सं० बब्बूर] एक प्रसिद्ध कँटीला पेड़ जसकी पतली-पतली शाखाएँ दतुअन के काम आती है। कीकर।
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बबूला  : पुं० [देश०] हाथियों के पाँव मे होनेवाला एक प्रकार का फोडा़। वि, समस्त पदों के अन्त में उक्त फोडे़ के समान तना और सूजा हुआ। पद—आग-बबूला। (दे० )। पुं० १.=बगूला। २.=बुलबुल। २. -बबूला।
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बब्बू  : पुं० [?] उल्लू। (पक्षी)। पुं० [हिं० बाबू] छोटे बच्चों के लिए प्यार का एक सम्बोधन। (पश्चिम)।
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बभनी  : स्त्री० बम्हनी।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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बभूत  : स्त्री० १=भभूत। २.=विभूति।
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बभ्रु  : वि० [सं०√भ्रू+कु] १. गहरे भूरे रंग का। २. खल्वाट। गंजा। पुं० १. गहरा भूरा रंग। २. अग्नि। ३. नेवला। ४. चातक। ५. विष्णु। ६. शिव।
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बभ्रु-धातु  : स्त्री० [सं० कर्म० स०] १. सोना। स्वर्ण। २. गेरू।
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बभ्रु-लोमा (मन्)  : वि० [सं० ब० स०] भूरे बालोंवाला।
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बभ्रुवाहन  : पुं० [सं० ब० स०] चित्रांगदा के गर्भ से उत्पन्न अर्जुन का एक पुत्र जो मणिपुर का शासक था।
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बभ्रुवी  : स्त्री० [सं० बभ्रु+अण्+ङीष्] दुर्गा।
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बम  : पुं० [अनु०] १. शिव के उपासकों का वह बम बम शब्द जिससे शिवजी का प्रसन्न होना माना जाता है। मुहावरा—बम बोलना या बोल जाना=शक्ति, धन आदि की समाप्ति या अंत हो जाना। बिलकुल खाली हो जाना। कुछ न रह जाना। २. शहनाईवाला का एक छोटा नगाड़ा जो बजाते समय बायी ओर रहता है। मादा नगाड़ा। नगड़िया। पुं० [कन्नड़, बम्बू-बाँस] १. बग्घी, फिटन आदि में आगे की ओर लगा हुआ वह लम्बा बाँस जिसके दोनों ओर घोड़े जोते जाते हैं। २. इक्ते, टाँगे आदि में के वे बाँस या लम्बोतरे अंग जिनमें घोड़ा जोता जाता है। पुं० [अं० बाम्ब] १. वह विस्फोटक रासायनिक गोल जिसके फूटने से घोर शब्द होता है तथा व्यापक बरबादी और जीव-संहार होता है। २. एक तरह की आतिशबाजी जिसमें से जोर का शब्द निकलता है।
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बमकना  : अ० [अनु०] १. क्रुद्ध होकर जोर से बोलना। २. डींग हाँकना।
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बमकाना  : स० [हिं० बमकना] ऐसा काम करना जिससे कोई बमके। किसी को बमकाने में प्रवत्त करना।
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बमगोला  : पुं० [हिं० बम+गोला] बम (विस्फोटक तथा रासायनिक गोला)। वि० १. आफत का परकाला। २. हो-हल्ला करनेवाला।
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बम-चख  : स्त्री० [अनु० बम+चीखना] १. शोरगुल। हल्ला-गुल्ला। २. लड़ाई-झगड़ा। क्रि० प्र०—चलना।—चलाना।—मचना।—मचाना। ३. कहा-सुनी।
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बमना  : स० [सं० वमन०] १. वमन करना। कै करना। २. उगलना।
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बम-पुलिस  : पुं०=बंपुलिस (सार्वजनिक शौचालय)।
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बमबाज  : वि० [हिं० बम+फा० बाज०] [भाव० बमबाजी] १. (वायुयान) जो बम गिराता हो। २. (व्यक्ति) जो शत्रुओं पर बम फेंकता हो।
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बम-बाजी  : स्त्री० [हिं० बम+फा० बाजी] बम गिराने या फेंकने की क्रिया या भाव।
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बम-भोला  : पुं० [हिं० बम+भोला] महादेव। शिव।
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बम-वर्षक  : पुं० [हिं० बम+सं० वर्षक] एक तरह का बहुत बड़ा हवाई जहाज जो बम फेकने के काम आता है। (बाँम्बर)।
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बम-वर्षा  : स्त्री० [हिं० बम+वर्षा] बम-बारी।
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बमीठा  : पुं०=बाँबी (दीमकों का)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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ब-मुकाबला  : अव्य० [फा०+अ०] १. मुकाबले में। समझ। सामने। २. तुलना में। अपेक्षया।
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ब-मुश्किल  : अव्य० [फा०+अ०] कठिनता से।
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ब-मूजिक  : अव्य० [फा०+अ०] अनुसार। मुताबित। जैसे—हुकुम बमूजिक।
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बमेल  : स्त्री० [देश०] एक प्रकार की मछली।
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बमोट  : पुं०=बमीठा। (दीमकों की बाँबी)।
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बम्भण  : पुं०=ब्राह्मण।
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बम्हनी  : स्त्री० [सं० ब्राह्मण, हिं० बाम्हन] १. छिपकली की तरह का एक रेगनेवाला छोटा पतला कीड़ा। इसकी पीठ चित्तीदार काली दुम और मुँह लाल चमकीले रंग का होता है। २. आँख की पलकों पर होनेवाली फुंसी। गुहाजनी। बिलनी। ३. वह गाय जिसकी पलकों पर के बाल झढ़ गये हो। ४. ऊख या गन्ने को होनेवाला एक रोग। ५. हाथी का एक रोग जिसमें दुम सड़-गलकर गिर जाती है। ६. ऐसी जमीन जिसकी मिट्टी लाल हो। ७. कुश की जाति का एक तृण। वन-कुस।
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बयंड  : पुं० [हिं० गयंद=सं० गजेंद्र] हाथी। (डिं० )।
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बय  : स्त्री=वय (अवस्