जानकी मंगल - हनुमानप्रसाद पोद्दार 111 Janki Mangal - Hindi book by - Hanuman Prasad Poddar
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गीता प्रेस, गोरखपुर >> जानकी मंगल

जानकी मंगल

हनुमानप्रसाद पोद्दार

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :48
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 908
आईएसबीएन :81-293-0503-8

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जानकी मंगल सरल भावार्थ सहित....

Janki Mangal a hindi book by Hanuman Prasad Poddar - जानकी मंगल - हनुमानप्रसाद पोद्दार

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

।। श्रीहरि: ।।

प्रथम संस्करण का निवेदन

जानकी-मंगल में (जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है) प्रात: स्मरणीय गोस्वामीजी ने जगज्जननी आद्याशक्ति भगवती श्रीजानकीजी तथा परात्पर पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम के परम मंगलमय विवाहोत्सव का बड़े ही मधु शब्दों में वर्णन किया है। जनकपुर में स्वयंवर की तैयारी से आरम्भ करके विश्वामित्र के अयोध्या जाकर श्रीराम-लक्ष्मण को यज्ञ-रक्षा के व्याज से अपने साथ ले आने, यज्ञ-रक्षा के के अनन्तर धनुष-यज्ञ दिखाने के बहाने उन्हें जनकपुर ले जाने, रंग-भूमि में पधारकर श्रीराम के धनुष तोड़ने तथा श्रीजनकराजतनया के उन्हें वरमाला पहनाने, लग्न,-पत्रिका तथा तिलककी सामग्री लेकर जनक पुरोधा महर्षि शतानन्दजी के अयोध्या जाने, महाराज के दशरथ के बारात लेकर जनकपुर जाने, विवाह-संस्कार सम्पन्न होने के अनन्तर बारात के बिदा होने, मार्ग में भृगुनन्दन परशुरामजी से भेंट होने तथा अन्त में अयोध्या पहुँचने पर वहाँ आनन्द मनाये जाने आदि प्रसंगों का संक्षेप में बड़ा ही सरस एवं सजीव वर्णन किया गया है; जो प्राय: रामचरितमानस से मिलता-जुलता ही है। कहीं-कहीं तो रामचरितमानस के शब्द ही ज्यों-के-त्यों दुहराये गये हैं।

इस छोटे-से ग्रन्थ का सरल भावानुवाद कई वर्ष पूर्व कवितावली के टीकाकार हमारे पूर्वपरिचित स्वर्गीय श्रीइन्द्रदेवनारायणसिंहजीने किया था, जिसका हमारे अपने श्रीमुनिलालजी (वर्तमान स्वामी श्रीसनातनदेवजी) ने बड़े परिश्रम एवं प्रेम से संशोधन भी कर दिया था। परन्तु इच्छा रहते भी इतने लम्बे काल तक उसे छापने का सुयोग नहीं उपस्थित हुआ। श्रीसीतारामजी की कृपा से वह स्वर्ण-अवसर अब प्राप्त हुआ है और पूज्य गोस्वामीजी की यह मंगलमयी कृति सरल अनुवादसहित श्रीरामभक्तों की सेवा में सादर प्रस्तुत की जा रही है। अनुवाद कैसा हुआ, इसकी परख तो विज्ञ पाठक ही कर सकेंगे। पाठ अथवा अर्थ में जहाँ कहीं भ्रमवश तथा दृष्टि दोष से भूलें रह गयी हों, उनकी ओर यदि कोई महानुभाव हमारा ध्यान आकृष्ट कराने की कृपा करेंगे तो हम उनके कृतज्ञ होंगे तथा अगले संस्करण में उन भूलों को सुधारने की चेष्टा करेंगे। श्रीसीताराम जी के इस परम पावन चरित्र के अनुशीलन से जनता का अशेष मंगल होगा- इसी आशा से उनकी यह वस्तु उन्हीं के पाद-पद्मों में निवेदित है।

विनीत हनुमानप्रसाद पोद्दार

।। श्रीहरि: ।।

श्रीजानकी-मंगल
मंगलाचरण



गुरु गनपति गिरिजापति गौरि गिरापति।
सारद सेष सुकबि श्रुति संत सरल मति।।1।।
हाथ जोरि करि बिनय सबहि सिर नावौं।
सिय रघुबीर बिबाहु जथामति गावौं।।2।।

गुरु, गणपति (गणेशजी), शिवजी, पार्वतीजी, वाणी के स्वामी बृहस्पति अथवा विष्णुभगवान्, शारदा, द्वेष, सुकवि, वेद और सरलमति संत-सबको हाथ जोड़कर विनयपूर्वक सिर नवाता हूँ और अपनी बुद्धि के अनुसार श्रीरामचन्द्रजी और जानकीजी के विवाहोत्सव का गान करता हूँ।।1-2।।


स्वयंवर की तैयारी



सुभ दिन रच्यौ स्वयंबर मंगलदायक।
सुनत श्रवन हिय बसहिं सीय रघुनायक।।3।।
देस सुहावन पावन बेद बखानिय।
भूमि तिलक सम तिरहुति त्रिभुवन जानिय।।4।।


पृथ्वी का तिलक स्वरूप और तीनों लोकों में विख्यात जो परम पवित्र शोभाशाली और वेदविदित तिरहुत देश है, वहाँ एक अच्छे दिन श्रीजानकी का मंगलप्रद स्वयंवर रचा गया, जिसका श्रवण करने से श्रीराम और सीताजी हृदय में बसते हैं।।3-4।।

तहँ बस नगर जनकपुर परम उजागर।
सीय लच्छि जहँ प्रगटी सब सुख सागर।।5।।
जनक नाम तेहिं नगर बसै नरनायक।
सब गुन अवधि न दूसरे पटतर लायक।।6।।


वहाँ (तिरहुत देश में) जनकपुर नामक एक प्रसिद्ध नगर बसा हुआ था, जिसमें सुखों की समुद्र लक्ष्मी स्वरूपा श्रीजानकीजी प्रकट हुई थीं।।5।। उस नगर में जनक नाम के एक राजा निवास करते थे, जो सारे गुणों की सीमा थे, और जिनके समान कोई दूसरा नहीं था।।6।।


भयउ न होइहि है न जनक सम नरवइ।
सीय सुता भइ जासु सकल मंगलमइ।।7।।
नृप लखि कुँअरि सयानि बोलि गुर परिजन।
करि मत रच्यौ स्वयंबर सिव धनु धरि पन।।8।।


जनक के सामन नरपति न हुआ, न होगा, न है; जिनकी पुत्री सर्वमंगलमयी जानकीजी हुईं।।7।। राजा ने राजकुमारी को वयस्क होते देख अपने गुरु और परिवार के लोगों को बुलाकर सलाह की और शिव-धनुष को शर्त के रूप में रखकर स्वयंवर रचा। (अर्थात् यह शर्त रखकर स्वयंवर रचा कि जो शिवजी का धनुष चढ़ा देगा, वही कन्या से विवाह करेगा) ।।8।।



पनु धरेउ सिव धनु रचि स्वयंबर अति रुचिर रचना बनी।
जनु प्रगटि चतुरानन देखाई चतुरता सब आपनी।।
पुनि देस देस सँदेस पठयउ भूप सुनि सुख पावहीं।
सब साजि साजि समाज राजा जनक नगरहिं आवहीं।।1।।


राजा ने शिव-धनुष चढ़ाने की शर्त रखकर स्वयंवर रचा, जिसकी सजावट अत्यन्त सुन्दर थी, मानो ब्रह्मा ने अपना सम्पूर्ण कौशल प्रत्यक्ष करके दिखा दिया। फिर देश-देश में समाचार भेजा गया, जिसे सुनकर राजालोग प्रसन्न हुए और वे सब-के-सब अपना साज सजा-सजाकर जनकपुर में आये।।1।।


रूप सील बय बंस विरुद बल दल भले।
मनहुँ पुरंदर निकर उतरि अवनिहिं चले।।9।।
दानव देव निसाचर किंनर अहिगन।
सुनि धरि-धरि नृप बेष चले प्रमुदित मन।।10।।


वे सुन्दरता, शील, आयु, कुल की बड़ाई, बल और सेना से सुसज्जित होकर चले, मानो इन्द्रों का यूथ ही पृथ्वी पर उतरकर जा रहा हो ।।9।। दैत्य, देवता, राक्षस किन्नर और नागगण भी स्वयंवर का समाचार सुन राजवेष धारण कर-करके प्रसन्नचित्त से चले।।10।।


एक चलहिं एक बीच एक पुर पैठहिं।
एक धरहिं धनु धाय नाइ सिरु बैठहिं।।11।।
रंग भूमि पुर कौतुक एक निहारहिं।
ललकि सुभाहिं नयन मन फेरि न पावहिं।।12।।


कोई चल रहे हैं, कोई मार्ग के बीच में हैं, कोई नगर में घुस रहे हैं और कोई दौड़कर धनुष को पकड़ते हैं और फिर सिर नीचा करके- लज्जित हो बैठ जाते हैं (क्योंकि उनसे धनुष टस-से-मस नहीं होता) ।। 11 ।। कोई रंगभूमि और नगर की सजावट बड़े चाव से देखते हैं और बड़े भले जान पड़ते हैं, वे अपने मन और नयनों को वहाँ से फेर नहीं पाते।।12।।



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