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गीता प्रेस, गोरखपुर >> परमार्थ की मन्दाकिनी

परमार्थ की मन्दाकिनी

हनुमानप्रसाद पोद्दार

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2000
पृष्ठ :91
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 932
आईएसबीएन :00000

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प्रस्तुत है परमार्थ की मन्दाकिनी....

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Parmarth Ki Mandakini a hindi book by Hanuman Prasad Poddar - परमार्थ की मन्दाकिनी - हनुमानप्रसाद पोद्दार

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

निवेदन

यह ‘शिव’ विचार-तंरगों का सातवा भाग है। ये तरंगे ‘कल्याण’ के आदि सम्पादक परम श्रद्धेय भाईजी श्रीहनुमानप्रसाद जी पोद्दार की लेखनी द्वारा तरंगित हुई हैं। वे प्रतिमास ‘कल्याण’ में ‘कल्याण’ शीर्षक  अग्रलेख में अपना नाम न देकर ‘शिव’ नाम से ही अपने विचार व्यक्त करते थे।
शिव-धारा की तरंगे दैहिक, दैविक एंव भौतिक संताप से संतप्त मानव को केवल शीतलता ही प्रदान नहीं करती हैं; अपितु अवगाहन करने वाले को परमार्थ के उच्च शिखरपर आरुढ़ होने में सहायता करती हैं। संत-हृदय की पवित्र धारा सुखशान्ति का उद्गम है। अतएव यह ‘मन्दाकिनी’ सहज ही दुःखी मानव को परमानन्द एवं दिव्य भाव तक प्राप्त करा सकती है। सभी को इसमें लाभ उठाना चाहिये।

प्रकाशक

 परमार्थ की मंदाकिनी
संतोषी परम सुखी

याद रखो—

मनुष्य की एक बड़ी कमजोरी है—उसका चिर स्थायी ‘असंतोष’। इसीसे वह सदा दुःखी रहता है। तृष्णा की कोई सीमा नहीं है; जितना मिले उतनी ही तृष्ण बढ़ती है। भोगों की प्राप्ति से तृष्णा का अन्त नहीं होता—वरं ज्यों-ज्यों भोग प्राप्त होते हैं, त्यों-ही-त्यों तृष्णा का दायरा भी बढ़ता ही जाता है। भोग भोगने की शक्ति चाहे नष्ट हो जाए, परंतु तृष्णा बड़े-से-बड़े धनवान, ऐश्वर्यवान् को भी सदा दरिद्र बनाए रखती है; उसमें कभी जीर्णता नहीं आती, उसका तारूण्य सदा ही बना रहता है।

याद रखो—

जिसका मन प्रत्येक परिस्थिति में संतुष्ट है, वही परम सुखी है। वस्तुतः संतोष ही वह परम धन है, जिसे पाकर मनुष्य सदा धनी बना रहता है; कोई भी अवस्था उसे दीन-दरिद्र नहीं बना सकती। संतोष से प्राप्त होने वाला जो महान् पद है, वह बड़े-से-बड़े सम्राट के पद से भी ऊँचा और महान् है।


याद रखो—

संतोष संपन्न पुरुष ही वास्तविक साधु है। घर छोड़ने पर भी जिसको संतोष नहीं है, वह कभी साधु नहीं हो सकता; वह तो दिन-रात असंतोष की आग मे जलता रहता है। संतोष ही वह परम शीतल पदार्थ है, जो जलते जीवन को सुशीतल बन देता है। संतोष ही जीवन के अंधकार से अभिशप्त अंगों को परमोज्जवल बनाता है।


याद रखों –

जिसको संतोष नहीं है, उसकी वृत्ति कभी एकाग्र नहीं हो सकती; वह सदा ही क्षिप्त और चञ्चल  बनी रहती है। असंतोष मनुष्यको चोर, ठग, डाकू औऱ परहितहरण करने वाला असुर बना देता है। असंतोष से ही द्वेष, क्रोध, वैर और हिंसा को प्रोत्साहन मिलता  है। शील, शान्ति, प्रेम, सेवा आदि सद्गुण असंतोषी मनुष्य के जीवन में कभी नहीं आते। यदि इनमें से कोई कुछ क्षणों के लिये आता है तो असंतोष की आगसे झुलसकर नष्ट हो जाता है।

याद रखो-

संतोष होता है जगत् की अनित्यता, दुःखमयता, असद्रूपता के निश्चयसे या श्रीभगवान् के मंगल-विधानपर परम विश्वास होने पर ही जगत की कोई भी स्थिति वास्तव में या तो मायामात्र है-कुछ है नहीं या विविध रसमयी भगवान की लीला है। माया है
तो असंतोष का कोई शरण नहीं है; लीला है तो प्रत्येक लीला में लीलामय के मधुर-मंगल दर्शन परमानन्द है। उसी में चित्त रम जाता है।


याद रखो-

जो लोग असंतोष की आग में जलते रहते हैं, वे ही दूसरो के हृदय में असंतोष की आग सुलगाकर उन्हें संतप्त कर देते हैं। वे कहते हैं कि  ‘असंतोष के बिना उन्नति नहीं होती। उन्नति कामी को असंतोषी होना चाहिये।’ पर यह उनकी असंतोष- वृत्तिसे उदित विकृत बुद्धि का विपरीत दर्शनमात्र है। बुद्धि जब तमसाच्छन्न होकर विकृत हो जाती है, तब मनुष्य को सब विपरीत दिखायी देता है। इसलिये वह सहज ही बुरेको भला मानकर स्वयं उसी को ग्रहण करता है और वही दूसरों को भी समझा देना चाहता है।


 याद रखो-


संतुष्ट मन वाले पुरुष के अंदर से जो सहज ही एक आनन्द की लहर बाहर निकलती है रहती है; वह आस-पास के लोगों को प्रभावितकर उन्हें भी आनन्द प्रदान करती है। संतोष पुरुष ही शत्रु-मित्र-दुःख निन्दा स्तुति आदि द्वन्द्वों में समभाव रखकर भगवा्नका प्रिय भक्त हो सकता है। और वहीं अपने शान्त जीवन के द्वारा भगवान की यथार्थ पूजा कर सकता है।


याद रखो-


 अकर्मण्यता, आलस्य, प्रमाद आदिका नाम संतोष नहीं है। संतोषी पुरुष ही वस्तुतः व्यवस्थित चित्त से सत्कर्म कर सकता है; क्योंकि उसका चित्त शान्त और उसकी बुद्धि शुद्ध विवेकवती एवं यथार्थ निश्चय करनेवाली होती है।


अपने ‘स्व’ को विस्तृत करें



याद रखो-

संसार में जितने भी जड़-चेतन जीव हैं- सभी में भगवान् भरे हैं, सभी भगवान के रूप हैं या सभी आत्मस्वरूप  हैं- यह समझकर जिन प्राणियों से भी सम्पर्क प्राप्त हो, उसके रूप तथा वेश के अनुसार मन वाणी, शरीर दान, सम्मान देकर उनका पूजन या उन्हें सुख-दान करना चाहिये। किसी भी कार्य की बात सोचते तथा किसी भी कार्य को करते समय यह पूरा ध्यान रखना चाहिये कि इसमें किसी भी प्राणी का किसी प्रकार का कोई अहित तो नहीं होगा और केवल मेरा ही नहीं, दूसरों का भी इससे हित होगा या नहीं।


याद रखो-


‘स्व’ जितना ही सीमित होता है, उतना ही ‘स्वार्थ’ परिणाम में हानिकारक, अशान्तिदायक, दुःखप्रद और गंदा होता है। ‘स्व’ जितना ही बृहद-विशाल होता है, उतना ही ‘स्वार्थ भी पवित्र परिणाम  में लाभकारक, शान्ति दायक तथा सुखप्रद होता है।

जो केवल अपने व्यक्तिगत अथवा कुटुम्ब तक लाभ के लिये ही सोचा करता है- इसी को स्वार्थ समझता है, वह व्यक्तिगत लाभ के लिये चराचर जीवों तथा विश्वमानवों की तो कभी बात सोचता ही नहीं, देश को भी भूल जाता है। उसकी ईश्वरभक्ति, देशभक्ति, जनसेवा-सीमित स्वार्थ के निम्रस्तर में उतरकर ईश्वरद्रोह और देशद्रोह तथा जनसंतापतकमें परिणत हो जाती है। ऐसा ‘ईश्वरभक्त’, ‘देशभक्त’ तथा सेवक कहलाने वाला वास्तव में साधारण मनुष्य की उपेक्षा भी बहुत अधिक खतरनाक होता है- समाज के लिये, देशके लिये, विश्व के लिये; क्योंकि वह अपने नीचे स्वार्थ भरे आचरण से ईश्वर, देश तथा सेवाके पवित्र  नाम को बदनाम करता है, उनके स्वरूप को लोकदृष्टि में गिराता है और आदर्श को नष्ट करता  है।

 

याद रखो-

सेवक, देशभक्त और ईश्वर भक्त पदका  अधिकारी वही होता है जिसका ‘स्व’ छोटी सीमासे निकलकर उत्तरोत्तर बड़ी –से-बड़ी सीमामें  पहुंचाता  हुआ अन्त में  असीम में जा मिलना है। जिसका ‘स्व’ सर्वभूतमय है, वही सबका सच्चा सेवक बन सकता है, जिसका ‘स्व’ देश के ‘स्व’ में मिलकर देशात्मबोध की अनुभूति करा देता है, वही देश भक्त होता है और जिसका ‘स्व’ असीम अनन्त सर्वात्मा भगवान के साथ एकात्मता को प्राप्त कर सर्वात्मरूप हो जाता है, जो प्रत्येक चराचर प्राणी में सदा-सर्वदा भगवान के मंगलमय दर्शन करता है, वही ईश्वरभक्त है। ऐसे लोगों के जीवन में उत्तरोत्तर ‘त्याग’ की वृद्धि होकर वह सदा असीमकी ओर अग्रसर होता रहता है। जितना-जितना त्याग बढ़ता है, उतना-उतना ‘स्व’ का विस्तार तथा ‘स्वार्थ’ पवित्र होता है।  

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