|
श्रंगार - प्रेम >> अब के बिछुड़े अब के बिछुड़ेसुदर्शन प्रियदर्शिनी
|
186 पाठक हैं |
|||||||
पत्र - 55
प्राण !
तुम चले गये हो। यह चुभन बनकर साल रहा है। मेरे हृदय के किसी कोने में यह व्यथा रिसती रहेगी। मैं इस व्यथा को कोई नाम नहीं दे सकती। चाहकर भी इसका नामकरण नहीं किया जा सकता। शहनाज की आँखों की वीरानगी ही इसका नाम हो सकता है शायद...।
उसी बात को फिर दुहराने लगी हूँ कि कहीं न कहीं तुम लोग निर्ममता के पर्याय बन ही जाते हो। शहनाज की आँखों की वीरानी-तुम्हारी एक जिद्द के कारण-उलाहना बनकर उसकी आँखों में उतर आई है। वह तक तुम्हारे साथ जाना चाहती थी...तुम्हें जितनी दूर तक आँखों में भर सकती-भरना चाहती थी-किंतु तुमने उसे साथ ले जाने से मना कर दिया। तुम लोगों के अंदर संवेदना या कोमलता की कोई परत होती है या नहीं, मालूम नहीं, लेकिन यह अवश्य होता है कि तुम लोग अपनी दुर्बलताओं को किसी के समक्ष उजागर नहीं होने देना चाहते। जबकि यहीं तुम्हारी क्षण भर की दुर्बलता नारी के लिये उम्रभर का स्मृति-सम्बल बन सकती है। क्या होता-अगर दो आँसू तुम्हारी आँखों में शहनाज देख लेती। जब तुम देश छोड़ते तो तुम्हारा मन भर आता और शहनाज को गले लगा कर, उसके कंधे पर एक बूँद खारा जल बहा देते-तो शहनाज के अंदर के आलोड़न को हृदय की जानलेवा मरोड़ को कितनी शाँति मिलती...पर नहीं-अपनी पौरूषता की झाँक में तुम किसी की दुर्बलता बनना तो स्वीकार कर लेते हो-लेकिन स्वयं दुर्बल बनना तुम्हें स्वीकार्य नहीं होता...। जबकि यही वह क्षण होता है-जब तुम मानव बन सकते हो। उस क्षणिक दुर्बलता में भी कितनी बड़ी सबलता छिपी रहती है प्राण! तुम्हारे इस अहम् ने आजतक कितने युद्ध हारे है-कितने मन धाराशायी हुये है। शहनाज के चेहरे का वह रंग-कहीं मुझे भी तुम से दूर ले जाने लगा है। रेलगाड़ी की खिड़की पर टिके हुये-तुम्हारे काल्पनिक चेहरे की उदासी को-मैं आज भी ढूँढ रही हूँ...। क्या कहीं एक बार तुम्हारे मानस में-शहनाज के चेहरे के साथ कोई और चेहरा भी उभरा होगा! या कि हर पुरुष की तरह केवल तुम्हारा भविष्य ही था। अतीत का क्या कोई भी पदचिन्ह-उभर नहीं पाया था! ये वे क्षण होते है-जिन्होंने इतिहास रचे हैं। ससि-पुन्नू और हीर-राँझा घड़े है। ये क्षण परम-भक्ति के ही नहीं-परम सम्मोहन के होते है। जिन्हें सदियों में कहीं एक बार निर्मित होना होता है...फिर वे उम्र भर-उस आने वाले रास्ते पर पलके बिछाये बैठे रहते हैं-प्रतीक्षारत...कि कोई आए और उन्हें अपने सबल-हाथों से उठाये और थाम ले...और वे फिर सदा के लिये तुम्हारे साथ हो ले...।
पर कहीं वह सब होता है...जो चाहा जाता है! नही-न! तुम-तुम रहते हो और हम-हम!
फिर भी जहाँ हो-मेरी शुभकामनाएँ-तुम्हारा मार्ग प्रशस्त करती रहे...।
इन्हीं प्रार्थनाओं के साथ-
- तुम्हारी दुआ
|
|||||

i 









