1278 दशमहाविद्या - गीताप्रेस 1278 Dashmahavidya - Hindi book by - Gitapress
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1278 दशमहाविद्या

गीताप्रेस

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :23
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 859
आईएसबीएन :81-293-1068-6

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प्रस्तुत है दस महाविद्याओं का वर्णन...

Dashamahavidhya a hindi book by Gitapress - दसमहाविद्या - गीताप्रेस

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

1-काली

दस महाविद्याओंमें काली प्रथम हैं। महाभागवतके अनुसार महाकाली ही मुख्य हैं और उन्हीं के उग्र और सौम्य दो रूपोंमें अनेक रूप धारण करनेवाली दस महाविद्याएं हैं। विद्यापति भगवान् शिवकी शक्तियाँ ये महाविद्याएँ हैं। विद्यापति भगवान, शिव की शक्तियाँ ये महाविद्याएँ अनन्त सिद्धियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं। दार्शनिक दृष्टिसे भी कालतत्तवकी प्रधानता सर्वोपरि है। इसलिये महाकाली या काली ही समस्त विद्याओं की आदि हैं। अर्थात् उनकी विद्यामय विभूतियाँ ही महाविद्याएं हैं। ऐसा लगता है कि महाकालकी प्रियतमा काली ही अपने दक्षिण और वाम रूपों में दस महा विद्याओं के नामसे विख्यात हुईं। बृहन्नीलतन्त्रमें कहा गया है कि रक्त और कृष्णभेदसे काली ही दो रूपों में अधिष्ठित हैं। कृष्णाका नाम ‘दक्षिणा’ और रक्तवर्णाका नाम ‘सुन्दरी’ है।

कालिकापुराण में कथा आती है कि एक बार हिमालयपर अवस्थित मतंग मुनिके आश्रम में जाकर देवताओं ने महामायाकी स्तुति की। स्तुति से प्रसन्न होकर मतंग-वनिताके रूप में भगवतीने देवताओं को दर्शन दिया और पूछा कि तुमलोग किसकी स्तुति कर रहे हो। उसी समय देवीके शरीर से काले पहाड़ के समान वर्णवाली एक और दिव्य नारीका प्राकट्य हुआ। उस महातेजस्विनी ने स्वयं ही देवताओं की ओर से उत्तर दिया कि ‘ये लोग मेरा ही स्तवन कर रहे हैं।’ वे काजलके समान कृष्णा थीं, इसलिये उनका नाम ‘काली’ पड़ा।

दुर्गा सप्तशीतीके अनुसार एक बार शुम्भ-निशुम्भ के अत्याचार से व्यथित होकर देवताओं ने हिमालय जाकर देवीसूक्त से देवीकी स्तुति की, तब गौरीकी देहसे कौशिकीका प्राकट्य हुआ। कौशिकी के अलग होते ही अम्बा पार्वतीका स्वरूप कृष्णा हो गया, जो ‘काली’ नाम से विख्यात हुईं। कालीको नीलरूपा होने के कारण तारा भी कहते हैं। नारद-पाञ्चरात्र के अनुसार एक बार कालीके मन में आया कि वे पुनः गौरी हो जायँ। यह सोचकर वे अन्तर्धान हो गयीं। शिवजीने नारदजी से उनका पता पूछा। नारदजी ने उनसे सुमेरुके उत्तर में देवी के प्रत्यक्ष उपस्थित होने की बात कही। शिवजीकी प्रेरणासे नारद वहां गये। उन्होंने देवीसे शिवजी के साथ विवाहका प्रस्ताव रखा। प्रस्ताव सुनकर देवी कुद्ध हो गयीं और उनकी देहसे एक अन्य षोडशी विग्रह प्रकट हुआ और उससे छाया विग्रह त्रिपुरभैरवीका प्राकट्य हुआ।

काली की उपासना में सम्प्रदायगत भेद हैं। प्रायः दो रूपों में इनकी उपासना का प्रचलन हैं। भव-बन्धन, मोचनमें उपासना सर्वोत्कृष्ट कही जाती है। शक्ति –साधना के दो पीठों में कालीकी उपासना श्याम-पीठा पर करनेयोग्य हैं। भक्तिमार्ग में तो किसी भी रूप में उन महामाया की उपासना फलप्रदा है, पर सिद्धके लिये उनकी उपासना वीरभाव से की जाती है। साधना के द्वारा जब अहंता, ममता और भेद-बुद्धिका नाश होकर साधन में पूर्ण शिशुत्व का उदय हो जाता है, तब कालीका श्रीविग्रह साधकके समक्ष प्रकट हो जाता है। उस समय भगवती कालीकी छवि अवर्णनीय होती है। कज्जलके पहाड़ के, समान, दिग्वसना, मुक्तकुन्तला, शवपर आरुढ़, मुण्डमालाधारिणी भगवती कालीका प्रत्यक्ष दर्शन साधकको कृतार्थ कर देता है। तान्त्रिक-मार्ग में यद्यपि कालीकी उपासना दीक्षागस्य हैं, तथापि अनन्य शरणागति के द्वारा उनकी कृपा किसी को भी प्राप्त हो सकती है। मूर्ति, मन्त्र अथवा गुरुद्वारा उपदिष्ट किसी भी आधारपर भक्तिभावसे, मन्त्र-जप, पूजा, होम और पुरश्र्चरण करने से भगवती काली प्रसन्न हो जाती हैं। उनकी प्रसन्नतासे साधकको सहज ही सम्पूर्ण अभीष्टों की प्राप्ति हो जाती है।

2-तारा


भगवती कालीको ही नीलरूपा होनेके कारण तारा भी कहा गया है। वचनान्तरसे तारा नामका रहस्य यह भी है कि वे सर्वदा मोक्ष देनेवाली, तारनेवाली हैं, इसलिये इन्हें तारा कहा जाता है। महाविद्याओँ में ये द्वितीय स्थानपर परिगणित हैं। अनायास ही वाक्शक्ति प्रदान करने में समर्थ हैं, इसलिये इन्हें नीलसरस्वती भी कहते हैं। भयंकर विपप्तियों से भक्तों की रक्षा करती हैं। इसलिये उग्रतारा हैं। बृहन्नील-तन्त्रादि ग्रन्थों में भगवती ताराके स्वरूप की विशेष चर्चा है। हयग्रीवका वध करने के लिये इन्हें नील-विग्रह प्राप्त हुआ था। ये शवरूप शिवरूप प्रत्यालीढ़ मुद्रा में आरुढ़ हैं। भगवती तारा नीलवर्णवाली,नीलकमलों के समान तीन नेत्रोंवाली तथा हाथों में कैंची, कपाल, कमल और खड्ग धारण करनेवाली हैं। ये व्याघ्रचर्मसे विभूषिता तथा कण्ठ में मुण्डमाला धारण करने वाली हैं।

शत्रुनाश, वाक्-शक्ति की प्राप्ति तथा भोग-मोक्ष की प्राप्ति के लिये तारा अथवा उग्रतारा की साधना की जाती है। रात्रिदेवी की स्वरूपा शक्ति तारा महाविद्याओं में अद्भुत प्रभाववाली और सिद्ध की अधिष्ठाती देवी कहीं गयी है। भगवती ताराके तीन रूप हैं।–तारा, एकजटा और नील सरस्वती। तीनों रूपों के रहस्य, कार्य-कलाप तथा ध्यान परस्पर भिन्न हैं, किन्तु भिन्न भिन्न होते हुए सबकी शक्ति समान और एक है। भगवती ताराकी उपासना मुख्यरूप से तन्त्रोक्त पद्धतियों से होती हैं, जिसे आगमोक्त पद्धति भी कहते हैं। इनकी उपासना से समान्य व्यक्ति भी बृहस्पति के समान विद्वान हो जाते है।
भारतमें सर्वप्रथम महर्षि वसिष्ठ ने ताराकी अराधना की थी। इसलिये ताराको वसिष्ठाराधिता तारा भी कहा जाता है। वसिष्ठ ने पहले भगवती ताराकी आराधना वैदिक रीतिसे करनी प्रारम्भ की, जो सफल न हो सकी। इन्हें अदृश्य शक्ति से संकेत मिला कि वे तान्त्रिक-पद्धतिके द्वारा जिसे ‘चिनाचारा’ कहा जाता है, उपासना करें। जब वसिष्ठ ने तान्त्रिक पद्धति का आश्रय लिया, तब उन्हें सिद्ध प्राप्त हुई। यह कथा ‘आचार’ तन्त्र में वसिष्ट मुनि की आराधना उपाख्या में वर्णित है। इससे यह सिद्ध होता है कि पहले चीन, तिब्बत, लद्दाख आदि में ताराकी उपासना प्रचलित थी।
ताराका प्रादुर्भाव, मेरू-पर्वतके, पश्चिम भाग में चोलना’ नामकी नदीके या चोलन सरोवरके तटपर हुआ था, जैसा कि स्वतन्त्रतन्त्रमें वर्णित है-

मेरोः पश्र्चिमकूले नु चोत्रताख्यों हृदो महान्।
तत्र जज्ञे स्वयं तारा देवी नीलसरस्वती।।

‘महाकाल-संहिता के काम कलाखण्ड में तारा-रहस्य वर्णित है, जिसमें तारारात्रिमें ताराकी उपासनाका विशेष महत्त्व है। चैत्र-शुक्ल नवमी की रात्रि ‘तारारात्रि’ कहलाती है-


चैत्रे मासि नवम्यां तु शुक्लपक्षे तु भूपते। क्रोधरात्रिर्महेशानि तारारूपा भविष्यति।। (पुरश्चर्यार्णव भाग-3)

बिहार के सहरसा जिले में प्रसिद्ध ‘महिषी’ ग्राम में उग्रतारा का सिद्धपीठ विद्यमान है। वहाँ तारा, एकजटा तथा नीलसरस्वती की तीनों मूर्तियाँ एक साथ हैं। मध्य में बड़ी मूर्ति तथा दोनों तरफ छोटी मूर्तियाँ हैं। कहा जाता है कि महर्षि वसिष्ठ ने यहीं ताराकी उपासना करके सिद्ध प्राप्त की थी। तन्त्रशास्त्रके प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘महाकाल’-संहिता के गुह्य-काली खण्ड में महाविद्याओं की उपासनाका विस्तृत वर्णन हैं, उनके अनुसार ताराका रहस्य अत्यन्त चमत्कारजनक हैं।

3-छिन्नमस्ता


परिवर्तनशील जगत् का अधिपत्य कबन्ध हैं और उसकी शक्ति ही छिन्नमस्ता है। विश्व की वृद्धि-ह्रास तो सदैव होती रहती है। जब ह्रासकी मात्रा कम और विकासकी मात्रा अधिक होती है, तब भुवनेशेवरी का प्राकट्य होता है। इसके विपरीत जब निर्गम अधिक और आगम कम होता हैं, तब छिन्नमस्ताका प्राधान्य होता है।

भगवती छिन्नमस्ता का स्वरूप अत्यन्त ही गोपनीय है। इसे कोई अधिकारी ही जान सकता है। महाविद्याओं में इसका तीसरा स्थान होता है। इसके प्रादुर्भाव की कथा इस प्रकार है- एक बार भगवती भवानी अपनी सहचरी जया और विजया के साथ मन्दाकिनी में स्नान करने के लिये गयीं। स्नानोपरान्त क्षुधाग्रिसे पीड़ित होकर वे कृष्णवर्ण की हो गयीं। उस समय उनकी सहचरियों ने भी उनसे कुछ भोजन करने के लिये माँगा। देवी ने उनसे कुछ समय प्रतीक्षा करने के लिये कहा। थोड़ी देर प्रतीक्षा करने के बाद जब सहचरियों ने पुनः भोजन के लिये निवेदन किया.तब देवी ने उनसे कुछ देर और प्रतीक्षा करने के लिये कहा। इस सहचरियों ने देवी से विनम्र स्वर में कहा कि माँ तो अपने शिशुओं को भूख लगने पर अविलम्ब भोजन प्रदान करती है आप हमारी उपेक्षा क्यों कर रही है। ?

अपने सहचरियों के मधुर वचन सुनकर कृपामयी देवी ने अपने खड्गसे अपना सिर काट दिया। कटा किया हुआ सिर देवी के बायें हाथ में आ गिरा और उनके कबन्ध से रक्त की तीन धाराएं प्रवाहित हुईं। वे दो धाराओंको अपनीदोनों सहचरियों की ओर प्रवाहित कर दीं। जिसे पीती हुई दोनों प्रसन्न होने लगीं तीसरी धाराको देवी स्वयं पान करने लगीं। तभी देवी छिन्नमस्ता के नाम से प्रसिद्ध हुईं।


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