आक्ष/aaksh
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शब्द का अर्थ

आक्ष  : वि० [सं० अक्ष+अण्] अक्ष संबंधी। (सभी अर्थों में)।
समानार्थी शब्द-  उपलब्ध नहीं
आक्षपाद  : वि० [सं० अक्षपाद+अण्] अक्षपाद संबंधी अक्षरपाद का। पुं० १. न्याय शास्त्र। २. न्याय-शास्त्र का ज्ञाता। नैयायिक।
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आक्षिक  : वि० [सं० अक्षि+ठक्-इक] १. अक्षृ-संबंधी। आक्ष। २. पासा या शतरंज खेलनेवाला। पुं० १. जुए में लगाया जानेवाला दाँव या धन। २. आल का वृक्ष।
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आक्षिप्त  : भू० कृ० [सं० आ√क्षिप् (फेंकना)+क्त] १. जिसका आक्षेपण हुआ हो। फेका या हटाया हुआ। २. जिसपर आक्षेप किया गया हो। ३. घबराया हुआ। व्याकुल। ४. लगा हुआ। युक्त।
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आक्षीरी (रिन्)  : वि [सं० आ√क्षिप्, प्रा० स०+इनि] (पेड़ या पौधा) जिसके डंठल तने या पत्ते में से दूध जैसा गाढ़ा तरल पदार्थ निकलता हो। (लैटिसिफेरस)।
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आक्षेप  : पुं० [सं० आ√क्षिप्+घञ्] [कर्ता आक्षेपक] १. दूर हटाना या फेकना। २. किसी के ऊपर कुछ गिरना या गिराना। ३. किसी के आचरण, कथन या कार्य के संबंध में कही जानेवाली कोई ऐसी अप्रिय कटु या कठोर बात जिससे वह कुछ दोषी सिद्ध हो या मन में लज्जित हो। व्यंग्यपूर्ण दोषारोपण। ४. साहित्य में, एक अर्थालंकार जिसमें पहले कोई बात कहकर फिर अपवाद रूप में उसका प्रतिषेध किया जाता है। (पैरालैप्सिस) जैसे—(क) जदपि कवित रस एकौ नाँही। राम-प्रताप प्रकट एहिं मांही। (ख) उपकार तो दुर्जनों का भी करना चाहिए, पर होता है वह ऊपर में बीज बोने के ही समान। ५. एक बात रोग जिसमें हाथ पैर रह-रहकर ऐंठतें और काँपते हैं। (कन्वल्शन)
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आक्षेपक  : वि० [सं० आ√क्षिप्+ण्वुल्-अक] १. गिराने फेकने या दूर हटानेवाला। २. आक्षेप या व्यंग्यपूर्ण आपत्ति करनेवाला। पुं० आक्षेप नामक वात रोग।
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आक्षेपण  : पुं० [सं० आ√क्षिप्+ल्युट्-अन] [भू० कृ० आक्षिप्त] १. गिराना, दूर हटाना या फेकना। २. व्यग्यपूर्ण आपत्ति या आक्षेप करना।
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आक्षेपी (पिन्)  : वि० [सं० आ√क्षिप्+णिनि]=आक्षेपक।
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आक्षोट  : पुं० [सं० आ√अक्ष्(व्याप्ति)+ओट] अखरोट (पेड़ और फल)।
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